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“जी हाँ, मैं बस एक ही अवगुण छोड़ने कह रहा हूँ। अगर
एक से ज्यादा छोड़ने कहूँगा तब तो आप मेरी बात सुनेंगे ही नहीं, अतः बस एक के लिए ही कह रहा हूँ। आप केवल एक ही छोड़िये और फिर देखिये
कैसे धीरे-धीरे आपका जीवन सुधरता जाएगा, जीवन शुद्ध-शांत और
निर्मल हो जाएगा।” आज के सत्संग का यही सार था – एक अवगुण छोड़िये। स्वामी जी ने यह भी नहीं बताया की कौन सा अवगुण
छोड़ें, वह भी हम पर ही छोड़ दिया।
सत्संग से उठ कर बाहर निकलते
ही सुनने को मिला - “गुण
हों या अवगुण, बड़ी लंबी फेहरिस्त है। वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, रामायण, धर्माचार्य,
महामंडलेश्वर, गुरु, ऋषि, कथा वाचक हर समय केवल बस यही तो कहते रहते हैं – या तो कोई कथा-कहानी
सुनाते हैं या फिर ये करो-ये न करो। उनकी बातें मानने लगें तो जीने लायक ही नहीं रहें।
वे जो कहते हैं उसे बस वहीं छोड़ कर चले आने में ही भलाई है। क्यों ठीक कह रहा हूँ
न? शायद यही कारण है कि वे अपनी कहते रहते हैं और दुनिया
अपनी चाल से चलती रहती है। और तो और महर्षि पतंजलि को लें तो उन्होंने भी पाँच यम
और पाँच नियम गिना दिये। एक-दो गिनाते तो
शायद उस पर फिर भी विचार कर लेते”।
“भाई साहब जरा ठहरिए! अगर एक-एक होते तो क्या आप उन पर विचार
करते?”
अपनी झोंक में लेकिन थोड़ा संभलते हुए कहा, “तब-का-तब सोचते!”
“अच्छा बताइये ये पाँच-पाँच क्या हैं?”, मैंने पूछ ही लिया।
“पाँच यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय,
ब्रह्मचर्य और पाचवाँ .......”
“अपरिग्रह।”
“हाँ...हाँ वही, अब आप ही बताइये इन्हें अपना लें तो कैसे
जीवन चले। अपने तो बस एक ही सिद्धान्त अपना रखें हैं – व्यावहारिकता। मनुष्य को
व्यावहारिक होना चाहिए, बस इससे अपना कम चल जाता है”।
उन्होंने घोषणा कर दी।
“जी,
ठीक कहा अपने, अहिंसा – गुस्सा तो नाक पर चढ़ा रहता है, बच्चों को डांट न लगाएँ, मजदूर को चार गाली न दें
तो वे काम ही न करें। और ये सत्य, अगर सत्य बोलें तो जेल में
रहें या फिर सड़क किनारे खाली कटोरा ले कर बैठे रहें, झूठ
बोले बिना तो भीख भी नहीं मिलती।”
“हाँ, और नहीं तो क्या!”, मैंने जोड़ा।
“अस्तेय- चोरी न करना, अरे हम कोई चोर हैं क्या, चोरी तो न हम
करते हैं और न करेंगे। चोरी तो छोड़ी हुई ही है!”
“अरे वाह! तब हम यह मान लेते हैं कि हमने एक अपना लिया है, अब हमें मुक्त करो। क्यों क्या कहते हैं आप? इसके साथ यह भी जोड़ देते हैं कि वैसे तो हम चोरी करेंगे ही नहीं लेकिन
अगर कहीं गलती से, लालच से कर भी लिया तो हम प्रायश्चित भी
कर लेंगे या तो उसे बता देंगे या वह सामान वापस वहीं रख देंगे। क्या दिक्कत है, ऐसा काम करें कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।” मौका देख कर मैंने
कहा।
“हाँ, हाँ। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हम किसी
तीर्थ पर जाते हैं तो कुछ छोड़ने कहा जाता है और हम वही छोड़ते हैं जो पहले से ही
छोड़ा हुआ है। आम-के-आम गुठली के दाम।”
चलिये अब यह समझ लें कि चोरी
किसे कहते हैं। शब्दकोश का सहारा लें तब इसकी परिभाषा कुछ इस प्रकार बनती है – जब
कोई किसी व्यक्ति की सम्मति या जानकारी के बिना उसका समान या संपत्ति ले लेता है
या हटा देता है तो इसे चोरी कहा जाता है। यानी बिना सम्मति या जानकारी के ले लेना ही
नहीं बल्कि हटा देना भी चोरी ही है।
इस चोरी को और जरा गहराई से
देखने और उस पर विचार करते-करते मुझे अपने जीवन की एक छोटी सी आपबीती याद आ गई।
मैं अपने सहपाठी,
सुरेश के कार्यालय में बैठा था। उसका लड़का राहुल भी वहीं था। गर्मी का मौसम था, टिफिन में आम भी था। मैंने लेने से इंकार किया और कहा कि मैंने आम छोड़
रखा है और बताया कि आम मेरे प्रिय फलों में से एक है, लेकिन
उस वर्ष पूरी गया था वहाँ जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर के वट वृक्ष पर एक वर्ष तक आम
न खाने का वचन देकर आया हूँ। राहुल ने बताया कि उसने भी इसी वर्ष वहीं आम
छोड़ा है। लेकिन तभी टिफिन में रखे आचार को मैंने उठा लिया। राहुल ने बताया, “अंकल यह आम का आचार है।” मुझे बात समझ नहीं आई तो उसने जोड़ा ‘अंकल अभी तो आपने बताया
कि आपने आम छोड़ रखा है’। ‘हाँ, लेकिन यह तो आम का ......’, यहाँ तक कहने के बाद मेरी
जबान तलवे से चिपक गई। मुझे सचमुच बड़ा अच्छा लगा जिसे मैं बच्चा मान रहा था उसने
आम को छोड़ने के वचन को बड़ी गहराई से समझा था।
जब आम पर उसने इतनी गहराई से
सोचा तब फिर चोरी पर भी सोचने की जरूरत है। श्रीअरविंद ने चोरी का अर्थ ही
बदल दिया है। लगभग 1905 में वे अपनी पत्नी को एक पत्र लिखते
हैं जिसमें वे अपने तीन पागलपन की चर्चा करते हुए पहले पागलपन के बारे में लिखते
हैं कि अगर वे अपने पास जितनी उनको
आवश्यकता है उससे ज्यादा रखते हैं तब वे अपने आप को चोर समझेंगे। उस समय उन्हें
500 रुपए माहवार मिला करते थे। उस समय के हिसाब से यह एक शाही राशि थी। यह राशि
पूर्ण रुपेण श्रीअरविंद की उनकी अपनी थी
लेकिन फिर भी वे उसका अपने लिए उपयोग करना चोरी मानते थे। यह चोरी का एक अन्य आयाम
है। अपना होने के बावजूद अपनी आवश्यकता से
ज्यादा रखना, जिसके पास
उसका अभाव है उसकी आवश्यकताओं की चोरी करना है।
इशोपनिषद
का पहला श्लोक है:
ईशा वास्यम् इदं सर्वम्
यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
ते न त्यक्तेन भुञ्जीथा मा
गृधः कस्य स्विद् धनम् ।।१।।
श्लोक के अंतिम छंद का अर्थ है ‘किसी दूसरे के धन की इच्छा मत करो’, यानि
किसी दूसरे के धन की इच्छा करना भी चोरी या चोरी की तैयारी है अतः उसे भी त्यागो।
चोरी को त्यागने का अर्थ है मन से, कर्म से और वाणी से उसका
त्याग करना।
सामान्यतः एक और वस्तु की
चोरी करने की हमारी बुरी आदत है, वह है दूसरों
के समय की चोरी। निर्धारित समय से न आ कर किसी को इंतजार करवाना उस के समय की चोरी
है। अगर वहीं किसी आयोजन में जहां हम वक्ता हैं या प्रमुख अतिथि हैं और वहाँ देर
से पहुँचना वहाँ उपस्थित सबों के समय की चोरी है। समय से ज्यादा बोलना अन्य वक्ता
के समय की, न सुनने की इच्छा होने के बाद भी बोलते जाना, श्रोता या अन्य वक्ता के समय की चोरी ही है।
अनिच्छा से दी जाने वाली
वस्तु को लेना, बिना इच्छा
के किसी के प्रेम की अपेक्षा रखना, ज्यादा लेकर कम देना यहाँ
तक की कम देने की भावना रखना भी अलग-अलग प्रकार की चोरियाँ ही हैं।
एक अन्य प्रकार की प्रचलित
चोरी है – जमाखोरी। मुनासिब से ज्यादा कमाने की इच्छा से कम उपलब्ध सामग्री को जमा
करना, भविष्य के लिए इतना जमा कर लेना कि दूसरे
के वर्तमान के लिए भी न रहे। कोरोना के समय ऐसी वारदातें देखने को मिलीं, किसी कॉलोनी या मुहल्ले में पानी की कम आपूर्ति की खबर आने पर जरूरत से
ज्यादा पानी जमा करना इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। यहाँ हम दूसरे के हिस्से का संसाधन
चुरा कर खुद के लिए या खुद के मुनाफे के लिए जमा कर रहे हैं।
अन्य के कार्य को अपना बताना
या अपने होने का आभास देना तो प्रत्यक्ष रूप से चोरी है ही किसी के कार्य की उचित
प्रशंसा न करना भी सूक्ष्म चोरी है। किसी के लिखे हुआ को अपना बताना, उसकी सहमति के बिना उसका प्रयोग करना तो आज
कॉपी-राइट के नियमों के अंतर्गत जुर्म ही है, चोरी तो है ही।
किसी की अनुपस्थिति में उसकी
निंदा करना क्या उसकी प्रतिष्ठा, मान, मर्यादा की चोरी नहीं है? भविष्य और आने वाली पीढ़ी का ध्यान न रखते हुए प्रकृति का अनावश्यक दोहन
भी चोरी का ही स्वरूप है।
और तो और श्रीकृष्ण ने गीता के तीसरे
अध्याय में कहा है :
इष्टान् भोगान्, हि, वः, देवाः, दास्यन्ते, यज्ञभाविताः,
तैः दत्तान्, अप्रदाय, एभ्यः, यः, भुङ्क्ते, स्तेनः, एव, सः ।।3:12।।
इस श्लोक का भावार्थ यही निकलता है कि यह
पूरी सृष्टि इसलिए चल रही है क्योंकि देना और लेना निरंतर चलता रहता है। देने से
ही मिलता है और जो मिला उसमें से फिर देना। और जो इस कड़ी को तोड़ता है यानि सिर्फ
अपने लिए लेता है देता नहीं वह चोर है।
आप जितना गहरे उतरते जाएंगे, चोरी के नए-नए आयाम खुलते जाएंगे। जैसे-जैसे
आप उन्हें जिंदगी में उतारते जाएंगे, आपका जीवन निखरता
जाएगा।
कबीर को याद कीजिये-
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे
पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
किनारे बैठ कर ही अगर संतोष हो जाता है तब
आपकी मर्जी लेकिन अगर मोती चाहिए तो पानी में गहरा उतरना होगा।
(डॉ.रमेश
बिजलानी की वार्ता पर आधारित)
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पांडेचरी, श्री अरविंद आश्रम से हम सब परिचित हैं। भले ही वहाँ गए न हों, उस स्थान का नाम सुना है। इस आश्रम में एक साधिका रहती थीं, लंबे समय से। बल्कि यह कहना उचित होगा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही इस आश्रम को समर्पित कर दिया था। एक बार उनके परिवार की कई महिलाएं आश्रम देखने और उनसे मिलने वहाँ आईं। लौटते समय उनका चेन्नई (तब मद्रास) 2-3 दिन रुक कर, घूम-फिर कर लौटने का कार्यक्रम था। उन्होंने उस साधिका को भी साथ चलने के लिए कहा और सुझाव दिया कि वे तो चेन्नई से फिर आगे चली जाएंगी और साधिका आश्रम वापस लौट आयें। साधिका का भी मन बना और उन्हें श्रीमाँ से अनुमति भी मिल गई।
जिस दिन यात्रा पर निकलना था उसके पहले
रात्री को तेज बरसात हुई। रात लगभग 10 बजे किसी ने साधिका के कमरे का दरवाजा
खटखटाया। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, भला इतनी रात
कौन आया होगा? दरवाजा खोला, एक अन्य वरिष्ठ
साधक दरवाजे पर खड़े थे। उन्हें देख सकपकाना स्वाभाविक था। उन्होंने उन्हें एक
लिफाफा पकड़ाया और बताया कि श्रीमाँ ने उनके लिए यह एक आवश्यक पत्र भेजा है। दरवाजा
बंद कर वे कुर्सी पर बैठ गईं और आशंकित मन से धीरे-धीर लिफाफा खोला। लिखा था, “तुम कहीं नहीं जाओगी”। साधिका सन्न रह गयी। उसके मंसूबों पर पानी फिर
गया। उन्हें बड़ा झटका लगा, दुख हुआ,
क्रोध आया, निराशा हुई। रात भर नींद नहीं आई लेकिन श्रीमाँ की आज्ञा का पालन करते हुए उसने अपना
कार्यक्रम रद्द कर दिया। लेकिन दुख और क्रोध में दूसरे दिन कमरे से बाहर नहीं
निकलीं, खाने के लिए भी नहीं। शाम को अचानक उन्हें एक खबर
मिली। जिस गाड़ी में उनके परिवार की महिलाएं गई थीं रास्ते में, गाड़ी समेत सड़क धंस गई, उनमें से कोई नहीं बचा।
साधिका के रोंगटे खड़े हो गए। एक बार तो
किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी रहीं फिर बदहवास हो उत्तेजित होकर माँ के कमरे की तरफ दौड़
पड़ीं। उन्हें कमरे के दरवाजे पर रोका गया, ‘श्रीमाँ अभी व्यस्त हैं, मुलाक़ात नहीं हो सकती’। ‘नहीं, मुझे तो अभी ही मिलना
है’, और वे एक प्रकार से जबर्दस्ती कमरे में घुस गईं। अब तक
उनकी उत्तेजना, दुख, झटका, निराशा क्रोध, श्रद्धा, भावुकता, समर्पण अविश्वास में तब्दील चुकी थी। वह अपने आप को श्रीमाँ की अपराधी समझ रही
थी। रो रही थीं और अपने आप को माफ नहीं कर पा रही थी। श्रीमाँ उन्हें देखते ही समझ
गईं। उन्होंने उंगली से साधिका को चुप रहने और बैठने के लिए कहा। कुछ देर में जब
साधिका व्यवस्थित हुई, उसकी उत्तेजना शांत हुई तब माँ ने उनकी
तरफ देखा।
“जब आप को पता था यह होने
वाला है, तब आपने मुझे तो रोका लेकिन उन्हें क्यों नहीं
रोका”?, साधिका का क्रोध फिर मुखर हो उठा।
श्रीमाँ
ने धीरे से कहा, “क्या मेरे रोकने से वे रुक
जातीं”?
साधिका सन्नाटे में आ गई, उन्हें पता था वे नहीं रुकतीं। उनके मन में, श्रीमाँ के प्रति न वह श्रद्धा थी न विश्वास।
साधिका श्री माँ के चरणों में गिर पड़ी और धीरे-धीरे उठ कर वापस आ गई।
श्रीमाँ, जन्मदिन पर बधाई-पत्र दिया करती थीं। जब इस साधिका को जन्मदिन पर बधाई
पत्र मिला तो उसने देखा उसमें जो तारीख लिखी थी, वह उसका
जन्मदिन नहीं था। उसने माँ की तरफ देखा। माँ मुस्कुरा रही थी। उसे याद आया, यह वही तारीख थी जिस दिन उपरोक्त दुर्घटना घटी थी।
दैवीय शक्तियाँ हमेशा हमारा मार्ग-दर्शन
करने के लिए कटिबद्ध रहती हैं, हमें सावधान
करती रहती हैं, हमारा मार्ग दर्शन करती हैं, बशर्ते हम इस योग्य बनें कि उनकी बात सुनें और माने। ये मार्ग-दर्शन हमें
उन शक्तियों से सीधे भी प्राप्त होते हैं, छठी इंद्रियों के
माध्यम से या फिर किसी योग्य व्यक्ति के माध्यम से भी जिनमें हमारा अटूट विश्वास
होता है, उनके प्रति हमारी श्रद्धा होती है। लेकिन क्या
हमारी तैयारी है?
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सोशल मीडिया पर न जाने कितनी निरर्थक बातें, वीडियो, फोटो तैरती रहती हैं। उसी भीड़ में कभी-कभी अचानक ऐसा कुछ दिख जाता है जो दिल को छू लेता है। ऐसा ही, सर्वेश तिवारी का एक पोस्ट पढ़ने को मिला :
तीर्थाटन की
परम्परा जीवन के तीसरे-चौथे चरण के लिए बनी थी। हमारे देश और संस्कृति में यह परंपरा अनेक पुरानी है। अपने गृहस्थ धर्म
के उत्तरदायित्व से मुक्ति पा कर पूर्णतः ईश्वर में लीन हो चुके बुजुर्ग जब तीर्थ
को निकलते थे तो उस भूमि के कण-कण को प्रणाम करते चलते थे। मन जब हर नदी, तालाब, पर्वत या वृक्ष में ईश्वर को देखने लगे, जब हर जीव
में ईश्वर का अंश दिखने लगे, तब घूमते हैं तीर्थ...
बहुत ज्यादा उम्र नहीं हुई मेरी, पर दूर
गाँव से काशी आ कर गंगा मईया को देखते ही रो पड़ने वाले बुजुर्गों को भी देखा है
मैंने। मैंने देखा है श्रद्धा से प्रणाम करते चलती माताओं को... बेटा यदि एक बार
काशीजी, अजोधाजी, प्रयागराज घुमा दे तो
उल्लसित मन से उसे भर-भर कर आशीष देती और उसके सारे अपराध माफ करती माताएं! जैसे
जीवन में इससे बड़ा कोई काम नहीं....
बकरी बेच कर बैजनाथ धाम में जल चढ़ाने गया कोई बूढ़ा व्यक्ति जब
डेढ़ सौ रुपये में खरीदे गए प्रसाद को घर आ कर सत्तर पुड़िया बना कर गाँव भर को
बांटता है, तो उसके चेहरे पर आस्था नहीं, सीधे ईश्वर दिखते हैं। और मैंने ऐसे असंख्य ईश्वरीय चेहरों को देखा है।
आपकी आस्था का स्तर यह हो तो कीजिये तीर्थ...
लोक में तीर्थ की महिमा यह है कि हमारे गाँव के लोग जब गया
पिंडदान करने जाते तो समूचा गाँव गाजे बाजे के साथ उनके पीछे-पीछे कुछ दूर तक
छोड़ने जाता था। तीर्थ से लौटे व्यक्ति को तो अब भी हर सभ्य देहाती प्रणाम कर के
आशीर्वाद लेता है। जैसे तीर्थ घूम लेने भर से उस व्यक्ति में कुछ दैवीय अंश आ गया
हो...
मैंने अनेक ऐसे लोगों को भी देखा है जो केदार-बदरी की यात्रा
के बाद अपने गृहस्थ जीवन से विरक्त से हो गए। झगड़ों में नहीं पड़ेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे, लहसुन प्याज नहीं खाएंगे, किसी जीव पर प्रहार नहीं करेंगे... जैसे तीर्थ कर लेने से सब-कुछ बदल गया
हो! यह तीर्थ के प्रति सनातन आस्था है।
कासी-बिसनाथ या बैजनाथ धाम में जल चढ़ाने के लिए लगी लम्बी
लाइनों में हर-हर महादेव के नारों के बीच दसों बार मैं रोया हूँ... ईश्वर के सामने
पहुँच कर अनायास ही मन भर उठता है भाई... यह सामान्य आस्था है! यह न हो तो कोई
अर्थ नहीं तीर्थ का...
मैं समझ नहीं
पाता कि तीर्थों को कूड़े का ढेर बना देने वाले ये ‘पर्यटक’ कौन सा भाव लेकर केदार-बद्रीनाथ धाम जाते हैं? अपनी
कथित तीर्थयात्रा से देव-भूमि को नरक बना देने वाले ये लोग कैसे-कैसे कार्य करते
हैं?
सतही तौर पर सफाई और पर्यावरण की बातें
करने वाले लोग सफाई ने नाम पर ‘कूड़ा जहां-तहां न फेंकना’ तो जानते हैं लेकिन नष्ट न होने वाले कूड़े का निर्माण और प्रयोग भी वही
करते हैं। पर्यावरण के नाम पर अपने घर में गमले लगाते हैं,
बगीचे सजाते हैं, फार्म हाउस में फल-फूल भी उगाते हैं लेकिन
फिर जंगल काटने में भी नहीं हिचकते।
अभी
कुछ वर्ष पहले ही धनबाद के नजदीक एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल को राज्य सरकार ने ‘पर्यटक स्थल’ घोषित कर दिया था। स्थानीय लोग उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए – पर्यटक स्थल
तीर्थस्थल की आत्मा का हनन कर देती है। लेकिन सरकार पर जब इसका कोई असर नहीं हुआ
तब देश के अन्य भागों में भी इसका विरोध हुआ और जनता इससे जुड़ने लगी। तब सरकार को
अपना फैसला बदलना पड़ा। तीर्थों में तीर्थ यात्रियों की सुविधा की व्यवस्था करना, जाने-आने के मार्ग तैयार करना, ठहरने-खाने की
समुचित व्यवस्था करना, दर्शन-पूजा की व्यवस्था करना तक तो
ठीक है लेकिन उससे आगे बढ़ कर उसे ‘पर्यटक’ स्थल बनाना तीर्थ के महत्व को कम करना है, उसकी
आस्था पर प्रहार करना है, पवित्रता को अपवित्र करना है, तीर्थ की शुद्धता
को अशुद्ध करना है।
तीर्थाटन और पर्यटन दो विपरीत छोरों पर
है। तीर्थाटन की अपनी कमियाँ हैं तो पर्यटन की अपनी। तीर्थ को पर्यटन बनाना, तीर्थ
की आस्था को दूषित करना है, उसे नष्ट करना है। पर्यटन के
ताम-झम के सामने साधारण मानव अपने घुटने टेक देता है। सरकार और प्रशासन को ‘पर्यटन’ में ही विकास दिखता है, अतः उसे ही प्रोत्साहित करते हैं। पर्यटन से होने वाली कमाई सरकार और बड़ी
कंपनी को मिलता है जबकि तीर्थाटन में होने वाली कमाई स्थानीय लोगों का घर-गृहस्थी चलाती है। पर्यटन
में बड़े लोग मालिक होते हैं और स्थानीय नौकर, तीर्थाटन में
स्थानीय मालिक होते हैं और तीर्थ यात्री पर्यटक।
लोग
प्रश्न करते हैं कि - मंदिर चाहिये या रोजगार? यह प्रश्न उठाने वाले या तो राजनीति से प्रेरित हैं, या षडयंत्रकारी, या “मंदिर” को बना-बनाया पैसे कमाने की मशीन के रूप में
देखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी हैं। ऐसा नहीं है कि मंदिर रोजगार उत्पन्न नहीं करती हैं। हर मंदिर
स्थानीय विकास करती है। किसी भी मंदिर के
निर्माण के लिए, कोई सरकारी या बैंक से ऋण नहीं
लिया जाता है। इनके द्वारा होने वाले निर्माण में न तो किसी बहुराष्ट्रीय
कंपनी का सहयोग है और न ही विदेशी निवेश
की आवश्यकता, अतः उनकी आँखों में खटकता है।
मंदिर स्थानीय लोगों को रोजगार देता है, उनमें भक्ति और
श्रद्धा का संचार करता है न कि लालच, ईर्ष्य का।
किसी भी मंदिर में जाएँ तो जरा सा नजर
उठा कर ध्यान से चारों तरफ देखें तो देखेंगे कि मंदिर करोड़ों लोगों को रोजगर दे
रहा है। लेकिन
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि ये वे लोग हैं जिनके पास किसी संस्थान
से डिग्री नहीं है। इतना धन नहीं है कि कोई बड़ा निवेश कर सकें। अर्थव्यवस्था में समाज
के निचले स्तर के लोग है और वहीं के निवासी हैं। ये किसी भी
प्रकार से सरकार पर आश्रित नहीं हैं। कारखानों और कंपनियों की तुलना में मंदिरों आयु भी लंबी होती
है। कारखाने और कंपनियाँ तो
बंद होती रहती हैं लेकिन तीर्थस्थान-मंदिर तो सनातन हैं। किसी
प्रकार की छंटनी नहीं, विस्थापन नहीं, प्रदूषण नहीं। ये सामाजिक , धार्मिक उन्नयन का केंद्र है। यदि आर्थिक
दृष्टि से देखें तो मंदिर, अपने निवेश से
कई हजार गुना रोजगार दे रहा है।
हाँ पर्यटन का अपना महत्व है और
आवश्यकता भी लेकिन इसके लिए तीर्थस्थलों
को ही क्यों पर्यटन स्थल बनाया जाय। छोटे-छोटे, सुंदर और मनोरम जगहों की कमी नहीं उसे पर्यटन
स्थल बनाएँ, लोगों को वहाँ आकर्षित करें, उनका विकास करें! पर्यटन के लिए
जगहों की कोई कमी तो है नहीं फिर ‘तीर्थ’ को ही क्यों ‘हड़पें’? अगर
जंगल-अभारण्य को संरक्षित घोषित कर जानवरों की, पर्यावरण की
रक्षा की जा सकती है तब तीर्थस्थलों की आस्था और पवित्रता को संरक्षित क्यों नहीं
किया जा सकता? तीर्थ ने उस स्थान को आकर्षक बनाया, प्रसिद्ध किया, और लोग पहुँचने लगे तब उसे पर्यटक
स्थल बना दिया? जरा एक तीर्थस्थान तो बना कर दिखाएँ? आज तो कई बड़े-बड़े विशाल मंदिर भी
स्वयं ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। फिर शताब्दियों से बने आस्था
स्थलों को क्यों दूषित करें?
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हम बदलेंगे युग बदलेगा
(क्या आपको ऐसा लग रहा है कि यह
कहानी अपने सुनी है? आप गलत हैं।
अपने नहीं सुनी है। अंत तक सुनें फिर खुद ही निर्णय करें।)
कुछ
क्षण बीते, चीते ने उसे
फिर से अपने ऊपर से उड़ते देखा, लेकिन इस बार उस दिशा में
जिस दिशा में चीता जा रहा था। कुछ समय तक चीते ने उस चिड़िया की गतिविधि को बहुत
ध्यान से देखा और महसूस किया कि वह चिड़िया जंगल की ओर तथा उसके विपरीत दिशा में कई
बार आ- जा रही है।
कुछ
समय तक यह सब देखने के बाद चीते से रहा नहीं गया और उसने चिड़िया से पूछने का
निश्चय किया; क्योंकि
चिड़िया का यह व्यवहार बहुत ही विचित्र लग रहा था। चीते ने उससे पूछा, 'तुम बार-बार इधर-से-उधर क्यों
उड़ रही हो ?'
चिड़िया ने उत्तर दिया, 'मैं पहले झील की तरफ जाती
हूँ और अपनी चोंच में पानी भर कर लाती हूँ तथा उसे जंगल में लगी आग को बुझाने के
लिए डालती हूँ।"
यह
सुन कर चीता हंसने लगा। उसने चिड़िया से कहा, "क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?
क्या तुम सच में सोचती हो कि तुम अपनी इस छोटी-सी चोंच के पानी से
उस भयंकर आग को बुझा सकती हो ?"
‘नहीं’, चिड़िया
ने कहा, 'मुझे पता है कि मैं आग बुझाने
में सफल नहीं हो पाऊँगी, लेकिन जंगल मेरा घर है। जंगल मुझे
खाने के लिए फल देता है, यह मुझे और मेरे परिवार को आश्रय
देता है। इस सब के लिए मैं जंगल की बहुत आभारी हूँ। और जब मैं जंगल के फल-फूल खाकर, उनके बीजों को इधर-उधर गिरा देती हूँ तो ये बीज जंगल को फैलाने और घना
करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मैं इस जंगल का एक हिस्सा हूँ और यह
जंगल मेरे जीने का एक महत्वपूर्ण भाग है। मुझे पता है कि मैं इस भयंकर आग को नहीं
बुझा सकती लेकिन मुझे अपनी तरफ से पूरी कोशिश करनी ही होगी।’
जब
चीते और चिड़िया का यह संवाद चल रहा था, उसी समय जंगल में भागने वाले अन्य
जीव-जन्तु भी रुक कर उनका संवाद सुनने लगे। बहुतों ने तो चिड़िया को पागल समझा और
उसकी हंसी उड़ते हुए यह कहते हुए भाग निकले कि उसके अकेले के करने से क्या होगा।
लेकिन कुछ को उसकी बात में सार नजर आया और वे भी अपनी-अपनी समझ और क्षमता के
अनुसार जंगल की आग बुझाने में लग गए।
उस
समय वन में रहने वाली ‘दिव्य आत्माएं’ इसे बहुत गहराई से अनुभव कर रही थीं। वे सब जंगल के प्रति चिड़िया और फिर
उसके साथ लगे अन्य प्राणियों की प्यार भरी भावनाओं से बहुत प्रसन्न हुईं और एक
चमत्कार हुआ, जंगल में हुई मूसलाधार बारिश ने भीषण आग को
शान्त कर दिया।
क्या
आप अपने जीवन में चमत्कारों को अनुभव करना चाहते हैं, चमत्कार करना चाहते हैं? यदि हां, तो हमेशा अपना शत-प्रतिशत दीजिये। यह विचार
मत कीजिये कि अकेले के करने से क्या होगा? अगर हमारे दिल में
प्यार, कोमलता, विनम्रता और सहजता की
भावना है, अगर हम इतने रचनात्मक बन सकते हैं तो हम मानवता को अलग
स्तर पर ले जाने में सक्षम हो सकते हैं। अगर कुछ होगा तो हमारे अकेले के करने से
ही होगा। हम बदलेंगे, युग बदलेगा।
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