गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

सपना जो पूरा हुआ - वर्गिज कुरियन



4th March 2009

This is an autobiography of Verghese Kurien, the man behind bringing White Revolution in India. The original book is in English. This is its hindi translation.

मैं अभी यह किताब पढ़ रहा हूँ। कई खास बातें हैं । गीता पीरामल की पुस्तक Business Maharaja पढ़ा हूँ। लेखिका ने इस पुस्तक में लिखा है कि जीवन में एक ऊंचाई के बाद आसमान छूने के लिए केवल काबिलियत काफी नहीं होती है। यह आवश्यक है कि किसी न किसी का वरद हस्त सर के ऊपर हो जो कठिनाइयों को दूर कर सके तथा छलांग लगवा सके। कुरियन में काबिलियत तो थी ही साथ ही उनके जीवन में ऐसे लोग भी मौजूद थे।

कुरियन ने जो भी अनुभव किया एवं सीखा उसे बहुत ही सहज भाषा में परोस दिया है। पढ़ने में बहुत ही सरल और सुनी सुनाई सी बात लगती है लेकिन शब्दों में अनुभव की ऊष्मा महसूस कर सकते है। यथा :

जब आप स्वयं के लाभ के लिए काम करते हैं तो उससे प्राप्त सुख अल्पकालिक होता है, लेकिन यदि आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो संतुष्टि का एक गहरा भाव जाग्रत होता है और जो धन मिलता है, वह आवश्यकता से कहीं अधिक होता है। ( पृ. ४३)।

सरकारी अनुष्ठानों से मिले कटु अनुभवों को बेबाक शब्दों में अभिव्यक्त किया :

जब भी सरकार किसी व्यवसाय में घुसती है तो भारतीय जनता के साथ धोखा किया जाता है। सरकार के किसी भी व्यवसाय में शामिल होने का सबसे अप्रत्यक्ष प्रभाव यह पड़ता है कि सरकार जनता के निहित हितों कों पूरा करने के बजाय स्वयं के स्वार्थों की पूर्ति में लग जाती है। (पृ.४४)

डेयरी की स्थापना करते हुए उनके सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी - उत्पादन ऐसे मूल्य पर होना चाहिये कि वस्तु को लाभ के साथ बेचा जा सके :

किसी भी वस्तु का उत्पादन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई वस्तु उस कीमत से अधिक पर नहीं बिकती, जिस पर उसका उत्पादन हुआ है। अधिक कीमत उत्पादक को और अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित करती है । (पृ.६८)

स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजों के तौर तरीकों से ही कार्य करने की पद्धति से भी वे संतुष्ट नहीं हैं :

ब्रिटिशों के कार्य करने की पद्धति कुछ इस तरह की थी कि कोई भी काम सरकारी नियमों द्वारा स्वीकृति लेने के बाद ही होता था और स्वतंत्रता के बाद भी हम भारतियों ने उसमें सुधार न करते हुए उसी ढर्रे पर चलना जारी रखा।

दुर्भाग्यवश , हम भारत की सबसे बड़ी संपत्ति - यहाँ की जनता - को ही भूल गए। किसी भी अनुभवी सरकार के लिए आवश्यक है कि वह देश की जनता को अपनी सबसे बड़ी संपत्ति माने और किसी भी कार्य को नौकरशाही को देने के बजाय देश की जनता को सौंपने की कोशिश करे। (पृ.७०)


विदेशी धन के निवेश पर टिप्पणी करते हुए, कूरियन लिखते हैं :

कोई भी देश किसी दूसरे देश में तब तक निवेश नहीं कर सकता जब तक उसे निवेशित धन से अधिक प्राप्त होने की आशा न हो। (पृ.७३)

आज जब हर राजनीतिज्ञ किसी भी तरीके से पैसे बनाने के चक्कर में है, टी.टी.कृष्णामचारी की एक घटना का उल्लेख सुकून पहुंचाती है। टी.टी.कृष्णामचारी की संस्था टी.टी.के.एंड सन्स को अमूल मख्खन का वितरक बनाया गया था। टी.टी.कृष्णामचारी जो उस समय वित्तमंत्री थे इस कंपनी के मालिक थे। टी.टी.के. को लगा कि यह उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं होगा। अत: , उन्होंने २४ घंटों में वितरक को बदलने का आदेश दिया। आज के राजनीतिज्ञों के लिए यह एक सबक है।

11th March 2009

प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी आणन्द का दौरा किया था। उनकी जिद थी के वे एक गांव में किसी किसान के घर पर ही निवास करेंगें। सुरक्षा के इंतजाम एवं वास्तविक गाँव में असली किसान के घर पर ठहराने का काम आसान नहीं था। लेकिन इसे सफलता पूर्वक किया गया। शास्त्रीजी ने आणन्द में किसानों से काफी बातें कीं, वहां कि जलवायु, मिटटी एवं हर प्राकृतिक परिस्थिति का जायजा लिया। फ़िर कुरियन से पुछा कि आणन्द में ऐसी कोई विशेषता नहीं है जिसके कारण यहाँ के डेयरी सफल हो और दूसरी जगह असफल। फिर उनकी हर सरकारी डेयरी जो पूरे देश में फैली हुई हैं वे क्यों नहीं चल रही हैं? कूरियन ने बताया कि इसका केवल एक कारण है - बाकि सब डेयरियाँ सरकारी हैं जबकि उनकी डेयरी किसानों कि ख़ुद कि हैं।

शास्त्रीजी ने उसी समय देश कि सब डेयरी का संचालन कुरियन के हाथों में देने का निर्णय ले लिया लेकिन दिल्ली लौटने के बाद उनका निर्णय नौकरशाही के बीच फँस गया। कुरियन कि पहुँच प्रधानमंत्री एवं अन्य सत्ताधारी राजनीतिज्ञों तक भी थी। लेकिन इसके बावजूद उन्हें बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ा । जगह जगह उनकी यह खीज उजागर होती है :-
दिल्ली के लोग बहुत सी चीजों के बारे में तो सोचते हैं, सिर्फ किसानों के बार में नहीं सोचते। (प्र.१०९)
सरकार के साथ संपर्क के दौरान मुझे इस बात का पूरी तरह से अहसास हो गया था कि सरकार का काम सिर्फ शासन करना है। उन्हें व्यवसायों को चलाने का काम नहीं करना चाहिये। सरकार के नियम-कानूनों का उद्देश्य डेयरियाँ चलाना नहों था, बल्कि देश का शासन चलन था। (प्र.११२)

कुरियन सरकार कि उस प्रक्रिया से बहुत कुंठित थे जो एक निरर्थक प्रक्रिया का अंग बन चुकी थी जिसमें समय एवं शक्ति का बहुत व्यय होता था. एन.डी.डी.बी. कि फाइल को ले कर वे कहत परेशान रहे। उन्हीं के शब्दों में:
मैं फाइल ले कर गया और सचिव से मिला, जिसने कुछ चर्चा के बाद मुझसे कहा,"हाँ सरकार इस मुद्दे पर विचार करेगी।" जब मैं ने पूछा सरकार कौन है?" तो उनहोंने मुझे बताया,"यह सरकार मंत्री हैं।" इसलिए मैं फाइल ले कर ,"पहले कृषि मंत्री, फिर वित्त, योजना और पर्यावरण मंत्री के पास गया। वहां एक बार फिर इस मुद्दे पर वही पुरानी चर्चा कि गई और मुझे बताया गया कि,"हाँ, सरकार इसपर विचार करेगी।" (प्र.१४०)
इस बार सरकार प्रधानमंत्री थे। और प्रधानमंत्री ने सरकार कैबिनेट को बताया। पुरा साल बीत गया था। मेरे मन में यह कलुषित विचार घर कर गया था कि जिस व्यक्ति से भी मिलूं और वह मुझे बताये कि "सरकार इस विषय पर विचार करेगी" तो इसका अर्थ होगा कि इसपर कोई भी विचार करने नहीं जा रहा है। (प्र.१४०)

26th March 2009

ऑपरेशन फ्लड की कामयाबी के साथ इसकी देश एवं विदेशों में धूम मच गई तथा अनेक अति विशिष्ट व्यक्तियों कातांता लग गया। इनमें रूस के प्रधानमंत्री कोसिगिन भी थे। डेयरी देखने के बाद उन्होंने कहा कि भारत में दूध केअलावा वनस्पति तेल, जूट एवं कपास में भी ऐसी ही क्रान्ति की आवश्यकता है। दूध वितरण में सुधार कराने में३० वर्ष लगे और इसी प्रकार तेल के लिए ३० वर्ष एवं जूट के लिए ३० वर्ष लगे तो अपना कार्य पूरा करने के पहले हीकुरियन इस दुनिया से विदा हो जायेंगें। अत: महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को इतना धीरे धीरेनहीं किया जाना चाहिए। इन सभी परिवर्तनों को सभी क्षेत्रों में एक साथ एवं शीघ्रता से लाया जाना चाहिए। यहएक क्रान्ति की तरह होना चाहिए। और इसके साथ ही कोसिगिन ने कुरियन को रूस आने का निमंत्रण दिया।कुरियन रूस गए, वहाँ घूमे और उसके बाद कोसिगिन की टिप्पणी को पूरी तरह नकारते हुए लिखा :
"परिवर्तन में निशिचित रूप से समय लगना चाहिए। बुनियादी सामाजिक और आर्थिक परिवर्थान क्रमिक दंग से लाये जाने की आवश्यकता है। जितनी अधिक सावधानी एवं सोच विचार करके इसे लाया जाएगा उताना ही यह अधिक स्थायी होगा। (पृ.१९१)"
कुरियन को कई देशों से वहाँ के दूध वितरण व्यवस्था को सुधारने के लिए निमंत्रण मिला और वे वहाँ गए भी ।
लेकिन दुर्भाग्यवश कहीं भी सफलता नहीं मिली। इसके प्रमुखत: दो कारण रहे। पहला - दुग्ध वितरण में लगे हुएव्यवसाइयों का विरोध एवं दूसरा उस देश में अपना दूध बेचने वाली MNC। वहाँ की सरकारों ने इन दो शक्तियों केआगे घुटने टेक दिए। उनके अनुभवों से यह साफ़ विदित होता है की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कितनी ताकतवर होतीं हैंतथा उनका उद्देश्य केवल अपनी कमाई होती है, और इस उद्देश्य की पूर्ती में वे उस देश का कितना अहित करतीं हैं।

कूरियन पाकिअस्तान भी गए और वहाँ के लोगों से मिले। उनसे मिलने के बाद वे लिखते हैं:
"मेरी समझ में दोनों देशों के बीच चल रही कटुता बेबुनियाद है। मेरे विचार से, विभाजन के पीछे विकसित देशों का षड्यंत्रकारी दिमाग हमें कमजोर बनाने का रहा है।" (पृ.१९४)
श्री लंका में नेस्ले कंपनी ने लंका के बाजार को आधा आधा बाँट लेने का प्रस्ताव रखा जिसे कूरियन ने ठुकरा दिया। फलस्वरूप अंत में कूरियन को ही वापस आना पडा।

दूध वितरण की सफलता के बाद, सरकार के अनुरोध पर कूरियन ने बिजली, नमक, फल एवं सब्जी के वितरण व्यवस्था का अध्ययन किया। लेकिन अब तक वे सरकार से लड़ते लड़ते काफी थक चुके थे। सरकार का भी पहले जैसा समर्थन प्राप्त नहीं था, भ्रष्टाचार एवं नैतिकता का इतना ज्यादा पतन हो चुका था कि कूरियन क्षुब्ध हो जाते थे।
"वास्तव में यह पता करके मेरे रोंगटे खड़े हो गए कि हमारे लाइनमैन ही किसानों को बिजली चुराने के गुर सिखा रहे थे।" (पृ.२०१)
इन पीड़ा के क्षणों में उन्हें कोसिगिन की फिर याद आई :
"कई बार सरकारी कर्मचारियों ने खुलासा किया कि उनका अस्तित्व उनकी शक्ति और पैसे के कारण है। उनका अस्तित्व देश की भलाई पर टिका नहीं है। अत्यन्त निराशा के इस क्षणों में मुझे वास्तव में आश्चर्य होता है कि कोसिगिन द्वारा दी गई सलाह पर मैंने ध्यान क्यों नहीं दिया। परिवर्तन केवल क्रांति द्वारा और कुछ लोगों का सर काट कर लाया जा सकता है। निस्संदेह यह मेरा ऐसा संघर्ष था, जिससे मैं पीछे हट गया। (पृ.२०४)
वर्त्तमान नेताओं एवं राजनीतिज्ञों पर लिखते हैं:
"यह देख कर पीड़ा होती है कि हमारे पास अब वे महान उद्देश्य अनुसरण के लिए नहीं है और हम घटिया नेता पैदा कर रहें हैं। सरकार से मेरा संबंध पचास वर्षों से अधिक का रहा। मैंने पाया कि सार्वजनिक जीवन में शालीनता दुर्लभ हो गयी है। आज जब शक्ति एवं धन हासिल करने के लिए तीव्र स्पर्धा चल रही है तो अशिष्टता चरम सीमा पर पहुँच गयी है और योग्यता सबसे पीछे रहा हाई है.(पृ.२०७)
लोकतंत्र क्या है :
"
नौकरशाहों की सरकार, नौकरशाहों द्वारा तैयार सरकार और नौकरशाहों के लिए सरकार - लोकतंत्र के इस ब्रांड का जनता में कोई स्थान नहीं है। (पृ। २०७)
अन्तिम पृष्ठों में कूरियन दार्शनिक हो जातें हैं :
"बहुत कम पैसे होना कष्टकारी है, क्योंकि तुम्हारे पास खाने तथा अपनी भूख शांत करने के लिए भी पर्याप्त धन होना चाहिए। किंतु अत्यधिक धन होना इससे भी बुरा है, क्योंकि तब तुम निश्चय ही भ्रष्ट हो जाओगे।(पृ.२२४)
"जब भी आपको आपकी योग्यता से कम मिलता तो आप सम्मान पा सकते हैं और यदि आपको योग्यता से अधिक पैसे मिलते हों तो आपको कोई सम्मान नहीं मिलेगा। (पृ.२२५)
पूरी पुस्तक पड़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि

१। गीता पीरामल का यह कथन पूर्णतया सही है कि सफलता के लिए किसी शक्तिशाली व्यक्ति का वरदहस्त सर पर होना चाहिए।
२। हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से बच कर रहना चाहिए।
३। सरकारी कर्मचारी देश एवं जनता की भलाई के लिए नहीं केवल अपनी भलाई ले लिए होते है।

गुरुवार, 19 मार्च 2009

गंगा | Ganga

एक बूंद पानी। अनगिनत बूंदों के समूह से बना अथाह जल सागर। सूर्य की किरणों से वाष्प में परिणत हुईं । भाग्यशाली बूंदों को मिला कैलाश का सहारा और परिणत हो गईं बर्फ की शिलाओं में। विधाता का खेल। वापस उसी सूर्य की किरणों के कारण जल का रूप लिया और प्रादुर्भाव हुआ जल स्त्रोत का। २५०० किलोमीटर से ज्यादा लंबा सफर तय करना है और साथ ही २२००० फीट नीचे भी उतरना है। कहाँ समय है उसके पास? बड़ी बड़ी चट्टानों को काटती, उनके बीच से रास्ता निकालती, इतराती, इठलाती, कूदती, फांदती आगे बढ़ती है। रास्ते में बहुमूल्य एवं दुर्लभ जड़ी बूटियों को मथते हुए अपने में समेटती भी है। ६७ मीटर प्रति किलोमीटर की गति से उतरती हुई समतल भूभाग पर पहुंचती है। समुद्र में वापस मिलने के पूर्व २९ बड़े शहरों, २३ छोटे शहरों तथा अन्य ४८ कस्बों को देखना भी है और साथ ही दस लाख वर्ग किलोमीटर की भूमि को उपजाऊ भी बनाना है। अपनी इस भाग दौड़ में उसे ध्यान ही नहीं रहा कि चलते चलते उसे महादेव के चरणों को धोना भी है। उत्तर से दक्षिण की और जाती हुई अचानक वह घूम जाती है और वापस अपने उदगम दिशा की ओर, दक्षिण से उत्तर की तरफ़ दौड़ पड़ती है। महादेव की नगरी को देखने, महादेव के चरण धोने।

आप शायद समझ ही गए हैं। जी हाँ, मैं गंगा की बात कर रहा हूँ। गंगा जिसे हमने 'माँ गंगा', 'गंगा मैया' का सम्बोधन दिया और देवी मान कर पूजा की। हाँ, गंगा हमारी माता है, देवी स्वरूपा है, उसी की करुणा से भारत भूमि इतनी उपजाऊ एवं हरियाली है। लेकिन क्या हम उसके सपूत हैं? माता ने हमें इतना कुछ दिया, उसके बदले हमने उस के साथ कैसा व्यवहार किया? यह सही है कि गंगोत्री से हमने उसे पूजना शुरू किया, हरिद्वार में आरती उतारी, इलाहबाद को प्रयाग राज का नाम दिया, काशी में उसे भवतारिणी बताया, गंगासागर में हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन मेले का आयोजन किया। लेकिन उसकी दुःख भरी कहानी भी गंगोत्री से ही प्रारम्भ हो जाती है। संसार की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में गंगा का भी नाम है। अपने श्रद्धा सुमन को हम प्लास्टिक के बैग में साथ लेकर जाते हैं और पुष्प पूजा के बाद उस प्लास्टिक को भी गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिए जले, अधजले एवं अनजले शवों को भी गंगा में बहाने में जरा भी संकोच नहीं करते। जानवरों को नहलाने एवं कपड़ों कों धोने में तो हमें जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती।
ढेर के ढेर फूल चढ़ा कर हम जहाँ एक तरफ़ पूजा करते हैं वहीं उसे गन्दा भी करते हैं। हम अपनी बाहरी गन्दगी के अलावा आतंरिक गंदगी भी डालने में नहीं हिचकिचाते। लेकिन गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित हुई है कपड़े एवं चमड़े के उद्योग से निकली हुई रासायनिक कीचड़ के कारण तथा शहरों एवं कस्बों से निकली हुई गन्दी नालियों से। ८०% प्रदूषण इन शहरों की गंदगियों को आत्मसात करने से हुई है।

गंगा action plan के अंतर्गत सरकार ने १००० करोड़ रुपये व्यय किए। लेकिन अधिकांश रुपया बिना कुछ प्रभावित किए बह गया। लेकिन आशा की किरणें आज भी हैं। बहुत से सार्वजनिक संगठन गंगा को प्रदूषण मुक्त करने में लगे हुए हैं। वाराणसी में संकट मोचन मन्दिर के महन्त डा. वीर भद्र मिश्र उन में से एक हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के वैज्ञानिक डा. बिल ओसवाल्ड के साथ मिल कर डा. मिश्र इस योजना पर काम कर रहे हैं। डा. मिश्र ने संकट मोचन फाउन्देशन के नाम से धर्म निरपेक्ष एन. जी.ओ. संस्था बनाई है। इस फाउन्देशन के तहत उनहोंने 'स्वच्छ गंगा' आन्दोलन भी छेड़ रखा है जिसे भारत के अलावा अमेरिका, स्वीडेन, ब्रिटेन एवं आस्ट्रेलिया से भी समर्थन एवं सहयोग प्राप्त है। डा. मिश्र का नाम United Nations के Environmental Program's Global 500 में दर्ज है। Time पत्रिका ने Hero of the Planet का पुरस्कार भी दिया है। किसी श्रद्धालू ने पूछा -'डा. मिश्र what I can do for making Ganga clean?' उन्ही के शब्दों में -'It cannot be cleaned just by technology, just by setting up the right kind of infrastructure, there has to be an intermixing of culture, faith, science and technology. We have that kind of relation with Ganga.' उनहोंने आगे कहा -'This is not visionary. It is simply essential.' उनहोंने अंत में कहा-' To clean the river is a natural extension of a religious conviction.'

तो श्रद्धालुओं आपके पास जो है वही दें। धन, समय, तकनीक, और कुछ नहीं तो समुचित एवं सच्ची भावना तो दे ही सकते हैं। सच्ची लगन की बस एक बूंद।




गुरुवार, 12 मार्च 2009

Mahatma's personal belongings


ONE metal rimmed glasses
ONE pocket watch
ONE pair of sandal
ONE plate, and
ONE bowl
Purchaser - Vijay Mallya
Price - Rs.9.3 crore and lots of controversy
This raises lots of question.

ONE

A person or a family always like to inherit or keep or preserve the memorabilia of one's family and fore fathers at "Any Cost". However "Any Cost" differs from person to person, family to family. It largely depends on two things - first the emotional attachment one has with the material or the person, and the second ones strength to inherit, preserve the memorabilia. This includes the financial strength. Of the two, the first i.e. sentiment is essential and has greater priority as without sentiment any such material looses its charm and value.


Mahatma is Father of the Nation, hence we all Indians are his family members. So the first question comes up is does his Family members have any attachment with the father? I have.

TWO


Stronger the sentiment, stronger is the desire to inherit the memorabilia. But if one doesn't have the required strength to get them, they try to hide their weakness under the pretext of "Not worth its value" or similar other moral grounds. But the tragedy is if one member of the family posses the required strength and thus succeeds in inheriting the same why others makes noise instead of clapping?

THREE

The owner of the memorabilia Mr.Otis had promissed to donate them to Indian Government if the later agrees to step up its budgetry allocation for health care of the poors of India AND to promote the Gandhian Philosophy i.e. peace and non voilance outside India. The Government was not in a position to make any such commitment. However some time back the Government have written of Rs.1,00,000 crores - Rs.30,000 crores by reducing Service Tax and Rs.70,000 crores by writing off loans to farmers. The eyes of the Government is always on the vote banks than anything else.
While Otis has put up his demand, in one way he had said , you slumdog first become millionaire then talk to me. Mallya and Doshi replied to him that we are not slumdog and are not millionaire but are billionaire. I am proud of them for their fitting reply.

FOUR

One very interesting observation. The two sons who fought for the Fathers memorabilia one is Liquor Baron and the other is promoter of Criket. Both doesn't zeal with the Mahtma's philosphy. But at the same time both of them had cried out at the top of their voice " Mahatma! I love you Dad." Gandhians and other sons of the Father should feel proud of these brothers.

FIVE

What Gandhains will do if Grand and Great Grand Sons of the Mahatma will forget him? Hence the way it is important to spend resources to spread His philosophies, similarly its important to spend to keep Mahatma alive in the minds of his family. Its required to be loudly spoken that if a Liquor Baron can spend such huge resources, if a cricketer has so much love for him how much others should have ? Taking this as an example we need to encourage all others to spend resources and follow Gandhian philosophy.