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शुक्रवार, 3 मई 2019

सूतांजली मई २०१९

सूतांजली मई, २०१९ का अंक तैयार है।
इस अंक में दो लेख हैं और एक रिपोर्ट है -  
१. सरदारजी की चाय और संस्कार 
अगर संस्कार दे नहीं सकते तो कम से कम उसे बचा कर तो रखें। 
२. सम्मान के पीछे क्या है?
जैसे सुख और दुख, धूप और छाँह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं वैसे ही सम्मान और अपमान भी एक साथ हैं। 
 “कौन जनता गांधी को” की मई की रिपोर्ट

 पढ़ें http://sootanjali.blogspot.com पर

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

सूतांजली अप्रैल २०१९


सूतांजली अप्रैल, २०१९ का अंक तैयार है।
इस अंक में दो लेख हैं और एक रिपोर्ट है -  
१. प्रश्न पूछने का हक और फर्ज
‘प्रश्न पूछने के अधिकार’ को लेकर काफी चर्चा है, विशेकर बुद्धिजीवी वर्ग में।  लेकिन इस अधिकार के साथ जुड़े उत्तरदायित्व  को समझने की कोशिश नहीं है। प्रश्न पूछने के पहले विचार करें कि आपका उद्देश्य क्या है? अन्यथा हो सकता है आप अपने से, समाज से, देश से, मानव से अन्याय कर रहे हों।

२. चलो तो सही
केवल पढ़ना नहीं, केवल सुनना नहीं, केवल सोचना नहीं, चलना भी पड़ता है।

“कौन जनता गांधी को” की मार्च की रिपोर्ट

पढ़ें http://sootanjali.blogspot.com पर

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

सूतांजली जुलाई २०१८


  सूतांजली                    ०१/१२                            जुलाई २०१८               
                                    ~~~~~~~~~
क्या हम समझदार हैं?

चंदामामा। न मैं चाँद की बात कर रहा हूँ न मामा की। मैं बात कर रहा हूँ उस पत्रिका की जिसे हमारे मोहल्ले का हर बच्चा बड़े चाव से पढ़ा करता था, अब से करीब ३०-४० वर्ष पूर्व। इसका प्रकाशन देश की अनेक भाषाओं में होता था। पत्रिका हमारे घर में आया करती थी और आने के पहले से हम पत्रिका का आरक्षण करवाते थे। कौन, किस समय और किस दिन पढ़ेगा? ताकि सब, मिल बाँट कर थोड़ा थोड़ा पढ़ सकें। बेहतरीन कागज, उत्तम छपाई, रंगीन चित्र। ऐतिहासिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, लघु एवं धारावाहिक कहानियाँ। चंदामामा का प्रत्येक अंक सँभाल कर रखते थे। और फिर, कुछ समय के बाद उसका ऑपरेशन होता था। प्रत्येक पन्ने को बहुत सँभाल कर अलग अलग करते, विषयानुसार एवं धारावाहिक कहानियों को अलग एक साथ कर उन्हे मंढाया जाता। फिर हम बच्चों के पुस्तकालय में  जमा कर लिया जाता था। इसकी सबसे ज्यादा मांग रहती। हम बच्चों को इस चंदामामा ने कितना कुछ दिया – सिखाया इसका आकलन करना आसान नहीं है। दर्द यह है कि यह या ऐसी कोई दूसरी पत्रिका अब उपलब्ध नहीं है।

प्रस्तुत है इसी पत्रिक में पढ़ी एक लघु कहानी। एक गाँव में तीन भाई रहते थे। तीनों वैद्य थे। सबसे बड़ा भाई साधारण वैद्य। उसे गाँव के बाहर कोई नहीं जानता था। मंझला भाई उत्तम वैद्य था। उसे दिखाने आसपास के कई गावों से मरीज  आया करते थे। लेकिन सबसे छोटा भाई श्रेष्ठ वैद्य था। दूर दूर से लोग उससे इलाज कराने आते थे। उसकी ख्याति सुन कर शहर के एक पत्र के संवाददाता उनसे मिलने पहुँच गए। बात-चीत के दौरान उस वैद्य ने बताया कि सही अर्थों में सबसे बड़ा भाई श्रेष्ठ वैद्य है और वह स्वयं एक साधारण वैद्य है। उसकी बात सुन कर संवाददाता हैरान रह गया। छोटे भाई ने समझाया, बड़ा भाई नाड़ी  परीक्षण तथा रोगी के लक्षण देख कर ही आसन्न रोग समझ लेते हैं। अत: आरंभ में ही हलकी-फुलकी औषधि या खान पान में उलट फेर कर उसका निराकरण कर देते हैं।  गाँव में घूमते हुए ही व्यक्ति के लक्षण देख कर बिना पूछे ही उसे सलाह दे, उसके आने वाले रोग को वहीं रोक लेते हैं। मंझले भाई को थोड़ा कम समझ में आता है। जब तक रोग कुछ ज्यादा बढ़ नहीं जाता और उसके लक्षण प्रगट नहीं होते, वह सही निदान नहीं कर पाता है। अत: उसे जड़ी-बूंटियों का लंबे समय तक सेवन करवाना पड़ता है। और मैं तो जब रोग बहुत बढ़ कर असाध्य हो जाता है तभी निदान कर पाता हूँ। इस कारण मुझे कई बार शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है। लोग इन बातों को समझते नहीं है। लोगों के अज्ञान पर ही मेरी वैद्यगिरी चल रही है नहीं तो कोई मुझे पूछे भी नहीं।

आज के इस आधुनिक युग में क्या हम इन्टरनेट के बिना दुनिया की कल्पना कर सकते हैं? लेकिन इन्टरनेट आया कहाँ से, किसने बनाया, कौन करता है इसका रख रखाव? हमने कभी जानने की कोशिश की? और इस इन्टरनेट के लिए हमें न तो कोई मूल्य देना पड़ता है और न  ही कहीं, कभी कोई पंजीकरण करना पड़ता है। लेकिन फिर भी हमें यह उपलब्ध है २४ X ७, बिना किसी छुट्टी के। कभी भी रख-रखाव के लिए भी बंद नहीं। ISP (इंटरनेट प्रदान करने वाली कंपनियाँ) हमें इंटरनेट नहीं देतीं वे हमें केवल उससे जोड़ भर देती हैं। बनाने वाले ने बनाया और विश्व को समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के।

हम विकिपीडिया का भी प्रयोग करते हैं। इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी का असीमित भंडार। पूरा इनसाइक्लोपीडिया। लेकिन बिना किसी मूल्य के और फिर वही २४X७, बिना किसी छुट्टी के। दुनिया के हर देश में, हर कोने में और अनेक भाषाओं में उपलब्ध है। इतना ही नहीं  निरंतर नई जानकारियाँ जोड़ने का कार्य भी चलता रहता है।  लेकिन इसे किसने बनाया? कौन करता है इसका रख रखाव? इसमें सब जानकारी कौन और कैसे डालता है?  क्या इसके प्रयोग के लिए किसी को भी  कोई मूल्य देना या पंजीकरण कराना पड़ता है? हम बेखबर हैं। इसे भी बनाने वाले ने बनाया और मानव को  समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के।

कम्प्युटर का बटन दबाते ही हमें सबसे पहले जो दिखाई पड़ता है वह है ‘विंडो’। आप समझ रहे हैं, मैं खिड़की की बात नहीं कर रहा हूँ में उस सॉफ्टवेयर की बात कर रहा हूँ जिसके बिना हमारा कम्प्युटर चल नहीं सकता। यह या तो हमें ‘चोरी’ करना पड़ता है या खरीदना पड़ता है। बनाने वाले ने इससे बिलियन की कमाई की और उसमें से मिलियन का दान किया है। बनाने वाले को बच्चा बच्चा जानता है। ऐसा कौन सा विश्वविद्यालय है जहां इसकी सफलता की कहानी नहीं पढ़ाई गई हो? बनाने वाले ने बनाया और दुनिया भर में बेचा – नाम और दाम के साथ।

सत्य की गति बड़ी सूक्ष्म है। जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वह समझते नहीं। 

पवित्र-पाप जो सच्चा-पुण्य है

क्या आपने महाभारत पढ़ी है? आसान नहीं है इस ग्रंथ को पढ़ना। विशाल ग्रंथ है। इसे आद्योपांत पढ़ने के लिए समय भी चाहिए और धैर्य भी। ग्रंथ में कई बातें बार बार दोहराई गई हैं, यथा, “धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है”। यानि दैनिक जीवन में क्या धर्म है और क्या अधर्म यह समझना आसान नहीं है। जीवन में कई बार ऐसे प्रसंग आते हैं  जिन्हे ऊपरी तौर पर देखने से अधर्म प्रतीत होता है लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उसमें से धर्म की खुशबू आती है। कई बार हम इसे सूंघ लेते हैं लेकिन कभी भ्रमित भी हो जाते हैं और सही निर्णय नहीं ले पाते कि क्या पाप है और क्या पुण्य।

कभी-कभी किसी काम को करते वक्त मनुष्य एक अजीब-सी दुविधा में पड़ जाता है, सोचता है कि वह जो करने जा रहा है वह पाप है अथवा पुण्य। निर्णय मनुष्य को अपने विवेक से करना पड़ता है। जिसको हम पाप समझते हैं कभी वह भी पवित्र होता है और किसी पुण्य से कम नहीं होता। ऐसा ही एक प्रसंग एक प्रसिद्ध नेता ने सुनाया था। उन्होने बताया कि, ‘कभी-कभी सार्वजनिक अभिनंदन के मौके पर एक व्यक्ति को ढेर सारे लोग सम्मानित करने और माला पहनाने लगते हैं, तब ऐसा भी होता है कि उसे पहले से पहनाई गई माला को दुबारा उठाकर दूसरा व्यक्ति फिर से पहना देता है। हालांकि यह बात साधारण नजर में नहीं आती है, मगर आ जाए तो अच्छा नहीं माना जाता है’।

वे आगे बोले, ‘चेन्नई के एक प्रसिद्ध मंदिर में रोज हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं।  दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। वहाँ एक दिन मेरा भी जाना हुआ। साथ में एक स्थानीय सज्जन भी थे। मंदिर के बाहर फूलों की कई दुकानें थीं, जिनमें रंगीन आकर्षक फूलों की मालाएँ लटक रही थीं। मैंने अपने साथ के सज्जन से कहा कि हमें भी एक अच्छी सी माला लेनी चाहिए। कह कर एक फूल  की बड़ी दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिये। 
साथ वाले सज्जन ने मुझे रोका और कहा, ‘यहाँ नहीं, हम उस तरफ फूल माला लेते हैं’। कहकर उन्होने अंगुली से एक बुढ़िया की  तरफ इशारा किया जो टोकरी में कुछ मालाएँ लेकर जमीन पर बैठी थी।
मैंने धीरे से एतराज किया, ‘वहाँ क्यों, किसी अच्छी दुकान से माला लेते हैं, भगवान को चढ़ानी है तब पैसे की तरफ नहीं देखना चाहिए’।
उन सज्जन ने कहा, ‘पैसे की बात नहीं है, कोई और बात है। इन बड़ी दुकानों में नए फूल की माला बिकती है, और यह बुढ़िया मंदिर में से भगवान को चढ़ायी हुई माला ले आती है और उसे बेचती है। यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग इस बात को जानते हैं, और उससे कोई माला नहीं खरीदता है’।
सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ, ‘चंद पैसों के लिए आप ऐसा क्यों करते हैं?’
वे बोले, ‘मैं उस बुढ़िया को भी उतने ही पैसे देता हूँ, जितना बड़ी दुकानों मे लगता है’।
‘मगर, भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को दुबारा चढ़ने से पाप नहीं लगता है’?
वे सज्जन बोले, “पाप और पुण्य की बात मैं नहीं जानता हूँ, मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मेरे जैसे चंद लोग इस बुढ़िया से माला खरीद लेते हैं तब इसकी दो रोटी का इंतजाम हो जाता है। यह बुढ़िया किसी से भी एक पैसा दान नहीं लेती है”।

सुनकर मैं सोचने को मजबूर हो गया कि क्या भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को उस बुढ़िया से खरीदना पाप था या कि एक पवित्र-पाप जो सच्चा पुण्य होता है।
रिलीफ़, फरवरी २०१८

मंगलवार, 5 जून 2018

सूतांजली, जून २०१८

  सूतांजली                             ०१/११                      जून २०१८
                                                  ~~~~~~~~~~

बा का जन्म किस दिन हुआ, यह जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन वे  बापू से एक वर्ष बड़ी थीं। बापू की १५०वीं जयंती हम अगले वर्ष मनाएंगे। मतलब, बा का १५०वां जयंती वर्ष चल रहा  है। बापू महिलाओं को अपने संग्राम में जोड़ना चाहते थे और इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी बा को मनाना। बा बहुत सरल और कोमल हृदय महिला थीं लेकिन साथ ही अपने इरादों की पक्की। उन्हे मनाना आसान काम नहीं था। बापू ने उन्हे कैसे जोड़ा और वे कैसे जुड़ीं?  बा को समर्पित है श्री विष्णु प्रभाकर का लिखा यह प्रसंग।

दक्षिण अफ्रीका में एक दिन बा रसोईघर में कुछ बना रही थीं। गांधीजी कुछ और काम कर रहे थे। सहसा उन्होने कस्तूरबा से पूछा, “तुझे पता चला या नहीं”?
बा उत्सुक स्वर में बोली, “क्या”?
गांधीजी ने हँसते हुए कहा, “अब तक तू मेरी विवाहिता पत्नी थी, लेकिन अब नहीं रही”।
बा ने चकित होकर उनकी ओर देखा और पूछा, “ऐसा किसने कहा? आप तो रोज नई नई बातें खोज निकालते हैं”।
गांधीजी बोले, “मैं कहाँ खोज निकालता हूँ। वह जनरल स्मट्स कहता है कि ईसाई विवाहों की तरह हमारा विवाह सरकारी अदालत के रजिस्टर में दर्ज नहीं हुआ है, इसलिए वह गैर कानूनी माना जाएगा और तू मेरी विवाहिता पत्नी नहीं, बल्कि रखैल मानी जाएगी”।
बा का चेहरा तमतमा उठा। बोली, “उनका सिर! उस निठल्ले को तो ऐसी ही बातें सूझा करती हैं”।
गांधीजी ने पूछा, “लेकिन अब तुम स्त्रियाँ क्या करोगी”?
बा बोलीं, “आप ही बताइये, हम क्या करें”?
गांधीजी जैसे यही सुनने के लिए तैयार बैठे थे। तुरंत बोले, “हम पुरुष जिस तरह सरकार से लड़ते हैं वैसे ही तुम स्त्रियाँ भी लड़ो। अगर तुम्हें विवाहिता पत्नी बनना हो और अपनी आबरू प्यारी हो तो तुम्हें भी हमरी तरह सत्याग्रह करके जेल जाना चाहिए”।
बा ने अचरज से कहा, “मैं जेल जाऊँ? औरतें भी कभी जेल जा सकती हैं”?
“औरतें जेल क्यों नहीं जा सकती? पुरुष जो सुख दुख भोगेंगे वे स्त्रियाँ क्यों नहीं भोग सकती? राम के साथ सीता, हरिश्चंद्र के साथ तारामती और नल के साथ दमयंती, इन सभी ने वनों मे अपार दुख सहे थे”, गांधी ने कहा।
बा बोली, “वे सब तो देवताओं जैसे थे। उतनी शक्ति हममें कहाँ”?
गांधीजी ने उत्तर दिया, “हम भी उनके जैसे आचरण करें तो देवता बन सकते हैं। मैं राम बन सकता हूँ और तू सीता बन सकती है। सीता राम के साथ न गई होती, तारा हरिश्चंद्र के साथ न बिकी होती और दमयंती ने नल के साथ कष्ट न उठाए होते तो उन्हे कोई भी सती नहीं कहता”।
यह सुनकर बा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “तो फिर आपको मुझे जेल भेजना ही है। जाऊँगी मैं, जेल भी जाऊँगी। लेकिन जेल का खाना क्या मुझे अनुकूल आयेगा?”
गांधीजी बोले, “जेल का खाना अनुकूल न आए तो वहाँ फलों पर रहना”।
बा ने पूछा, “जेल में सरकार मुझे फल खाने देगी”?
गांधीजी ने कहा,  “न दे तो उपवास करना”।
बा हंस पड़ी, “ठीक है, यह आपने मुझे मरने का अच्छा रास्ता बता दिया। अगर मैं जेल गई तो जरूर मर जाऊँगी”।
गांधीजी खिलखिला पड़े और कहा, “हाँ-हाँ। तू जेल में  जाकर मरेगी तो मैं जगदंबा की तरह तेरी पूजा करूंगा”।
बा दृड़ स्वर में बोली, “अच्छा, तब तो मैं जेल जाने को तैयार हूँ”।

उस समय कौन जानता था कि बा-बापू होनी की ही बात कर रहे थे। २२ फरवरी १९४४ को संध्या ७.३५ पर आगाखान महल की कारा में ही बा ने देह त्याग किया।
गांधी अभी हारे नहीं हैं?
बाहुबली का जमाना है। सब अपनी अपनी शक्ति,  शक्ति यानि हथियार या धन, बटोरने में लगे हैं। जिसके पास ज्यादा शक्ति वही सर्वशक्तिमान। उसी की चलती है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। सत्य हो या अहिंसा, शिक्षा हो या धर्म सब इसी के सामने घुटने टेकते हैं। गांधी? हाँ, कहने सुनने में भले  ही अच्छा लगता हो, सत्य-अहिंसा, लेकिन अब उसका क्या काम? इन सबसे कुछ होनी जानी नहीं  है। जब तक लाठी नहीं पड़ती अक्ल ठिकाने नहीं लगती। बंदूक कनपट्टी पर रखो या जेब गर्म करो तब सब काम खुद-ब-खुद हो जाते हैं, नहीं तो घिघियाते रहो, हाथ जोड़ते रहो कुछ नहीं होता।

मेदिनीपुर, बंगाल। जन-जाति का शिकार करने का त्योहार। ५००० जन जाति के लोग लाठी, कुल्हाड़ी, तीर-कमान लेकर तैयार खड़े हैं जंगल में घुसने के लिए। उन्हे अपने रीति-रिवाज का पालन करना है। इस त्योहार पर शिकार करना है। उनके सामने खड़े हैं ३०० वन विभाग के अधिकारी और पुलिस। उन्हे शिकार करने से रोकने के लिए। उनका नेतृत्व कर रही हैं, अतिरिक्त जिला वन विभाग अधिकारी (additional divisional forest officer) श्रीमती पूरबी महतो। किसी भी समय लाठी चलाने का हुक्म दिया जा सकता है। और इसके बाद क्या परिस्थिति रहेगी कोई नहीं जानता। क्या इतने से उन्हे रोक पाएंगे? या फिर अश्रु गैस, गोली, गिरफ्तारी, आगजनी का माहौल बनेगा? लेकिन यह क्या? अचानक श्रीमती महतो आगे बढ़ती है और शिकार पर आमादा जन जाति के अगुआ दिनेन हेम्बरम के पैरों पर गिर पड़ती है। उसके पैरों को पकड़ कर उन्हे सब समझाती हैं और फिर पूरे दृड़ निश्चय के साथ कहती हैं कि इन सबके बाद भी अगर आप शिकार करना चाहते हैं तो उसके पहले अपने तीर कमान से उसे मार डालें फिर जाएँ। और देखते ही देखते पूरा दृश्य बदल जाता है। बिना एक लाठी चलाये, अश्रु गैस छोड़े, गोली दागे ५००० की भीड़  छंट  जाती है। न वन विभाग के इतिहास में ऐसा हुआ और न ही उस जन जाति के इतिहास में। जहां श्रीमती महतो यह कहती हैं कि उनके १७ वर्ष की नौकरी में ऐसा पहली बार हुआ है वहीं दिनेन कहते हैं कि हम पहली बार अपनी मर्जी से वापस लौट रहे हैं।

टेलीग्राफ में प्रकाशित
कमी है अपने विश्वास की, आत्मबल की। अपना अहंकार हम पर हावी हो जाता है और झुकने से इंकार कर देता है। और तब प्रारम्भ होती है हिंसा। कौन है बाहुबली? हिंसा या अहिंसा!
क्या पढ़ें
प्रदीप भट्टाचार्य का उपन्यास “मगरमुंहा”
“हमारे अकेले के करने से क्या होगा?” का उत्तर है यह उपन्यास। यह आख्यान है एक ऐसे साधारण युवक शिक्षक की जिसने देश की तीन सबसे ताकतवर वर्ग -  राजनीतिक, धार्मिक और औद्योगिक - से बिना जुड़े समाज एवं शहर में रचनात्मक बदलाव का सफलता पूर्वक आगाज किया।  किसी से सहायता मांगने नहीं गया। सब खुद-ब-खुद सहायक बन गए।


ब्लॉग विशेष
अनुपम भाई, उस गांधीवादी परंपरा के खाँटी वारिस हैं, जिसमें रचनात्मक काम को ज्यादा और विचार-पक्ष को कमतर महत्व का माना गया। गांधी ने अपने काम-धाम में और अपने साथ के लोगों में श्रम-साधना को प्रमुखता दी! कहा कि लोगों के बीच जाओ, शिक्षक बनना बंद करो, ज्ञानी बनना बंद करो, सीखो और काम करो। तो एक काम की दुनिया है और एक ज्ञान की दुनिया है। एक लोक ज्ञान है और एक विशेषज्ञों का ज्ञान है। क्या इस दो दुनियाओं के बीच संवाद सेतु बनाए जा सकते है?

अनुपम भाई के देहावसान पर “गांधी मार्ग” का जनवरी-अप्रैल २०१७ का अंक उन्हें समर्पित था। उसी अंक में पंकज पुष्कर का प्रकाशित लेख “लोकशक्ति को माना लोकबुद्धिको नहीं”।  





गाँधी 150

रविवार, 6 मई 2018

सूतांजली, मई २०१८


 सूतांजली                       ०१/१०                                    मई, २०१८

४ लाख - करोड़ - अरब की गलीच जिंदगी

अभी कुछ समय पहले मासिक पत्रिका अहा!जिंदगी में ऋतु रिचा की लिखी कहानी ‘गलीच जिंदगी’ पढ़ी। कहानी कोई खास नहीं है लेकिन लिखी बड़ी प्रभावोत्पेदक ढंग से है और इसलिए प्रभावित करती है।

कहानी तो बस इतनी ही है कि एक बच्चा अपनी सौतेली माँ के व्यवहार से तंग आकर घर छोड़ कर भाग जाता है और शनै: शनै: एक भिखारी बन जाता है। रोज सुबह सुबह उठ कर नियत जगह पर जाकर बैठना और भीख मांगना। दिन भर झींकन, चिड़चिड़ाना, झुञ्झुंलाना और कोसना। मन में तमन्ना कि कुछ रुपये जमा हों तो कुछ अच्छा पहने और खाये। नहीं तो वही चिथड़े पहनना और जूठन खाना। बस ऐसे ही अचानक एक दिन भीख मांगते मांगते वहीं लुढ़क गया और फिर कभी नहीं उठा। पुलिस आई, लाश को ठिकाने लगाई और उसके झोंपड़े की साफई की। वहाँ जमीन में दबी एक थैली मिली, बहुत भारी। खुचरे रुपयों और रेजगारी से भरी। थाने ले जाकर गिना गया तो पूरे ४ लाख रुपए निकले।

पहले पढ़ी या सुनी हुई है न! ‘थैली मिली’ पढ़ते ही पूरी बात भी शायद समझ गए होंगे। कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कुछ नया भी नहीं। बहुत हुआ तो एक बड़ा सा नि:स्वाश, और शायद एक गाली भी, ये ४ लाख का कंगाली!!! 

लेकिन ठहरें, जरा नजर उठा कर अपने समाज को देखें, आड़ोस – पड़ोस को देखें, गाँव-कस्बा- शहर पर नजर डालें। क्या आपको ४ लाख ही नहीं ४ करोड़ और ४ अरब के दरिद्र दिखाई पड़ रहे हैं? अकूत धन, लेकिन फिर भी सुबह उठने से रात देर सोने तक दोनों हाथों से बटोरने में लगे लोग दिखे? दिन भर झींकन, चिड़चिड़ाना, झुञ्झुंलाना, कोसना और सोचना कि कुछ रुपए हाथ आ जाए तो .......... करूँ। यूं ही सोचते, कहते, करते अचानक एक दिन लुढ़क जाना। दिखे ऐसे लोग? कहीं आप भी तो उनमें एक नहीं?

खुल कर मुस्कुराएं, प्रसन्न रहें, आशीर्वाद दें, मुक्त हस्त बांटे और उन्मुक्त हो कर जीयें। और फिर जीयें ४ लाख में ४ खरब की खुशहाल जिंदगी।

हाँ, है मुझ में दम

गांधीजी की पुण्य तिथि पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में २०१४ में आयोजित एक सभा को सम्बोधित करते हुए श्री गोपाल कृष्ण गांधी ने कहा था, “आज कोई यह नहीं क़हता कि भाई मुझ से गलती हुई है। मैं अपनी गलती कुबूल कर रहा हूँ। आगे मैं अपने आप को सुधारने की कोशिश करूंगा। .... आज हर राजनीतिक हैसियत, राजनीतिक दल और साथ ही वे भी जो अपने को सामाजिक आंदोलन का कर्ता धर्ता मानते हैं – ये सब ‘हिमालय जैसी भूलें’ कर रहे हैं, पर इनमें से एक भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं”। उन्होने आगे कहा, “गाँधी में चार चीजें ऐसी थीं, जो उन्हे एकदम अनूठा बनाती थीं: उन्हे मृत्यु का भय नहीं था,  पराजय का भय नहीं था,  कहीं कोई उन्हे मूर्ख नहीं मान  ले - इसका उन्हे डर नहीं था और  चौथी बात, सबसे महत्वपूर्ण यह कि उन्हें अपनी गलती स्वीकार करने से डर नहीं था। आज इन चारों बातों को अगर हम मापदंड के तौर  पर लें और पूछें कि कौन है जो इस  मापदंड पर खरा उतरता है तो बहुत कम लोग मिलेंगे। इसी में  हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है”।

मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। लेकिन अपनी गलती को स्वीकार न करना, अपराध है। यह मानव को पशु तुल्य बनाती है। मुझे  याद है, हमें यही शिक्षा दी जाती थी कि जीवन में गलतियाँ होंगी, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करो और उसके लिए दिल से क्षमा मांगो । लेकिन आज हर जगह घर हो या विद्यालय, प्रबंधन संस्थान हो या व्यापार जगत, राजनीति या सामाजिक क्षेत्र ठीक इसकी उल्टी शिक्षा दी जाती है – कभी अपनी गलती स्वीकार मत करो। इसी का यह परिणाम है कि पहले जिसे गलती समझी जाती थी अब वही व्यवस्था बन गई है। बड़े ठसक के साथ हम नियम, कायदे, कानून का उल्लंघन करते हैं और कभी यह मानने को भी तैयार नहीं होते कि ‘हाँ, हमसे गलती हुई है’, क्षमा मांगना तो बहुत दूर की बात है। बल्कि इतना और जोड़ देंगे कि ‘कौन अपनी गलती मानता है?’ पहले “वे” माने तब मैं सोचूँ। अब उनसे पूछें कि यह “वे” कौन कौन हैं? कौन बताएगा? उस ‘वे’ ने गलती मानी या नहीं, इसका निर्णय कौन करेगा?

लेकिन, निराश मत होइए! जिस नई पीढ़ी को हम कोसते रहते हैं, जिनसे हम कोई आशा नहीं रखते, उसी पीढ़ी ने बीड़ा उठाया है इस शिक्षा को फिर से पटरी पर लाने का और उदाहरण प्रस्तुत करने का। हम और कुछ नहीं तो कम से कम इन नौजवान बच्चों के हिम्मत की दाद तो दे ही सकते हैं। यह तो कह ही सकते हैं “मेरे बच्चों रखना इसे संभाल के”।

क्रिकेट जगत में आस्ट्रेलिया का  अपना एक स्थान है। इसी आस्ट्रेलिया के जाने माने खिलाड़ी और कप्तान स्टीव स्मिथ ने स्वीकार किया, ‘हाँ, मैंने  गलती की और इसका मुझे दुख है’। अपनी भूल के लिए उन्होने  माफी मांगी। पत्रकार सम्मेलन में स्मिथ कामनोबल बढ़ाने के लिए उसके पिता पीटर उसके साथ खड़े थे। भारतीय क्रिकेटर कपिल देव ने 
टेलीग्राफ में  प्रकाशित कपिल देव का साक्षात्कार
टिप्पणी की, “मेरा आदर उनके प्रति ज्यादा है जो अपनी गलती को स्वीकार करते हैं”। स्टीव स्मिथ २८ वर्ष का युवा है।
  
व्यापार एवं उद्योग जगत में फ़ेस बुक के मालिक मार्क जुकेरबर्ग एक जाना पहचाना प्रतिष्ठित नाम है। उनके व्यापारिक साम्राज्य का मूल्य कई हजार करोड़ रुपए है। उन्होने भी सबके सामने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा याचना की। अपने गलत कार्य के कारण सुर्खियों में आने के बाद से उनकी कंपनी का मूल्य लगातार गिरता जा रहा था। लेकिन जूरी के सामने अपनी गलती स्वीकार करते ही उनकी कंपनी के शेयर का मूल्य गिरने के बजाय बढ़ना शुरू हुआ। मार्क जुकेरबर्ग ३३ वर्षीय युवा ही हैं।
टेलीग्राफ

सन्मार्ग 


इस कड़ी में एक भारतीय भी है। राजनीति से जुड़े, दिल्ली के मुख्य मंत्री, अरविंद केजरीवाल। अपनी गलत बयानी और अशोभनीय टिप्पणियों के कारण हर समय  विवादों में घिरे रहे, मानहानि के मुकदमे लड़ते रहे लेकिन आखिर उन्हे भी समझ आई कि लड़ना नहीं बल्कि गलतियों के लिए माफी मांगना ही असली विजय है। और फिर लिखित में अपनी गलती को स्वीकारा और माफी मांग ली। नतीजा – मानहानि के मुकदमे हटा लिए गए। उनका कद छोटा होने के बजाय बढ़ गया। और स्वत: ही अपनी जबान पर काबू भी पा लिया। ४९ वर्षीय अरविंद को भले ही युवा न समझें लेकिन बुजुर्ग के श्रेणी में तो हरगिज नहीं आते।

२०, ३० और ४० के लोगों ने अपनी भूल सुधारने की कोशिश की और गलती स्वीकार की। आवश्यक  है औरों को आगे बढ़ कर कहने की, “हाँ, मुझ से गलती हुई, मुखे दुख है, मैं माफी मांगता हूँ आगे से ध्यान रखूँगा कि मुझसे कोई भूल न हो”। अगर गलती की है तो उस पर अड़े रहने के बजाय उसे सुधारें, भूल स्वीकार करें, सही दिशा की तरफ मुड़ें, लोगों को नई राह दिखाएँ।

हम  युवाओं के प्रति अपनी सोच में परिवर्तन करें। हम और उदाहरण पेश करें, गोपाल कृष्ण गांधी  को बता दें कि हम कमजोर नहीं हैं। महात्मा की तरह निडर बनें। है आप में दम? स्टीव स्मिथ, मार्क जुकेरबर्ग और अरविंद केजरीवाल ने तो कहा, “हाँ, है मुझ में दम”।

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

सूतांजली, अप्रैल २०१८


 सूतांजली                       ०१/०९                                                 ०१.०४.२०१८

पैड मैन
जी हाँ, मैं अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैड मैन’ की ही बात कर रहा हूँ। पिछले कुछ समय से देश प्रेमी, सुरक्षा कर्मी, ईमानदार नागरिक के   अभिनय की भूमिका में ही दिखा है। ऐसी ही कोई कहानी होगी, यही सोचकर गया था पैड मैन देखने। लेकिन यह फिल्म औरतों से जुड़ी उनकी निजी-व्यक्तिगत एवं सामाजिक समस्या पर आधारित है। पैड यानि सैनिटरी पैड। जानकारी के अभाव एवं रूढ़ियों के चलते खुल कर न बोल पाने के कारण देश की करोड़ों महिलाएं अपने मासिक रक्त स्त्राव के संबंध में चर्चा करने से कतराती हैं। अत: अनेक कष्टों को सहती हैं और रोगों से ग्रसित होती हैं  फिर भी मौन रहती हैं। कुछ समय पहले अमिताभ जी द्वारा संचालित टीवी सीरियल ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में एक सामाजिक संस्था  ‘गूंज’ ने भी इस समस्या का जिक्र किया था और देश के नगरिकों को औरतों की इस दयनीय दशा से अवगत कराया। खैर, यह तो वह मुद्दा है जिस पर यह  फिल्म आधारित है।  लेकिन इसके साथ साथ कई अन्य मुद्दे भी कहानी में पिरोये गए  गए हैं।

१।  आर्थिक परिस्थिति  - देश की अधिकतर जनता गांवों में रहती है और गरीबी में किसी प्रकार अपने परिवार को चलाती है। समुचित कमाई के अभाव में उपलब्ध महंगे उपाय अधिकतर औरतें अपनाने में असमर्थ हैं। उस अतिरिक्त खर्च से उनकी अर्थ व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। शहर-विद्यालय-कॉलेज  की पढ़ी लिखी  औरतों को ‘विश्वसनीय’ उपाय चाहिए और उसके लिए कुछ भी खर्च करने में वे जरा भी नहीं  हिचकती  हैं। लेकिन जितने रुपयों का उनके लिए कोई महत्व नहीं, उतने रुपए हमारे देश की अधिकतर औरतों के लिए परिवार के आर्थिक अस्तित्व का सवाल खड़ा कर देती हैं। उन्हे स्वदेशी सस्ता उपाय चाहिए  जो उनकी जेब के अनुरूप हो।

२।  हमारी साख – देश की राजधानी, दिल्ली में नायक को सम्मान और पुरस्कार मिलने पर गाँव  वाले नायक का स्वागत करते हैं, खुशी मनाते हैं, सम्मान देते हैं। लेकिन फिर जब उस सम्मान और पुरस्कार का कारण पता चलता है तब वापस वही पुराना तिरस्कार झेलना पड़ता है। फिर कुछ  समय बाद हमारा वह  नायक उन्हीं कारणों से विश्व मंच पर सम्मानित होता है। तब वही गाँव वाले उसे सिर आँखों पर बैठा लेते हैं।  ऐसा क्यों? हमारी जनता अपने देश द्वारा दिये गए सम्मान को उतना महत्व  क्यों नहीं देती! उसमें नुक्ताचीनी करती है! लेकिन जब वही सम्मान पश्चिम से घूम कर आता  है तब उसे स्वीकार कर लेती है! हमारी जनता को  पश्चिमी पर ज्यादा भरोसा क्यों है? या फिर हमारी सस्थाओं ने अपनी ही जनता का विश्वास खो दिया है?  हमें अपनी जनता का विश्वास हासिल करना होगा।

३। मित्र की आवश्यकता – हमें अपने जीवन के हर दुर्गम मोड़ पर एक सच्चे  मित्र की आवश्यकता होती है। कठिन समय में वही हमारी सहायता करता है, सही मार्ग दिखाता है। हमें कठिनाइयों से निकालता है लेकिन उसके बदले कोई चाह नहीं होती।  आध्यात्मिक भाषा में हम उसे  ही गुरु कहते हैं। चेले ने गुरु को नहीं खोजा, गुरु ने ही चेले को खोजा। हम  सत्पथ और सेवा भाव अपनाएं, गुरु अपने आप सहारा देने आ जाएंगे।

४। पढ़ें और गुनें  – आज अपनी गति के कारण हमारे पास न तो पूरा पढ़ने का समय है, न सुनने का, न गुनने (समझने) का।  आज हमारी गति के आवेग में, आवेग की ऐसी बन आयी है कि गति की सूझबूझ ही शेष रह गयी है। तेज़, और तेज़, और तेज़, आखिर भागकर हम कहाँ पहुंचना चाहते हैं? यह हमें पता ही नहीं है। बिना पढ़े, सुने और  गुने करने और बोलने के लिए हम व्याकुल  हैं। नायक के गाँव वालों ने नायक को मिले सम्मान और उसकी फोटो ही देखी। क्यों मिला? यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की। हमारा भी यही हाल है। सिर्फ पढ़े  नहीं, बल्कि गुनें।

मैंने पढ़ा
सार्वजनिक संस्था का अर्थ है, लोगों कि स्वीकृति और धन से चलने वाली संस्था

 .......(नेटाल इंडियन काँग्रेस के) कोष में लगभग 5 हजार पौंड जमा हो गये। मेरे मन में लोभ यह था कि यदि कांग्रेस का स्थाई कोश हो जाए, तो उसके लिए जमीन ले ली जाए और उसका भाड़ा आने लगे तो काँग्रेस निर्भय हो जाये। सार्वजनिक संस्था का यह मेरा पहला अनुभव था। मैंने अपना विचार साथियों के सामने रखा। उन्होने उसका स्वागत किया। मकान खरीदे गए और भाड़े पर उठा दिये गए। उनके किराये  से काँग्रेस का मासिक खर्च आसानी से चलने लगा। संपत्ति का सुदृड़ ट्रस्ट बन गया। यह संपत्ति आज भी मौजूद है, पर अंदर-अंदर वह आपसी कलह का कारण बन गई है और जायदाद का किराया आज अदालत में जमा होता है।

यह दुखद घटना तो मेरे दक्षिण अफ्रीका छोड़ने के बाद घटी, पर सार्वजनिक संस्थाओं के लिए स्थाई कोष रखने के संबंध में मेरे विचार दक्षिण अफ्रीका में ही बदल चुके थे। अनेकानेक सार्वजनिक संस्थाओं की उत्पत्ति और उनके प्रबंध की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद मैं इस दृड़ निर्णय पर पहूंचा हूँ कि किसी भी सार्वजनिक संस्था को स्थाई कोष पर निर्भर रहने  का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसमें उसकी नैतिक अधोगति का बीज छिपा होता है।

सार्वजनिक संस्था का अर्थ है, लोगों कि स्वीकृति और लोगों के धन से चलने वाली संस्था।  ऐसी संस्था को जब लोगों कि सहायता नहीं मिले, तो उसे जीवित रहने का अधिकार ही नहीं रहता। देखा यह गया है कि स्थाई संपत्ति के भरोसे चलने वाली संस्था लोकमत से स्वतंत्र हो जाती है और कितनी ही बार वह उल्टा आचरण भी करती है। हिंदुस्तान में हमें पग-पग पर इसका अनुभव होता है। कितनी ही धार्मिक माने जाने वाली  संस्थाओं के हिसाब-किताब का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। उनके ट्रस्टी ही उनके मालिक  बन बैठे हैं और वे किसी के प्रति उत्तरदायी भी नहीं हैं। जिस तरह प्रकृति स्वयं प्रतिदिन उत्पन्न करती और प्रतिदिन खाती है, वैसी ही व्यवस्था सार्वजनिक संस्थाओं की भी होनी चाहिए, इसमें मुझे कोई शंका नहीं है। जिस संस्था को लोग मदद देने के लिए तैयार न हों, उसे सार्वजनिक संस्था के रूप में जीवित रहने का अधिकार नहीं है। प्रतिवर्ष मिलने वाला चंदा ही उन  संस्थाओं की लोकप्रियता और उनके संचालकों की प्रामाणिकता की कसौटी है, और मेरी यह राय है कि हर एक संस्था को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए। .......... सार्वजनिक संस्थाओं के दैनिक खर्च का आधार लोगों से मिलने वाला चंदा ही होना चाहिए।
गांधी, आत्मकथा

धर्म का विशेषण
धर्म को मैं निर्विशेषण देखना चाहता हूँ। आज तक उसके साथ जितने भी विशेषण लगे हैं, उन्होने मनुष्य को बांटा ही है। आज एक विशेषण रहित धर्म की अवशयकता है, जो मानव-मानव को आपस में जोड़, यदि विशेषण ही लगाना चाहें तो उसे मानव-धर्म कह सकते है।
आचार्यतुलसी


ब्लॉग विशेष
आजाद आदमी के अंदर कुछ सोचने, फैसला करने और अपने फैसले पर अमल करने की दिलेरी होती है। गुलाम आदमी यही दिलेरी खो चुका होता है।
 

प्रख्यात फिल्म अभिनेता बलराज साहनी द्वारा १९७२ में जेएनयू के दीक्षांत समारोह में दिये गए व्याख्यान के संपादित अंश                                                                           गांधी मार्ग, जुलाई-अगस्त २०१७, पृ १२


सोमवार, 5 मार्च 2018

सूतांजली, मार्च २०१८



 सूतांजली                       ०१/०८                                                 ०१.०३.२०१८

नव वर्ष - नव संकल्प - नव संवत्सर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा २०७५, तदनुसार १८ मार्च २०१८
आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:  - (ऋग्वेद १-८९-१)
 जहां कहीं से श्रेष्ठ विचार मिलें, ग्रहण करना चाहिए।
नव वर्ष का सूर्योदय हम बिस्तर पर न  गवायें। न ही सिर्फ घूमने-फिरने, नाचने- कूदने, पकवान-मिष्ठान्न  खाने में व्यर्थ करें।   नव वर्ष के प्रारम्भ में  हम पुरानी भूलों को अवश्य याद करें। उन भूलों पर विचार करें और तब आगे की मंजिल देखें। इस बात पर गौर करें कि सामने वाले ने कम दिया या हमरी अपेक्षाएँ ज्यादा थीं? हरीन्द्र दवे के अनुसार,’किसी का प्रेम कम नहीं होता, हमारी अपेक्षाएँ ज्यादा होती हैं।’ इस सत्य को स्वीकार करें कि इस जीवन में सब कुछ नहीं पाया जा सकता लेकिन अपनी समझ एवं सकर्म के मेल से बहुत कुछ पाया जा  सकता है। जो हासिल नहीं कर पाये हैं उसके मिलने की संभावना बनी हुई है। पाने का यत्न ही गतिशीलता है और गतिशीलता ही हमारी विजय है। गलतियाँ तो उसी से होंगी जो कार्य  करेगा। या तो उन गलतियों का सुधार कर लिया जाय या फिर छोड़ दिया जाए। भाषा में, कर्म में, कहीं भी चूक हो तो हम उसे समझें और उसका निदान भी निकालें। यह इंसान से ही संभव है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी गलतियों – भूलों को समझते हैं? क्या हमारे पास इतनी फुर्सत है कि हम अपने आप को निहार सकें? क्या हमारा संवाद हम से होता है? क्या हमारी व्यस्तता महज भागमभाग है, संबंध औपचारिकता मात्र, धर्म केवल अनुष्ठान हैं? सत्य अनेक आयामी भ्रम हो गए हैं, प्रगति अनिश्चित गंतव्य हो गया है, प्रेम मृग मरीचिका बन गई है, ज्ञान कुतर्क और संवाद हठधर्मिता बन गई है। द्रव्य की इस अंधी दौड़ में हमें यह पता नहीं है कि हमें कितना धन चाहिए,  किस लिए चाहिए? हमारी चाह क्या है  और उस चाह की पूर्ति के लिए कितना द्रव्य चाहिए? अत: निराशा आनी स्वाभाविक है।

पिछले वर्ष भी सबों ने योजनाएँ बनाई होंगी। किसी की पूरी हुई, किसी की नहीं। यह संभव है कि योजना को पूरा करने के लिए और कुछ समय चाहिए। विभिन्न कारणों से कार्य पूरा नहीं हुआ, लेकिन व्यर्थ भी तो नहीं गया। कुछ तो सीखा? यदि हम कुछ सीखेंगे तभी औरों को कुछ सीखा पाएंगे। हमारी आत्मा सबसे पहले हमें सावधान करती है। इसका संकेत करती है। हमारे हर गलत कार्य  पर वह अलार्म बजती है। लेकिन हम अनसुना कर देते हैं। स्वप्न को कभी व्यर्थ न जाने दें, उसे यथार्थ बनाएँ। कुछ सपने तो कभी साकार नहीं होते लेकिन जिन्हें पूरा करना संभव है उन्हे करें या फिर करने का प्रयास करें। यही हमारा पुरुषार्थ है। कला व जीवन दोनों को आत्मीयता से रचा जा सकता है। समझदार लोग कला को जीवन तथा जीवन को कला बना लेते हैं।  हमारे सम्मुख हमारा भविष्य है और पीछे भूतकाल। दोनों हमारी पकड़ के बाहर है। अत: वर्तमान को गहराई से साधें। हर क्षण को विशिष्ट माने। विशिष्टता हमारे कौशल और दृष्टि में है, यही पारस है, लोहे को सोना बना सकती है।  कठिनाइयाँ हमारे लिए अच्छी राह  बना सकती हैं। इनका उपयोग करना सीखें। अपने श्रम, कल्पना, बुद्धि, मनोभाव को तरल बनाएँ। उनको स्नेह भरा बनाएँ तभी दीया जलेगा। यह दीया हमारे साथ साथ दुनिया को भी प्रकाशित करेगा।
(परिचय दास से अनुप्रेरित)
दूसरों के त्योहारों को मनाना, संस्कृति को अपनाना उत्थान का द्योतक  है। लेकिन उसकी चकाचौंध में  अपनी भूल जाना पतन की निशानी है।

मैंने पढ़ा

इसी उम्मीद में है इंतजार होली का
‘होली’ शब्द के उच्चारण मात्र से मन में हिलोरें उठने लगती हैं और पूरा अस्तित्व सब कुछ भूलकर बचपन की  यादों में डूबने उतराने लगता है। सात-आठ बरस की रही होऊँगी – यानि १९४२-४३ के समय की याद आती है। तब पिताजी लखनऊ के जुबली कॉलेज में हिन्दी पढ़ाते थे। लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब के बीच पल रहे थे हम। पड़ोस में एक मुस्लिम परिवार रहता था। खां साहब हमारे ताऊ जी थे और उनकी बेगम हमारी ताई। हर बरस उनके घर से सुबह-सुबह हमारे घर बड़ी स्वादिष्ट सिवईयाँ आतीं और शाम को साज-धज कर अपनी ईदी वसूलने जाते हम भाई-बहन। और होली के दिन सबसे पहली पिचकारी खां ताऊ को भिगोती। अस्मत और इफ़्फ़त आपा कितना भी भागें या छुपें हम उनके गालों पर गुलाल मले बिना उनका पीछा नहीं छोड़ते। शाम को हम खूब सारे होली के पकवान लेकर उनसे होली मिलने जाते। वे लोग हमारे लाए लड्डू, पपड़ी, खुरमे, शक्करपारे और खासतौर से मावे भरी गुझियाँ बहुत स्वाद ले-लेकर खाते और असीसते। ताई बेगम की मैं  सबसे लाड़ली थी। हर होली पर वे अपने हाथों से बनाई कपड़े की गुड़िया जरूर देती थीं। गुड्डा इफ़्फ़त  झटक लेती थी। फिर सावन में हम दोनों उनका ब्याह रचाते थे। ओह! रे मीठे प्यारे बचपन! होली आने के पाँच दिन पहले घर के दो शरारती बच्चे एक तो मैं और दूसरा मेरा छोटा भाई,  हम दोनों सुबह-सुबह निकल जाते थे और मोहल्ले भर का चक्कर लगा कर गाय का गोबर इकट्ठा करके घर लाते थे। हम तीनों बहनें गोबर की चपटी लोइयाँ बनाकर अंगुली से बीच में छेद बनाकर धूप में सूखने रख देतीं। हम तीनों बहनें अपने भाइयों का नाम ले-लेकर गीत गातीं और उनके ढाल और तलवार की शक्ल की लोइयाँ बनातीं । सूखने के बाद होली दहन वाले दिन इस छेदों के बीच से सुतली पिरोकर छोटी-बड़ी मालाएँ बनाई जाती थीं। रात को आँगन में अम्मा एक चौकोर अल्पना बनतीं और विधिवत पूजन के बाद सबसे पहले बड़ी वाली माला गोलाकार बिछाई जाती और क्रमानुसार उससे छोटी मालाएँ एक-एक करके एक-दूसरी के ऊपर टिकाई जातीं और इन मालाओं का एक पिरामिड जैसा बन जाता। फिर मंत्रोच्चारण के साथ पिताजी होलिका दहन करते। हमारा भरा-पूरा घर परिक्रमा लगाता। हम गन्ने और हरे चने के होराहे उन लपटों में भूनते।

और फिर वह क्षण आता, जब हम छोटे बच्चों का गहन इंतजार खत्म होता और मुंह में पानी भर आता। कई दिन से अम्मा गुझियाँ तथा अन्य  पकवान बना-बनाकर कलसों में भरकर रखती जाती थीं और कहती थीं, ‘होली जलाने के बाद रोज खाने को मिलेंगे।’ अब थके मांदे सब सोने जाते, पर नींद कहाँ आती थी। सुबह से ही रंग-गुलाल से होली जो खेलनी थी। ..........

कैसी मनोहारी परम्पराएँ थीं। पहली रात में होली के साथ सारी दुशमनी जला दी जाती थीं। दूसरे दिन मन के बचे-खुचे मैल रंगों  से धो दिए जाते थे और शाम को खुले मन से प्रेम-प्यार के वातवरण में सब एक-दूसरे से गले मिलते थे। धीरे-धीरे हमारे देखते-देखते पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में लोग यह सब भूलते गए और अब तो “हैप्पी होली” कह दिया और हो ली ‘होली’।
साभार – पुष्पा भारती, आहा!जिंदगी मार्च २०१७
जरा ठहरें, और विचार करें। सांप्रदायिक सौहार्द की इस ऊंचाई से हम इस  खड्डे में क्यों और कैसे गिर गए? औरों के दोष ढूँढने के बदले पहले हम खुद में ढूँढे।

किसी के हम काम न आए, न कोई अपने काम आया,
ताज्जुब है कि तो भी, जुमर-ए-इनसा१ में नाम आया।
१ मनुष्य की श्रेणी में