वार्षिक त्यौहार दीवाली ने हमारे घर पर दस्तक दे दी है। दीवाली के आगमन की तैयारी अब अपने अंतिम चरण में है। दीवाली, जो पहले भारत का त्यौहार था अब धीरे-धीरे इसे वैश्विक दर्जा भी मिलने लगा है। अनेक देशों ने इस दिन सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी है, तो कई देशों ने इस दिन आंशिक-धार्मिक-सामुदायिक छुट्टी की घोषणा की है। कई विदेशी शहरों में भी सरकारी भवनों और पर्यटक इमारतों को रोशनी से सजाया जाता है, जिनमें मुस्लिम मुल्क भी शामिल हैं। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी गाहे-बगाहे पटाखों की आवाज सुनने लगी है, पटाखों की रोशनी दिख रही है। आकाश दीप के गुब्बारे और छतों पर जली आकाश दीप भी दिख रही हैं। लेकिन सबसे खास बात यह है कि दीवाली हमारा पारिवारिक त्यौहार है। इसे हम अपने घर-परिवार में एक साथ मानते हैं। पूरा परिवार एक घर में जमा होता है और वहीं इसे सानंद मनाया जाता है। कोई पार्टी नहीं, कोई दोस्तों की जमघट नहीं, कोई केक नहीं। आधुनिकता और कॉर्पोरेट ने इसमें काफी दखल-अंदाजी की है लेकिन इसके बावजूद भी आज भी यह प्रमुखतः पारिवारिक त्यौहार ही है।
कई परिवारों ने ‘बचत’ के नाम पर एक साथ
जमा होना छोड़ दिया है। बच्चे, भाई-भाई,
माँ-बाप अलग-अलग, अपने-अपने शहरों में मनाते हैं। ‘एक दिन के लिए आ कर क्या करेंगे, बहुत खर्च हो
जाएगा!’ नहीं मिलने का रामबाण बहाना है। क्या इतना भी नहीं
कमा रहे हो कि एक दिन के लिए नहीं आ सको? पूरा परिवार एक साथ
हो सके! नहीं ऐसा नहीं है, बस मानसिकता हो गई है, और इसमें बच्चों का कम माँ-बाप का ही हाथ ज्यादा है। आर्थिक तंगी-दबाव को
नजरंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन बचपन से ही हमने उन्हें ऐसी समझ डाल दी है –
परिवार बाद में अन्य सब कुछ उसके पहले। जब बच्चे छोटे थे आप को उनकी जरूरत नहीं थी, तब आकर क्या करेंगे। अब वे बड़े हो गए तब जाकर क्या करेंगे?
लेकिन इन सब विषमताओं के
विपरीत ऐसे परिवार हैं जिनके लिए परिवार
ही सबसे पहले है,
अन्य सब उसके पीछे। देश के एक छोटे से शहर में पला-बड़ा और बढ़ा यह छोटा सा परिवार
समय के साथ-साथ बड़ा होता गया। बच्चों को पढ़ने के लिए देश की राजधानी दिल्ली एवं
अन्य बड़े शहरों की तरफ मुंह मोड़ना पड़ा। धीरे-धीरे माँ-बाप को छोड़ एक-एक कर सब
बच्चे अपने शहर से निकल गए। लेकिन
प्रारम्भ से ही माँ-बाप ने एक कड़े अनुशासन का पालन किया – साल भर कहीं भी रहें
दीवाली के दिन पूरे परिवार को अपने शहर में
आना होगा। सबों को बुलाया जाता था और समय के साथ अब सब आते ही नहीं थे
बल्कि इस दिन की प्रतीक्षा भी करते रहते थे। सब दीवाली पर जमा होते हैं, पूरा परिवार आपस में मिलता और मिलकर उत्सव मनाता है। समय बीतता गया बच्चे
अब शहर ही नहीं देश तक भी सीमित नहीं रहे। लेकिन आज भी सब बच्चे दीवाली पर अपने
उसी पैतृक घर में ही होते हैं, दीवाली एक साथ मनाते हैं। यही
एक दिन होता है जब पूरा परिवार – पाँच लड़के, पाँच बहुएँ और
बड़े-बड़े पोते-पोतियाँ सब – एक साथ होते हैं। बिना किसी शिकन के ही नहीं बल्कि बड़े
चाव से। यही कारण है कि इतना बड़ा परिवार, सब अलग-अलग शहरों और देशों में रहने के बाद भी एक साथ है, सबों में पांडवों जैसा संबंध है, एक दूसरे के लिए
खड़े हैं, साल भर एक दूसरे के पास आते-जाते रहते हैं। वह बीज
जो पिता ने बोया था आज घना वट वृक्ष हो गया है। और सब मिलकर इस वृक्ष को खाद-पानी
देते हैं इसकी रक्षा करते हैं, फलस्वरूप फल-फूल रहा है।
और एक दूसरा परिवार है, मुझे हर समय यही लगता रहा कि परिवार
आधुनकिता में लिपा-पुता है। लेकिन फिर एक घटना ने मेरे विचार बदल दिये। एक
पारिवारिक आयोजन था। परिवार के सदस्यगण – बेटे, बहुएँ, पोते, पोतियाँ – अलग-अलग शहरों में रह रहे थे।
परिवार के सब सदस्यों के पहुंचने की बात थी। उनके अलावा अन्य पारिवारिक सदस्य, मित्र, रिश्ते-नातेदार भी पहुँच रहे थे।
पोते-पोतियाँ स्कूल में थे, मैंने सोचा सब लोग तो पहुँच ही
नहीं सकते। सिर्फ पता लगाने मैंने एक को फोन किया और पूछा कि कौन-कौन जा रहे हैं?
‘हमलोग सब कोई जा रहे हैं?’
‘तो बच्चे किसके साथ रहेंगे?’ मेरा अगला प्रश्न था।
‘नहीं हम सब जा रहे हैं, बच्चे भी जा रहे हैं,’ फिर से वही जवाब मिला।
मैंने फिर कहा, ‘लेकिन छुट्टी तो है नहीं, स्कूल मिस करवाओगे?’
‘और उपाय भी क्या है भैया,’ जवाब मिला।
‘स्कूल से अनुमति मिल गई है?’
‘नहीं, मैंने मांगी ही नहीं। छुट्टी तो तब
मांगनी जब विकल्प हो, जाना तो है ही,
तब अनुमति क्या मांगना। परिवार पहले है या स्कूल,’ उसने बिना
रुके कहा, ‘छुट्टी तो सिर्फ बहाना होता है नहीं आने का, बच्चा हमारा है, परिवार हमारा है, वे कौन होते हैं हमारे परिवार के बीच में आने वाले?’
जब ऐसे विचार हों तब परिवार
चलते हैं। विघटनकारियों के विरुद्ध ऐसे ही आक्रामक होना पड़ता है, तब अस्मिता बचती है। समर्पण करने से हम
अपनी सभ्यता, संस्कृति का नाश करते हैं। प्रायः यह देखने में
आता है कि दुष्टों के प्रति हम डर कर दया का भाव रखते हैं और सज्जनों के प्रति
आक्रामक हो जाते हैं। श्रीअरविंद तो यहाँ तक कहते हैं कि भेड़िये के द्वारा आक्रांत
मेमने की तरह अपनी हत्या होने देने से कोई विकास नहीं होता,
कोई प्रगति नहीं होती। भेड़िये पर आक्रमण कर अपनी और मेमने की रक्षा करनी होती है। दूसरों
की नकल में विघटित मत होइये, संगठित होइये; दुर्जनों के प्रति समर्पित नहीं आक्रामक होना है। सुविधा भोगी नहीं, संरक्षक बनिये। अपने परिवार से प्रारम्भ कीजिये। अपने तीज त्यौहार अपनी
संस्कृति के अनुसार मनाइये। समय के अनुसार बदलाव अवश्यंभावी है, जरूर कीजिये लेकिन उन्नति के लिए अवनति के लिए नहीं। हमारे तीज-त्यौहार
जुड़ना सिखाते हैं, टूटना नहीं। आज की नहीं कल की सोचिये। दुनिया
को बदलने के लिये अपने को बदलने की जरूरत है। पहले खुद बदलिये, फिर दुनिया को बदलिये। कल हमारा होगा।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लाइक
करें, सबस्क्राइब करें, शेयर करें
ऑन लाइन
कोम्मेंट्स दें
यूट्यूब का
संपर्क सूत्र à
ब्लॉग का संपर्क सूत्र à
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें