मैंने पढ़ा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मैंने पढ़ा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 21 जून 2024

प्रकाश


  हमने अपनी जगह बदली कर ली है। नयी जगह का लिंक है 

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/S74xuIOhZtc

 ब्लॉग  पर पढ़ें : 

https://raghuovanshi.blogspot.com/2024/06/blog-post_21.html


आपको नयी जगह कैसी लगी बताएं, विशेष कर अगर पसंद न आई हो या कोई असुविधा जो तो जरूर  से बतायेँ। 

जुलाई  2024 से हमारे सब पोस्ट नये लिंक पर ही होंगे। अतः अनुरोध है कि नये लिंक पर ही पढ़ें। 

पुराने  पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ का लिंक नयी लिंक पर भी रहेगा। 



शुक्रवार, 14 जून 2024

नवजात


 हमने अपनी जगह बदली कर ली है। नयी जगह का लिंक है 

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/dCaRKpbSqQ8

ब्लॉग  पर पढ़े

https://raghuovanshi.blogspot.com/2024/06/blog-post.html

आपको नयी जगह कैसी लगी बताएं, विशेष कर अगर पसंद न आई हो या कोई असुविधा जो तो जरूर  से बतायेँ। 

कुछ समय (जून2024) तक  हम अपनी पोस्टिंग यहाँ भी करेंगे, लेकिन अनुरोध है कि नये लिंक पर पढ़ें। 


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

त्रिविध परीक्षण


 

यूनानी दार्शनिक सुकरात से उनकी जान-पहचान का व्यक्ति एक दिन उनसे मिलने आया। वह सुकरात से कुछ कहने के लिए बड़ा उद्विग्न था। उसने छूटते ही सुकरात से कहा: "क्या बताऊं! आपके उस दोस्त के बारे में मैंने क्या सुना?"

उसकी बात पूरी होने के पहले ही सुकरात बीच में बोल पड़े “जरा ठहरो! तुम कुछ कहो, इससे पहले मैं तुम्हारी और तुम्हारी बात की जांच तो कर लूं!" दोस्त सुकरात को देखता रह गया, उसे सुकरात की बात समझ नहीं आई। खैर, सुकरात ने अपनी बात जारी रखी। "इससे पहले कि तुम इस दोस्त के बारे में कुछ बताओ, मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या तुम पूरी तरह आश्वस्त हो कि तुम जो कहने जा रहे हो वह सत्य है?"

हकलाते हुए रुक-रुक कर दोस्त ने कहा, "नहीं......., ऐसा तो मैं नहीं कह सकता! दरअसल मैंने ये सारी बातें किसी से सुनी हैं और चाहता हूं कि आपको भी बताऊँ।"

“वो तो ठीक है", सुकरात ने कहा, “ जिस बात की सच्चाई का तुम्हें भरोसा नहीं है वह बात तुम मुझसे बांटना चाहते हो तो बताओ, जो बात तुम मेरे दोस्त के बारे में कहने जा रहे हो क्या वह कुछ अच्छी, शुभ बात है?

"नहीं, बल्कि बात तो इसकी उलटी..."

सुकरात ने उसकी बात काटते हुए पूछा, अच्छा तो बात यह है कि तुम मुझे ऐसी बुरी बात बताने जा रहे हो जिसके बारे में तुम यह भी नहीं जानते कि वह सत्य है या नहीं, तो मुझे यह बताओ कि जो तुम मुझे बताना चाहते हो क्या वह मेरे लिए उपयोगी है?

सामने वाला आदमी थोड़ी परेशानी से बोला, “हां, नहीं... नहीं, कुछ खास उपयोगी तो नहीं..."

"अच्छा तो अब सुनो," सुकरात ने अपनी बात पूरी की, "तुम मुझे जो बात बताना चाहते हो वह न सत्य है, न अच्छी है और न उपयोगी ही है, तो उसे सुनने और उसे सुनाने में क्या लाभ?... हम वक्त क्यों जाया करें! आओ, मेरे साथ काम करो!"

सुकरात अपने काम में उसे आदमी को जोड़ कर व्यस्त हो गए। यह कथा संसार भर में 'सुकरात का त्रिविध परीक्षण' नाम से प्रचलित हुई। और सभी इसे अपनी-अपनी तरह से सुनाते हैं। लेकिन इस त्रिविध परीक्षण का सार तो हर कहीं एक ही है : जो व्यर्थ है उसे कहने सुनने में समय व्यर्थ न करो

(अगला कोई किस्सा कहने-सुनने, व्हाट्सएप्प किसी को भेजने के पहले इस त्रिविध परीक्षण को दुबारा पढ़ें और उसका त्रिविध परीक्षण करें। दूसरों की बात कहने के बजाय अपनी बात, अपना अनुभव साझा कीजिये। कबीर को याद कीजिये:

“सार-सार को गही रहे, थोथा देई उड़ाय”

तोड़ने की बात उड़ा दीजिये, जोड़ने की बात रख लीजिये। सत्य को रख लीजिये अफवाह को उड़ा दीजिये। अफवाहों को फैलाना बंद कीजिये। किसी की लिखी / पढ़ी / सुनी बात अच्छी लगे तो उसके साथ अपने विचार, अपने अनुभव भी जोड़ कर भेजिये। इससे आपका ही फायदा होगा क्योंकि:  

1। जो अच्छी बात आप आगे भेज रहे हैं, उसे पहले खुद को समझना होगा, उस पर मनन करना होगा, अपने अनुभव जोड़ने होंगे, और  

2। इस प्रकार छान कर भेजी हुए बात को पढ़ने वाला, सुनने वाला ज्यादा महत्व देगा।)

~~~~~~~~~~~~

क्या आपको हमारे पोस्ट पसंद आ रहे हैं, क्या आप चाहते हैं दूसरों को भी इसे पढ़ना / जानना चाहिए!

तो इसे लाइक करें, सबस्क्राइब करें, और दूसरों से शेयर करें।

आपकी एक टिक – एक टिप्पणी दूसरों को

पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

~~~~~~~~~~~~

 

यूट्यूब  का संपर्क सूत्र à

https://youtu.be/Q5hSO8XdLF8


शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

जो दिलों को रौशन करे वही दीवाली

 

दीपावली के शुभ अवसर पर सबों को बधाइयाँ

और

दीपोत्सव के वंदन



दीपों की जगमगाहट के साथ जीवन को मिठास से भर देने की परम्परा का नाम ही दीपावली है। रौशनी के इस महापर्व की तैयारी भी शुरू हो चुकी है तो क्यों न इस बार रौशनी के पर्व की शुरुआत घर का अँधेरा मिटाने के अलावा मन का अँधेरा दूर करने से ही की जाये? इस बार उपहार के बहाने खुशियाँ बाँटी जायें? क्यों न इस बार मुँह के साथ जिंदगी को भी मीठा कर दें? क्यों न इस बार दीपों की जगमगाहट की तरह नई सोच को जीवन से जोड़ दिया जाए ताकि खुशियों को बाँटने की परंपरा जीवन में त्यौहार की तरह बस जाए।

          सवाल कई हैं और उनके जवाब भी हमारे पास हैं, हमारे खुद के पास, क्योंकि जब तक हम जिंदगी में कुछ सकारात्मक नहीं करेंगे, तब तक जीवन का अँधेरा सदा के लिए दूर करना मुश्किल है। हम इससे जीत नहीं सकते, इसलिए इस बार एक नई शुरुआत करते हैं, अँधेरे को हमेशा के लिए दूर करने की। घर की सफाई यदि हमने कर ली मगर कूड़ा मुहल्ले के किसी चौराहे पर फेंक आये, तो उससे तो परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। हमें सोचना चाहिए कि इससे वहाँ रहने वाले लोगों को परेशानी होती है। इसलिए कचरे का सही तरीके से प्रबंधन करना सीखें।

          यदि हमारे शहर मुहल्ले में कूड़े का निस्तारण सही ढंग से नहीं हो रहा है तो इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से करें और खुद भी सोचें कि कचरे का प्रबंधन कैसे हो? इस बार कोशिश करें कि गंदगी घरों से ही नहीं, बल्कि सड़कों व शहरों से भी दूर हो। एक स्वच्छ माहौल तैयार हो और खुशियों के आने का रास्ता पूरी तरह साफ हो।

          हर बार की तरह कोई कोना रोशनी से न बचने पाए, यह तो जरूर सोचा होगा। इस बार हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं कोई कूड़ा-कचरा गंदगी को न बढ़ा रहा हो, साथ ही कोई हृदय अँधेरे से भरा न रहे  यह भी हमें सोचना चाहिए। इस बार रोशनी की जगमगाहट को हृदय से जोड़े रखिए, ताकि जीवन भर यह जगमगाहट हर कोने के साथ हर हृदय तक पहुँचे। सभी व्यक्तियों के साथ मुक्त हृदय से मिलिए। हृदय खोलकर मिलिए। मिठाइयाँ तो हर साल बँटती हैं, इस बार से खुशियों को बाँटने की परंपरा को और ज्यादा मजबूत और सशक्त बनाइए। सगे-संबंधी रिश्तेदारों और आस-पास के लोगों के बीच खुशियाँ इतनी बाँटी जाएँ कि घर से बाहर तक खुशियों का माहौल इस बार लंबे वक्त के लिए ठहर जाए। इस बार खुशियों को बाँटने में कोई कंजूसी नहीं हो, यह सोचकर हम दीपावली का त्योहार मनाएँ।

          मिठास जबान पर हो तो मन अच्छा हो जाता है और दिलों में हो, तो जिंदगी खूबसूरत। तो क्यों न इस बार जिंदगी को मीठा कर दिया जाए - प्रेम की बोली से, मनचाही कुछ बातों से, दुःख-सुख बाँटने के कुछ अच्छे लम्हों से, क्योंकि यह मिठास ऐसा धागा है जो जीवन में न सिर्फ मिठास ही बोलेगा, बल्कि दिलों को भी जोड़े रखेगा। नई शुरुआत जीवन की उन उलझनों को कहीं पीछे छोड़कर हो, जो लंबे समय से रुकी हुई है। नई शुरुआत उन रिश्तों की भी होनी चाहिए, जिन पर उदासी का रंग चढ़ गया है, ताकि एक नई उम्मीद के साथ फिर से जिया जा सके।

          हालांकि भारतीय दीपावली एकता के रंगों से जगमग होती रही है। इस सिलसिले को बनाए रखने के लिए और घर के माहौल के साथ पूरे परिवेश को खुशियों से भरने के लिए इसमें प्रेम की मिठास को घोलते रहना जरूरी है, ताकि विविधताओं से भरे इस देश में दीवाली हमेशा मनती रहे 'एकता की दीपावली ।'  कोई अकेला न रह जाए, इसलिए पास-पड़ोस के लोगों से मिलते रहने का बहाना ढूंढ़िए। घर की सजावट के लिए प्राकृतिक फूलों के बंदनवार, शुभ दीपावली, कंदील आदि बनाएं। इससे दीपावली पर हमारा घर प्राकृतिक एवं सकारात्मक ऊर्जा और खुशबू से महक उठेगा।

          इसके साथ ही हम ये भी सोचें कि सबसे बढ़कर अगर कोई उपहार है तो वह है जरूरत में काम आने वाली चीज। इसलिए इस बार उन घरों में भी झाँकिए, जहाँ रौशनी तो है मगर जरूरतें भी मौजूद हैं। हो सकता है हमारा कोई उपहार उन जरूरतों को पूरा करे। मिठाइयाँ तो सभी बाँटते हैं, इस बार जरूरतमंदों की जरूरत के मुताबिक उपहार बाँटिए। फिर इसकी जरूरत चाहे हमारे अपने घर के बुजुर्गों को हो, छोटों को या फिर आस-पास के माहौल में किसी को क्यों न हो, इस बार एक दीया जिंदगी की नई शुरुआत के नाम हमें जलाना ही चाहिए

(मधुसंचय पर आधारित)

~~~~~~~~~~~~

क्या आपको हमारे पोस्ट पसंद आ रहे हैं, क्या आप चाहते हैं दूसरों को भी इसे पढ़ना / जानना चाहिए!

तो इसे लाइक करें, सबस्क्राइब करें, और दूसरों से शेयर करें।

आपकी एक टिक – एक टिप्पणी दूसरों को

पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

~~~~~~~~~~~~

 

यूट्यूब  का संपर्क सूत्र à

https://youtu.be/PMeLpdriHGk


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

हर मुश्किल से पार लगाती है, इंसानियत

(कहानी नहीं, उन सच्ची घटनाओं में से एक है यह, जिनमें जात-पाँत के होते हुए भी इन्सानों में सच्ची इन्सानियत का जज्बा उझक-उझक कर झलकता है और होठों पर बरबस मुस्कान और मोहब्बत की लकीरें खींच जाती है। इंसान-इंसान होता है, वह न हिन्दू है न मुसलमान, न सिक्ख, न ईसाई। वह न गरीब है न धनवान। जात-पांत से परे उसी कुम्हार की रचना है जिसने सब को गढ़ा है।)



          मैं एक किसान का लड़का हूँ, मगर मैंने खुद कभी हल नहीं चलाया। मेरे पिताजी संस्कृत के बड़े पण्डित थे, साथ ही खेती का काम भी अच्छी तरह से जानते थे। हमारे पड़ोसी थे, इब्राहीम। वे जात के जुलाहे थे, पर खेती से अपना गुज़ारा करते थे। हमारे और उनके खेत पास-पास थे अतः हमारे बीच अच्छा संबंध था। मेरे पिताजी उनको अपने भाई की तरह मानते थे। हम सब उन्हें इब्राहीम चाचा कह कर पुकारते थे।

          इब्राहीम चाचा हमारे साथ अपने बच्चों का-सा बरताव करते थे। वे एक नेक मुसलमान थे, और हमारी धार्मिक बातों का हमसे भी ज़्यादा ख़याल रखते थे। अक्सर, फसल के दिनों में मेरे पिता और इब्राहीम चाचा बारी-बारी हमारे खेतों की रखवाली करते, और इस तरह पैसा और वक़्त दोनों बचा लिया करते थे।

          जब कभी हम मुँह अँधेरे अपने खेत पर जाते, तो दूर से ही चिल्ला कर पुकारते- "इब्राहीम चाचा, सो रहे हो या जाग रहे हो?" वे खेत में से जवाब देते– “आओ बेटा, आओ ! आज मैंने बहुत अच्छी-अच्छी ककड़ियाँ और मीठे-मीठे खरबूजे तोड़े हैं। आओ, ले जाओ", और हमारी झोलियाँ भर देते। मेरे पिताजी भी अपने अच्छे से अच्छे खरबूजे तुड़वा कर चाचा के घर भिजवाते। हम में से किसी को भी यह खयाल तक न आता कि हम हिन्दू है और वे मुसलमान!

          हम चार भाई थे मैं सबसे छोटा था, इसलिए इब्राहीम चाचा मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते थे। आम के मौसम में टपके का सबसे पहला आम इब्राहीम चाचा उतारते, बहुत हिफाजत के साथ उसे  कपड़े में लपेट कर लाते और चुपचाप मेरी जेब में डाल देते। मैं उसे सूँघता और उसकी मीठी खुशबू से मस्त होकर मारे खुशी से बोल उठता- "चाचा, आप तो इस आम से भी ज्यादा मीठे हैं।" चाचा को गुड़ बहुत पसन्द था, और उनकी बोली भी बहुत मीठी थी। इससे हम सब उन्हें हंसी से 'मीठे चाचा' कहा करते। यह सुन वे चिढ़ते और हमें पकड़ने के लिए लपकते। हम भाग जाते और कभी उनके हाथ न आते।

          अक्सर इब्राहीम चाचा अपनी रकाबी में रोटी रख कर हमारे घर आते और मुझे आवाज देकर कहते “बेटा, जरा देखो तो तुम्हारे घर कोई साग तरकारी बनी है?" मैं दौड़ा-दौड़ा माँ के पास जाता और तरकारी, अचार और दूसरी अच्छी-अच्छी खाने की चीजें थाली में ले आता और उनकी रकाबी में रख देता। चाचा वहीं बैठ कर बड़े मजे से खाते और उन्हें परोसी हुई चीज खतम भी न हो पाती कि मैं और ले आता और उनके मना करने पर भी रकाबों में परोस देता। मेरे इस बरताव से अक्सर उनकी आँखों में मोहब्बत के आंसू छलछला आते।

          इस तरह मेल-मोहब्बत में कई साल बीत गये, और दोनों कुनबों के लोगों में आपसी मोहब्बत बढ़ती गयी। इस बीच मेरे पिताजी गुज़र गये। अब तो इब्राहीम चाचा हमें पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगे। मेरे बड़े भाई हमेशा उनकी सलाह से काम करते, और चाचा भी उन्हें सच्ची सलाह देते।

          एक बार का क़िस्सा है। हिन्दुओं की कुछ गायें और भैंसे चरवाहों की लापरवाही से मुसलमानों के कब्रिस्तान में घुस गये और बहुत से पेड़-पौधे चर गयीं। मुसलमानों को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई। गाँव के मुसलमानों ने चरवाहों की खासी मरम्मत की और जानवरों को कांजी हौस में ले जाने लगे। चरवाहों ने यह खबर गांव में पहुंचायी। जानवरों के मालिक अपनी लाठियाँ संभाल कर मौकाये  वारदात पर पहुंच गये। बात बिजली की तरह सारे गाँव में फैल गयी, और आसपास तमाम हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे से लड़ने के लिए मैदान में जमा होने लगे। घण्टों तू-तू, मैं-मैं होती रही और लाठियों के चलने की पूरी तैयारी हो गयी। समझौते की सब कोशिशें बेकार साबित हुई। मुसलमानों ने कहा- "चरवाहों के लड़के हमेशा ऐसा करते हैं” और उन्होंने लाठी, पत्थर, ईंट वगैरह जो भी चीज मिली, जमा कर ली। वे लड़ने और मरने मारने पर तुल गये।

          इब्राहीम चाचा भी अपने बेटों और पोतों के साथ वहां मौजूद थे। उन्होंने झगड़ा मिटाने की बहुत कोशिश की, मगर किसी ने उनकी न सुनी। उन मवेशियों में हमारे मवेशी भी थीं, इसलिए मेरे भाई भी वहाँ पहुंच गये थे। औरतों और बच्चों को छोड़ कर सारा गाँव वहाँ जमा हो गया था। औरतें  बेचारी हैरान थी और सोचती थी – मर्दों का क्या होगा?

          मैं मदरसे से आया तो देखा घर के दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द थीं। मुझे भी झगड़े का पता चल गया। मैंने किताबें एक कोने में पटकी, माँ मना करती रही, मगर मैं मैदान की तरफ भाग लिया, और तेज़ी से उस जगह पहुँच गया जहाँ लोगों की भीड़ जमा थी। देखा तो मालूम हुआ कि इब्राहीम चाचा अपने बेटों और पोतों के साथ सामने वाले दल में सबसे आगे खड़े थे। मैंने बड़ी मासूमियत से उनसे पूछा- "इब्राहीम चाचा, आप किस तरफ हैं?"

          इब्राहीम चाचा ने फ़ौरन अपने एक बेटे के हाथ से लाठी ली, और वे मेरे पास आ खड़े हुए। उन्होंने अपने बेटों से कहा- "इसका पिता आज ज़िन्दा नहीं है, इसलिए मैं इसके साथ रह कर ही लड़ूँगा। तुम उस तरफ़ रहो।" इब्राहीम चाचा को दूसरी तरफ़ जाते देख कर सब लोग दंग रह गये। कुछ देर तक वहाँ सन्नाटा छाया रहा। सब शर्मिन्दा हो गये और बिना कुछ बोले अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े। इब्राहीम चाचा के पीछे-पीछे हम सब भी अपने-अपने घर लौट आये।

          उस दिन तो मैं समझ ही न पाया कि इतना बड़ा झगड़ा एकदम कैसे ठण्डा पड़ गया। लेकिन आज में इस चीज़ को अच्छी तरह समझता हूँ, क्योंकि आज मैं इन्सानियत से परिचित हो गया हूँ।

          इब्राहीम चाचा अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन मैं उन्हें कभी नहीं भूलूँगा। मैं उनकी क़ब्र को अच्छी तरह पहचानता हूँ। उसे देख-देख कर मैंने कई बार आँसू बहाये हैं। जब कभी क़ब्रिस्तान की तरफ़ से निकलता हूँ, तो उनकी क़ब्र देख कर बच्चों की तरह बरबस यह पूछ बैठता हूँ-"इब्राहीम चाचा! सोते हो या जागते हो?" और मुझे अपने प्यारे इब्राहीम चाचा की मानों सदियों से सुनी आ रही वही भीनी-भीनी ख़ुशबू लिये आवाज़ सुनायी देती है— “बेटा, तेरा इब्राहीम चाचा दुनिया की नज़रों में भले सो चुका हो, लेकिन तेरी हर पुकार पर हमेशा की तरह दौड़ कर, तुझे अपनी बाँहों में भर, हर मुश्किल के समन्दर से पार लगा देगा।"

(वंदना - 'अग्निशिखा', से)

~~~~~~~~~~~~

क्या आपको हमारे पोस्ट पसंद आ रहे हैं, क्या आप चाहते हैं दूसरे भी इसे पढ़ें!

तो इसे लाइक करें, सबस्क्राइब करें, और परिचितों से शेयर करें।

आपकी एक टिक – एक टिप्पणी दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

~~~~~~~~~~~~

यूट्यूब  का संपर्क सूत्र

https://youtu.be/Ytn1Afhodxs


शुक्रवार, 25 मार्च 2022

ऐसा भी एक समय था

मैंने पढ़ा

(धर्मवीर भारती हिन्दी के जानेमाने  लेखक, कवि, नाटककार हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में हैं गुनाहों का देवता, अंधायुग, कनुप्रिया, सूरज का सातवाँ घोड़ा आदि। काऊ बेल्ट की उपकथा के शीर्षक से, दशकों पहले  लिखा उनका लेख देश की हिन्दी पट्टी की सामाजिक सौहार्द और धार्मिक सहिष्णुता की कहानी कहता है। प्रस्तुत अंश उसी लेख से है। यह विचारणीय है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.......)     

हिंदी प्रदेश से हजारों मील दूर, थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक। इतने दिनों से देश के बाहर चक्कर काट रहा हूँ कि देश की ऋतुओं और तिथियों का कोई अंदाज ही नहीं रहा। हवाई अड्डे से होटल बहुत दूर है और होटल पहुँचने के पहले ही बीच में रुककर एक मेले में जाना है। मेला काहे का? कुश्ती का। मैं हक्का-बक्का हूँ कि यह कैसा होगा और कुश्ती से मेरा क्या ताल्लुक? तीन ओर मकानों से घिरे एक खुशनुमा मैदान में हजारों भारतीयों की भीड़। बीच-बीच में छह सात अखाड़े खुदे हुए हैं। पहलवान अपनी मंडलियों के साथ 'बजरंगबली की जय' बोलते चले जा रहे हैं। मेजबान मुझको आश्चर्य चकित देखकर मुस्कुराते हैं और फिर आहिस्ते से समझाते है, 'आप बंबई में रहते हैं न, भूल गए होंगे कि आज नागपंचमी है। हम लोग सौ साल से यहाँ हैं, पर अपने त्यौहार नहीं भूले। नागपंचमी को हम लोगों ने युवा दिवस बना लिया है। उसी तरह अखाड़े खुदते हैं, जैसे यू.पी., बिहार में।  आज की कुश्ती के चैंपियन को पुरस्कार आपके हाथ से दिलाएंगे।' नागपंचमी की पुरस्कार विजेता थी, लछमन अखाड़े की युवा जोड़ी - इसाक गफूर और राघव मिसरा।

          ये थे 'काऊ बेल्ट'1 से जाकर बैंकॉक में बसे हुए प्रवासी भारतीय इनमें साधारण दरवान और चौकीदारों से लेकर लखपति, करोड़पति लोग थे। मालूम हुआ कि बैंकॉक का सारा लकड़ी का व्यापार, इमारती सामान की तिजारत, मकान बनाने का उद्योग, मशीनों और फ़ैक्टरियों को संचालित करने का उद्यम, कपड़े की आढ़तें सब भारतीयों के हाथ में हैं और इन सभी भारतीयों में नब्बे प्रतिशत यू.पी., बिहार के लोग हैं, पिछड़ी हुई हिंदी पट्टी के। अशिक्षाग्रस्त काऊ बेल्ट के।

शाम को डिनर रखा गया था, अब्दुल रज्जाक साहब के घर पर। वे बैंकॉक में इमारती लकड़ी के सबसे बड़े व्यापारी हैं, थाईलैंड के मिनिस्टरों और सेनापतियों के हम प्याला, हम निवाला। हज कमेटी के सर्वेसर्वा, मलेशिया और थाईलैंड के इस्लामिक कल्चर फेडरेशन के चेयरमैन, पर आज भी दिल उनका यू.पी. में रमा हुआ है। यू.पी. से कोई मेहमान आए, पहली शाम का डिनर उन्हीं के यहाँ होना जरूरी है। पता नहीं कैसे, उन्हें मालूम हो गया था कि मैं आया बंबई से हूँ, पर हूँ मूलत: यू.पी. का।

रज्जाक साहब तपाक से गले मिले। बैंकॉक के भारतीयों की समस्याएं बतलाते रहे। भारत का हालचाल पूछते रहे। फिर बोले, 'खाना मेज पर लगा है। पर दो मिनट ठहर जाइए। मेरा एक दोस्त आपसे मिलने आया है खासतौर से। हाथ-मुँह धोने गया है।' कौन है यह दोस्त?

दो तीन मिनट बाद बाथरूम  का दरवाजा खुला और उसमें से जो लंबे से अधेड़ साहब निकले, उनका हुलिया साक्षात 'काऊ बेल्टी' था। धोती का फेंटा कसते हुए भीगे जनेऊ से पानी सूंघते हुए, लंबी चोटी को फटकारते हुए उन्होंने नम्रता से नमस्कार किया। मालूम हुआ ये हैं रामभरोसे पंडित। बैंकॉक के हिंदू सेवादल के अध्यक्ष, भारत प्रवासी ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टी, विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय महामंत्री। शिखा बांधकर, बदन पर एक फतूही डालकर जब वे खाने की मेज पर बैठे तो पता चला कि रज्जाक और रामभरोसे की जिगरी दोस्ती पूरे देश में मशहूर है। आंधी हो, पानी हो, हफ्ते में कम से कम दो दिन, दोनों साथ डिनर लेते हैं, कभी रज्जाक साहब के यहाँ, कभी रामभरोसे पंडित के यहाँ।

रज्जाक साहब प्रेम से रामभरोसे की टांग खिचाई कर रहे थे- 'साहब यह हिंदू सभा का नेता है, पर महीनों तक जनेऊ नहीं बदलता। बार-बार मुझे याद दिलानी पड़ती है। परले सिरे का कंजूस है।' रामभरोसे कहाँ पीछे रहने वाले, बोले- 'साहब, इसकी बातों में न आइएगा। इसका कोई दीन-ईमान है। मस्जिद के मकतबे में जंगली लकड़ी का शहतीर लगवा रहा था। मैं आकर बिगड़ा तो इसने साख की लकड़ी लगवाई। अरे धरम के काम में तो मुनाफा न कमा।'

बहरहाल, खाना शुरू होता है तो यह भेद खुलता है कि हफ्ते में दोनों दो बार साथ खाना खाते हैं, वह इसलिए कि अपनी-अपनी संस्थाओं की समस्याओं के बारे में एक-दूसरे की सलाह  जरूरी होती है। रज्जाक साहब हिसाब-किताब, कानून-आईन में पक्के हैं और रामभरोसे पंडित को संस्था संचालन... लोकप्रियता के हथकंडे और तिकड़में खूब आती हैं। रामभरोसे के हिंदू सेवा दल वगैरह का हिसाब-किताब रज्जाक साहब के जांचे बिना पूरा नहीं होता और रज्जाक साहब की संस्थाओं में कोई झगड़ा झंझट उठ खड़ा होता है तो रामभरोसे की सूझबूझ काम में आती है। पिछले साल हज जाने वाले यात्रियों का मलायी और चीनी कुलियों से कुछ झंझट हो गया और मामला जरा तूल पकड़ने लगा। रज्जाक साहब ने संदेशा भेजा। रामभरोसे दौड़े हुए आए और डांट-फटकार, मान-मनुहार कर आधे घंटे में मामला रफा-दफा कर दिया। एक बार बैंकॉक के कलेक्टर ने जमीन का कोई पुराना कानून लागूकर नागपंचमी के मेले पर बंदिश लगा दी और पिछले दस साल का हर्जाना लाखों में मांग लिया। रज्जाक साहब पहुँच गए दो वकीलों को लेकर कानून पर बहस की, हर्जाने की रकम कम कराई और नागपंचमी के मेले की लिखित अनुमति लेकर डेढ़ घंटे में पहुँच गए। अखाड़े चालू करवा दिए।

ये किस्से सुनकर जब मैंने रज्जाक साहब से कहा कि 'खूब है आप लोगों की दोस्ती! तो रामभरोसे बोले, 'काहे की दोस्ती डॉक्टर भारती साहेब, असल में हम आजमगढ़ के हैं, इही सारू आजमगढ़ का है। एक माई का दुइ बेटवा समझी। ई बात जुदा है कि हम लायक बेटवा हैं, ई जरा नालायक निकल गया। मुला धन दौलत एही कमाता है। बात ई है कि लक्षमी मैया तो उल्लुऐ पर बैठती है न...' और रज्जाक साहब का एक घूंसा रामभरोसे की पीठ पर पड़ा, 'अबे देवी-देवताओं की तो इज्जत रख, हंसी-मजाक में उन्हें भी घसीटता है। जाने इसे हिंदू सभा का सेक्रेटरी किसने बना दिया?'

अपने-अपने धर्म पर अखंड आस्था दूसरे धर्म के प्रति गहरा निश्छल आदर और जात-पात संप्रदाय से ऊपर उठकर पूरी भारतीय जाति को अपना समझने वाले ये रज़्ज़ाक़ और रामभरोसे के चेहरे मेरे जेहन में गहरे दर्ज हैं, क्योंकि हिंदी पट्टी का, हम हिंदी भाषियों का यही असली चेहरा है।

आज जब मुरादाबाद, मेरठ, इलाहाबाद या बिहार में कहीं भी सांप्रदायिक तनाव की खबर पढ़ता हूँ, तो बड़ी शिद्दत से याद आते हैं ये दोनों चेहरे उदास होकर सोचता हूँ कि कहाँ खोता जा रहा है हमारा असली चेहरा? ये नफरत के मुखौटे किसने लगा दिए हैं हमारे चेहरों पर? किसने हमारे होठों पर चिपका दिए हैं, ये ललकार भरे नारे? नहीं दोस्तों, यह जहर हमारी हिंदी पट्टी का नहीं, यह तो कोई साजिश कर रहा है, चुपचाप। हमारा तो असली चेहरा वही है जिसका मजहब कोई हो, जिसका असली धर्म प्यार है, निश्छल प्यार, उदारता, दिली भाईचारा

धर्मवीर भारती  अहा ! जिंदगी | सितम्बर 2017

'काऊ बेल्ट'1 हिन्दी भाषी प्रदेश, मतलब राजनीतिक भाषा में हिंदी पट्टी, अंग्रेजी परस्त अफसरों और पत्रकारों की भाषा में 'काऊ बेल्ट' मतलब अशिक्षा, पिछड़ेपन, जातिवादी और संप्रदायवादी कट्टरता में निमग्न अंधकार भरी पट्टी - देश की प्रगति और आधुनिकीकरण में सबसे बड़ा अवरोध; उपहास, उपेक्षा और अवमानना का पात्र!

(काऊ बेल्ट शब्द का प्रयोग अंग्रेज़ एवं अग्रेज़ परस्त लोग हिन्दी भाषा क्षेत्र के लिए करते थे जो एक प्रकार का अपमानसूचक शब्द था, एक प्रकार की सभ्य गाली।

नफरत करना और फैलाना बहुत आसान है असली भारतीय हों तो इसे रोकें, रोक न सकें तो कम-से-कम इसे फैलाने में सहयोग न करें और भाईचारा और सौहार्द का माहौल बनाने का प्रयत्न करें – संपादक)

**************

आपने भी कहीं कुछ पढ़ा है जिसे आप दूसरों से बांटना चाहते हैं तो हमें भेजें। हम उसे यहाँ, आपके संदर्भ के साथ  प्रस्तुत करेंगे।

~~~~~~~~~~~~

अगर हमारे पोस्ट आपको पसंद आ रहे हैं, तो सबस्क्राइब करें, अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको कैसा लगा और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

यू ट्यूब का संपर्क सूत्र -->

https://youtu.be/bFXPrxyEuTY


शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

क्या हासिल होगा, सरल होने से?

 क्या हासिल होगा,

       सरल होने से?

सरल होकर तुम

                    आनंद हो जाओगे...

 जीवन क्या है? एक जटिल पहेली या एक सरल सफर! हम इस प्रश्न से रोज किसी न किसी रूप से जूझते रहते हैं। आज लोग जीवन की आपाधापी में बेचैन दिखते हैं, पर सच तो यह है कि जीवन बहुत ही सरल है। जिसका जीवन जितना सरल उसकी आंतरिक शक्ति उतनी ही बड़ी। एक पौधे में से कलि निकलकर देखते-ही-देखते फूल बन जाती है। यह गुलाब की आंतरिक शक्ति है कि वह कभी साबित नहीं करना चाहता कि वह गेंदे से बेहतर है, और गेंदा कभी नहीं कहता कि उसका रंग गुलाब से सुंदर है। वे जो हैं वही हैं, न कम न ज्यादा, सहज सरल, उन्हें किसी को कुछ साबित नहीं करना। उनकी आंतरिक शक्ति उन्हें पूर्णता का एहसास कराती है।

          कुछ भी करने के पहले हम विचार करते हैं – क्यों करूँ? क्या हासिल होगा यह करने से? जैसे, क्या होगा सत्य कहने से, क्या हासिल होगा ईमानदार होने से, क्या मिलेगा सरल होने से ....... क्या उपयोगिता का केवल एक ही पैमाना है – धन? उस धन की क्या उपयोगिता जो कलह पैदा कर दे! क्या उससे गरीबी की उपयोगिता ज्यादा मूल्यवान नहीं जो सुलह करा दे? क्या आनंद ही अंतिम उपयोगिता नहीं है? तब हम क्यों आनंद को छोड़ धन के पीछे भागते फिरते हैं। इस भ्रम को क्यों पालते हैं कि धन से ही आनंद प्राप्त होगा? हाँ, धन चाहिए, लेकिन क्या केवल धन? क्या सब धनी आनंद में हैं? सरल होने में तो कोई धन भी नहीं लगता। फिर, आनंद के लिए धन क्यों चाहिए? क्या सरल-आनंद को अपने कभी भोगा है? एक बार तो इस आनंद में डुबकी लगा कर देखिये।  

          एक समय की बात है सुकरात और डायोजिनीज की मुलाकात हुई। सुकरात साधारण कपड़े पहनते थे। डायोजिनीज या तो नंगा रहता था या चीथड़े लपेटे रहता। डायोजिनीज ने सुकरात से कहा, 'मैंने तो सुना था कि तुम ज्ञानी और सरल हो, पर देख रहा हूँ कि तुमने बड़े सुंदर कपड़े पहन रखे हैं। सुकरात हंसे और बोले कि 'शायद ऐसा ही हो। डायोजिनीज बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने सुकरात के शिष्य प्लेटो से व्यंग्य में कहा कि स्वयं तुम्हारे गुरु ने स्वीकार किया है कि वे सरल और त्यागी बिल्कुल नहीं हैं। प्लेटो ने उत्तर दिया, उन्होंने ज्ञान और त्याग, सरलता और साधुता का कोई बाना नहीं पहन रखा है, न ही तुम्हारी तरह वे त्याग का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें अपने त्याग और ज्ञान पर अहंकार नहीं है, किंतु तुमने तो अपने नंगे शरीर को पोस्टर बना रखा है। इस नंगेपन में कोई सरलता नहीं है। प्रयत्न करके नंगा होना-सरलता कैसे होगी? सरल वह होता है, जो अनायास हो और भान भी न हो। धर्म और तप का प्रदर्शन भी अहंकार है।

          तोलस्तोय कहते हैं, 'जहाँ सरलता और अच्छाई और सत्य के लिए स्थान नहीं है, वहाँ महानता हो ही नहीं सकती।' सरलता हर समय प्रस्तुत रहती है, पर इंसान जीवन को जटिल बनाने में जुट जाता है। संसार का हर जीव कर्म के अनुसार फल के इस नियम में बंधा जीवन जी रहा है। पर इंसान ने इस सरल नियम से किनारा कर लिया है। लोग सोचते हैं कि ऐसी क्या युक्ति निकाली जाए कि आम के पेड़ में कटहल उग आए। वे यह नहीं सोचते कि अगर हम आम खाना चाहते हैं, तो आम लगा लें और कटहल की चाह में कटहल। पर नहीं, यह सरल मार्ग हमें नजर नहीं आता। और जब जटिलता के मार्ग पर चलकर हमें सरलता के दर्शन नहीं होते हैं तो हम कहते हैं, अगर जटिल मार्ग पर चलकर हमें मंजिल नहीं मिली तो सरलता पर चलकर तो हम गर्त में ही चले गए होते। आज यह प्रश्न बहुत ही जरूरी बन गया है कि आखिर क्यों कोई व्यक्ति जटिल हो जाता है?

          न्यूटन का, वर्षों की मेहनत नष्ट करने वाली बिल्ली से यह कहना, ‘तुम्हें पता नहीं प्यारी बिल्ली कि तुमने यह क्या किया। यह न्यूटन की आंतरिक शक्ति से निकली हुई बात है और यह आंतरिक शक्ति उनकी सरलता से निकलती है। ऐसा नहीं हुआ होगा कि उन्हें अपनी वर्षों की मेहनत के नष्ट होने से कोई कष्ट नहीं हुआ हो। पर उन्हें अपने द्वारा किए गए कार्य, उसके महत्व का किसी भी प्रकार से अहंकार नहीं था। यह उनके मन की शक्ति से निकली हुई बात थी। यह उनकी आंतरिक शक्ति ही थी, जिसके चलते वे नए सिरे से उस कार्य को कर सके।


          कुछ ऐसा ही वाकिया है थॉमस एडीसन का। 67 वर्ष की उम्र में एक दिन एक विस्फोट के साथ उनके  कारखाने में आग लग गई। अथक प्रयासों के बावजूद भी, तेजी से फैलते केमिकल के चलते कारखाने को नहीं बचाया जा सका और पूरा कारखाना जल कर राख हो गया। एडिसन के साथ उनका लड़का भी था। उन्होंने उसे कहा जाओ अपनी माँ को बुला कर लाओ, उसने अपनी जंदगी में कभी राख का इतना बड़ा ढेर नहीं देखा होगा। उनकी पत्नी जब अर्धमूर्छित अवस्था में वहाँ पहुंची तो उन्होंने कहा दुःखी मत होओ, अच्छा हुआ मेरी सब गलतियाँ जल कर राख हो गईं। अब मैं फिर नए सिरे से प्रारम्भ करूंगा। उन्हें यह शक्ति कहाँ से मिली? यह उनकी आंतरिक शक्ति ही थी, हर चीज को सरलता से लेने का उनका स्वभाव था जिससे उन्हें इतनी ऊर्जा मिली।  

लाओत्से  भी कहते हैं, "महान उपलब्धियों की नींव में सरलता होती है।"          

    सात्रे को नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई तो उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से उसे लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, 'मैं नोबेल लेकर कोई इंस्टीट्यूशन नहीं बनना चाहता, क्योंकि अगर मैं इंस्टीट्यूशन बन गया तो मैं जो भी कहूंगा लोग सच मानेंगे और कोई भी व्यक्ति हमेशा सच नहीं होता। वे अपने ज्ञान, जीवन की सीमाओं को स्वीकार करते हैं यही है, जो उन्हें आनंद से भर देती है। यह बात स्वीकारना कि मैं भी अपूर्ण हूँ, मुझसे भी गलतियां हो सकती हैं, संसार में मुझसे भी अच्छे भले लोग हैं, सरलता के मार्ग पर रखा पहला और निर्णायक कदम है। जैसे ही हम यह मानना शुरू कर देते हैं कि संसार बहुत बड़ा है, विविध है, मैं इसकी विविधता का एक अंश मात्र हूँ, हम सरल हो उठते हैं। विलियम जेम्स का कहना है, 'बुद्धिमान होने का एक मात्र रास्ता है, सरल हो जाओ

          दूसरों की उन्नति प्रगति को देखकर उनके प्रति ईर्ष्याभाव रखना तुम्हारे जीवन की उन्नति के मार्ग में बाधा है, पर अपनी गलतियों, बुराइयों से बचकर अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्ष करना, आगे बढ़ना उन्नति का सबसे सहज और सरल मार्ग है। यही सरलता तुम्हारी आंतरिक शक्ति को बढ़ाएगी और आंतरिक शक्ति, जीवन को बेहतर मार्ग पर ले जाएगी।

          जीवन एक ही नियम से चलता है, वह है कि जो बोओगे वही पाओगे। गीता में जब श्री कृष्ण कह रहे हैं कि 'तुम कर्म करो फल की चिंता मत करो’, तो वे इस बात को पुष्ट कर रहे होते हैं कि कर्म के बाद फल आपको मिलना तय है - उतना ही निश्चित जितना सूर्य का पूर्व से उदित होना। वे स्पष्ट कह रहे हैं कि फल निश्चित है, पर आजकल लोगों की आंतरिक शक्ति इतनी कमजोर हो गई दिखती है कि वे इस बात को इस तरह से ले रहे हैं, 'फल मिले न मिले तू कर्म करता चल', जो कि एक सरल बात को जटिल कर देता है।


          जब विवेकानंद कहते हैं कि 'आप जैसा सोचते हो वैसे ही बन जाते हो, तो वे भी इसी सिद्धांत की बात कर रहे हैं कि जीवन में जो भी करोगे जीवन वैसा ही हो जाएगा। इसलिए अगर सरलता चाहते हो, तो सरल हो जाओ। और जैसे ही आप सरल हो जाओगे वैसे ही आपकी आंतरिक शक्ति मजबूत हो जाएगी। आप स्वयं आनंद का श्रोत हो जाओगे।



         गौतम बुद्ध ने भी कहा है चलते, खड़े होते, बैठते या सोते हुए जो मन को शांत और सरल रख सकता है वह शांति का सुख प्राप्त कर लेता है।

(अरुण लाल, अहा जिंदगी, नवम्बर, 2017 के लेख पर आधारित)

**************

आपने भी कहीं कुछ पढ़ा है जिसे आप दूसरों से बांटना चाहते हैं तो हमें भेजें। हम उसे यहाँ, आपके नाम के साथ  प्रकाशित करेंगे।

~~~~~~~~~~~~

अगर हमारे पोस्ट आपको पसंद आ रहे हैं, तो सबस्क्राइब करें, अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको कैसा लगा और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

यू ट्यूब का संपर्क सूत्र --> 

https://youtu.be/jU9DzqDwI5I