शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

क्या पसंद है और क्या है अच्छा?



यह व्यंग चित्र (कार्टून) देख कर आपको बीते हुए दिन याद आ रहे होंगे, आना ही चाहिये। बल्कि अगर याद नहीं आ रही है तब यह प्रश्न उठता है कि क्या डेनिस के कार्टून अपने नहीं देखे? ‘Dennis the Menance’ के नाम से अखबारों में, पत्रिकाओं में इसके नये व्यंग चित्र का बेसब्री से इंतजार रहता था। इसके जनक थे हांक केचाम (Hank Ketcham) जिसने अवतार लिया था 12 मार्च 1951 को। यह कई व्यक्तियों के हाथों से गुजरता हुआ अब, 2010 से, उनके लड़के स्कॉट द्वारा लिखा और बनाया जाता है।

          अब हम आते हैं इस कार्टून पर। क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि इस कार्टून में क्या चल रहा है? यह तो साफ नजर आ रहा है कि डेनिस अपने अनोखे लेकिन चिर-परिचित अंदाज  में खड़ा है और शायद कुछ बोल रहा है। उसके सामने एक महिला कुछ पका रही है जो संभवतः उसकी माँ है। अगर दिमाग पर थोड़ा और ज़ोर लगाएँ तो लगता है कि उनके बीच जो खाना पकाया जा रहा है उसके बारे में ही बातचीत हो रही है। लेकिन उनके बीच क्या बात हो रही है? यही है महत्वपूर्ण। ठहरें, आगे बढ़ने के पहले जरा आए सोचें, अटकलें लगाएँ-

क्या डेनिस पूछा रहा है कि आज क्या पक रहा है? या

खेलने जाने की अनुमति मांग रहा है? या

वह अपनी माँ की सहायता करना चाहता है?

न, नहीं इनमें से कुछ भी नहीं। लेकिन फिर क्या?

डेनिस अपनी माँ से पूछ रहा है, “क्या मुझे कुछ ऐसा मिल रहा है जो मुझे पसंद है या कुछ ऐसा जो मेरे लिये अच्छा है?”  

कुछ देर इस प्रश्न का आनंद लीजिये, फिर हम प्रयत्न करेंगे इसकी गहराई में उतरने का।  - “हमें क्या मिल रहा है – हमें पसंद है या हमारे लिए अच्छा है?”

          इस वार्तालाप से यह जाहीर है कि डेनिस जानता है कि उसे क्या पसंद है और उसे यह भी मालूम है कि उसके लिए क्या अच्छा है। उसे अच्छा-बुरा, सही-गलत सीखाने या बताने की अवश्यकता नहीं है, यह उसे ज्ञात है। इतना ही नहीं उसे इस बात का संदेह भी है कि जो पक रहा है वह उसे पसंद नहीं है बल्कि उसके लिए अच्छा है। इसके बाद भी वह इस आशा से पूछ रहा है कि शायद उसे उसके मनोनुकूल उत्तर मिल जाये या फिर उसके मनोनुकूल पका दिया जाये। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा नहीं होगा। वही पकेगा जो पक रहा है और जो पक रहा है वह उसके लिये अच्छा है। 

          इसके विपरीत हम यह मानते हैं कि बच्चे को ‘पसंद और अच्छे’ का ज्ञान नहीं है। लेकिन सही यही है कि वह दोनों का फर्क जानता है। पसंद और अच्छे का ही नहीं बल्कि ‘सही और गलत’, ‘अच्छे और बुरे’ का फर्क भी वह जानता है। फिर बच्चा बुरे की तरफ ही क्यों प्रवृत्त होता है? ‘बुरे’ में आकर्षण है और हाथों हाथ लाभ नजर आता है। अच्छे का फल मिलने में थोड़ा समय लगता है, तब तक उसका आकर्षण समाप्त हो चुका होता है और बहुधा पता ही नहीं चलता कि जो अच्छा हुआ वह सही निर्णय के कारण हुआ। तब एक अभिभावक या शिक्षक के रूप में हमारा उत्तरदायित्व सिर्फ इतना ही है कि हम उसे अच्छे और सही की तरफ प्रेरित करें, उत्साहित करें।

          हमने ही अपने कृत्यों से उसे अच्छे के बजाय बुरे की तरफ प्रेरित किया है, ‘अच्छे’ के बजाय ‘पसंद’ की तरफ धकेला है, सही के बदले गलत को आकर्षक बनाया है। और इसे ठीक करने का केवल एक ही उपाय है – हम अपने कृत्यों को बदलें, हम खुद सही और अच्छे करें।  

           

भारत के एक महान योगी के शिक्षा सिद्धान्त सिर्फ बच्चे पर ही नहीं हम पर भी लागू होते हैं -

"सच्चे शिक्षण का पहला सिद्धान्त है कि कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता। शिक्षक तो एक सहायक एवं पथ प्रदर्शक है। उसका काम है सुझाव देना, थोपना नहीं। वह सचमुच हमारे मानस को प्रशिक्षित नहीं करता, वह तो उसे केवल यह दिखाता है कि अपने ज्ञान के उपकरणों को कैसे पूर्ण बनाया जाये और इस प्रक्रिया में वह उसे सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करता है। वह उसे ज्ञान नहीं देता, वह उसे यह दिखाता है कि अपने लिये ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाए। वह अंदर स्थित ज्ञान को बाहर प्रकट नहीं करता; वह केवल यह दिखलाता है कि ज्ञान कहाँ स्थित है और उसे ऊपरी तल पर आने के लिये कैसे अभ्यस्त किया जा सकता है।”

अब एक बार इस चित्र में थोड़ा सा परिवर्तन करते है। उस बच्चे की जगह अपने को देखें और माँ कि जगह ईश्वर को। अब बताएं ईश्वर से हमें क्या मांगना चाहिए – वह जो हमें पसंद है या वह जिसमें हमारा अच्छा है, भला है?

हमारी प्रकृति हमें अपना स्वधर्म निभाने के लिये प्रेरित करती है, लेकिन हम उसकी सुनते नहीं हैं?

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

क्या है महान लक्ष्य?


          किसे कहेंगे महान लक्ष्य? क्या अकूत संपत्ति का मालिक होना महानता है? देश-विदेश में कारोबार का होना महानता है। ऐश्वर्य-वैभव का होना महानता है? कैलिफोर्निया की बे-एरिया में कंपनी का मुख्यालय होना महानता है। हजारों इंजीनियर-टेकनिशियनों को रोजगार देना महानता है। महानता क्या है? कोई ऊंचा पद हासिल करना, कोई बड़ा पुरस्कार प्राप्त करना, आज की तकनीकी दुनिया में करोड़ों लाइक बटोरना-फ़ौलोअर्स का होना? – क्या है महानता लेना या देना!  मैं या हम। सब-कुछ अपनी मुट्ठी में होते हुए भी मुट्ठी को खुली रखना ही महानता है। सब कुछ स्वयं करते हुए भी ‘करनहार’ को ही करने वाला मानना महानता है। मैं नहीं तू ही महानता है।  

          किसी की कुल सम्पति अगर 18 हजार करोड़ रूपये की हो तो 300 करोड़ रूपये के प्राइवेट जेट विमान खरीदने पर ऑडिटर भी एतराज नहीं करेगा, और जब अथाह पैसा हो तो फिर मुश्किल ही क्या है? यूँ भी, लक्ष्मी जब छप्पर फाड़कर धन बरसाती है तो ऐसे फैसले किसी को ख़र्चीले नहीं लगते। शायद इसलिए एक खरबपति के लिए जेट विमान खरीदना ऐसा ही है जैसे किसी मैनेजर के लिए मारुति कार खरीदना। लेकिन जोहो कारपोरेशन (Zoho Corporation) के चेयरमैन श्रीधर पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती भी मेहरबान थीं। इसलिए उनके इरादे औरों से बिलकुल अलग थे। उनका अगला लक्ष्य प्राइवेट जेट खरीदना होना चाहिए था। लेकिन प्राइवेट जेट खरीदना तो दूर उन्होंने अपनी कम्पनी के बोर्ड के निर्देशकों से कहा कि वे अब कैलिफोर्निया (अमेरिका) से जोहो कारपोरेशन का मुख्यालय कहीं और ले जाना चाहते हैं। कहाँ?

          श्रीधर के इस विचार से कम्पनी के अधिकारी हतप्रभ थे क्यूंकि सॉफ्टवेरी के लिये कैलिफोर्निया की बे-एरिया से मुफीद जगह दुनिया में और कोई है ही नहीं। गूगल, एप्पल, फेसबुक, ट्विटर या सिस्को सब-के-सब इस इलाके में बसे, फले-फूले। पर श्रीधर तो कोई बड़ा अप्रत्याशित फैसला लेने जा रहे थे। वे कैलिफोर्निया से शिफ्ट होकर सीएटल या हूस्टन नहीं जा रहे थे। वे अमेरिका से लगभग 13000 किलोमीटर दूर चेन्नई वापस आना चाहते थे।

          उन्होंने बोर्ड मीटिंग में कहा कि अगर डेल, सिस्को, एप्पल या माइक्रोसॉट अपने दफ्तर और रिसर्च सेंटर भारत में स्थापित कर सकते हैं तो जोहो कारपोरेशन को स्वदेश लौटने पर परहेज क्यों है?

श्रीधर के तर्क और प्रश्नों के आगे बोर्ड में मौन छा गया। फैसला हो चुका था। आई आई टी मद्रास के इंजीनियर श्रीधर वापस मद्रास जाने का संकल्प ले चुके थे। उन्होंने कम्पनी के नए मुख्यालय को तमिलनाडु के एक गाँव  में स्थापित करने का फैसला ले लिया था और एलान के मुताबिक, अक्टूबर 2019 में श्रीधर ने टेंकसी जिले के मथलामपराई गाँव में जोहो कारपोरेशन का हेडक्वार्टर शुरू कर दिया।

 

स्वदेश क्यों लौटना चाहते थे श्रीधर?

श्रीधर अमेरिका की किसी एजेंसी या बैंक या स्टॉक एक्सचेन्ज के दबाव के कारण स्वदेश नहीं लौटे। उनपर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी नहीं था। वे कोई नया व्यवसाय भी नहीं शुरू कर रहे थे। वे किसी नकारात्मक कारण नहीं एक सकारात्मक विचार लेकर वतन लौटे। उन्होंने कई वर्ष पहले संकल्प लिया था कि अगर जोहो ने बिजनेस में कामयाबी पायी तो वे मुनाफे का बड़ा हिस्सा गाँव के बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने पर खर्च करेंगे। इसी इरादे से उन्होंने सबसे पहले मथलामपराई गाँव में बच्चों के लिए निःशुल्क आधुनिक स्कूल खोले। फोर्ब्स मैगजीन में दिए एक इंटरव्यू में श्रीधर बताते हैं कि टेक्नोलॉजी को अगर ग्रामीण इलाकों से जोड़ा जाए तो गाँव से पलायन रोका जा सकता है। गाँव में प्रतिभा है, काम करने की इच्छा है। इसीलिए मैं भी बच्चों की क्लास में जाता हूँ, उन्हें पढ़ाता भी हूँ। हम न सिर्फ दूरियां मिटा रहे हैं, न सिर्फ पिछड़ापन दूर कर रहे हैं, बल्कि शहर से बेहतर डेलीवरी गाँव से देने जा रहे है... प्रोडक्ट चाहे सॉफ्टवेयर ही क्यों न हो।

          श्रीधर बेहद सहज और सादगी पसंद इंसान हैं। वे लुंगी और बुशर्ट में ही अक्सर आपको दिखेंगे। गाँव और तहसील में आने जाने के लिए वे साईकिल पर ही चल निकलते हैं। उनकी बातचीत से, हाव-भाव से, ये आभास नहीं होता कि श्रीधर एक खरबपति सॉफ्टवेटर उद्योगपति हैं जिन्होंने 9 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है जिसमें अधिकाँश इंजीनियर है। उनकी कम्पनी के ऑपरेशन अमेरिका से लेकर जापान और सिंगापुर तक फैले हैं जहाँ 9,300 टेक-कर्मियों को रोजगार मिला है। श्रीधर का कहना है कि आने वाले वर्षों में वे करीब 8 हजार टेक रोजगार भारत के गाँवों में उपलब्ध कराएंगे और ग्लोबल सर्विस को देश के ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित करेंगे। शिक्षा के साथ गाँवों में वे आधुनिक अस्पताल, सीवर सिस्टम, पीने का पानी, सिंचाई, बाजार और स्किल सेंटर स्थापित कर रहे हैं। सरकार ने 2021 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा है।

          महान लक्ष्य का कोई एक निश्चित सूत्र नहीं है। जो बात पन्नों में लिखी जाती है विद्वान जन उसे कुछ पंक्तियों में बयाँ कर देते हैं। कोलकाता विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के आचार्य स्व. विष्णुकान्त जी शास्त्री की ये पंक्तियाँ देखें :

          बड़ा काम करना है मुझको,

                       मैंने पूछा मन से।

                                    बड़ा लक्ष्य हो बड़ी तपस्या

                                           बड़ा हृदय मृदुवाणी।

                                                                      किन्तु अहम छोटा हो जिससे

                                                                                सहज मिले सहयोगी।

                                                                                                    दोष हमारा श्रेय राम का

                                                                                                        यह प्रवृत्ति कल्याणी।

और यही है महानता, सब कुछ करने की क्षमता होने पर भी यह स्वीकार करना कि सब दोष हमारे हैं सब उपलब्धि राम की है। 

(इन पंक्तियों को मुझ तक प्रेषित करने का श्रेय जाता है हमारे एक सुधि पाठक /  सब्सक्राइबर श्री श्री गोपालजी  डागा को जिन्हें यह हठात मिली अपनी पत्नी, सुधा भाभी के संग्रह में। उनका अतिशय आभार।)

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शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

सूतांजली जनवरी 2024


 

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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

आज की नहीं कल की सोचें


मेरा एक मित्र है, बल्कि सहपाठी। हम दोनों एक ही विद्यालय की एक ही कक्षा के छात्र थे। मेहनती है और लोगों से काम लेना भी आता है और दूसरों की सहायता करने में आगे भी। बागवानी का शौक है। छोटा सा बगीचा है जिसमें भांति-भांति के फल-फूल के पेड़ लगे हैं। एक दिन जब वह शहर के बाहर, किसी नर्सरी में पेड़-पौधे लेने जा रहा था, मैं भी उसके साथ हो लिया। नर्सरी क्या थी पूरा बगीचा था। छोटे-छोटे पौधों से लेकर आदम कद के पेड़ तक थे। पौधे की लंबाई के साथ-साथ उसके मूल्य में भी गुणात्मक वृद्धि। नर्सरी के मालिक ने बताया कि इन छोटे-बड़े पेड़ों को उखाड़कर नयी जगह लगाने तक का काम वे लोग करते हैं। आजकल यही काम ज्यादा हो रहा है। सोच रहा था कि इन्हें कौन और क्यों खरीदता होगा? उसने बताया कि विवाह आदि के अवसर पर कृत्रिमता को वास्तविकता का जामा पहनाने के लिए  ये भाड़े पर दिये जाते है। सत्य और असत्य को पृथक करना अपने आप में एक चुनौती बन गई है। लेकिन मुख्य बात यह थी कि अब शहरी लोग छोटे पौधे के बजाय, पैसों की परवाह किए बिना इन बड़े पेड़ों को ही ज्यादा खरीदते हैं। क्यों? अब न तो किसी के पास धैर्य है न ही दुनिया-समाज की परवाह। और तो और अपने बच्चों तक की भी नहीं। अगर क्यारी लेते हैं तो उसके फल तो अगली पीढ़ी ही खाएगी, खुद को तो चखने भी नहीं मिलेंगे, उसका आनंद तो कोई और ही लेगा, क्या मतलब निकलता है इसका? अगर मैं कर रहा हूँ, तो इसका आनंद भी मुझे मिलना ही चाहिये, नहीं तो क्या ‘फायदा’? इतनी संकीर्ण सोच?   मैं तो बुत बना खड़ा उसकी बातें सुनता रह गया।

 

और इसके विपरीत, ये दो छोटी घटनाएँ:

 

पहला - बालमन

बाल मन एक वैज्ञानिक होता है। बात उन दिनों की है जब चीनी दस रुपए किलो थी। चाय पीने वालों के गुट में मेरा परिवार भी शामिल था। उस समय का तौल भी पक्का, सामान भी अच्छा। आज के जैसे नहीं कि अगर चीनी चालीस रुपए प्रति किलो, तो आधा किलो का इक्कीस रुपया और एक किलो का चालीस। यह जनसाधारण के आर्थिक शोषण का व्यापारियों द्वारा अन्वेषित नई परंपरा है। मुझे रोज सुबह एक रुपए का बड़ा-सा सिक्का मिलता था। मैं वह सिक्का लेकर दुकान पर पहुंचता, एक रुपए की चीनी ले  सीधे घर की तरफ चल पड़ता। जब अपने घर के पीछे, जहां एक बगीची थी, के पास पहुंचता मुट्ठी में चीनी भरकर, जैसे किसान खेतों में गेहूं और सरसों बोते हैं, वैसे ही बो देता था। बाकी चीनी मां को दे देता। चीनी वास्तविक तौल से कम होती थी। अतः शंका होना लाजिमी था। दुकानदार के पास शिकायत हुई। उसने साफ तौर पर मना किया। उसने कहा, 'मेरा तौल पक्का है। आपका बच्चा चीनी खा जाता होगा।' गुप्त रूप से तहकीकात हुई। मैं रंगे हाथों पकड़ा गया। बड़े भाई ने पूछा, 'ये क्या कर रहे हो?' मेरा जवाब था, 'चीनी के पेड़ उगेंगे, परिवार की समस्या ही समाप्त हो जाएगी' सच बालमन किसी वस्तु को कितनी अलग तरह से समझता है। कहाँ से ऐसे विचार उसके मन में पनपे होंगे? परिवार के भविष्य के बारे में सोचना कहाँ से सीखा होगा?

 

दूसरा - हम आजीवन ऋणी हैं 

          सारी जमीन-जायदाद यहीं रह जाएगी, धन-दौलत, गहने, कपड़े सब छूट जाएंगे। मेरे साथ जाएगा केवल वह, जो स्वयं के देह को क्षत-विक्षत करके भी मुझे अपने आगोश में लेगा, समा जाऊंगा उसी की गोद में, जब इस लोक की यात्रा पूर्ण करने के बाद परलोक के लिए जाऊंगा, केवल वही मेरे साथ जाएगा, वह 'वृक्ष' जो अपनी टहनियां देकर मेरी चिता सजाएगा और मेरे साथ-साथ अपना अस्तित्व भी मिटा डालेगा मुझे ईश्वर से 'मिलाने के लिए।'  ये विचार मेरे मन में बस यूं ही अचानक नहीं आ गए, बल्कि ये सच्चाई है हमारे समाज, घर-परिवार के बुजुर्गों की दूर-दृष्टि की, जिसने मुझे इन पेड़-पौधों, वृक्षों के प्रति अलग नजरिये से देखना सिखाया और इसके गवाह हैं हमारे आंगन में लगे हुए पेड़...।

          मेरे पिता द्वारा साठ के दशक में लगाए गए आम के पौधे, जो अब विशालकाय वृक्ष का आकार ले चुके हैं, जो अब हमारे घर के सदस्य, हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा हैं। वे आम के पेड़ आज भी मीठे फल दे रहे हैं, पूरे घर को छाया देकर तन कर खड़े हैं किसी रखवाले की तरह। उस पेड़ के आम का स्वाद हमारे घर की 4थी पीढ़ी उठा रही है। कितनी दूर की सोच थी हमारे पुरखों की, उस समय न तो कोई पर्यावरण दिवस था, न ग्लोबल वार्मिंग जैसे शब्द, लेकिन अपनी इस कृति के रूप में वे आज भी जीवित हैं। हम आजीवन ऋणी हैं उनके इस अनमोल धरोहर के, उनके आशीर्वाद के रूप में, जो हमें आज भी उनकी याद दिलाता है। वृक्षों के रूप में मिला उनका अविस्मरणीय आशीर्वाद जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका अस्तित्व जीवित रखेगा।

          अपनी तो सब सोचते हैं। उससे दो कदम आगे चल कर बच्चों के भविष्य की, समाज की, दुनिया की भी सोचिये। हम बदलेंगे, युग बदलेगा।

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शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

लक्ष्य महान रखें


क्या आप जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहते हैं? क्या आप सामान्य जीवन से संतुष्ट हैं? यदि आप में पूर्णता प्राप्त करने की इच्छा है, तो  भगवदगीता में सफलता का सूत्र है। हर किसी का बौद्धिक स्तर (IQ) उच्च नहीं होता। हर कोई अत्यंत प्रतिभाशाली नहीं होता। लेकिन हर एक व्यक्ति अत्यधिक प्रेरित हो सकता है। ध्यान बाहरी विषयों से हटाकर आंतरिक विजय की ओर करना होगा। तब, आपको मन की शक्ति का पता चलता है। मन पर विजय प्राप्त करना ही संसार पर विजय प्राप्त करना है।  

          उत्कृष्टता के लिए शांत मन की आवश्यकता होती है। जब मन शांत होता है, तो बुद्धि तीव्र होती है, एकाग्रता होती है और कार्य शानदार होते हैं। जब मन अशांत होता है तो आप अपने ज्ञान तक नहीं पहुंच पाते, अपनी आंतरिक शक्ति तक नहीं पहुँच पाते, सोच भटक जाती है और कार्य दोषपूर्ण हो जाते हैं।

          हम सभी मानसिक अशांति से पीड़ित हैं। मन को क्या परेशान करता है? हमारे स्वयं के, अपने खुद के विचार। जब स्वयं के विचार रास्ते में आते हैं तो एक गायक के स्वर गड़बड़ा जाते हैं, नौकरी पाने का इच्छुक व्यक्ति साक्षात्कार में तब असफल हो जाता है जब उस पर नौकरी पाने का जुनून सवार हो जाता है, एक बावर्ची (शेफ) जब अपने मेहमानों को प्रभावित करना चाहता है तो गल्तियां करता है, एक परीक्षार्थी में जब असफल होने का भय समा जाता है तो उसके उत्तर गलत हो जाते हैं, एक कलाकार जब प्रशंसा पाने के लिए रचना करता है तब उसकी रचना श्रेष्ठ नहीं बनती है। इन सब में एक समानता है – आपकी अपनी इच्छा ही बाधा है, लक्ष्य उच्च नहीं है, लक्ष्य में दोष है। जब अकबर ने तानसेन से पूछा, “तुम्हारे गायन में वह कशिश क्यों नहीं है जो तुम्हारे गुरु हरिदास के गायन में है?” तानसेन ने यही कहा था कि ‘मैं आपके लिए गाता हूँ और मेरे गुरु ब्रह्म के लिए गाते हैं’। एक उत्कृष्ट निर्माण के लिए लक्ष्य का महान होना अनिवार्य है।

          विशिष्टता कुछ चुनिंदा लोगों का विशेषाधिकार नहीं है। सबसे प्रतिभाशाली से लेकर सबसे कम संपन्न तक, हर कोई इसके बारे में जानता है। इसके लिए बस आपकी व्यक्तिगत इच्छाओं से परे एक दृष्टिकोण और एक उच्च लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। इच्छा ही आपके और सफलता के बीच सबसे बड़ी बाधा है। इच्छा से मुक्त हो जाने पर आप पूर्णता की परिधि में पहुंच जाओगे।

          जीवन का नियम है कि आपको वह मिलता है जिसके आप हकदार हैं, न कि वह जो आप चाहते हैं। इसलिए ‘इच्छा’ को अलग रखें और अपनी ‘योग्यता’ पर ध्यान केंद्रित करें।  योग्यता हासिल करने के लिए काम करें, अपने कौशल को निखारें, अपने कार्य को बेहतर ढंग से करने का प्रयास करें, अपने व्यापार को और सुचारु बनाएँ, अपनी कला को और सजाएँ। हड़पने से परोसने की ओर,  मुनाफाखोरी से सेवा की ओर, लेने से देने की ओर बदलाव करें। प्रकृति की शक्तियां आपके सामने झुक जाएंगी, आपका सहयोग करने लगेंगी। प्रकृति का चक्र देने के सिद्धान्त पर ही टिका हुआ है। सागर अपना जल मेघ को, मेघ वर्षा को, वर्षा पर्वतों को, पर्वत नदियों को, और फिर नदी वही जल वापस सागर को दे देती है। 

          आप अपने आप को दुर्भाग्यशाली समझते हैं या भाग्यशाली? यदि आप अपने को दुर्भाग्यशाली समझते हैं तब आप कुछ ऐसी चीज़ें पाने के लिए काम कर रहे हैं जो आपके पास नहीं हैं? तो फिर आप उत्साहहीन हैं। आप केवल अपने काम की गतिविधियों से गुजरते हैं। इससे असफलता और हताशा पैदा होती है।

          इसके विपरीत क्या आप उस प्रचुर मात्र में मिले उपहार से अवगत हैं जो आपको मिला है? तब आप आभारी हो जाते है। जब आप लोगों को देना, उन्हें योगदान देना और उनका मूल्य बढ़ाना चाहते हैं तब आप रचनात्मक, प्रेरित और सफल बनते हैं। प्रचुरता - भौतिक संपत्तियों से असंबद्ध मन की एक स्थिति है। हो सकता है कि आपके पास कुछ भी न हो और आप धन्य महसूस करें। और इसके विपरीत सबसे अमीर व्यक्ति भी वंचित महसूस कर सकता है, दुर्भाग्यशाली महसूस करता है।

          अपने जुनून, प्रतिभा, उपहार को पहचानें।  उस क्षेत्र में एक उच्च आदर्श स्थापित करें। काम, सेवा और त्याग की भावना से, एक बड़े लक्ष्य के लिए करें। स्वार्थी कार्य सामान्यता की ओर ले जाता है। सभी सफल लोगों ने एक महान उद्देश्य के लिए काम किया। डॉन ब्रैडमैन ने स्वार्थ के लिए क्रिकेट नहीं खेला। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान संगीत के प्रति समर्पित थे। आइंस्टीन केवल भौतिकी के बारे में सोचते थे। शास्त्रीय गायक और नृत्यांगनाएँ ईश्वर को आराध्य मान कर कला का प्रदर्शन करती थीं।

          जब आपका ध्यान संसार से ‘परे’ की ओर चला जाता है, तो आप निःस्वार्थ कर्म करते हैं। आप न तो स्वार्थी लक्ष्य के लिए काम करते हैं और न ही निःस्वार्थ लक्ष्य के लिए। आप जानते हैं कि आपकी प्रतिभा ईश्वर प्रदत्त उपहार है। आप इसे परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिये अर्पित करें। फिर, पूर्णता आप में सहजता से प्रवाहित होती है। एथलीट एरिक लिडेल, (फ्लाइंग स्कॉट्स-मैन), अपराजेय था और उसने ओलंपिक रिकॉर्ड बनाए। वह कहता था: "भगवान ने मुझे दौड़ने के लिए बनाया है, और मैं भगवान के लिए दौड़ूंगा।" इसी आदर्श वाक्य के साथ उन्होंने ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते।

          आप कितने भी प्रतिभाशाली क्यों न हों, आप अकेले सफलता हासिल नहीं कर सकते। आपको मजबूत दल (टीम) बनाने की जरूरत है। अपने दल के सदस्यों के साथ एकाकार महसूस करें। उन्हें भागीदार के रूप में देखें, विरोधियों के रूप में नहीं। वे आपके सहयोगी हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। जब आपको सफलता मिले तो उनसे दूर न हों। याद रखें, यह क्षणिक और अस्थायी है। यह किसी दिन चला जाएगा। अपने परिश्रम का फल भोगें, लेकिन उस पर निर्भर न रहें। आंतरिक भंडार का निर्माण करें जो विपत्ति के समय आपके साथ खड़ा रहेगा। जब चीजें आती-जाती रहती हैं, जैसा कि उन्हें होना चाहिए, तो आप टूटेंगे नहीं, आपका दिल डूबेगा नहीं। जैसा कि ओलिवर वेंडेल होम्स ने कहा:

“For him, in vain the envious season roll,

Who bears eternal summer in his soul”

जिसकी आत्मा में वसंत का वास हो, उसे दूसरे मौसम कष्ट नहीं दे सकते।

आत्मा से ईर्ष्या का त्याग कर प्रेम की अग्नि प्रज्वलित करें।

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