शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

ऑस्ट्रेलिया – वेस्टमीड


ऑस्ट्रेलिया – वेस्टमीड


स्वच्छ, निर्मल, बेदाग आकाश। कहीं बादल एक टुकड़ा भी नहीं, सारे सारे दिन। कहीं कोई धब्बा नहीं। सामान्य नीले रंग से थोड़ा गहरा नीला। देखा तो देखता ही रह गया, नजरें नहीं हटीं, पाँव थम गए। पल्लव ने पुकारा तब देखा वे आगे बढ़ गए हैं और मैं सर उठाए आसमान ताक रहा हूँ। हाँ, यहाँ का आकाश अलग है।  अगर आकाश की शुभ्रता और निर्मलता देखने लायक है तो यह भी उतना ही सच है कि सुबह-शाम पक्षियों के झुंड आकाश में एक संगीतात्मक लय में चक्कर लगाते नहीं दिखते। कबूतर, चिड़िया (गौरय्या) दिखते हैं। कौव्वे हमारे भारत कि तुलना में ज्यादा बड़े और काले कि देखते ही भय सा लगता है।  मैना बहुतायत में, कभी कबार तोतों का जोड़ा भी नजर आता है। इनके अलावा यहाँ के स्थानीय पक्षी जैसे कि कोकाटू (cockatoo) अलग अलग रंग की किलंगी में, सफ़ेद गुल (silver gull) तथा अन्य कई पक्षी दिख जाते जाते हैं। हवा शीतल नहीं, ठंडी है। धूप इतनी तेज कि चमड़ी जल जाए, ठंड इतनी कि कंप-कंपी छूट जाए। मौसम का मिजाज कब कैसे बदलेगा पता नहीं। हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना जरूरी है। तापमान आज, 24 सितंबर का 7-22 सेंटीग्रेड। पूर्वी औस्ट्रेलिया  भारत से 4.30 घंटे आगे है। अक्तूबर से यह फर्क 5.30 घंटे हो जाएगा।  
 
वेस्टमीड स्टेशन और ट्रेन 
वेस्टमीड, सिडनी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से लगभग 27 किलोमीटर और सिडनी से 25 किलोमीटर है। दरअसल वेस्टमीड सिडनी के पश्चिम में  उसका एक उपनगर है। दूरी पर न जाएँ क्योंकि यहाँ की  द्रुतगति से सपाट सड़कों पर दौड़ती आरामदेह बसों और रेल के लिए इतनी दूरी न तो ज्यादा है, न थकाने वाली और न ही समय लेने वाली। हमारा निवास इसी उपनगर में है। यह उपनगर और दो उपनगर हैरिस पार्क और पैरामैटा के बाद है। इन तीनों ही नगरों में भारतीय मूल के निवासियों का बाहुल्य है। वेस्टमीड और हैरिस पार्क के मध्य पैरामैटा में रेस्टुरेंट, कार्यालय, शॉपिंग सेंटर हैं।

वेस्टमीड का क्षेत्रफल 2.9 km2  है और जनसंख्या 2016 की जनगणना के अनुसार 16309 थी। यहाँ भारत मूल के निवासी सबसे ज्यादा हैं, 36.3%। दूसरे नंबर में ऑस्ट्रेलिया के निवासी आते हैं, 25.4%। इनके अलावा चीन, श्रीलंका, फिलीपींस और नेपाल मूल के लोग भी हैं। इस क्षेत्र में अँग्रेजी बोलने वाले 20.8% हैं और दूसरे नंबर में हिन्दी बोलने वाले, 10.1% हैं। यहाँ के निवासियों की औसत साप्ताहिक आय $1866 है जो देश के औसत $1438 से ज्यादा है। और शायद इसी कारण यहाँ की औसत अचल संपत्ति (रियल इस्टेट) के ऋण का मासिक भुगतान $2000 है जबकि देश का औसत $1755 है। हिन्दू (40.8%) सबसे ज्यादा हैं।  शायद यही कारण है कि यहाँ घूमते फिरते ऐसा आभास होता है कि हम भारत में ही घूम रहे हैं। भारतीय स्टोर और रेस्टुरेंट्स भी बड़ी संख्या में हैं।

वेस्टमीड की  पहचान यहाँ की मेडिकल सेंटर, स्कूल और यूनिवरसिटि के कारण है। वृहद वेस्टमीड सरकारी 
स्कूल और यूनिवरसिटि 
अस्पताल भारत के किसी भी निजी अस्पताल से टक्कर ले सकता है। बड़ों के अलावा बच्चों और मेंटल हेल्थ के अलग से अस्पताल हैं। निजी अस्पताल और डॉक्टरों के अनेक क्लीनिक हैं। वेस्टर्न सिडनी यूनिवरसिटि, WSU कॉलेज, UWS कॉलेज भी यहीं हैं। वेस्टमीड पब्लिक स्कूल 1917 में स्थापित हुआ था। इसके अलावा कैथरीन माउलेय कैथॉलिक स्कूल, और पैरामैटा मरिस्ट हाई स्कूल जो की औस्ट्रालिया का सबसे पुराना कैथॉलिक स्कूल है जिसकी स्थापना 1820 में हुई थी। इनके अलावा और भी कई स्कूल यहाँ हैं।

घरों के नमूने 
रहने के लिए छोटे छोटे बंगलानुमा मकान हैं। हर ऐसे बंगले के साथ एक छोटा सा बगीचा और गाड़ी खड़ी करने की जगह। ऐसे एक जैसे बंगलों का समूह भी है जिसने कॉलोनी का सा रूप ले लिया है। कुछ एक छोटे छोटे 2 या 3 तल्लों के मकान और समूह भी हैं। बहुमंजली इमारतों का केवल एक समूह है। ऐसी और एक इमारत वेस्टमीड स्टेशन के निकट बन रही है।

रोज़मर्रा की चीजों के लिया कोल्स का वृहद सुपर स्टोर है। यहाँ फल, सब्जी के अलावा रोज़मर्रा में लगने वाली हर वस्तु बड़ी संख्या में उपलब्ध है। इस स्टोर में सेल्फ बिलिंग काउंटर है जहां आप खुद अपना बिल बना और भुगतान कर सकते हैं, बिना किसी की दखलंदाजी के। कहीं किसी प्रकार की रोक टोक, चेकिंग नहीं है लेकिन कैमरा और तकनीक की सहायता से अपने आप पूरी निगरानी रखी जाती है और सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ आदमी आदतन ईमानदार है। खास बात यह है कि, जैसा मैं पहले लिख चुका हूँ, यहाँ की जनसंख्या में भारत मूल के हिन्दू ही सबसे ज्यादा हैं। अगर हम ऑस्ट्रेलिया में ईमानदार हो सकते हैं तो अपने देश में क्यों नहीं?  हमें दूसरों जैसा नहीं बनना है, दूसरों को अपने जैसा बनाना है।

बाहर खाने का शौक  हो या खरीददारी करनी हो तो पैरामैटा जाना की ठीक है। यहाँ रेस्टुरेंट्स की भरमार है और वेस्ट फील्ड का बहुमंजिला और बहु इमारतों में फैला वृहद बाजार है जिसे पूरा एक दिन में नहीं घूमा जा सकता। इसमें मल्टीप्लेक्स में मूवी भी देखी जा सकती है। यह स्टोर रेल स्टेशन और बस अड्डे से सटा हुआ है।  वेस्टमीड स्टेशन से केवल एक स्टेशन दूर है। लगभग 2.5किमी। कई एयर कंडीशंड बसें भी दौड़तों रहती हैं जिन्हे 10 मिनट से भी कम समय लगता है।
 
बच्चों एवं बड़ों का पार्क, चैरिटी का समान डालने की जगह, बस स्टॉप 
पिछले चार वर्षों में यहाँ यातायात में बढ़ोतरी हुई है। यहाँ की दौड़ती गाडियाँ, घूमते लोग, बच्चे दादा-नाना की संख्या और इनके साथ साथ यातायात नियमों का उल्लंघन और गंदगी में भी आबादी की तुलना में वृद्धि दिखाई पड़ती है। लेकिन इन सब के बावजूद एक स्वस्थ्य वातावरण, प्रदूषण मुक्त जलवायु और शांत परिवेश मानव के रहने के लिए अच्छा स्थान है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

आस्ट्रेलिया – कोलकाता से सिडनी तक

आस्ट्रेलिया – कोलकाता से सिडनी तक
कई दिनों, नहीं सप्ताहों के इंतजार के बाद आखिर 13 सितंबर की रात या 14 सितंबर की सुबह हम फिर एक लंबी यात्रा पर लंबे समय के लिए निकल पड़े। गंतव्य था सिडनी। पासपोर्ट तो था ही, हवाई जहाज की टिकिट वीसा मिलने के बाद ही लेने का विचार था।  अत: वीसा का आवेदन भी लगा दिया गया था। आवेदन राशि थी 145 आस्ट्रेलियन डॉलर। ऑस्ट्रेलियन  वीसा आवेदन की सबसे बड़ी खास बात यह रही कि आवेदन से लेकर प्राप्ति तक हमें कहीं नहीं जाना पड़ा। ऑस्ट्रेलिया में ई-विसा मान्य है। घर में बैठे बैठे ही, आवेदन से लेकर प्राप्ति तक का पूरा कार्य अपने कम्प्युटर से ही कर लिया (https://immi.homeaffairs.gov.au/) । पिछली यात्रा के समय तो मन में पूरा विश्वास था कि वीसा तो मिल ही जाएगा, लेकिन इस बार थोड़ी शंका थी। शंका का कारण था,  कुछ समय पहले ही मेरी भतीजी के वीसा आवेदन का अस्वीकृत होना। हम अटकलें लगाते रहे लेकिन अस्वीकृत करने के किसी भी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच पाये थे। हमारे आवेदन जमा करने के साथ साथ ही हमें मेल से सूचित किया गया कि हमें अपने स्वास्थ्य का परीक्षण करवाना होगा। इसके साथ ही कहाँ, क्या और कब तक जमा करवना है, पूरी सूचना थी। शायद हम वरिष्ठ नागरिक हैं तथा हमने 6 माह रहने की अनुमति मांगी थी, इसलिए परीक्षण करवाने का निर्देश दिया गया था। खैर परीक्षण की पूरी रिपोर्ट परीक्षण केंद्र (diagnostic centre) ने सीधे  ऑन लाइन ही जमा कर दी। परीक्षण रिपोर्ट जमा करने के 2 दिनों के अंदर ही हमें हमारा वीसा मिल गया। 12 महीने की वैधता, अधिकतम एक साथ 6 महीने का निवास और इस वैधता के दौरान कई बार जाने की अनुमति के साथ।  और इस प्रकार पूरी तौयरी के साथ हम पहुँच गए कोलकाता के हवाई अड्डे पर। हमारे सामान का वजन नियम मुताबिक था, कोई परेशानी नहीं हुई।

हमारी यात्रा का पहला चरण कोलकाता से हाँग काँग तक कैथी ड्रगन से थी। कैथी ड्रैगन, कैथी पैसिफिक की कम बजट की अंतरराष्ट्रीय एयर लाइंस  है। इसकी अवस्था राष्ट्रीय कम बजट की एयर लाइन से खराब थी। और तो और बैठने की कुर्सी फ़िक्स्ड थीं। आगे पीछे (push button) करने की गुंजाइश नहीं थी। किसी भी प्रकार के मनोरंजन का भी कोई साधन नहीं था। सौभाग्य से यात्री बहुत कम होने के कारण हम तीन-तीन सीट पर पैर फैला कर सो गए। सोने के पहले सैंड विच, फल और पेय पदार्थ दिया गया।  जब हम हाँग काँग पहुंचे सुबह हो चुकी थी। चारों तरफ धूप पसरी पड़ी थी। सुबह के 7.30 बज रहे थे।

हाँगकाँग एयरपोर्ट पर क्या करना है, वेब साइट पर देख कर, पहले से तय कर रखा था। खोजते हुए हम 
हाँगकाँग हवाई अड्डे पर 
रिलेक्सेशन कोर्नर (relaxation corner) पर पहुंचे। यहाँ आराम कुर्सियाँ लगी हैं। लेकिन मुश्किल से 15-20 ही थीं। समझ गए, इसका इंतजार करना मूर्खता है। खोज प्रारम्भ हुई, तथा जल्द ही ऐसी जगह खोज लिए जहां पैर पसार कर सोया जा सकता था। हमने वही किया। कुछ समय बाद, शायद भूख लगने पर नींद टूटी। घर से लाये रोल निकाले, एक कप कॉफी लिया और भूख मिटाई । दाम हाड़ फोड़ कर लेते हैं। लेकिन मात्रा इतनी ज्यादा देते हैं कि दो के लिए काफी होता है।  खा-पीकर तरो ताजा हुए और फिर निकल पड़े एयरपोर्ट देखने। बहुत बड़ा है, लेकिन सिंगापुर की तुलना में विशेष नहीं। कोलकाता से निकलने  के पहले  ‘Priority Pass’ (https://www.prioritypass.com)  ले लिया था। सौभाग्य  से यह कार्ड अपने क्रेडिट कार्ड पर बिना मूल्य के प्राप्त हो गया। इसकी कृपा से प्लाज़ा प्रीमियम लाउंज में तीन घंटे के लिए प्रवेश की सुविधा मिली। यहाँ 

प्लाज़ा प्रीमियम लाउंज में

सोफा पर जम गए। पैर फैला कर आराम किए। खाना पीना बिना किसी मूल्य के मिला, नहाने की भी व्यवस्था थी। हमलोगों के लिए खाने की विशेष बानगी नहीं थी फिर भी सैंड विच, सूप, फल, सलाद, टोस्ट, चाय, कॉफी, जूस और शीतल पेय तो थे ही। इतना कुछ लेने पर अलग से भोजन की आवश्यकता नहीं रह जाती है।  घड़ी आगे बढ़ती जा रही थी। यहाँ हमारा लगभग 12 घंटे का ठहराव शनै: शनै: कम होता जा रहा था, और हमें इसका भान भी नहीं हो रहा था। लाउंज से निकलने पर हमने देखा कि हाँगकाँग सांस्कृतिक संस्था की तरफ से नृत्य चल रहा है।  उसका आनंद लिए। समय बीत गया और हम बोर्डिंग गेट के तरफ चल पड़े।

आगे की यात्रा आस्ट्रेलिया  की एयर लाइंस काँटाज  (Qantas) से थी। यहाँ वातावरण अच्छा था। यात्री कुछ कम थे। यहाँ भी तकदीर ने साथ दिया। हमारे बगल की एक सीट खाली थी। पसर तो नहीं सके, लेकिन हाँ कुछ सहूलियत से फैल गए। खाना-पीना ठीक था। लगभग सूर्योदय के साथ साथ हम सिडनी के हवाई अड्डे पर उतर गए। यह हवाई अड्डा तुलनात्मक दृष्टिकोण से बहुत  छोटा है। हमारे ऊपर इमिग्रेशन और सामान निरीक्षण की तलवार लटकी थी। दिल धड़क रहा था। हवाई 
हाँग काँग हवाई अड्डे पर पारम्परिक नृत्य 

कलाकारों के साथ 
जहाज पर ही हमें इमिग्रेशन को दिया जाने वाला घोषणा पत्र (declaration form) दे दिया गया था जिसमें हमें अपने बारे में तथा हम क्या ला रहे हैं इसकी जानकारी देनी थी।  आस्ट्रेलिया के मुख्य कारोबार में दूध और कृषि का विशिष्ट स्थान है। अत: यहाँ की सरकार इन के बारे में काफी सचेत और सजग है। ऐसी कोई भी वस्तु जिससे दूध और कृषि उत्पादन में हानिकारक हो सकती है, लाने नहीं देती है। मीनू ने हाँगकाँग में सेव और कोक का टिन उठा लिया था। मैंने उसे फिंकवा दिया। साथ में खाने पीने का थोड़ा सामान था। अच्छी तरह और सही ढंग से पैक किया था। ध्यान से पढ़ने के पर लगा हमारे साथ खाने का जो भी सामान है उसके लिए हाँ कहने की आवश्यकता नहीं है। अत: हमने सबों पर नहीं का निशान लगाया लेकिन दवा पर हाँ का लगाया। इमिग्रेशन तेजी से हो गया और अब हम एक लंबी कतार में खड़े थे। वहीं से सामने ही ‘quarantine’ यानि बंद कमरे में अकेले रखने की जगह बनी हुई दिखाई पद रही थी। वहीं से देखा 10-10 की कतार में 30 लोगों को खड़ा कर के कुत्ते से सुंघाया जा रहा था। यानि जल्दी ही हम भी कुत्ते की कृपा पर ही आश्रित होने वाले थे।  उस समय हमें वे कुत्ते ही भगवान लग रहे थे। कुछ ही देर में हम भी उसी जगह खड़े थे और कुत्ते हमारे अगल बगल से दौड़ने लगे। एक कुत्ता मीनू पर उछला। हमारी साँसे बंद हो गई। लेकिन फिर समझा, वह उसकी ट्रॉली के ऊपर रखे बैक-पैक को सूंघ रहा था। कुत्ते बाबा की  कृपा से हम वहाँ से सही सलामत विदा हो गए। अब हम हवाई अड्डे से बाहर थे। बाहर निकलते ही ठंड का अहसास हुआ। हमें पहले ही हिदायत दे दी गई थी कि गरम कपड़े बाहर रखें । सलाह के अनुसार काम करने के कारण कोई परेशानी नहीं हुई। कोलकाता, घर से निकलने पर शंकाओं से घिरी पूरी यात्रा निर्विघ्न समाप्त हुई। हम जो कुछ लेकर चले थे वह सब लेकर आस्ट्रेलिया पहुँच चुके थे।


हमारी दिक्कत यही है, हम वर्तमान, जो खूबसूरत है,  में नहीं जीते । वर्तमान को छोड़ भूत के पश्चाताप और भविष्य की चिंता में लिपटे वर्तमान को बिगाड़ते रहते हैं। 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

तो हम सब यहाँ से हट जाएँ


सन १९२१ में काँग्रेस का अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ था। कोलकाता से एक कार्यकर्ता श्री बर्ड गो-रक्षा में बहुत दिलचस्पी लेते थे। वह भले और सच्चे व्यक्ति थे। जिस समय महासमिति की बैठक हो रही थी, किसी ने गो-हत्या बंद करने के संबंध में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। अध्यक्ष पद पर हाकी अजमल खाँ विराजमान थे और गांधीजी उनकी मदद कर रहे हे। उन्होने राय दी, यह प्रस्ताव काँग्रेस में लाना ठीक नहीं होगा।

लेकिन बर्ड साहब इस बात पर तुले हुए थे कि यह प्रस्ताव पेश होना ही चाहिए। अध्यक्ष महोदय ने बार-बार बैठ जाने की प्रार्थना की, लेकिन वह टस-से-मस नहीं हुए। तब विवश होकर अध्यक्ष बोले, “आप मेरा आदेश नहीं मानते है, तो सभा छोड़कर चले जाइये”।
बर्ड साहब ने उत्तर दिया, “मैं नहीं जाऊंगा”।
अब तो सभा में हलचल मच उठी। आखिर क्या किया जाय? क्या इन्हे पकड़कर हटाया जाय या पुलिस को बुलाया जाय? किन्तु गांधीजी ने एक नया उपाय खोज निकाला। खड़े होकर बोले, “मैं सब सदस्यों से अनुरोध करता हूँ कि यदि बर्ड सभा-स्थान से नहीं हटते, तो हम सब यहाँ से हट जाएँ”।

बस दूसरे क्षण सभी लोग वहाँ से उठाकर चले गए। अकेले बर्ड साहब हतप्रभ से वहाँ खड़े रहे।



कुछ नया सोचें, शालीन सोचें।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

सूतांजली सितंबर 2019


सूतांजली सितंबर२०१९ में ३ लेख और एक सार्वजनिक प्रार्थना है। अपने विचार एवं टिप्पणी हम तक पहुंचाएं तो हमें अच्छा लगेगा।

इस अंक के तीन  लेख इस प्रकार हैं  -  
१. पर्यावरण, पीतरों की याद में
शायद आप सोच रहे हों कि पर्यावरण और पीतर में क्या संबंध है? देश के कई भागों में सफलता पूर्वक दोनों को जोड़ा गया है और पितृ पक्ष में पीतरों कि याद में वृक्षा रोपण का कार्य हो रहा है।

२. गांधी क्यों?
ऐसी क्या खास बात है कि हम बार बार गांधी को याद करते हैं?

३. गणेश, भारत और हम
हमें कितना याद है गणेश और भारत?

 पढ़ें http://sootanjali.blogspot.com पर

शनिवार, 31 अगस्त 2019

शत्रु से दोस्ती मित्र से बैर?

 बापू के भाष्यकारों में से आचार्य कृपलानी बड़े मार्मिक और विनोदी हैं? उन्होने एक बार कहा कि बापू ने हमें हर तरह से यह बताया कि अरे भाई, अपने दुश्मनों पर प्रेम करो। उन्हे ऐसा लगा कि अपने दोस्तों और पड़ोसियों से प्रेम करने के लिए कहने की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि वह तो स्वाभाविक है। लेकिन हम लोगों ने सोचा कि चूंकि बापू लोकोत्तर पुरुष थे, इसलिए उनकी सीख भी लोक-विलक्षण होनी चाहिए। राजनीति में भी असत्य न हो, हिंसा न हो, यही लोक-विलक्षण सिखावन है। चुनांचे धर्म में, व्यापार में और कुटुंब में झूठ और हिंसा होनी चाहिए, ऐसा मतलब आगर बापू की सीख में से निकले तभी वह अद्भुत होगी, असामान्य होगी। अन्यथा बिलकुल मामूली समझी जाएगी। इसी तरह, अपने शत्रु से प्रेम करो यह बापू की शिक्षा लोकोत्तर थी। उसके मुक़ाबले में दूसरी कौन सी शिक्षा लोकोत्तर हो सकती थी? भला, यही न, कि अपने पड़ोसियों और मित्रों से द्वेष करो। यह तो बिलकुल सीधा तर्क है। अगर शत्रुओं पर प्रेम करना हो तो पहले शत्रु पैदा करने चाहिए। उसके लिए पड़ोसियों और मित्रों से दुश्मनी करनी चाहिए। पहले सारी दुनिया से दुश्मनी मोल लो तभी तो प्रेम कर सकोगे! इस प्रकार बैर द्वारा प्रेम करने की यह अपूर्व प्रक्रिया है। कृपलानीजी ने आगे कहा, बापू ने हमसे शत्रुओं से प्रेम करने को कहा, और हमने उनके आदेश का अक्षरश: पालन किया। हमने केवल शत्रुओं से प्रेम किया – मित्रों से प्रेम करना या तो भूल गए, या फिर उसे इरादतन टालते रहे, क्योंकि अगर वैसा न करते तो बापू की आज्ञा की खिलाफवर्जी  जो होती
कृपलानीजी की इस आलोचना में केवल सस्ता मज़ाक नहीं था।
  चंद्र शेखर धर्माधिकारी, समग्र सर्वोदय दर्शन, दादा धर्माधिकारी, पृ २५

आज बुद्धिजीवी और पीएचडी का एक वर्ग इसी प्रकार से बाल की खाल निकालने और अर्थ का अनर्थ बनाने में व्यस्त है। यह वर्ग ऐसे ही आधुनिक लेकिन गलत विचारों के कारण मीडिया के कृपा पात्र हैं। इन्हे आधुनिक विचार धारा का और एक नए दृष्टिकोण (new angel) से पूरे घटनाक्रम को देखने का खिताब मिलता है। ये हमारी जड़ें खोद रहे हैं, इनसे बचें। 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

महात्मा गांधी महामूर्ख थे?

न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर धर्माधिकारी ने समग्र सर्वोदय दर्शन में अपने पिता दादा धर्माधिकारी के संस्मरण को लिपिबद्ध करते हुए लिखा कि एक बार वे कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार के नाते खड़े थे। दादा (दादा धर्माधिकारी) से आशीर्वाद मांगने गए, तो दादा ने उनसे पूछा कि इस फंदे में तुम क्यों पड़े?
मैंने जवाब दिया, “आप जैसे लोग कहते हैं कि अच्छे लोगों को चुनाव लड़ने के लिए सामने आना चाहिए। अत: मैं इस फंदे में पड़ा”।  
दादा ने पूछा, “तुम अच्छे हो, यह किसने तय किया”?
“अपने देश में दूसरा कोई तो ऐसा कहता नहीं, इसलिए मैंने ही तय किया”, मैंने संभल कर  जवाब दिया।
दादा ने बाद में सवाल  किया, “इस देश में राष्ट्रपति से लेकर गाँव के सरपंच तक सत्ता के कितने पद होंगे”?
“यही कोई दस-पंद्रह लाख तो होंगे ही!” मैंने कहा।
दादा ने पुन: पूछा, “इस देश का काम सुचारु रूप से चले इसलिए पदनिरपेक्ष कार्य करने वाले कितने लोग चाहिए”?
 मैंने कहा, “कम से कम पचास लाख लोग तो चाहिए ही”।
तब दादा ने गंभीर होकर कहा,जो किसी पद पर नहीं है और न पद की आकांक्षा रखता है ऐसे मूरखों की सूची में अपना नाम होना चाहिए। ऐसा महान या महामूर्ख व्यक्ति था महात्मा गांधी”।

तब मेरे ध्यान में आया कि सत्ताकांक्षी या सत्ताधारी लोग समाज या राष्ट्र नहीं बनाते, न सँभालते या सुधारते हैं। उलटा बिगाड़ते हैं। समाज तो सत्ता, संपत्ति निरपेक्ष लोगों ने बनाया है, संवारा है। उम्मीदवारशाही, लोकशाही या लोकनीति नहीं है। जहां हकदार उम्मीदवार नहीं होते, वही तो रामराज्य है और जहां सारे हकदार उम्मीदवार बनना चाहते हैं, वह हरामराज्य है।
दादा धर्माधिकारी एवं चन्द्रशेखर धर्मधकारी 




शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

ज्ञान, प्रेम और घृणा


आज का वर्ग बहुत ज्ञानी है। अत: किसी भी ज्ञान की बात पर उफ़्फ़’, फिर शुरू’, बस बहुत हो गया’, और ज्ञान नहीं ऐसे कुछ जुमले हैं जो तुरंत सुनने को मिलता है। इस वर्ग को और ज्ञान नहीं चाहिए। अगर उन्हे कभी कुछ चाहिए तो बाबा से पूछ लेंगे, अरे अपने वही गूगल बाबा से। लेकिन क्या कभी यह भी सोचा कि उस बाबा को ज्ञान देना भी पड़ता है? यही नहीं, उससे मिला ज्ञान क्या सही है? क्या इस, भले ही अधूरे ज्ञान पर ही सही, कभी विचार किया है? उस ज्ञान पर काम किया है? हमारे पास ज्ञान लेने का समय नहीं है लेकिन व्हाट्सप्प फॉरवर्ड करने के लिए, आस पास रेस्टुरेंट खोजने के लिए, मौल खोजने के लिए, कितने लाइक मिले और यह विश्लेषण करने के लिए कि किसका लाइक मिला और किसका नहीं मिला बहुत समय है। मैं इन्हे छोड़ने नहीं कहता। इन्हे कीजिये, लेकिन सही ज्ञान लेने, समझने और उस पर अमल करने की बात कर रहा हूँ। यही ज्ञान जिंदगी बदलेगी।
   
प्रेम और घृणा पर शोध करने वाले एक विद्वान ने पंद्रह विद्यार्थियों की कक्षा में कहा कि वे वहाँ मौजूद जिन विद्यार्थियों को बिलकुल नापसंद करते हों, उनके नाम एक चिट पर फ़ौरन लिख कर दें।  एक विद्यार्थी को  छोड़ कर, सबने चिट पर नाम लिख दिये। फकत उस एक विद्यार्थी ने किसी का भी नाम नहीं लिखा। कुछ ने कुछ नाम लिखे तो एक ने तो अधिकतम तेरह नाम लिख डाले। इस प्रयोग से जो तथ्य सामने आया, वह बहुत चौंकानेवाला था। जिन विद्यार्थियों ने अधिकतम लोगों को नापसंद किया, उनको स्वयं को भी अधिकतम लोगों ने नापसंद कर डाला। सबसे अद्भुत बात तो यह रही कि जिस युवक ने किसी को भी नापसंद नहीं किया, उसका नाम किसी ने भी अपनी चिट में नहीं लिखा। पसंद और नापसंद, प्रेम और घृणा परस्पर अवलंबित होती है। अच्छे बुरे भाव सापेक्षता का सिद्धांत होते हैं, जैसा हम दूसरों को देखते हैं, दूसरे भी हमें वैसा ही देखते हैं