शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

विदेशी नागरिकता

  “झुटपुटा होते ही खेलका मैदान मनुष्यों का सागर बन गया। कोने कोने में आस-पास की इमारतों के कमरे पर सिर-ही-सिर दिखायी दे रहे थे। ऐसा लगता था कि बालूका एक कण भी जमीन तक न पहुँच पायेगा, बीचके सिर ही उसे थाम लेंगे। इधर-उधर चारों ओर ऊँचे-ऊंचे लाउडस्पीकर तैनात थे। ऐसा लगता था कि उनके अन्दर भी जान आ गयी है। वे भी अपने महत्व को पहचान गये हैं और उसके अनुकूल बनना चाहते हैं।

ठीक निश्चित समय पर पासके एक कमरे का दरवाजा खुला और एक मानव आकृति बाहर आयी। यह मानव देह थी या शुभ्र ज्योत्स्ना ने मानव आकार ले लिया था ? चारों ओर के वातावरण में, ठोस नीरवता को चीरती हुई एक मधुर गंभीर शब्द-लहरी गूँज उठी:

"मैं इस दिन के साथ अपनी एक चिर-पोषित अभिलाषा की अभिव्यक्ति जोड़ देना चाहती हूँ-वह है भारतीय नागरिक बनने की अभिलाषा। सन् १९१४ से ही, जब मैं पहली बार भारत में आयी, मैंने अनुभव किया कि भारत ही मेरा असली देश है, यही मेरी आत्मा और अन्तःकरण का देश है। मैंने निश्चय किया था कि ज्यों ही भारत स्वतंत्र होगा, मैं अपनी यह अभिलाषा पूरी करूंगी। लेकिन मुझे उसके बाद भी यहाँ पांडिचेरी के आश्रम के प्रति अपने भारी उत्तरदायित्व के कारण बहुत प्रतीक्षा करनी पड़ी। अब समय आ गया है जब कि मैं अपने विषय में यह घोषणा कर सकती हूँ।

लेकिन, श्रीअरविन्दके आदर्श के अनुसार, मेरा ध्येय यह दिखाना है कि सत्य एकत्व में है, न कि विभाजन में। एक राष्ट्रीयता प्राप्त करने के लिये दूसरी को छोड़ना कोई आदर्श समाधान नहीं है, इसलिये मैं आशा करती हूँ कि मुझे दोहरी राष्ट्रीयता अपनाने की छूट रहेगी, अर्थात्, भारतीय हो जानेपर भी मैं फ्रेंच बनी रहूँगी।



          जन्म और प्रारंभिक शिक्षा से मैं फ्रेंच हूँ। अपनी इच्छा और रुचि से मैं भारतीय हूँ। मेरी चेतना में इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। इसके विपरीत, वे एक-दूसरे से भली प्रकार मेल खाती हैं और एक दूसरे की पूरक हैं। मैं यह भी जानती हूँ कि मैं दोनों देशों की समान रूपसे सेवा कर सकती हूँ, क्योंकि मेरे जीवन का एक मात्र ध्येय श्रीअरविन्द की महान् शिक्षाओं को मूर्त रूप देना है। उन्होंने अपनी शिक्षाओं में यह प्रकट किया है कि सारे राष्ट्र वस्तुतः एक हैं और सुसंगठित एवं समस्वर विविधता के द्वारा इस भूमिपर भागवत एकत्वको अभिव्यक्त करने के लिये उनका अस्तित्व है।"

          शब्द-प्रवाह अचानक बन्द हो गया, लेकिन नीरव वातावरण अन्दर जीवित स्पन्दन बहुत देर तक अनुभव होते रहे।

          जब सारे संसारमें राष्ट्रीयता का बोलबाला था, युद्ध राष्ट्रवादका सखा बनकर पृथ्वीको टुकड़ों में काट रहा था, महायुद्ध तो समाप्त हो चुका था, परन्तु उसकी जूठन चारों ओर फैली हुई थी, भिन्न-भिन्न देशों के ही नहीं, एक ही देश के विभिन्न प्रदेशों के लोग एक-दूसरे के लिये अजनबी और पराये बने हुए थे, ऐसे समय किसने, कौन था जिसने इस सामंजस्य पूर्ण विभिन्नता का स्वप्न लिया और इस तरह खुलकर घोषणा की? महायुद्ध के दिनों में, सभी के हितों के भार-तले चर्चिल ने इंग्लैंड और फ्रांस को एक करना चाहा था, पर सफलता न मिली। आज भारत के एक छोटे-से कोने में से सारी मानवता को यह सन्देश दिया जा रहा था जो पूर्व और पश्चिम को, वृद्ध आध्यात्मिक गुरु, भारत, और व्यवहार कुशल युवा, फ्रांस, को एक-दूसरे के नजदीक लाकर सारे विश्व में एक नयी रचनात्मक क्रान्ति के बीज बोयेगा। क्या मानव जाति इतना बड़ा कदम उठाने के लिये तैयार थी? यह साहसपूर्ण, भविष्यमें प्रवेश करती हुई वाणी उन्हीं की थी जिन्हें श्रीअरविन्दने 'मदर' या माताजी कहा है। – श्वेत कमल, रवीन्द्र, भूमिका



          श्रीमाँ लंबे समय तक भारत में रहीं। भारत ही उनका घर था, कर्म स्थल था, लेकिन जन्मस्थल फ़्रांस था।  भारत की नागरिक बनना उनका सपना था। लेकिन वे कहती हैं कि उन्हें भारत प्रिय है लेकिन फ़्रांस भी उन्हें उतना ही प्रिय है। अगर भारत कर्मभूमि है तो फ़्रांस जन्मभूमि है। एक को पाने के लिए दूसरे को छोड़ने को वे तैयार नहीं। उनकी इच्छाशक्ति के सामने आखिर सरकारें झुकीं और उन्हें दोहरी-नागरिकता प्रदान की गई।

हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यान चंद का नाम किसने नहीं सुना है। हिटलर को किसी भी क्षेत्र में हार मंजूर नहीं थी। अपनी हार से तिलमिलाये हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को प्रलोभन दिया कि वह जर्मनी की नागरिकता स्वीकार कर ले, उसे कर्नल बनाने की भी पेशकश की गई। लेकिन मेजर ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। वे  भारत के नागरिक ही बने रहे।  



          प्रश्न है क्या पाने के लिए क्या छोड़ना? अमूमन हम बेहतर के लिए वर्तमान का त्याग करने को प्रस्तुत रहते हैं। लेकिन क्या दूसरे की माँ अपनी माँ से बेहतर हो सकती है? दूसरे का घर अपने घर से ज्यादा अच्छा हो सकता है? इस पर विचार करने की हमें न तो फुर्सत है न क्षमता शेष बची है। भौतिक उपलब्धियों के लिए हम दूसरे के घर जाके उसकी माँ को अपनाने में नहीं  हिचकते।

 

          आज की इस नयी दुनिया  में, नियम-कानून की जकड़ी-बंदी में फंसे हमें, कई ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जो हमें स्विकार्य नहीं। लेकिन हमें इस बात का पूरा भान होना चाहिए, हमें अपनी अंतरात्मा की गहराई तक यह स्पष्ट होना चाहिए कि हमारा लक्ष्य अपनी माँ की सेवा करनी है, हमें अपना घर सजाना है; इसके लिए यह समझौता सिर्फ रास्ते का एक पड़ाव है

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आपने भी कहीं कुछ पढ़ा है और आप उसे दूसरों से बाँटना चाहते / चाहती हैं तो हमें भेजें। स्कैन या फोटो भी भेज सकते / सकती हैं। हम उसे यहाँ प्रकाशित करेंगे।

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

रहस्य

किसी भले इंसान ने मुझे रॉन्डा बर्न (Rhonda Byrne) की पुस्तक द सीक्रेट (The Secret) पढ़ने का सुझाव दिया था। लेकिन उस समय मैं अनसुनी कर गया। लेकिन फिर जब श्रीअरविंद आश्रम की पुस्तकालयाध्यक्षा ने इसका हिन्दी संस्करण मेरे हाथ में थमाया,  तब मैं अनसुनी नहीं कर पाया; और जब मैंने पढ़ना प्रारम्भ किया तब लगा कि मैं एक और आत्म-विकास की पुस्तक पढ़ रहा हूँ। लेकिन जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए विचार में परिवर्तन हुआ और लगा कि यहाँ आध्यात्म के मार्ग से ही आत्म-विकास की चर्चा है। 

पुस्तक के ऊपरी आवरण पर छापा था-एक महान रहस्य के अंश पुराने काव्य, साहित्य, धर्मों, दर्शनों में सदियों से मौजूद हैं। रहस्य के ये सभी अंश पहली बार इकट्ठे होकर अविश्वसनीय रूप में सामने आ रहे हैं, इस रहस्य का ज्ञान और अनुभव सभी लोगों के जीवन का कायाकल्प कर सकता है।... रहस्य में आधुनिक युग के उपदेशकों का ज्ञान भी शामिल है, जिन्होंने इसका प्रयोग सेहत, दौलत और सुख हासिल करने में किया है।”

मेरी इस पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता और बढ़ गई जब मैंने प्रस्तावना में पढ़ा :-

मुझे अचानक एक महान रहस्य, जीवन के रहस्य की झलक मिली। झलक - सौ साल पुरानी एक पुस्तक में मिली, जो मेरी बेटी हेली ने मुझे दी थी। इसके बाद मैंने इस रहस्य को इतिहास में टटोला। मैं यह जानकर हैरान रह गई कि बहुत से लोगों को इस रहस्य का ज्ञान था। वे इतिहास के महानतम व्यक्ति थे: प्लेटो, शेक्सपियर, न्यूटन, ह्यूगो, बीथोवन, लिंकन, इमर्सन, एडिसन, आइंस्टीन। हैरानी से मैंने खुद से पूछा, “हर इंसान यह रहस्य क्यों नहीं जानता है?”

तब एकबारगी मुझे लगा कि लेखिका एक रहस्य तैयार कर रही है ताकि पुस्तक बिके। लेकिन मन में शंका बनी रही और मैं पन्ने पलटता चला गया। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया मुझे इसमें विज्ञान और साहित्य के दर्शन होने लगे, विलियम शेक्सपियर, रॉबर्ट ब्राउनिंग और विलियम ब्लेक ने इसे अपनी कविता में सिखाया है। लुडविग वैन बीथोवन जैसे संगीतकारों ने इसे अपने संगीत में व्यक्त किया है। लियोनार्दो द विंची ने इसे अपनी पेंटिंग्स में उकेरा है। सुकरात, प्लेटो, रैल्फ़ वाल्डो इमर्सन, पाइथैगॉरस, सर फ्रांसिस बेकन, सर आइज़ैक न्यूटन, जोहानन वोल्फ़गैंग वॉन गेटे और विक्टर ह्यूगो ने इसे अपनी लेखनी और दर्शन में व्यक्त किया है। इसी कारण उनके नाम अमर हैं। और उनकी महानता सदियों बाद भी कायम है।

यह रहस्य हिंदू धर्म, हर्मीटिक परंपराओं, बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम में मौजूद है। यह बैबिलोन और मिस्त्र की प्राचीन सभ्यताओं की लेखनी और कहानियों में व्यक्त हुआ है। यह नियम युगों-युगों से कई रूपों में व्यक्त होता आ रहा है और इसे सदियों पुराने प्राचीन ग्रंथों में पढ़ा जा सकता है। इसे 3000 ईसा पूर्व पत्थर पर उकेरा गया था। हालाँकि कुछ लोग इस रहस्य के ज्ञान को हासिल करना चाहते थे और उन्होंने इसे सचमुच हासिल भी कर लिया है, लेकिन यह हमेशा मौजूद था और कोई भी इसे खोज सकता था।

और फिर मुझे विज्ञान भी मिला, “आप एक क्वांटम फ़िज़िसिस्ट के पास जाकर पूछते हैं, "यह दुनिया किस चीज़ से बनी है ?" वह जवाब देगा, “ऊर्जा से।ऊर्जा का वर्णन करें। इसे बनाया या नष्ट नहीं किया जा सकता, यह हमेशा थी, हमेशा रही है, हर चीज़ जो विद्यमान थी हमेशा विद्यमान होती है, यह आकार में, आकार द्वारा और आकार के बाहर बदलती रहती है।"

आप किसी धर्मशास्त्री के पास जाकर सवाल पूछते हैं, "ब्रह्मांड किसने बनाया?” वह जवाब देगा, “ईश्वर ने।" ईश्वर का वर्णन करें। "हमेशा था और हमेशा रहेगा, कभी बनाया या नष्ट नहीं किया जा सकता। जो हमेशा था, हमेशा रहेगा, आकार में, आकार द्वारा और आकार के बाहर बदलता रहेगा।"

वैज्ञानिक पहली उक्ति को समझते हैं और एक आध्यात्मिक दूसरी को। लेकिन दोनों में फर्क क्या है? यह कोई तार्किक शायद समझता होगा और तर्क से समझा भी देगा। लेकिन हम यह भी समझते हैं कि एक व्यावहारिक के लिए दोनों एक ही है। “वर्णन वही है, बस शब्दावली अलग-अलग हैं। आकर्षण का नियम नैसर्गिक नियम है। यह निष्पक्ष है और अच्छी या बुरी चीज़ों में भेद नहीं करता है। यह आपके विचारों को आपके जीवन में साकार कर देता है। आप जिस भी बारे में सोचते हैं, आकर्षण का नियम आपको वही देता है।

“पिछले अस्सी सालों में क्वांटम भौतिकशास्त्रियों के आश्चर्यजनक कार्यों और खोजों के कारण अब हम मानवीय मस्तिष्क की असीमित सृजनात्मक शक्ति को ज़्यादा अच्छी तरह समझ चुके हैं। उनके निष्कर्ष विश्व के महानतम चिंतकों के शब्दों के अनुरूप हैं, जिनमें कारनेगी, इमर्सन, शेक्सपियर, बेकन, कृष्ण और बुद्ध शामिल हैं।”

“आप ईश्वर का शारीरिक रूप हैं। आप मांस नहीं, आत्मा हैं। आप शाश्वत जीवन हैं, जो ख़ुद को आपके रूप में प्रकट कर रहा है। आप ब्रह्मांडीय जीव हैं। आप समूची शक्ति हैं। आप समूचा ज्ञान हैं। आप समूची प्रज्ञा हैं। आप पूर्ण हैं। आप भव्य हैं। आप रचयिता हैं और इस ग्रह पर अपनी रचना कर रहे हैं।

हर धार्मिक परंपरा में बताया गया है कि आपको रचनात्मक स्रोत की छवि में रचा गया है। इसका मतलब है कि आपमें ईश्वर की क्षमता और शक्ति है। आपमें अपना संसार रचने की पूरी शक्ति है।”

हर आत्म-विकास, आध्यात्मिक, धार्मिक पुस्तक में ऐसे एक नहीं अनेक रहस्यों की चर्चा रहती है। बल्कि इतने रहस्य रहते हैं कि आम आदमी उस भूल-भुलैया में खो जाता है। लेकिन यहाँ लेखिका ने एक, केवल एक रहस्य कि चर्चा की है। लेखिका ने रहस्य बताया है, उसे कैसे साधना है - यह भी बताया है। उसने यह भी बताया है कि  हम कहाँ-कहाँ और क्या गलतियाँ करते हैं और उनसे कैसे बचना है? लोगों ने कैसे इस पर अमल किया और उन्हें कैसे-क्या मिला! अगर आपको नहीं मिल रहा है तो इसके संभावित कारण क्या हो सकते हैं? इन सब की विस्तार पूर्वक चर्चा की है। इन कारणों से यह पुस्तक आम पुस्तकों से जरा अलग है। सही बात तो यह है कि यह पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं बल्कि अभ्यास करने के लिए है। 

आप जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर वह सीक्रेट क्या है? मैं उस रहस्य को क्यों नहीं बता रहा हूँ। किसी जासूसी पुस्तक, फिल्म या टीवी सिरियल में उत्सुकता तब तक ही बनी रहती है जब तक इस रहस्य का पता नहीं चलता। जहाँ रहस्य प्रकट हुआ उत्सुकता समाप्त हुई। लेकिन फिर भी मैं उसे ऊपर लिख चुका हूँ, खोजिये! मिला? अगर नहीं तो पुस्तक पढ़िये।

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शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

फकीरी...की ...अमीरी ...की... फकीरी

इस आश्रम में आने की इच्छा तो 2020 के मार्च से ही थी लेकिन कभी कोरोना और कभी व्यक्तिगत कारणों से आना न हो सका। आखिर सब नकारात्मक विचारों को दरकिनार कर जुलाई, 2021 की गर्मी में हम यहाँ पहुँच ही गए। सूर्य देव ने पूरे उत्साह से हमारा स्वागत किया। हमने भी आत्मसमर्पण करते हुए उनके स्वागत को स्वीकार किया। शीघ्र ही  वरुण देव को हमारे स्वागत में लगा, सूर्य देव ने खुद भी साँस ली और हमें भी थोड़ी राहत दी।  



किसी भी आश्रम में, बिना किसी विशेष प्रयोजन के इतने लंबे समय तक रहने का पहला अनुभव है। इसके पहले पूना के नजदीक चिन्मय मिशन के चिन्मय विभूति में भी लंबे समय तक ठहरने का मौका मिला। लेकिन वहाँ गीता-ज्ञान-यज्ञ और फिर सम्पूर्ण-मानस के आयोजन में गया था। लेकिन यहाँ आने का प्रयोजन केवल आश्रम में रहना और यहाँ के कार्यों में हाथ बँटाना है। 

अब नाम में आश्रम है तो आश्रम तो कहना ही पड़ेगा। लेकिन एक आम भारतीय के मन में आश्रम के नाम से जो छवि उभरती है वैसा कुछ नहीं है। न कोई भजन-कीर्तन, न प्रवचन-गोष्ठी, न कोई मंदिर-पुजारी, न कोई विशेष वेश-भूषा, न कोई विशेष सम्बोधन। उम्र चाहे जो भी हो, चाहे जो पद हो, ट्रस्टी हो या सफाई पर्मचारी, सब या तो भैया हैं या दीदी। प्रत्येक आश्रमवासी अपनी योग्यतानुसार किसी-न-किसी प्रकार का सहयोग करता रहता है और आश्रम का काम बढ़ता रहता है। प्रात:, सूर्योदय के साथ-साथ उठकर कमरे से बाहर आश्रम के उद्यान में आयें तो प्रशिक्षण के लिए आए हुए बालक-बालिकाओं, युवक-युवतियों और आश्रमवासियों के दर्शन होंगे। आश्रम के खेतों में, बगीचे में, समाधि पर, भवन में सब मिलकर एक साथ श्रमदान करते हैं। इससे परिसर स्वच्छ और परिष्कृत बना रहता है। विशेष अवसरों, तिथियों एवं त्यौहारों पर ये सब ही मिलकर सजावट करते हैं और सुंदर, मनमोहक, आध्यात्मिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत करते हैं। तत्पश्चात सब अपने-अपने दैनिक कार्य, शिक्षण-प्रशिक्षण और उत्तरदायित्व के निर्वाह में तल्लीन हो जाते हैं।  

बड़े भू-खंड पर प्रकृति की छटा बिखरी हुई है। न जाने कितने किस्म के फल-फूल, सब्जी की हरियाली, सुगंध और सुंदरता हर वक्त चारों तरफ बिखरी रहती है। आपका मन, आपकी आत्मा के अनुसार जिसे पसंद करता है उठा लेता है, उसी में सरोबार हो जाता है, उसी का आनंद लेता है। सादगी पूर्ण सीधा-सादा जीवन। आश्रम भरा रहता है लोगों से, लेकिन किसी की आवाज़ नहीं सुन पड़ती। नहीं, गलत कह गया, आश्रम में बहुत शोर है।  दिन भर मोर, तोते, कोयल, मैना, गिलहरी और न जाने कितने पशु-पक्षियों के दर्शन होते रहे हैं और उनका संगीत कानों में पड़ता रहता है। जब सब एक साथ बोल उठते हैं तब तो ऐसा लगता है जैसे कई साज़ एक साथ बज उठे हों, संगीतज्ञों की महफिल सजी हो। कभी-कभी तो युगलबंदी भी सुनने को मिलती है। पूरी तरह से स्वच्छंद, उन्मुक्त, स्वतंत्र खुले आसमान के नीचे एक पक्षी-गृह। किसी एक जगह बैठ कर दत्तचित्त हो कर गिलहरियों या पक्षियों की भाग-दौड़, चुहुल-बाजी, अटखेलियाँ देखिये। तुरंत आपको इसमें एक लय-बद्धता नजर आयेगी। रूसा-रूसी, मान-मुनव्वल, प्यार-मुहब्बत, दौड़ा-दौड़ी, पकड़ा-पकड़ी, खेल-कूद ही नहीं मार-पीट और झगड़े भी दृष्टिगोचर होंगे। सृष्टि के सिद्धांत के अनुसार सृष्टिकर्ता ने मानव के पहले पशु-पक्षी का निर्माण किया था। अत: यह निश्चित है कि मानव नहीं ये पशु-पक्षी ही मानव के शिक्षक रहे हैं।  

                  वह फकीर फकीर नहीं, जो दिल का अमीर नहीं,

                        वह अमीर अमीर नहीं, जो दिल का फकीर नहीं।

अमीर और फकीर शब्द का इससे बढ़िया प्रयोग मैंने न देखा और न सुना। आपने अनेक अमीरों का नाम सुना है जो फकीर नहीं हैं, अनेक फकीर हुए हैं जो अमीर नहीं हैं। वहीं ऐसे अमीर भी हैं जिन्होंने फकीरी की है तो ऐसे फकीर भी हैं जो अमीर हैं। देशी अमीर, जिन्होंने फकीरी भी की, हैं - टाटा, मूर्थी, अजीमजी आदि। तो विदेशियों में बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग, वारेन बुफ़्फ़ेत्त, जॉर्ज सोरोस आदि का नाम ले सकते हैं। इन्होंने मिलियन-बिलियन का दान दिया लेकिन मिलियन-बिलियन रख भी लिया। अपना सर्वस्व देने वाले कितने और कौन हैं? ऐसा नहीं है कि नहीं हैं लेकिन उन्हें दुनिया कम जानती है। सर्वस्व यानि – अपना सब कुछ – तन, मन, धन – बल्कि इससे भी आगे बढ़ कर खुद को ही नहीं बल्कि अपने परिवार और बच्चों तक को दान में दे दिया। खोजिए, शायद कोई- न-कोई मिल ही जाएगा।  

अभी, पिछले एक महीने से मैं ऐसे ही एक अमीर-फकीर द्वारा दान में दी गई संपत्ति, जिसे आज हम श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा  के नाम से जानते हैं, में रह रहा हूँ। और जिस फकीर की बात कर रहा हूँ वे थे श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर, जिन्हें सब चाचाजी के नाम से जानते हैं। कब, कहाँ, कैसे प्रेरणा मिली और 

उन्होंने अपना सर्वस्व श्रीमाँ के चरणों में अर्पित कर दिया! जब-जब बच्चे हुए, उन्हें भी श्रीमाँ की गोद में दे आए। उनकी इच्छा थी कि दिल्ली छोड़ कर पांडिचेरी चले जाएँ, लेकिन श्रीमाँ ने ही उन्हें रोका, दिल्ली में शाखा प्रारम्भ करने कहा। और व्यापार? श्रीमाँ ने साफ शब्दों में कहा, यह पूरा कारोबार अब से मेरा (श्रीमाँ का) है और वे (चाचाजी) उनके व्यापस्थापक के रूप में कार्य संभालेंगे। उसके बाद से सभी अहम फैसले श्रीमाँ की जानकारी नहीं अनुमति से ही लिए जाते थे। और तो और पदाधिकारियों की नियुक्ति भी श्रीमाँ की मंजूरी से ही होती थी। कई व्यापारिक फैसले, जिन्हें चाचाजी ले चुके थे, को श्रीमाँ ने अनुमति नहीं दी। फलत: चाचाजी को अपना फैसला बदलना पड़ा। कुछ समय बाद चाचाजी को अनुभव हुआ कि वे फैसले गलत थे और उन्हें रद्द कर देने के कारण वे बहुत बड़े घाटे / धोखे से बच गए। 

पहले किसी से बात होती थी तो मैं कहता था कि मैं दिल्ली में हूँ। लेकिन अब नहीं कहता, बताता हूँ कि में श्री अरविंद आश्रम में हूँ।  दोबारा पूछने पर बताता हूँ कि यह आश्रम दिल्ली की सहरद में है लेकिन दिल्ली में नहीं। यहाँ न दिल्ली का शोरगुल है, न प्रदूषण, न दिल्ली की भाषा, न दिल्ली की संस्कृति। यहाँ पूरे भारत के लोग आते हैं, रहते हैं, पूरा भारत बसता है। विदेशियों की भी कमी नहीं रहती। फिलहाल अभी कोरोना के चलते विदेशी नहीं दिखते।  



सच, अगर आगमन के साथ ही सूर्यदेव के स्वागत से डर कर हम पलायन कर जाते तो जीवन के इस एक अप्रतिम अनुभव से वंचित रह जाते। चाचाजी, श्रीमाँ और श्री अरविंद को सत-सत प्रणाम।  श्रीअरविंद का दर्शन, श्रीमाँ का आशीर्वाद और  चाचाजी की फकीरी को श्रद्धा सुमन।

                जगत की जननी जगत की माता, नमस्ते पहुँचे तुम्हें हमारा |

                                जगत के आधार विश्वकर्त्ता, नमस्ते पहुँचे तुम्हें हमारा ||

-        सुरेन्द्रनाथ जोहर 'फ़क़ीर'

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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

सूतांजली अगस्त 2021

 सूतांजली के अगस्त अंक का संपर्क सूत्र नीचे है:-

इस अंक में दो विषय, एक लघु कहानी और धारावाहिक कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी की आठवीं किश्त है।

१। विज्ञान और आध्यात्म  - मेरे विचार

विज्ञान और आध्यात्म आमने-सामने हैं या अगल-बगल? नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक चार्ल्स टौएंस के विचार क्रांतिकारी हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया है के ये आमने-सामने नहीं बल्कि अगल-बगल में खड़े हैं।

२। मेरी साइकिल दौड़ - एक चिंतन

दिन में कम-से-कम एक घटना हमें कुछ संकेत देती हैं। कभी हम समझ लेते हैं कभी नहीं। समझे  और अपनाया, तो जीवन बदलने लगा और वह सब मिला जिसके लिए सारी जिंदगी दौड़ते रहे।

३। साधारण बनना ही खास बनना है - लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

बड़ी पढ़ाई, बड़ा पैसा, बड़ी कुर्सी, बड़ा रुतबा आपको खास नहीं बनती, बड़ा बनाता है आपका साधारण बनना।

४। कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी – धारावाहिक

धारावाहिक की आठवीं किश्त

पढ़ने के लिए ब्लॉग का संपर्क सूत्र (लिंक) (ब्लॉग में इस अंक का औडियो भी उपलब्ध है): ->

https://sootanjali.blogspot.com/2021/08/2021.html

 

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

गाँव के मेले

(क्या आपको कभी गाँव-कस्बे में रहने का अवसर मिला है? त्यौहारों और पूजा पर लगने वाले मेलों को नजदीक से देखा है? उसे महसूस किया है? मनोज कुमार झा ने इसे देखा भी और महसूस भी किया। महसूस हुआ तो लिखा और ऐसा लिखा कि लगता है मेले में ही घूम रहे हैं, उससे रूबरू हो रहे हैं। कई गांवों में आज भी लगते हैं, लेकिन वे अब वैसे नहीं रहे जैसे हुआ करते थे। ऐसे ही मेलों में मानुष-रूपों की एक झांकी।)

कभी दुर्गा पूजा, कभी कृष्ण पूजा तो कभी इंद्र पूजा के अवसरों पर पहले गांवों में नियमित रूप से मेले लगा करते थे। मगर इन  पूजाओं में पूजे जाने वाले देवता थोड़ा पीछे खिसक जाते और जो लोग मेले में घूमने आते, वे थोड़ा आगे आ जाते। जो मेले में घूमने आते थे, वे पाँच मिनट मूर्ति के साथ रहते, बाकी समय सखा-सहेली के साथ। बस्ताव में मेले में वे भी आते जो आस्तिक नहीं थे।

 

सबसे खास होता था मेलों में विवाहित स्त्रियों का अपने रिश्तेदारों से मिलना। यह मोबाइल आने से पहले की बात है। तब विवाह नजदीक में ही होता लेकिन गांवों में घूमना-फिरना कम ही हो पाता था, अत: विवाह का अर्थ जड़ों से उखड़ जाना होता था। जब नैहर से कोई मिलने आता तो  वे खूब रोती। फिर छोटी-छोटी बातें पूछती। जैसे कि आँगन के बाएँ कोने में जो चूल्हा था वह वहीं है या उखड़ गया, माँ किस रंग की साड़ी ज्यादा पहनती है, अमरूद इस बार कितना फला....।

 

मेले का तो साल भर इंतजार रहता। उस दिन उन्हें माँ, चाची, बहन सब मिलती। मिलते ही गले लगकर बड़ी देर तक रोती। कितने पूराने किस्से निकलते। फिर ठहाके भी उठते। छोटी-छोटी बातें  होती जैसे, कैसे अंधड़ में आम चुगने गई थीं, जिसमें बेली भी साथ थी। ये सहेलियों को अपने ही दिये नामों से पुकारती थी। मेले में ये सहेलियाँ भी मिलती। तीन-चार कोस पर मेला लगता था। आसपास जो कोई रहती, आती। इनकी बातें छोटी-छोटी होती, लेकिन उसमें शक्कर की मिठास होती। ये छोटी-छोटी बातें मर्द लोग नहीं करते। छोटी बात को मर्द लोग मौगियाही बातें कहते, जनाना बातें। माउगी अर्थात स्त्री। इन बातों का उनके लिए कोई महत्व नहीं था कि पिछले मेले में लाल काकी ने जो पीतल का लोटा लिया था, उसे अपने पास रखा या बेटी को दे दिया। इन स्त्रियों के स्टार वही माँ, बहन, भाई आदि थे, जिनके बारे में ये सबकुछ जान लेना चाहतीं। मर्दों के स्टार रेडियो-टीवी आदि से निकलते।

 

महिलाओं के ढेरों छोटे-छोटे झुंड मेले में होते। तीन-चार घंटे ये बैठी रहती। खूब रोती-हँसती। मिठाइयाँ लेती-देती। मेला देखती। जब ये विदा होती तो थोड़ी उदास हो जाती और अपनी विदाई के बारे में सोचने लग जाती,आँखों में आँसू तक आ जाते।

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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

जीवन को मिली एक सीख

(हमारी जिंदगी को तराशने में हमारे समाज, परिवार, वातावरण की अहम भूमिका होती है। यह परिवेश किसी को मंदिरका देवता बना देता है, किसी को नींव का पत्थर तो किसी को राह में ठोकर खाने वाला रोड़ा। लेखिका मेहरुन्निसा परवेज़ के एक संस्मरण का कुछ अंश जो लगभग चार दशक पहले लिखा गया था।)

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लेखिका बताती हैं कि वे एक सम्पन्न परिवार से थीं लेकिन स्कूल में उनकी दोस्ती एक साधारण परिवार की लड़की गंगा से हो गई थी। गंगा जशपुर जेल में, सिपाहियों की नजर बचा कर पेड़ से कूद कर घुस जाती और ढेर सारे नसपाती चुरा कर जमा कर लेती और लेखिका उसका स्लेट पकड़े निगरानी करतीं।

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वह मेरे लिये अपने घर से रोटी लाती थी। हम दोनों टिफिन बदल कर खाते थे। मुझे अपने घर के गेंहू के पराठे पसंद नहीं आते थे और उसकी ज्वार की रोटी और चटनी मुझे बहुत अच्छी लगती थी। ज्वार की रोटी की वह सोंधी सुगंध मुझे बहुत भली लगती थी। ...

 

...  वह लड़की (गंगा) काफी फक्कड़ तबीयत की थी। उसने ही मुझे बाजार जाना सिखाया। अकसर हम दोनों वहाँ लगने वाले छोटे-से हाट पर चली जातीं और लाई-चना, अमरूद, बेर, इमली खरीद कर चोरी से खाया करते थे। मैं उसके साथ ये सारे काम बहुत चोरी से करती थी, हाट भी जाती तो बड़ी सड़क को छोड़कर छोटी-छोटी गलियों से लुकते-छिपते जाते थे।

 

एक दिन हमलोग स्कूल के बाद सीधे हाट चले गये और वहाँ हम दोनों लाई-चना खरीद रहे थे। मेरी और उसकी दोनों की फ्रॉक की ओली में लाई चना था तथा  बस्ता पीछे बंधा था। हम दोनों लाई-चना मुट्ठी-मुट्ठी उठा कर फाँकने लगे। आखिर घर भी तो जल्दी जाना था। शाम हो चली थी। तभी उधर से एक मोटी सी औरत सर पर सब्जी का टोकरा लिये आई और बोरा बिछाकर अपनी दुकान लगाने लगी कि तभी उसकी नजर गंगा पर पड़ी और वहीं से ज़ोर से चिल्लाई, अरी गंगा, तेरा बाप तेरी माँ को कूटे डाल रहा है। कमरा बंद कर लिया है। जा, जल्दी घर जा नहीं तो तेरी माँ को तेरा बाप मार ही डालेगा

 

सुनते ही गंगा का चेहरा फक पड़ गया। मुट्ठी में भरा लाई चना गिर गया, ओली सीधी हो गयी। उसकी आँखों में आँसू भर गये और वह घर की ओर बेहताशा भागने लगी। मैंने भी सारा लाई-चना फेंक दिया और उसके पीछे भागने लगी। मैं भूल गयी थी कि मेरा घर दूसरा है और अब शाम हो गयी है। मुझे घर जाना चाहिये। मैं उसके पीछे सरपट भाग रही थी, जैसे कोई मेरी माँ को कूटे डाल रहा हो। गंगा माँ माँ चिल्ला रही थी और रो रही थी। उसका घर एक छोटी सी गली में नाले के किनारे था। खोली बंद थी और भीतर से किसी औरत की रोने-चीखने की आवाज ज़ोर-ज़ोर से आ रही थी। आसपास मुहल्ले के कुछ लोग खड़े थे।

 

गंगा दरवाजा पीट रही थी, बापू, दरवाजा खोल, माँ को मत मार, बापू दरवाजा खोल। गंगा के साथ मैं भी दरवाजा पीटने लगी थी और वही शब्द दोहराने  लगी थी, साथ हो रोते भी जा रही   थी।  मैं भूल गयी थी कि गंगा का घर पराया है। मैं उसके दुख में इस तरह खो गयी थी कि अपना अस्तित्व भी भूल गयी थी।

 

मेरी नन्ही सी जान हैरान थी कि ऐसा धक्का, ऐसा दुख गंगा को कैसे मिला? हादसा उसके घर हुआ था, दुख उस पर पड़ा था, पर उसकी नंगी चोट का एहसास मेरे मन पर सीधा पड़ रहा था। तब भी और आज भी मैं हैरान हूँ कि ऐसा क्यों हुआ था? उसके वातावरण और मेरे वातावरण में जमीन आसमान का अंतर था। अमीरी और गरीबी का यह भेद अचानक एक क्षण में समाप्त कैसे हो गया था? बस दु:ख था, जिसकी आँच हम दोनों को बराबर लग रही थी। उस दिन मैं अपनी उम्र से बहुत बड़ी हो गई थी। मैं दूसरे के दर्द की चुभन महसूस कर रही थी। गंगा मेरी पहली पात्र थी, जिसके दर्द में मैंने अपना दर्द देखा और मेरे नन्हें-से मन में अनजाने में एक लेखिका ने जन्म लिया। गंगा के रूप में मेरी पहली कहानी, जो आगे आगे दौड़ रही थी, और मैं उसकी सारी चुभन को अपने भीतर समेटे कहानीकार के रूप में उसके पीछे दौड़ती, उसकी गंदी गली में गयी थी। यह मेरे लेखक मन की  पहली पहचान थी, पहला एहसास था जो मुझे कभी नहीं भूलता। ...

 

गंगा का मेरा साथ कुछ महीनों का था। हमारा ट्रांसफर हुआ और हम दूसरे शहर में चले गये। पर गंगा को, जेल की दीवार को, नसपाती को, उसके घर ज्वार की सोंधी महक से भरी उस रोटी को मैं भूल नहीं पायी।... 

*

(एक लंबे अरसे के बाद लेखिका की मुलाक़ात गंगा से हुई, ट्रेन में। दो महिला पुलिस एक अपराधी औरत को लिये जा रही थी। यह अपराधी औरत गंगा थी।)

...उसने आँखें खिड़की से बाहर कर ली, उसकी साँवली मोटी आँखों में आँसू भर गये थे। थोड़ी देर बाद वह फिर से मेरी तरफ देखने लगी थी, मैं गंगा हूँ, पर एकदम अपिवत्र। गंगा इतने वर्षों के बाद मुझे इस हाल में मिलेगी, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। ... मेरा मन इतना कड़वा सत्य देखने को तैयार नहीं था।

 

जब मेरा स्टेशन आनेवाला था, तो उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये, मुझे पता है कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे। मुझे १४ साल की सजा तो होगी ही, पर मैं आज जो हूँ, जहाँ हूँ, उसके जिम्मेदार लोग कौन हैं? क्या मेरे माँ-बाप नहीं? मेरी माँ ने मुझे इतनी नन्ही-सी उम्र में मुझे अपने दु:ख का भागीदार क्यों बनाया? मुझे हकीकत का सामना क्यों कराया? उन्हें मेरा बचपन छीनने का क्या हक था? मेरे कच्चे मन पर हथौड़ों से दु:खों की मार क्यों दी? माँ ने अपने दु:खों का गवाह मुझे ही क्यों बनाया? और आज दु:खों का सामना करते-करते मैं खुद एक अपराधीन बन गई हूँ

 

स्टेशन आया, मैं उतर गयी। वह खिड़की के पास बैठी थी। सलाखों के पार उसकी आँखें रो रही थीं और मेरी भी आँखें भरी हुई थीं। मन डूबा हुआ था गंगा के दर्द में। गंगा के दर्द को मैं फिर सह रही थी, एक ही दर्द को हम दोनों फिर से झेल रहे थे। यह मेरे कहानीकार मन पर दूसरी चोट थी। उस दिन मैंने जाना कि लेखक और पात्र का रिश्ता कितना गहरा होता है।

(कवि ने कुछ अनुभव पर ही ये पंक्तियाँ लिखी होगी

                        वियोगी होगा पहला कवि, आह! से उपजा होगा गान,

                                                उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।)

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

कल भी, आज भी..... कल भी!

 मानव न बदला है और न बदलता नजर आ रहा है। जैसा कल था, वैसा आज भी है, क्या कल भी ऐसा ऐसा ही रहेगा? अर्द्ध शताब्दी पूर्व श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर का यह लेख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। हमने भले ही वैज्ञानिक प्रगति की हो, भौतिक संसाधन जुटा लिए हों लेकिन क्या हमने कल की भूलों से सीख कर अपने आज को सही किया? 

 


मैंने (चाचाजी * ने) एक कविता लिखी थी। पैदा तो भारत वर्ष में हुआ हूँ परंतु जब पैदा हुआ था राज्य अंग्रेजों का था। इसलिये अँग्रेजी हर समय अंदर उछल-पुछल करती रहती है और छलाँगे लगती रहती है। कविता भले ही अँग्रेजी में है परंतु बात सच्ची - सबके लिये है:

          As a rule man is a fool

                    When it is hot, he wants it cool

                             When it is cool, he wants it hot

                                       He wants a thing which is not.

कॉफी हाउस में जाता है तो पहले आइस क्रीम और फिर हॉट-कॉफी माँगता है। कभी हॉट-डॉग्स माँगता है तो कभी कोल्ड-कैट्स। हवाई जहाज में जाता है तो एयर-कंडिशन चाहिए और साथ में हॉट-कॉफी।

 

एक दफा की बात है कि एक बड़ी दावत (banquet)  बुलाई गई। बड़े शान की दावत होती है। उसको कैसे बयान किया जाए? रंग-बिरंगे, मीठे-नमकीन, खुश्क-चमकीले, ठंडे-गरम, एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे व्यंजनों का तांता ही लग जाता है। मेज की शान, सफेद दस्तरख्वान, फूलों के गुलदस्ते, बेयरों की चहल-पहल, कोई आ रहा है, कोई जा रहा है। प्लेटों की खटपट, चम्मच-छूरी  की छनछनाहट, रोशनी जो सूरज को भी मात कर दे। डिनर-सूटों में बड़े-बड़े सरकारी ऑफिसर और नौसेना, वायुसेना, थलसेना के बड़े-बड़े ऑफिसर तमगों से लदे हुए। कुछ विदेशी दूत और बीच में चार-पाँच तिकोनी टोपी (गांधी टोपी) वाले, कोई धोती चप्पल में और कोई पाजामे-खेड़ी में। इस बीच में, मुझे याद नहीं मैं कैसे फंस गया।

 

मेज पर तो हल्ला नहीं कर सकता शोर काफी मचा हुआ था। सब अपनी – अपनी बातों में मस्त थे। मेरे दाहिने हाथ पर कोई पुलिस ऑफिसर था। वह अपने साथी के साथ बातों में मस्त था। मेरे बाएँ हाथ एक शानदार फौजी ऑफिसर बैठा था। जो जनरल नहीं तो करनल जरूर रहा होगा। वह किसी से बात नहीं कर रहा था, शांत बैठा था। मेज पर चारों ओर से आवाजें आ रही थीं। यह गरम लाओ’, यह ठंडा लाओयह ठंडा लाओ’, यह गरम लाओ। यह ऑफिसर बहुत देर तक तो चुप बैठा रहा – शांत रहा - परंतु धीरज की भी एक हद होती है। मुझ से कहने लगा, - ये सब लोग इतने बड़े-बड़े ऑफिसर हैं  और अपने आप को पढ़ा-लिखा कहते हैं। मतलब तो उसका था कि वे बेवकूफ हैं परंतु शिष्ट भाषा में कहने लगा कि उनको इतना भी ज्ञान नहीं है कि मनुष्य का शरीर तो भगवान ने संतोषी बनाया है। इसके अंदर गरम डालो तो ठंडा हो जाता है, ठंडा डालो तो गरम हो जाता है। तो फिर यह ठंडे-गरम की बाहरी बक-बक क्या है? यदि, जैसा मिले संतोष से खा लिया जाए तो शरीर की मशीनरी को झटकों से बचाया जा सकता है।  

 

यह किस्सा उस जमाने का है जब भारत में दुर्भिक्ष पड़ा हुआ था, कहने के लिए अनाज नहीं था, दूसरे  मुल्कों से भीख मांगी जा रही थी और लाखों करोड़ों को एक समय भी खाना नहीं मिलता था। जीवन-स्तर (लिविंग स्टैंडर्ड) की बात ही क्या थी। और दूसरे तरफ ठंडे-गरम के नखरे और नजाकत किए जा रहे थे।

 

*श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर को सब चाचाजी कहते थे

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