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शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

हार - जीत

 कहते हैं न, प्यार में हारने वाला ही जीतता है। हम हर जगह जीत खोजते हैं लेकिन फूल की दुकान पर हार खोजते हैं! बच्चों के साथ जीतने में आनंद नहीं आता, उनसे तो हारने में ही आनंद आता है। जीवन में अनेक क्षण ऐसे आते हैं जहाँ जीतने से हारने का मोल ज्यादा होता है, हारने का आनंद जीतने से ज्यादा होता है। 



          चार्ल्स बुकोवस्की कहते हैं कि बौद्धिक लोग आसान चीजों को मुश्किल तरीकों से कहते हैं। वहीं कलाकार मुश्किल चीजों को बड़ी आसानी से बयाँ कर देते हैं। जर्मन-अमेरिकन कवि बुकोवस्की की इसी बात को पंजाबी के लेखक राम सरूप अणखी की कहानी के जरिए समझा जा सकता है। ग्रेजुएशन के दौरान कोर्स की किताब में पढ़ी यह कहानी एक शख्स गुरविंदर की है। 40 साल का यह व्यक्ति गुरविंदर सिंह साइकिल पर शहर से गाँव जा रहा है। थोड़ा रास्ता तय करने के बाद उसकी नजर एक लड़के पर पड़ती है। लड़के की हाल ही में शादी हुई है। साइकिल पर पत्नी के साथ गुरविंदर के पास से होकर गुजरता है। गुरविंदर अपनी मस्ती में साइकिल चलाते हुए जोड़े से आगे निकल जाता है। खुद को पीछे महसूस कर लड़का तेज पैडल मारने लगता है, जैसे ही वो गुरविंदर को पीछे छोड़ देता है, पीछे बैठी दुल्हन के चेहरे पर खुशी, जीत और गर्व का भाव एक साथ आ जाता है। तीन-चार बार साइकिल दौड़ का यही क्रम जारी रहता है। इस अनकही दौड़ में अब गुरविंदर आगे निकल जाता है और अपनी जीत को देखने के लिए पीछे देखता है, पाता है कि दुल्हन के चेहरे का गर्व, अब हार के भाव में बदल चुका है। यह देखकर उसके मन में न जाने क्या आता है कि साइकिल धीमा, और धीमा कर लेता है। लड़का एक बार फिर से आगे निकल जाता है। दुल्हन जिसकी हार फिर से गर्व में बदल गई है। वह पीछे मुड़कर गुरविंदर की ओर देखती है और फिर लड़के के कंधे पर हाथ रख लेती है। गुरविंदर ने एक हजार किताबें नहीं पढ़ी थीं, पर वह समझ गया था कि आज अगर यह लड़का अपनी पत्नी के सामने इस साइकिल दौड़ में हार गया, तो फिर उसकी नजरों में कभी जीत नहीं पाएगा... कितनी सरलता से गुरविंदर ने खुद को हार जाने दिया। कितनी सरलता से उस लड़के को जीत जाने दिया। जिंदगी आसान है और गुरविंदर जैसे लोगों के पते पर मिलती है। राम सरूप अणखी और प्रेम प्रकाश की कहानियों में मिलती है। 'बावर्ची' फ़िल्म में राजेश खन्ना यानी रघु के किरदार में मिलती है। सरलता जो कहानियों में बची रह गई है, दरअसल वह आदमी के भीतर का सबसे सरल कोना है जो कि कभी-कभार खुलता है।

क्या आपके अंदर भी ऐसा कोना है? क्या ऐसी सरलता आपके पते पर भी  मिलती है। 4जी नेटवर्क के अंधेरे में खो रहे ऐसे कोनों को बचा कर रखिए, ऐसे पतों को ढूंढिए और लोगों को बताइये - एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा जिंदगी मुझे तेरा पता चाहिए...

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आपने भी कहीं कुछ पढ़ा है जिसे आप औरों तक पहुँचाना चाहते हैं तो हमें भेजें। हम उसे यहाँ, आपके नाम के साथ  प्रकाशित करेंगे।

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शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

मुजिका और शास्त्रीजी की सरलता और सादगी

 (उरुग्वे के राष्ट्रपति मुजिका को पूरा विश्व जानता है लेकिन अपने प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से, जो केंद्रीय मंत्री और फिर प्रधान मंत्री रहे, कितने लोग परिचित हैं? उन्होंने एक सादगी पूर्ण सरल जीवन ही व्यतीत  किया। अब दशकों बाद उनके अनेक किस्से एक-एक कर सामने आ रहे हैं। यह विचारणीय है कि देश, क्यों उनकी सादगी और सरलता की चर्चा नहीं करता?  क्यों हम अपने देश में ही उन्हें प्रतिष्ठित नहीं कर पाये? क्यों हमारे राजनेता, विधायक, प्रशासक उनके आदर्श को, उनकी सरलता को, सादगी को पसंद नहीं करते अतः नहीं अपनाते हैं और इस कारण उनकी चर्चा नहीं करते हैं? अगर हम ही इनकी चर्चा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा? सं.)

इंसान को मुश्किल बनाती स्थितियां हैं, तो वह हौसला भी है जो इंसान को सरल-सहज बने रहने के लिए प्रेरित करता है। भले ही असल जीवन में यह क़िस्से आटे में नमक के बराबर हों, लेकिन समाज को सरलता का स्वाद तो चखा ही देती हैं। ऐसा ही एक नाम एलबर्टो मुजिका का है। मुजिका उरुग्वे के राष्ट्रपति थे। दुनिया उन्हें सबसे ग़रीब राष्ट्रपति के नाम से जानती है।



          मुजिका अपने वेतन यानी 12 हज़ार डॉलर का 90 प्रतिशत हिस्सा ग़रीबों की मदद के लिए ख़र्च कर दिया करते थे। लोग उन्हें भले ही दुनिया का सबसे ग़रीब राष्ट्रपति कहती हो, लेकिन दरअसल वे दुनिया के सबसे अमीर राष्ट्रपति थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें यूं तो राष्ट्रपति भवन में रहना था, लेकिन उन्होंने अपना पुराना घर चुना। वे वहाँ अपनी पत्नी और कुत्ते के साथ रहा करते थे। उनके पास अपनी वॉक्सवेगन बीटल गाड़ी थी, जो उन्होंने 1987 में खरीदी थी, लेकिन 2010 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा। वे  मिसाल थे कि हमें अपनी जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति मुजिका कहते थे, गरीब वह है जो जीना नहीं जानता। जिसे जीने के लिए अपने अगल-बगल कबाड़ इकट्ठा करने की जरूरत पड़ती है। मुजिका ने बता दिया कि राजनीति इतनी भी मुश्किल नहीं होती है, सरल आदमी दूसरों की जिंदगी को आसान बनाता है। उसके लिए उसे साधु बनने की जरूरत नहीं है।

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बात उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय मन्त्री थे। सादगी और ईमानदारी  में शास्त्रीजी बेजोड़ थे। एक बार की बात है, प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू  ने उन्हें एक जरूरी काम से कश्मीर जाने के लिये कहा। शास्त्रीजी ने निवेदन किया कि किसी और को उनकी जगह भेज दिया जाये। नेहरूजी ने जब इसका कारण पूछा तो शास्त्री जी बोले – कश्मीर में इस समय बेहद ठण्ड पड़ रही है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है।' यह सुनकर बहुत इनकार करने के बावजूद नेहरूजी ने अपना एक कोट शास्त्रीजी को दे दिया। शास्त्रीजी ने पण्डितजी का कोट पहनकर देखा। वह बहुत लम्बा था और बहुत नीचे तक लटक रहा था। शास्त्री जी अपने एक मित्र को साथ लेकर एक नया कोट खरीदने बाजार पहुँचे। बाजार में काफी कोट देखे गये, पर मन पसन्द कोट नहीं मिला। वह या तो इतना महँगा होता कि शास्त्रीजी दाम चुकाने में असमर्थ होते या फिर उसका साइज ऐसा होता कि उनको ठीक नहीं आता। एक दुकानदार ने उन्हें एक ऐसे दर्जी का पता दिया, जो सस्ता और अच्छा कोट सिलकर दे सकता था। शास्त्रीजी अपने मित्र के साथ उस दर्जी के पास पहुँचे और एक सस्ता कोट सिलने को दे दिया। शास्त्रीजी के मित्र बोले- 'आप केन्द्रीय मन्त्री हैं। आप चाहें तो सैकड़ों कीमती कोट आपके पास हो सकते हैं, लेकिन आप एक मामूली कोट के लिये बाजार में मारे-मारे घूम रहे हैं।' शास्त्रीजी ने मुसकुराकर जवाब दिया—'भाई! मुझे इतनी तनख्वाह नहीं मिलती कि मैं कीमती कपड़े खरीद सकूँ और फिर मेरे लिये तो देश-सेवा ही सबसे बढ़कर है, जो मैं मामूली कपड़ों में भी कर सकता हूँ।'

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यह घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री भारत के गृहमन्त्री थे। शास्त्रीजी की सादगी सर्वविदित है। वे स्वयं पर अथवा अपने परिवार पर तनिक भी अनावश्यक खर्च नहीं करते थे। उनका रहन-सहन आम लोगों जैसा ही था। राष्ट्र के अति महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होने के बावजूद भी उन्होंने कभी अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया। एक बार इलाहाबाद स्थित निवास के मकान मालिक ने उनसे मकान खाली करने का अनुरोध किया, जिसे शास्त्रीजी ने तत्काल मान लिया। वास्तव में मकान मालिक को उस निवास स्थान की अति आवश्यकता थी और शास्त्रीजी स्वयं से अधिक दूसरों की जरूरतों का ख्याल रखते थे। अतः उन्होंने मकान खाली कर दिया और किराये  पर दूसरा मकान लेने के लिये आवेदन-पत्र भरा। काफी समय बाद भी शास्त्रीजी को मकान नहीं मिल सका, तो उनके किसी मित्र  ने अधिकारियों से पूछताछ की। अधिकारियों ने बताया कि शास्त्रीजी का कड़ा आदेश है कि जिस क्रम में उनका आवेदन-पत्र दर्ज है, उसी क्रम  के अनुसार मकान दिया जाये। कोई पक्षपात न किया जाये। और सच तो यह था कि १७६ आवेदकों के नाम शास्त्रीजी के पहले दर्ज थे, इसलिए देश का गृह मंत्री मकान के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षारत रहा।  इस घटना  का सार यह है कि नियम-कानून का पालन यदि साधारण लोगों के साथ विशिष्टजन भी पूरी ईमानदारी से करें तो समाज से भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जाये।

तुम मन की जेल में क्यों रहते हो...

जबकि दरवाज़ा तो पूरी तरह से खुला है।

                                                            रूमी

(आप एक बड़ी साँस लेकर सोच रहे हैं क्या स्थिति है, लेकिन मैं कर ही क्या सकता हूँ! क्या आप मुझे बताएँगे अगर आप नहीं कर सकते तो कौन कर सकता है? दर असल यह केवल और केवल आप यानी हम ही कर सकते हैं – आम जन। इस आम-जन में ताकत तो बहुत बड़ी है लेकिन हनुमान की तरह अपनी ताकत को भुला कर बैठा है। उत्तिष्ठ भारत उठो भारतीय जागो, अपनी ताकत को पहचानो।  

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https://youtu.be/oUpsHrqmwBM


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो,

चार- किताबें पढ़ कर वे भी हम जैसे हो जाएंगे

                                                                                                        निदा फाजली



वक्त बचपन को बहा ले जाता है। बचपन का जाना, जीवन से सरलता का चले जाना होता है। हम बड़े हो जाते हैं। सरल बनने की कोशिशें करते हैं, तमाम स्वांग करते हैं, आवरण ओढ़ते हैं, हजारों रुपए देकर जिंदगी जीने की कला सीखने भी जाते हैं, लेकिन नहीं बदलते। साल 2011 में लिटिल चैंप्स रियलिटी शो में एक बच्चा आया था। रूहानी आवाज के मालिक नन्हे से अजमत से जब पूछा गया कि अगर वह जीत जाएगा तो पैसों का क्या करेगा तो उसने शो में ही अपने एक और प्रतिभागी साथी का नाम लेकर कहा था, उसका मकान कच्चा है। उसके मकान को बनवाऊँगा इतनी सरलता से कोई बच्चा ही कह सकता है।

          यहाँ ईरानी डायरेक्टर अब्बास किआरोस्तामी की फिल्म 'वेयर इज दि फ्रेंड्स होम' याद आती है। फिल्म विद्यालय की कक्षा के दृश्य के साथ आगे बढ़ती है, जहाँ शिक्षक होमवर्क पूरा न करके लाने वाले छात्र को छड़ी से मारता है। अहमद को याद आता है कि उसके दोस्त की नोटबुक उसके पास रह गई है, वह उस दिन क्लास में नहीं आया, लेकिन अगले दिन आएगा होमवर्क नहीं किया होगा, तो क्या होगा। अहमद के इस दोस्त का गाँव उसके घर से दूर है, वह नोटबुक लेकर निकल पड़ता है उसे लौटाने के लिए। वह लड़के के गाँव पहुँचता है, तो पता चलता है वह कहीं और है। वह पता लेकर उसे ढूँढ़ने निकल पड़ता है, रात हो जाती है, लेकिन वह उसे ढूँढ लेता है। हम बड़े हो जाते हैं और दोस्तों के घर का पता होते हुए भी, हाथ में गूगल मैप होते हुआ भी, गाड़ी या मोटर साइकिल होते हुआ भी, नहीं पहुँच पाते। हम इतने बड़े क्यों हो जाते हैं?

         माजिद माजीदी की फिल्म 'चिल्ड्रन ऑफ हेवन।' अपनी बहन का जूता खो देने वाला अली विद्यालय की ओर से आयोजित दौड़ प्रतियोगिता  में हिस्सा लेने का फैसला करता है, क्योंकि उसे बस इतना पता है कि इनाम में उसे जूते मिलेंगे। जूते के लिए दरअसल उसे सेकेंड आना था, लेकिन वह दौड़ते हुए यह भूल जाता है और पहले नंबर पर आ जाता है। वह पहले नंबर पर आकर भी खूब रोता है, क्योंकि उसका लक्ष्य सिर्फ जूते हैं। आदमी ठीक इससे उलट करता है, वह लक्ष्य बना लेता है, पूरा करता है, वह उस लक्ष्य को पूरा करने का आनंद लेना भूल जाता है। उसका आनंद लेने की बजाय उसे फिर कुछ और चाहिए। ये कुछ और क्या है, उसे खुद को पता नहीं। वह ता-उम्र उस तक नहीं पहुँच पाता। सरलता सीखनी है तो बच्चों से सीखें, लेकिन बतौर समाज हम बच्चों से सबसे पहले जो छीनते हैं वह है उनकी सरलता।

गुलजार साहब की एक कविता याद आ रही है

 

"जिन्दगी की दौड़ में,

तजुर्बा कच्चा ही रह गया...।"

         " हम सीख न पाये 'फरेब'

         और दिल बच्चा ही रह गया...।"

                    "बचपन में जहाँ चाहा हँस लेते थे,

                    जहाँ चाहा रो लेते थे...।"

                              "पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए,

                              और आँसुओं को तन्हाई..।"

                                        "हम भी मुसकुराते थे कभी बेपरवाह, अन्दाज़ से..."

                                        देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में ..।

                                           "चलो मुस्कुराने की वजह ढूँढते हैं...

                                                   तुम हमें ढूँढो...हम तुम्हें ढूँढते हैं .....!!"

 

सरल होना, अपनी तरफ़ से अच्छे से अच्छा, और जहाँ तक हो सके श्रेष्ठ रूप से करना कितना अच्छा है; केवल प्रगति प्रकाश, सद्भावनापूर्ण , शान्ति के लिए अभीप्सा करना। तब कोई चिन्ता नहीं रहती और पूर्ण रूप से सुखी होते हैं!

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

सितारे बहुत बड़े दिखाई नहीं देते लेकिन

वे चमकदार दिखाई देते हैं

कल्पना चावला! अखबारों की सुर्खियां बटोरती भारतीय मूल की इस अमेरिकन महिला की स्पेस  सूट में तस्वीर आपके चेहरे के सामने घूम गई होगी। कल्पना चावला वह पहली भारतीय महिला है जिसने  अंतरिक्ष की यात्रा की थी। लेकिन, दरअसल हम उनके निजी जीवन के बारे में ज्यादा नहीं जानते। एक बार कल्पना के पिता उनसे मिलने ह्यूस्टन, अमेरिका गए। कल्पना ने कहा, ‘आप बैठो मैं आपके लिए खाना लगाती हूँ। यह कहकर कल्पना बर्तन धोने लगीं। पिता ने कहा, ‘बर्तन क्यों धो रही हो? बाद में धो लेना। कल्पना ने कहा, ‘घर में हम दो लोग हैं और हमारे पास बर्तन भी बस दो लोगों के लिए है कल्पना के घर में सामान के नाम पर जरूरत की चीजें भर हुआ करती थीं। अमेरिका की सबसे सस्ती कारों में से एक, उनके पास थी



          एक बार कल्पना के पिता ह्यूस्टन में उसके साथ थे। वे कल्पना के घर वापस आने का इंतजार कर रहे थे। कल्पना देरी से आईं तो पिता ने देरी का कारण पूछा। कल्पना ने पिता को बताया कि वह ऑफिस से सीधा मोची की दुकान पर चली गई थी। उसे अपने जूते ठीक करवाने थे। पिता जानते थे कि अमेरिका में मोची मिलना आसान नहीं है और यहाँ चीजों की मरम्मत करवाने से सस्ता है नई चीजें खरीद लेना। अतः उन्होंने कल्पना से पूछा, मोची की दुकान कहाँ है?’ कल्पना ने बताया घर से क़रीब 30 किलोमीटर की दूरी पर है। कितने पैसे लिए?’ पूछने पर कल्पना ने बताया कि 12 डॉलर, जबकि नए जूते 10 डॉलर में आ जाते हैं। पिता हैरान थे, कल्पना ने पिता से कहा क नई जोड़ी जूते खरीदने का मतलब है पहला, और एक जानवर की हत्या और दूसरा अगर हम नई जोड़ी ख़रीद लेंगे, तो मोची को काम कौन देगा’?  पिता ने कहा कि अगर वाक़ई किसी की मदद करना चाहती हो तो कुछ पैसे दान में दे देती। तुम दोनों पति-पत्नी इतनी मुश्किल से पैसा कमाते हो। कल्पना ने बताया जितना कमाते हैं, उससे जिंदगी आसानी से चल रही है

          हालांकि एक अंतरिक्ष वैज्ञानिक के पास देखा जाए तो पैसों की कमी नहीं हो सकती, लेकिन उनके पास अकाउंट में पैसे बहुत कम रहते थे। ऐसा नहीं था कि उनके पास पैसे नहीं थे, बल्कि वे हर साल अपने खर्च पर गाँव के दो बच्चों को अमेरिका लाती थीं, उन्हें लाने-ले जाने से लेकर अपने घर ठहराने तक। दुनिया के बारे में उन्हें जागरूक करती थीं। बच्चों की यात्रा 15 दिन की होती थी और उन्हीं बच्चों का चुनाव होता था, जो विज्ञान (साइंस) में सबसे अच्छे होते और इस क्षेत्र (फील्ड) में आगे जाने की जिनकी दिलचस्पी होती। साल 2003 में 41 वर्ष की उम्र में अंतरिक्ष से लौटते हुए उनकी मौत तक उनके पिता भी कल्पना की इस जिंदगी और सोच के बारे में नहीं जानते थे। जाहिर है कि दुनिया भी नहीं जानती थी कि इतनी बड़ी वैज्ञानिक इतनी साधारण जिंदगी जीती हैं। वे  चाहतीं तो घर में सामान का ढेर लग सकता था, लेकिन घर में उन्होंने दो लोगों के बर्तनों से ज्यादा बर्तनों की जरूरत भी नहीं समझीं। वे चाहतीं तो एक नहीं 10 जोड़ी जूते ख़रीद सकती थीं, लेकिन उन्होंने मोची के पास जाना चुना। कल्पना चावला की यही सरलता उन्हें और भी ख़ूबसूरत बनाती है, उपलब्धियाँ हासिल करना बड़ी बात होती है, लेकिन उससे भी बड़ी बात है उन उपलब्धियों के साथ भी सरल बने रहना। होना तो यह था कि चीजें, सुविधाएं और पैसा हमारी जिंदगी को सरल बनाता, लेकिन हुआ यह कि हमने अपने जीवन की सरलता को खो दिया।

सैली राइड, अमेरिकन अन्तरिक्ष यात्री (एस्ट्रोनॉट)

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