बुधवार, 1 नवंबर 2017

सूतांजली, नवंबर २०१७

सूतांजली                                                    ०१/०४                             ०१.११.२०१७
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मंथन
कुछ समय पहले की एक घटना है। कुछ समय, यानि कई एक वर्ष। एक पारिवारिक उत्सव पर हमारा पूरा परिवार जमा था। युवाओंबच्चों, बच्चियोंबहुओं का एक झुंड एक तरफ बैठा था। उसीके समीप हम बुजुर्ग भी बैठे बतिया रहे थे। आदतन मेरा मन जल्दी से बुजुर्गों के बीच कम लगता है। अत: बैठा भले ही उनके साथ था लेकिन मेरे कान बगल में बैठे युवाओं की बातों में घुसपैठ कर रहे थे।
आजकल चलते फिरते दुकानों में हर समय गरमा गरम सामान खाने को मिल जाता है, एक ने कहा।
हाँदुकानों में माइक्रोवेव ओवेन रहता है। जो भी मांगो हाथों हाथ गरम करके देते हैंदूसरे ने टिप्पणी की।
दूध का भी कितना आराम हो गया है। दिन भर जब चाहो एकदम ताजा दूध मिल जाता हैतीसरी ने कहा।
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उस दल की ओर मुखातिब हुआ, “मुझे एक संदेह है। गरम खाना किसे कहते हैं? उसे जिसे अभी पकाया गया हो या उसे जिसे अभी फिर से गरम किया गया हो?
एक सन्नाटा पसर गया। इसका फायदा उठाते हुवे मैंने दूसरा प्रश्न दाग दिया, “तुम लोग ताजा दूध की बात कर थे।  ताजा दूध किसे कहते हैं जिसे कुछ समय पहले दूहा गया हो? या गुजरात से अभी कोलकाता पहुंचा हो?या वितरक के हाथों घूमता हुआ दुकान में आया हो? या अभी जिसे हम दुकान से खरीद कर लाये हों? धरोष्ण दूध किसे कहते हैं, जानते हो?
इस बार सन्नाटे को चीरती हुई एक टिप्पणी आई, “अंकल, अब आप बूढ़े हो गये हैं, अपनी कुर्सी वापस उधर घुमा लीजिये।
शायद कुछ समय बाद बच्चे यह भी कहने लगें कि वे अमूल का दूध पीते हैं
परिभाषाएँ बदल गई हैं। मान्यताएँ विस्मृत हो गई हैं। सुविधायेँ  हावी हो गई है। पूरा संसार मुट्ठी भर परिवारों की जागीर हो गई है। हम अनजाने वही देखने, सोचने और करने को मजबूर हैं जो वे चाहते हैं। गांधी ने इसी के मद्देनजर मशीनों का बहिष्कार करने का सुझाव दिया था। उन्हे कार्य की सुविधा से नहीं संसाधनों के केंद्रीय करण पर एतराज था। फोर्बेस के आंकड़ों के अनुसार विश्व का ५० प्रतिशत संसाधन सिर्फ ८५ व्यक्तियों के हाथों में हैं।


                                                                                                 मैंने पढ़ा
प्रश्न पूछो ध्यान से
अहा जिंदगी, जुलाई २०१७आंद्रे मोक्विर्ज़, पृ. ७९
जीवन की निराशाओं का एक बड़ा कारण यह है कि हम ऐसे प्रश्नों के समाधान ढूंढते हैं, जो प्रश्न स्वयं ही गलत हैं। हमारा प्रश्न होता है, “मुझे ऐसा प्रेम पात्र कैसे मिले, जो सब प्रकार से सुंदर हो, निर्दोष हो और निस्वार्थ हो?ऐसी कौन-सी व्यवस्था हम खोज निकालें कि हमारे देश में सदा के लिए सब प्रकार कि समृद्धि और शांति स्थापित हो जाए? “मैं कौन सा पेशा अपनाऊँ कि ऊंचे से ऊंचे पद पर पहुँच जाऊँ? जो व्यक्ति अपनी समस्याओं को इस रूप में रखते हैं, उनके लिए कोई भी व्यक्ति संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकता। तो फिर प्रश्न का सही रूप क्या हो? यह मैं ऐसा प्रेम पात्र कहाँ पाऊँ जो मेरी ही तरह कमजोरियाँ रखता हो, किन्तु जिसके साथ पारस्परिक सद्भावना के आधार पर प्रगाढ़ मैत्री का संबंध स्थापित किया जा सके, जो हमें संसार के आघातों को सहने की  शक्ति दे? मेरा देश कौन से गुण प्राप्त करने के लिए कठोर श्रम करे कि उसका अस्तित्व खतरे में न पड़े?मैं अपना समय और शक्ति किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अर्पित करूँ कि आत्म विश्वास के साथ उनकी प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकूँ।   
  गीता के (४.३४)   श्लोक का हरि गीतामें अनुवाद है
सेवा विनय प्रणिपात पूर्वक प्रश्न पूछो ध्यान से ।
उपदेश देंगे तब ज्ञान का तत्व-दर्शी ध्यान से ।।

परवरिश बच्चों को लीडर बनाओ
अहा! जिंदगी, सितंबर २०१७ पृ २९, डॉ.अबरार मुल्तानी
थॉमस एल्वा एडिसन प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन स्कूल से घर आए और माँ को एक कागज देकर कहा,टीचर ने दिया है। उस कागज को पढ़कर माँ की आँखों में आँसू आ गए। एडिसन ने पूछा क्या लिखा है? आँसू पोंछ कर माँ ने कहा इसमें लिखा है – “आपका बच्चा जीनियस है। हमारा स्कूल छोटे स्तर का है और शिक्षक बहुत प्रशिक्षित नहीं है, इसे आप स्वयं शिक्षा दें।कई वर्षों बाद माँ गुजर गई। तब तक एडिसन प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन चुके थे।
एक दिन एडिसन को अलमारी के कोने में एक कागज का टुकड़ा मिला। उन्होने उत्सुकतावश उसे खोल कर पढ़ा। यह वही कागज था, जिसे टीचर ने दिया था। उसमें लिखा था, “आपका बच्चा  बौद्धिक तौर पर कमजोर है। उसे स्कूल न भेजें।
एडिसन घंटो रोते रहे .... फिर अपनी डायरी में लिखा, “एक महान माँ ने बौद्धिक तौर पर कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया।
महान थॉमसन एल्वा का उदाहरण यह बताता है कि हमारे बच्चों में छुपी प्रतिभा को बच्चे के अभिभावक ही समझ पाते हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने उत्तरदायित्व को समझें। न दूसरों पर निर्भर हों और न अपनी इच्छा उनपर थोपें। खुद बच्चों पर ध्यान दें और उनमें छिपी प्रतिभा को निखारें। 

                                            मैंने सुना
श्रद्धेय आचार्य श्री नवनीत जी
श्री अरविंद आश्रम, दिल्ली शाखा, नैनीताल, जून २०१७
प्रश्न : क्या पूजा पाठ एक घंटे करना आवश्यक है?
उत्तर: ४८ मिनट का एक मुहूर्त होता है। एक मान्यता है कि आप जब कोई भी कार्य करते हैं तो उसे कम से कम एक मुहूर्त तक करें ताकि उस कार्य की गहराई तक पहुंचा जा सके। या फिर आप कबड्डी की तरह भी कर सकते हैं। सांस बंद कर दौड़ते हुवे आए और छू कर वापस भाग लिए। ऐसे भी दर्शन हो सकता है और पूजा भी। लेकिन इसे तो हम कबड्डी पूजा / दर्शन ही कहेंगे। इसे हम बुरा नहीं कहते हैं लेकिन उसका अपना उद्देश्य और परिणाम है। लेकिन ४८ मिनट, जो एक घंटे के करीब हैमें चित्त  शांत हो कर निश्छलता प्राप्त होती है। यह एक नियम सा है लेकिन इसके अपवाद हैं।
एक बच्चा एक कवि से पूछता है, “मुझे आप जैसा कवि बनना है। इसके लिए मैं क्या करूँ?
कवि ने कई एक कवियों का नाम बताते हुवे कहा कि इनकी पुस्तकें पढ़ो और लिखने की कोशिश करो शायद कवि बन जाओगे।
बच्चा फिर पूछता है, “आपने कौन से कवियों की पुस्तक पढ़ी थी?
मैंने तो किसी को नहीं पढ़ा।
अरे! जब आप नहीं पढ़े तो मुझे पढ़ने क्यों बोल रहे हो?
प्यारे बच्चे मेरे मन में कवि बनने का प्रश्न उठा ही नहीं। मैंने कविता लिखनी शुरू कर दी, लोगों ने बताया कि मैं एक कवि हूँ और अच्छी कवितायें लिखता हूँकवि ने कहा।
इसे अपवाद कहते हैं, अन्यथा अपवाद अपवाद नहीं सुविधाहो जाती है।

ब्लॉग में विशेष
विकास का मतलब
इवान इलिच, गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१५ पृ.२०१५
अब यह मांग बढ़ रही है कि अमीर देश शस्त्र आदि पर खर्च करना रोक कर पिछड़े देशों के विकास पर खर्च करें। यह मांग ठीक नहीं है। लोगों को विदेशी मदद के प्रति सावधान रहना चाहिए। समझना चाहिए कि एक अमेरिकी ट्रक एक अमेरिकी टैंक से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है।
क्यों और कैसे? जानने के लिए यहाँक्लिक करें


गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

सूतांजली, अक्तूबर २०१७

सूतांजली                                              ०१/०३                                        ०१.१०.२०१७
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मजबूरी का नाम म** *धी
मजबूर! किसे कहते हैं मजबूर? उसे जो परिस्थितिवश बदल जाय  या उसे जो  परिस्थिति को बदल दे ? मैं पूरी तरह भ्रमित हूँ।

दक्षिण अफ्रीका पहुँचते ही वहाँ की रंग भेद नीति की गंध महसूस होने के बावजूद सब की सलाह को दरकिनारे करते हुवे रेल के प्रथम श्रेणी में सफर करने वाला इंसान मजबूर ही रहा होगा?
·        रेल में सफर करने वाले गोरे यात्रियों की परवाह न कर पुलिस के कहने पर भी तीसरे दर्जे में सफर करने  के बजाय प्लैटफ़ार्म पर फेंके जाने के लिए तैयार व्यक्ति मजबूर रहा होगा?
·     अदालत द्वारा पगड़ी को हटाने का निर्देश देने पर पगड़ी हटाने के बदले अदालत छोड़ कर जाने वाला इंसान मजबूर तो रहा ही होगा?
·     बीच सड़क पर अपने ही वतन के लोगों द्वारा इतनी पिटाई खाई की अगर गोरे बचाने नहीं आ जाते तो  वह शायद उसके जीवन का अंतिम दिन होता। कारण-वह अपने सिद्धांतो और विचारों सेमजबूर था।
·   गोरी सरकार और गोरों के हिंसात्मक विरोधों के बावजूद मय परिवार के वापस दक्षिण अफ्रीका पहुंचा। फिर से सड़क पर मार पड़ी। गोरे दोस्तों के कारण बचा। उसकी मजबूरी थी अपने देश वासियों के प्रति अपने उत्तरदायित्व और दिये गए वचन के निर्वाह की।
·    बनारस में मंच पर उपस्थित राजे-महाराजे एवं विशिष्ट-गणमान्य व्यक्तियों की परवाह  न कर उनके ही खिलाफ वक्तव्य देने की कोई तो मजबूरी रही होगी?
·     जब देश के सब साधन सम्पन्न शीर्ष एवं बड़े नेता चंपारण को अनदेखा कर रहे थे किसी मजबूरी के कारण ही वह वहाँ पहुंचा होगा।
·     चंपारण में नीलहे मालिकजिलाध्यक्षन्यायालय एवं सरकार द्वारा चंपारण छोड़ने के हुक्म को मनाने से इंकार करने की भी कोई मजबूरी रही होगी।
·     एक के बाद एक दो मुकदमों- न्यायालय की अवमानना और देशद्रोहमें अपने पर लगे इल्जाम को कबूलते हुवे कहा कि उसे कड़ी से कड़ी सजा सुनाई जाए।  बेचारा मजबूर इंसान।
·    जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था उस समय नोआखाली के मुस्लिम बाहुल्य प्रदेश में जहां हिंदुओं का कत्लेआम किया गया था अपने मुट्ठीभर साथियों के साथ निहत्थे लेकिन निर्भय घूमने के पीछे भी कोई मजबूरी ही रही होगी?
·      नोआखाली में मुसलमानों का हिंदुओं द्वारा मुसलमानों को माफीनामादेने का प्रस्ताव”  रद्द कर कहा कि जघन्य अपराधियों को सबसे पहले बिना किसी शर्त के समर्पण करना चाहिए। कोईमजबूरी ही रही होगी इस निर्णय  की?
·      बिहार के दंगा ग्रस्त इलाके में  एक हिन्दू एक   मुसलमान परिवार की ह्त्या कर  उस परिवार के 2 माह के एक बच्चे को लाया आया और पूछा कि बताओ मैं इस बच्चे का क्या करूँउसने सुझाव दिया कि इस बच्चे के लालन पालन का उत्तरदायित्व तुम लो और इस बात का ध्यान रखो कि यह बच्चा बड़ा हो कर एक सच्चा मुसलमान बने।  क्या मजबूरी रही होगी इस फैसले  की ?

 अगर इसे ही मजबूर इंसानकहते हैं तो हे ईश्वर! हे परवरदिगार! या अल्लाह! अगर तू कहीं है और मुझे सुन रहा है तो हमें ऐसा ही एक, सिर्फ एक ही मजबूर व्यक्ति दे दे।


                                                                           मैंने पढ़ा
गांधी जी का सेव                          (कुरजां से साभार)
वर्धा के गांधी आश्रम में बुनियाद शिक्षा का मसौदा बन रहा था। डॉ. जाकिर हुसैन, के.टी.शाह, जे.बी.कृपलानी, आशा देवी आदि कई लोग मौजूद थे। बापू ने पूछा, “के.टी. अपने बच्चों के लिए कैसी शिक्षा तैयार कर रहे हो? सब चुप रहे। के.टी. ने पूछा, “बापू, आप ही बताइये कि कैसी शिक्षा हो? बापू ने कहा, “के.टी., अगर मैं किसी भी कक्षा में जाकर पूछूं कि मैंने एक सेब चार आने में खरीदा और उसे एक रुपए में बेचा दिया तब मुझे क्या मिलेगा? मेरे इस प्रश्न के जवाब में अगर पूरी कक्षा यह कहे कि आपको जेल मिलेगी, तब मानूँगा कि आजाद भारत के बच्चों के सोच के मुताबिक शिक्षा है।बापू के इस सवाल पर सब दंग रह गये। वास्तव में किसी व्यापारी को यह हक नहीं कि वह चार आने के चीज पर बारह आने लाभ कमाये। इस प्रकार बापू ने एक प्रश्न के जरिये नैतिक शिक्षा का संदेश बिना बताये ही दे दिया।

एक विश्लेषण के अनुसार भारत की  प्रथम १०० कंपनियों (निजी एवं सरकारी मिलाकर) का वर्ष २०१६ में शुद्ध लाभ ३,७४,५५७.८१ करोड़ थायानि औसतन ३७४५.५८ करोड़। इस आंकड़े के  १००वां प्रतिष्ठान का दैनिक लाभ २ करोड़ रुपये है।  इन आंकड़ों को गांधी के विचारों के साथ जोड़ कर  समझने की आवश्यकता है। यह न किसी सरकार से संभव है न किसी कानून के तहत। गांधी की  आर्थिक आजादी तो जागरूकता के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।


अहा जिंदगी, जुलाई 2017, अनुपमा ऋतु, पृ. 11
आज दुनिया भर के अर्थशास्त्री पूंजी के नये मायने तय कर रहे हैं। उनकी नई परिभाषा में सबसे ऊपर है मानवीय पूंजी यानि मनुष्यता। दूसरे नंबर पर है सामाजिक पूंजी यानि रिश्ते। तीसरे पर है प्राकृतिक पूंजी यानि पर्यावरण। चौथे पर मानवनिर्मित पूंजी यानि इन्फ्रास्ट्रक्चर और सबसे निचली पायदान पर है आर्थिक पूंजी यानि मुद्रा। 2010 में हुवे एक शोध में यह निष्कर्ष दिया गया कि किसी भी समाज के सुख का मुख्य कारण वैयक्तिक पूंजी नहीं सामाजिक जुड़ाव है। पर विडम्बना यह है कि हमारी दौड़ इस आखरी पायदन पर आकर ठहर गई है।
महात्मा गांधी ने जब कहा कि यंत्र और उद्योग कि परवशता और उससे जन्मी अर्थ पिपासा का इलाज होना चाहिए,तब वे भी हमें विकास, प्रगति और सुख के इन्ही मायनों पर पुनर्विचार के लिए आग्रह कर रहे थे जिनके लिए आज विज्ञान कर रहा है।

हमें अंग्रेजों का राज्य तो चाहिए पर अंग्रेज़ नहीं चाहिए। इस बाघ  का  स्वभाव तो चाहते हैं पर बाघ को नहीं चाहते। मतलब यह कि हम हिंदुस्तान को अंग्रेज़अँग्रेजी तौर-तरीकेशक्ल सूरतवाला बनाना चाहते हैं। पर तब तो वह हिंदुस्तान नहीं इंगलिस्तान कहलाएगा। मैं ऐसा स्वराज नहीं चाहता।
आजादीलेकिन किसकी आजादीकिससे आजादी और कैसी आजादीयह भी तय करना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना आजादी आती नहीं हैगुलामी ही रूप बदल कर आ धमकती है।





शनिवार, 2 सितंबर 2017

सूतांजली, सितंबर २०१७

सूतांजली                                         ०१/०२                                          ०१.०९.२०१७
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गांधी हो या बुद्ध, राम हो या कृष्ण, सूर हो या तुलसीये कालजयी हैं। साहित्य एवं लोक में इनकी सकारात्मक पक्षका  ही गायन किया जाता  है। स्थापित वही होता है जिनके सकारात्मक पक्ष की ही बातें  सुनी और पढ़ी जाती हैं। तब  फिर हम प्रेम-कर्तव्य-त्याग सच्चाई-अहिंसा-अपरिग्रह-ईमानदारी की घटनाओं के बदले स्वार्थ- वैर-राग-द्वेष-झूठ-हिंसा की घटनाओं की बातें ही ज्यादा क्यों करते और सुनते हैं? समाज तो वैसा ही बनेगा जैसी हम चर्चा करेंगे?अगर हमने यही मन बना लिया है कि हमें ऐसा ही समाज बनाना है तब कोई बात नहीं। लेकिन अगर हम ऐसे समाज में रहने के लिए तैयार नहीं हैं तब यह बदलना पड़ेगा। हमें सकारात्मक घटनाओं और गुणों की ही बातें करनी होगी जिन्हे हम अपने इर्द गिर्द घटते हुवे देखना चाहते हैं। पड़ोसी की प्रतीक्षा न कर सूत्रपात हमें ही करना होगा। सूते को अंजलली भर बांटना होगा जिससे मनका मनका जोड़ कर माला पिरो सकें। यही है सूतांजली।


मैंने सुना
मुझे गांधी क्यों प्रेरित करते हैं?                    - कुमार प्रशांत (अधीक्षक, गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली)
1 मई 2017भारतीय संस्कृति संसद अनौपचारिक विमर्श      -पिछले पत्र से आगे
   
सबों को देखते हुवे एक ऐसी जगह पहुँच गए हैंहम सभी लोगसामूहिक रूप में जहां हम न खुद को सुरक्षित पा रहे हैं न अपने परिवार को। न अपने खुद के बारे में विश्वास के साथ कुछ कह पा रहे हैंन परिवार के बारे में। तो जिसे दिहाड़ी मजदूर कहते हैं वैसी जिंदगी गुजार रहे हैं। आज का दिन गुजर गया। बसअगला दिन कैसा होगा मालूम नहीं। अगला दिन भी गुजर जाएऐसा कुछ हो जाए तो चलो भगवान का भला अगला दिन भी निकल गया। ऐसे तो समाज नहीं चलता है। ऐसे तो समाज जीता भी नहीं है। इसीलिए हम जी नहीं पा रहे हैं। मुश्किल में पड़े हैं।

इतने सारे प्रतिद्वंद्वी खड़े कर लिए हैं हमने अपने अगल बगल कि लगता है कि हर समय कुरुक्षेत्र में ही खड़े हैं। कोई भी शांति के साथ जीवन का मजा नहीं ले रहा है। युद्ध कभी कभी होता है तो शायदअच्छा लग सकता है। लेकिन अगर २४ घंटे ही युद्ध होता रहे तो बोझ लगता हैमुश्किल हो जाती हैजीना कठिन हो जाता है।  अभी मैं भद्रक से आ रहा हूँओड़ीशा से। अभी १५-२० दिन पहले वहाँ एक बहुत बड़ा दंगा हुआ था वहाँ और तब से लगातार चल रहा है। वहाँ था मैं कुछ समय। कैसे शुरू हो गयाक्या बात हो गईकिसी नेजो एक नया संवाद का संसाधन निकला हैएस एम एसउसमें   सीता के बारे में थोड़ी गंदी सी बात लिख दी और उसके नीचे एक मुसलमान का नाम लिख दिया। यह बात फैली और वहाँ से विश्व हिन्दू परिषद ने इसे उठा लिया। इसके पहले कि यह समझ पाएँ कि यह सारा खेल क्या हुआ तब तक १५-२० मुसलमानो की दुकानों में आग लग गई। शाम को पुलिस सुपरिंटेंडेंट ने सभा बुलाई और कहा कि मैंने इस आईडी की जांच कारवाई है। यह एक बिलकुल गलत और भ्रामक आईडी है। ऐसी कोई आईडी है नहीं जिससे यह निकला हो।  अत: यह किसी बदमाश की कार्यवाही है। लेकिन तब तक तो परिस्थिति बदमाशों के हाथों मे चली गई थी। बदमाशों की  संख्या दोनों तरफ ही बराबर है। रात को पत्थर बाजी हुई मुसलमानों की तरफ से।

जब कभी ऐसा होता है आप क्या करते होयह साधारण सी बात मन में आती  है कि वहाँ पहुँच तो जाएँ और फिर देखें क्या होता हैहम,  जो भी १५-२० व्यक्ति थे पहूँचे। और तब से इस कोशिश में लगे हैं कि कोई रास्ता निकले। कुछ तो समझ बने लोगों के मन में। मैं बराबर लोगों से पूछता हूँ कि ऐसे ही रहने का इरादा हो कि आप भी रहते हो हम भी रहते हैं और बीच में पुलिस छावनी रहनी चाहिए। अगर यह पसंद है तो रहा जाए। मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं तो कुछ दिनों में यहाँ से चला जाऊंगा। भुगतना तो आप लोगों को ही पड़ेगा। लेकिन अगर आपको लगता है कि यह रहने का तरीका नहीं है तब ये पुलिस छावनी आपके बीच से हटेइसकी कोशिश आपको ही करनी पड़ेगी। मैं इस छावनी को नहीं हटा सकता। पुलिस मेरी बात मानेगी भी नहीं क्योंकि उसे मालूम है कि खतरा दोनों तरफ से है।इसमें पहला कदम कौन पीछे खींचता है वही सबसे समझदार आदमी है। आपने नियम ही यह बना दिया है कि कदम पीछे खींचना कायरता है। जब तक आप कदाम पीछे नहीं खींचतेकदाम ऊठेंगे नहीं। यह आप देख रहे हो। फिरकोई तो निर्णय आपको करना पड़ेगा। 

जब मैं यह बात सोचता हूँ तो मेरे लिए हिन्दू मुसलमान जैसी कोई बात रहती ही नहीं है। मैं सोचता हूँ हिन्दू हो,मुसलमान होक्रिश्चियन होपारसी होअगर रहना है तो रहने के लिए कुछ मूलभूत नियम तो बनाने ही पड़ेंगे।  क्योंकि हम में से कोई भी यह निर्णय नहीं ले  सकता है कि आज से इस देश में कोई मुसलमान नहीं रहेगाऔर मुसलमान नहीं रहेंगे। वे तो हैं। हमारे आप के चाहने या न चाहने के बावजूद हैं। और उनके चाहनेन चाहने  के बावजूद हम हैं। तब कैसे रहोगेइसको सोचना शुरू करोगे तब हम वहीं पहुंचेगे जहां पाकिस्तान बनने के पहले महात्मा गांधी पहुंचे थे। तो मेरे लिए महात्मा गांधी भगवान नहीं हैं। मैं उनकी पूजा नहीं करता हूँ। मैं जिन सवालों से परेशान हूँ उनका समाधान ढूँढता हूँ तो इसी आदमी के पास पहूंचता हूँ। तब सोचता हूँ कि कोई तो बात है भाई। इस आदमी के जवाब खत्म नहीं होते हैं। बस इतनी सी ही बात है जो मुझे प्रेरित करती है।

गांधी जयंती -१५० वर्ष
इस वर्ष गांधी की १५०वीं जयंती प्रारम्भ हो रही है। क्या उनकी जयंती किसी अलग ढंग से मनाई जा सकती है?कोई रचनात्मक कार्यों की परिकल्पना कर सकते हैंऐसे कार्य की  परिकपल्पना जो एक दिन और वर्ष भर के लिए भी हो। और हम चला भी सकें। आपके सुझावों का हम आदर करेंगे।


                                                               क्या पढ़ें 

सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ समय पहले सड़क दुर्घटनाओं के मद्देनजर देश की राष्ट्रीय सड़कों पर शराब की बिक्री पर रोक लगाई थी। न्यायालय के इस आदेश का पालन कैसे हुआ अपनी कमाई बनाए रखने के लिए सरकारें भी नियम कानून में छेद  ढूंढती हैं और अवशयकता पड़ने पर छेद करने में नहीं हिचकिचाती। अगर एक व्यापारी भी यही करता है और अपराधी है तब सरकार अपराधी क्यों नहीं?  पढ़ें – 
नशे की पोल लेखक चंद्रशेखर धर्माधिकारी। गांधी मार्ग अंक मई-जून २०१७ पृष्ठ ६०


पत्रिका के इसी अंक में एक और लेख पढ़ने योग्य है। मार्लो ब्रांडो होलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उन्हे ऑस्कर पुरस्कार से नवाजा गया था लेकिन उस पुरस्कार को लेने से इंकार कर दिया। ऑस्कर के मंच पर वे खुद उपस्थित नहीं थे। जब समारोह चल रहा था उस समय वे सुदूर वुंडेड नी में थे। समारोह में पढ़ने के लिए उन्होने आपना  व्याख्यान भेजा था। यह उसी व्याख्यान  के अंश हैं।
एक अधूरा भाषण” – मार्लो ब्रांडो



पत्रिका
गांधी मार्ग”  - संपादक श्री कुमार प्रशांत
 पूरी पत्रिका में कोई विज्ञापन नहीं है। कोई ऐसा अंक नहीं जिसमें कम से कम एक निबंध  ऐसा न हो जो दिल को न छू ले और सोचने पर मजबूर न कर दे।


एक अंक का मुखपृष्ट