शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

जो दिलों को रौशन करे वही दीवाली

 

दीपावली के शुभ अवसर पर सबों को बधाइयाँ

और

दीपोत्सव के वंदन



दीपों की जगमगाहट के साथ जीवन को मिठास से भर देने की परम्परा का नाम ही दीपावली है। रौशनी के इस महापर्व की तैयारी भी शुरू हो चुकी है तो क्यों न इस बार रौशनी के पर्व की शुरुआत घर का अँधेरा मिटाने के अलावा मन का अँधेरा दूर करने से ही की जाये? इस बार उपहार के बहाने खुशियाँ बाँटी जायें? क्यों न इस बार मुँह के साथ जिंदगी को भी मीठा कर दें? क्यों न इस बार दीपों की जगमगाहट की तरह नई सोच को जीवन से जोड़ दिया जाए ताकि खुशियों को बाँटने की परंपरा जीवन में त्यौहार की तरह बस जाए।

          सवाल कई हैं और उनके जवाब भी हमारे पास हैं, हमारे खुद के पास, क्योंकि जब तक हम जिंदगी में कुछ सकारात्मक नहीं करेंगे, तब तक जीवन का अँधेरा सदा के लिए दूर करना मुश्किल है। हम इससे जीत नहीं सकते, इसलिए इस बार एक नई शुरुआत करते हैं, अँधेरे को हमेशा के लिए दूर करने की। घर की सफाई यदि हमने कर ली मगर कूड़ा मुहल्ले के किसी चौराहे पर फेंक आये, तो उससे तो परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। हमें सोचना चाहिए कि इससे वहाँ रहने वाले लोगों को परेशानी होती है। इसलिए कचरे का सही तरीके से प्रबंधन करना सीखें।

          यदि हमारे शहर मुहल्ले में कूड़े का निस्तारण सही ढंग से नहीं हो रहा है तो इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से करें और खुद भी सोचें कि कचरे का प्रबंधन कैसे हो? इस बार कोशिश करें कि गंदगी घरों से ही नहीं, बल्कि सड़कों व शहरों से भी दूर हो। एक स्वच्छ माहौल तैयार हो और खुशियों के आने का रास्ता पूरी तरह साफ हो।

          हर बार की तरह कोई कोना रोशनी से न बचने पाए, यह तो जरूर सोचा होगा। इस बार हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं कोई कूड़ा-कचरा गंदगी को न बढ़ा रहा हो, साथ ही कोई हृदय अँधेरे से भरा न रहे  यह भी हमें सोचना चाहिए। इस बार रोशनी की जगमगाहट को हृदय से जोड़े रखिए, ताकि जीवन भर यह जगमगाहट हर कोने के साथ हर हृदय तक पहुँचे। सभी व्यक्तियों के साथ मुक्त हृदय से मिलिए। हृदय खोलकर मिलिए। मिठाइयाँ तो हर साल बँटती हैं, इस बार से खुशियों को बाँटने की परंपरा को और ज्यादा मजबूत और सशक्त बनाइए। सगे-संबंधी रिश्तेदारों और आस-पास के लोगों के बीच खुशियाँ इतनी बाँटी जाएँ कि घर से बाहर तक खुशियों का माहौल इस बार लंबे वक्त के लिए ठहर जाए। इस बार खुशियों को बाँटने में कोई कंजूसी नहीं हो, यह सोचकर हम दीपावली का त्योहार मनाएँ।

          मिठास जबान पर हो तो मन अच्छा हो जाता है और दिलों में हो, तो जिंदगी खूबसूरत। तो क्यों न इस बार जिंदगी को मीठा कर दिया जाए - प्रेम की बोली से, मनचाही कुछ बातों से, दुःख-सुख बाँटने के कुछ अच्छे लम्हों से, क्योंकि यह मिठास ऐसा धागा है जो जीवन में न सिर्फ मिठास ही बोलेगा, बल्कि दिलों को भी जोड़े रखेगा। नई शुरुआत जीवन की उन उलझनों को कहीं पीछे छोड़कर हो, जो लंबे समय से रुकी हुई है। नई शुरुआत उन रिश्तों की भी होनी चाहिए, जिन पर उदासी का रंग चढ़ गया है, ताकि एक नई उम्मीद के साथ फिर से जिया जा सके।

          हालांकि भारतीय दीपावली एकता के रंगों से जगमग होती रही है। इस सिलसिले को बनाए रखने के लिए और घर के माहौल के साथ पूरे परिवेश को खुशियों से भरने के लिए इसमें प्रेम की मिठास को घोलते रहना जरूरी है, ताकि विविधताओं से भरे इस देश में दीवाली हमेशा मनती रहे 'एकता की दीपावली ।'  कोई अकेला न रह जाए, इसलिए पास-पड़ोस के लोगों से मिलते रहने का बहाना ढूंढ़िए। घर की सजावट के लिए प्राकृतिक फूलों के बंदनवार, शुभ दीपावली, कंदील आदि बनाएं। इससे दीपावली पर हमारा घर प्राकृतिक एवं सकारात्मक ऊर्जा और खुशबू से महक उठेगा।

          इसके साथ ही हम ये भी सोचें कि सबसे बढ़कर अगर कोई उपहार है तो वह है जरूरत में काम आने वाली चीज। इसलिए इस बार उन घरों में भी झाँकिए, जहाँ रौशनी तो है मगर जरूरतें भी मौजूद हैं। हो सकता है हमारा कोई उपहार उन जरूरतों को पूरा करे। मिठाइयाँ तो सभी बाँटते हैं, इस बार जरूरतमंदों की जरूरत के मुताबिक उपहार बाँटिए। फिर इसकी जरूरत चाहे हमारे अपने घर के बुजुर्गों को हो, छोटों को या फिर आस-पास के माहौल में किसी को क्यों न हो, इस बार एक दीया जिंदगी की नई शुरुआत के नाम हमें जलाना ही चाहिए

(मधुसंचय पर आधारित)

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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

धर्म से अर्थ तक यात्रा संस्मरण

 धर्म से अर्थ तक                                                                                                   यात्रा संस्मरण

          धर्म हमारे जीवन का एक आवश्यक अंग है। धर्म हमारे अ-नियंत्रित अर्थ और काम को नियंत्रित करती है, उस पर लगाम लगती है और हमें सत-पथ पर अग्रसर करती है। धर्म निम्न, कमजोर समुदाय को एक बड़ा आर्थिक संबल भी प्रदान करती है। एक बहुत बड़ा वर्ग धर्म के खिलाफ भी है क्योंकि उनका मानना है कि धर्म के नाम पर ही अवांछित युद्ध और नर-संहार हुए हैं। उस वर्ग का यह भी मानना है कि धर्म के नाम पर धन और संसाधनों को बर्बाद भी किया जाता है। उनका मानना है कि बड़े मंदिरों-मठों के निर्माण के बदले अस्पताल-विद्यालय-कारखाने आदि का निर्माण कर उन्नति के कार्यों में निवेश किया जाना चाहिए और जीवन के मौलिक आवश्यकताओं – रोटी, कपड़ा, मकान + इलाज, शिक्षा – आदि की समस्या के समाधान पर खर्च करना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखने से यह तर्क बड़ा कारगर प्रतीत होता है लेकिन थोड़ा गौर करें और गहराई से जाँचे तो पाएंगे कि ये दोनों ही इल्जाम गलत और बे-बुनियाद हैं।

          युद्ध में हर-हर महादेव’, अल्लाहो अकबर का उद्घोष युद्ध की धार्मिकता का परिचायक नहीं है। हर धावक दौड़ शुरू होने के पहले अपने ईष्टदेव को याद करता है, व्यापारी धन-की-देवी को प्रतिष्ठित करता है, हर खिलाड़ी खेल प्रारम्भ होने के पहले अपने देव को याद करता है, हर विद्यार्थी परीक्षा में अपने भगवान को याद करता है, इस प्रकार वह उस शक्ति को याद करता है जहां से उसे ऊर्जा प्राप्त होती है। इतिहास उठा कर देखें तो युद्ध प्रायः सत्ता, धन और नारी के कारण हुए हैं। अंतिम दो विश्व युद्ध सत्ता और धन के कारण लड़ा गया न कि धर्म के कारण। विश्व में होने वाले धार्मिक दंगे-फसाद की जड़ भी राजनीतिक कारण हैं। ये दंगे हुए नहीं करवाए गए, एक दूसरे के विरुद्ध भड़का कर, राजनीतिक कारणों से सत्ता हथियाने या सत्ता बनाए रखने के लिए।

          धर्म के कारण न जाने कितने लोगों का घर चलता है, उन्हें दो  जून की रोटी मिलती है। पंडित-पंडों के विरुद्ध जहर उगलने वालों की भी कमी नहीं है। लेकिन क्या यही हाल दूसरे धंधों के दलालों का नहीं है। ऑनलाइन ठगी का धंधा कैसे चलता है? अच्छे और बुरे हर जगह हैं, सस्ते और महंगे कहाँ नहीं हैं? सवाल तो यह है कि आप उसे किस तरह नियंत्रित करते हैं, अच्छे और बुरे की आपको कितनी और कैसी पहचान है। आप सस्ते को रो रहे हैं या महंगे में फंसे हैं! आपको कितने सितारे की होटल या कैसी सेवा चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि धर्म के नाम पर किये गए खर्च की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नहीं बल्कि भूमि-पुत्रों को जाता है। इसका बड़ा अच्छा उदाहरण मुझे जसीडीह में और वहाँ से आते वक्त मार्ग में मिला।

मोहन कोठी का नव निर्माण, नव निर्मित मोहन कोठी
पुनर्निर्मित गोकुल कुंज और 5 नंबर कोठी 

          

एक लंबे अंतराल के बाद हम फिर जसीडीह आरोग्य भवन पहुंचे। यह स्थान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम से मात्र 12 किमी की दूरी पर है। इसके नजदीक ही शिवजी का एक और प्रसिद्ध स्थान, बासुकीनाथ धाम है। इन दो पीठों के कारण इनके आस-पास के इलाकों में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। लोगों के सुझाव के कारण अपने परिचित मार्ग – बक्रेश्वर, सूरी, मेस्संजोर, दुमका, बसुकीनाथ  से न जा कर 

कोठियों का नव-निर्माण 
 

आसनसोल, चित्तरंजन, सरथ होकर गए। लेकिन मुझे यह रास्ता सही नहीं लगा, अतः वापसी अपने पसंदीदा मार्ग, मेस्सेंजोर-दुमका, से ही आए। जसीडीह आरोग्य भवन दशकों तक कोलकाता के यात्रियों के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र रहा है। लेकिन फिर कालांतर में इसकी चमक धीरे-धीरे धुमिल हो गई। अब पूरे परिसर का नए सिरे से जीर्णोद्धार और नवीनीकरण द्रुत गति से हो रहा है और यह आशा की जा रही है कि 2023 के अंत तक यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा। क्या यह अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर पाएगा? फिलहाल अभी इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता लेकिन यह निश्चित है कि संस्था प्राण-प्रण से जुटी है इसे फिर से अपनी प्रतिष्ठा प्रदान कराने में। आशा और विश्वास तो है कि हमें फिर से नव-युग के मुताबिक छुट्टियाँ बिताने और स्वास्थ्य लाभ करने के लिए पूर्व-भारत में उचित व्यय पर लंबे समय तक रहने लायक एक स्थान मिल जाएगा।

          भवन के नजदीक ही पागल बाबा का मंदिर और आश्रम है। पिछले कई दशकों से यहाँ अखंड संगीतमय कीर्तन चल रहा है, 24 घंटे, बिना रुके। किसी पागल बाबा या लीलानंद ठाकुर ने इसकी कल्पना की और इसे मूर्त रूप दिया। उनके चलाये हुए ऐसे कीर्तन कई स्थानों पर अबाध रूप से चल रहे हैं। बाबा को ब्रह्मलीन हुए भी कई दशक हो चुके हैं। उन्होंने इसके लिए समुचित धन की  व्यवस्था भी की थी। लेकिन तब भी इस व्यवस्था को चलाने वाले तो इसके पीछे लगे हैं, अपना समय, कौशल लगा रहे हैं। शायद धन भी लगा रहे हों।

पागल बाबा आश्रम 

          
इस अखंड कीर्तन, धार्मिक कृत्य, के कारण मंदिर परिसर भी स्वच्छ रहता है, भक्त गण आते रहते हैं, उन के ठहरने की अच्छी व्यवस्था भी बन गई है। साथ-साथ मंदिर की अपनी गौशाला है। संस्था का विद्यालय है जिसमें छात्र-छात्राओं को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है। मंदिर प्रांगण में ही औषधालय है जहां बिना किसी भेद-भाव के निःशुल्क, दवा सहित, उपचार किया जाता है। ऐसी व्यवस्था देश के कई हिस्सों में हैं। कहीं कोई शिलालेख नहीं है जिसमें दाताओं के नाम उल्लखित हों। यह तो एक संस्था की बात हुई, ऐसी अनेक संस्था देश भर में कार्यरत हैं जो शांति से बिना किसी प्रकार का खुड़का किए सेवा कर रही हैं और लोगों का जीवन संवार रही है, इनका केंद्र बिन्दु है अखंड कीर्तन या ऐसा ही कोई संकल्प।

          लौटते समय हम बासुकीनाथ के नजदीक से गुजरे। दोनों तरफ पेड़ों की अनेक दुकानें और ठहरने की व्यवस्था की भरमार। सब स्थानीय लोगों की हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर एक बड़ी और साफ-सुथरी सी जगह देख हम चाय-नाश्ता करने रुके। मालिक बंगाल से था लेकिन उसका स्थान पूरी तरह से निरामिष था। पति-पत्नी कार्यरत थे। सब्जी-रोटी गरम और स्वादिष्ट थी। हम वहाँ काफी देर रुके खटिया पर आराम भी किए। लेकिन इस दौरान एक भी यात्री नहीं आया। सड़क पर यातायात भी नहीं के बराबर थी। बातचीत हुई। मैंने पूछा, यात्री तो है ही नहीं, गुजारा कैसे चलता है। पता चला एक लंबे समय से वे वहाँ रहते हैं। पहले गुजारा मुश्किल से चलता था। लेकिन अब वर्ष में सिर्फ एक माह काम चलता है। उस समय मुश्किल से 2 घंटे सोने मिलता है। कभी-कभी वह भी नहीं। बाबा की कृपा से उस एक माह में इतना बच जाता है कि साल भर निकल जाता है।

मामा लाइन होटल 

          

हमारे देश की अर्थ व्यवस्था टिकी हुई ही है ऐसे धार्मिक त्यौहार और अनुष्ठानों पर। देश के कोने-कोने में अलग-अलग नाम से इनका आयोजन होता रहता है और देश की बड़ी जनता इनमें उत्साह के साथ शरीक होती है। उनके मनोरंजन का साधन यही है और उनके कारण ही वहाँ के भूमिपुत्रों का गुजारा चलता है। वे अपने स्थानों पर बने हुए हैं, शहरों की तरफ नहीं दौड़ रहें हैं। यात्री इन्हीं का भोजन करते हैं, इन्हीं के घरों में ठहरते हैं और उनके कुएं का ही पानी पीते हैं। ये बिसलेरी, पिज्जा और अन्य ब्रांडेड वस्तुओं का प्रयोग करने वाले नहीं हैं।

          मुझे कई युवा मिले जिनकी राज-मार्ग पर पहली पसंद, खाट लगे ढाबा हैं। ये ढाबे एयर-कंडीशन्ड नहीं हैं, न ही वर्दी पहने बैरे यहाँ मिलेंगे। पूरा परिवार इसमें लगा होगा, एक पका रहा होगा, एक गल्ले पर बैठा होगा, एक खिला रहा होगा तो एक सफाई कर रहा होगा। युवा वर्ग का यह रुझान देश की अर्थ व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। आप भी इनका हौसला बढ़ाइए, अनजाने में ही सही, इन्हें अपनी जमीन से जुड़े रहने में सहयोग दीजिये, देश को मजबूत कीजिये। महूसस कीजिये धर्म कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे सहयोग कर रहा है।

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आपने भी कहीं कोई यादगार यात्रा की है और दूसरों को बताना चाहते हैं तो हमें भेजें। आप चाहें तो उसका औडियो भी बना कर भेज सकते हैं। हम उसे यहाँ, आपके नाम के साथ  प्रस्तुत करेंगे।

यूट्यूब  का संपर्क सूत्र à

https://youtu.be/2lq2iyl85sQ



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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

सूतांजली अक्तूबर 2022



 सूतांजली के अक्तूबर अंक का संपर्क सूत्र नीचे है:-

इस अंक में हैं शिक्षा का परिणाम और उद्देश्य तथा क्या गांधी-वाद जैसा भी कुछ है?

१। पहली सीढ़ी...... शिक्षा का दायित्व....... वसंत मैंने पढ़ा

जेन गुरु की कहानी, हिटलर के गैस चैंबर की दास्तां और वसंत का आगमन

२। ....वाद पर विवाद                          मेरे विचार

मानव का मनोविज्ञान कहता है – हम जिसे सही जानते हैं, उसे सही मानते नहीं। हम जिसका आदर करते हैं, उसकी सुनते नहीं। हम मानते कुछ हैं, चाहते कुछ और, इस दोहरी जिंदगी से निजात पाना होगा।

 

यू ट्यूब पर सुनें : à

https://youtu.be/Uo7qA7aHNOA

 

ब्लॉग  पर पढ़ें : à 

https://sootanjali.blogspot.com/2022/10/2022.html

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

अच्छा दिखना, अच्छा महसूस करना, अच्छा होना



हमारे ये तीन स्वरूप हैं – हमें अच्छा दिखना है, हमें अच्छा महसूस करना है और हमें अच्छा होना भी है। और इन्हें हासिल करने के लिए प्रारम्भ करते हैं अच्छा दिखने से, अच्छा दिखते हैं तो लोग सराहना करते हैं तब अच्छा लगने लगता है और जब अच्छा लगता है तब समझते हैं कि अच्छे हो गए हैं। क्या यह सही है? इस पर थोड़ा विचार करें।

          घबराहट तब होती है जब खुद को दूसरों की नजरों से देखते हैं। खुद को खुद की नजर से देखना होगा, खुद का सम्मान करना होगा। बिल्ली के अपने गुण होते हैं और कुत्ते के अपने, शेर के अपने गुण होते हैं और गाय के अपने। व्यक्ति को अपनी क्षमता का अनुकूलन करना चाहिए और दूसरों की क्षमता के साथ तुलना नहीं करनी चाहिए। जब दूसरों के सामने प्रस्तुति, व्याख्यान देना होता है तो घबरा जाते हैं क्योंकि दूसरों की नजर से देखने लगते हैं।

          अच्छा दिखना वह स्वरूप है जिसके लिए हम में से अधिकांश लोग काम करते हैं। इसके लिए हम कड़ी मेहनत करते हैं और अपनी आय से एक मोटी रकम भी इसके लिए खर्च करते हैं। अच्छा दिखना दूसरों के समर्थन पर निर्भर करता है। यह सोचकर हमें घबराहट होती है कि वे हमारी सराहना करेंगे या नहीं।           प्रश्न है, हम अपने इस स्वरूप को अच्छा दिखने से अच्छा महसूस करने में और अच्छा महसूस करने से अच्छा होने में कैसे परिवर्तित करें?

          आवश्यकता है अच्छा दिखने के महत्व को छोड़ना। हम दूसरों से अपनी सराहना पाने के लिए पागल बने रहते हैं । व्यापार जगत में दूसरों की सराहना की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसके लिए पागल होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी पागल ऊर्जाएँ हमें असंतुलित कर देती हैं। असंतुलित ऊर्जा एक रोग है। बीमारी तब होती है जब आराम भंग हो जाता है।

          अच्छा दिखने से अच्छा महसूस करने और अच्छा महसूस करने से अच्छा होने को महत्व देना प्रारम्भ करें। हम स्नान करते हैं और हमें तुरंत महसूस होता है कि हमें अच्छा लग रहा है। बस यहाँ न रुकें, अपने आप से कहें कि हमें यह बहुत अच्छा लगता है, हम सहज अनुभव कर रहे हैं, हमें अच्छा लग रहा है। अपने आप से बात करें और अंग-प्रत्यंग से यह प्रदर्शित कीजिये कि हम अच्छा महसूस कर रहे हैं। इस अच्छे महसूस को शारीरिक अभिव्यक्ति दें। फिर एक कदम और आगे बढ़ें, केवल महसूस न करें बल्कि  पूरी सिद्दत से यह मानें कि रोजाना स्नान करना अच्छा है। यह हुआ अच्छा बनना।

          सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने जीवन मूल्यों को इस विश्वास में बदलना कि अच्छा होना ही सबसे महत्वपूर्ण है। मूल्यवान तभी मूल्यवान है जब उस मूल्यवान का मूल्य हो। उन लोगों की संगति में रहें जो अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में अच्छे होने को महत्व देते हैं। उनकी ऊर्जाएं हमें प्रभावित करेंगी।

          जब भी आपको घबराहट महसूस हो तो खुद को निहारें-परखें और खुद को अच्छा बनने के लिए बदलें। घबराहट भी एक ऊर्जा है इस ऊर्जा को न दबाएं। इन ऊर्जाओं को तब्दील करने  के लिए मनोवैज्ञानिक अभ्यासों को अपनाएं जैसे हँसना, नाचना, ध्यान करना। अगर अपनी इस घबराहट को शारीरिक रूप से बाहर नहीं निकालते हैं, तब वे हमारे शरीर में जमा होने लगती हैं और हमारे जीवन, हमारे विचार और हमारे फैसलों  को नियंत्रित या प्रभावित करने लगती हैं। अपने विभिन्न हरकतों और क्रियाओं के माध्यम से अपनी घबराहट को व्यक्त करने लगते हैं, जैसे पाँवों को हिलाना, नाखून चबाना, इधर-उधर ताकना। यदि घबराहट को बुद्धि में नहीं बदलते तो वह बुद्धिमान होने के बजाय खुद को सही ठहराने की कोशिश करने में लग जाता है, कुतर्क करने लग जाता है।  

एक युवा ने महात्मा से पूछा, "पुण्य का फल सुख होता है?” “हाँ

“और पाप का फल दुख होता है?” “बिलकुल”

“कर्ज लेने में सुख मिलता है, तो लें पुण्य है और कर्ज चुकाने में दर्द होता है, वापस न करें पाप है”।

 

1965 के पाकिस्तान युद्ध के बाद शांतिवार्ता के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद जाना था। निमंत्रण सपत्नीक था। श्रीमती ललिता जी शास्त्री ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी हाल में नहीं जाएंगी। उनका न जाना गंभीर संकेत दे सकता था। शास्त्रीजी ने ललिता जी से बात की और उनका मन टटोला। फिर उन्हें समझाया, तुम्हें डर इस लिए लग रहा है क्योंकि तुम वह दिखना / दिखाना चाहती हो जो तुम नहीं हो। तुम सहज रहना, हिन्दी में ही बात करना  और वही पोशाक पहनना जो तुम यहाँ पहनती हो। तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। ललिता जी ने वही किया। रूस में मीडिया को बता दिया गया कि ललिता जी को केवल हिन्दी आती है और वे एक साधारण भारतीय गृहिणी हैं। ललिता जी अभूतपूर्व प्रशंसा लेकर लौटीं।

          अच्छा दिखने की कोशिश में हमें घबराहट होने लगती है, घबराहट हमें अच्छा महसूस नहीं करने देती फलस्वरूप हम अच्छा नहीं बन पाते। लेकिन अगर हम अच्छा बनने का प्रयत्न करें तो वह हमें अच्छा महसूस कराती है जिसका परिणाम होता है कि हम अच्छे दिखने लगते हैं। यह एक स्वाभाविक क्रिया है, अपने आप होती है इसके लिए आपको अलग से कुछ करना नहीं होता। ।

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

अराजकता के मध्य कैसे रहें शांत

( यह मेरे अपने जीवन के अनुभव हैं, कहीं सुनी या पढ़ी हुई नहीं। आप भी आजमा कर देखें। मैंने पहले से शुरू किया था बाकी एक के बाद एक स्वतः जीवन में उतरते चले गए, जीवन शांत होता चला गया।)

जिधर नजर घुमायें, उधर ही अशांति, मारकाट, तबाही, तनाव, अराजकता, हत्यायें, धर्मांधता, गणतन्त्र के  वेश में तानाशाही, नागरिक स्वतंत्रता और अधिकार का हनन, एक-के-बाद-एक, पूरे विश्व में।  अफगानिस्तान में तालिबन का कहर, सीरिया में अलग विक्षोभ, कोरोन की तबाही, यूक्रेन का न समाप्त होने वाला युद्ध स्पष्ट नहीं है कि यह कब और कैसे समाप्त होगा, पर्यावरण की दुर्दशा, दुनिया का अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से गर्म होना, बढ़ती घृणा और ईर्ष्या इन सब के प्रभाव से अनियंत्रित मंहगाई, अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई, असीमित लालच, अविश्वास का साम्राज्य - कहाँ तक गिनायें। मन को भले ही तसल्ली दें कि अब वापस सब यथावत हो गया / रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है। समय-असमय पर यह अशांत वातावरण बार-बार अपना सर उठा कर अपनी उपस्थिती दर्ज कराता रहता है। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां कुछ भी निश्चित नहीं है। भले ही कोविड अपने अंतिम खेल में हो, लेकिन इसका प्रभाव, दाग, घाव हर जगह दृष्टिगोचर है। हमारे लिए, आस-पास की अशांत दुनिया से अप्रभावित रहना मुश्किल है।



          बात यह है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां अनिश्चितता ही एकमात्र निश्चितता है। हर किसी के मन के किसी कोने में एक अनजाना भय, डर, अशांति, असुरक्षा, चिंता, बेबसी, उदासी, असंतुलन …….  के एहसास ने अपना एक स्थायी स्थान बना लिया है। तब इस सब के मध्य हम कैसे शांत और सकारात्मक रह सकते हैं। अलग-अलग जगह से मैंने कई चीजें उठाईं और अपनाया। मैं अब पहले की तुलना में बहुत शांत हूँ, अप्रभावित हूँ, संतुलित हूँ। ये बहुत ही कठिन हैं, अगर आप में निश्चय की कमी है। लेकिन बहुत ही सरल हैं, अगर निश्चय कर लें, क्योंकि ये आप के खुद के वश में हैं किसी दूसरे पर आश्रित नहीं।

1.    मीडिया से बचें - हमारी अधिकतर मीडिया उत्तेजित लहजा और भाषा, तीखी बहस, दुष्प्रचार और घृणास्पद समाचारों और असंतुलित विचारों को ही प्रस्तुत करती हैं।  समाचार के नाम पर अपने विचार हम पर थोपने का प्रयत्न करती हैं। ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया को "बेवकूफों के लिए एम्पलीफायर" कहा जाता है। वे मुफ़्त हैं, क्योंकि हम ही उनके उत्पाद हैं। लगभग दो साल पहले, मैंने टीवी देखना बंद करने और सोशल मीडिया से अपने आप को अलग करने का फैसला किया। यह सुझाव मुझे भी मेरे एक मित्र ने दिया जब उसने मुझे कभी-कभी अप्रत्याशित रूप से तनाव या विषाद में देखा। मुझे उसका यह सुझाव बड़ा अजीब और अव्यावहारिक लगा। लेकिन उसकी दृड़ता के कारण, बतौर प्रयोग, एक सप्ताह के लिये मैंने यह सब बंद कर किया था। अब उसे बंद किए दो वर्ष हो चुके हैं। मुझे बाद में यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि मेरे जैसे अनेक लोगों ने मीडिया का बहिष्कार कर रखा है और सुखी हैं। यहाँ मैं मार्क ट्वेन की उक्ति भी उद्धृत करना चाहूँगा, जब हम अखबार नहीं पढ़ते तब हमारे पास खबरें नहीं होतीं लेकिन जब हम अखबार पढ़ते हैं तब हमारे पास गलत खबरें रहती हैं

2.    अपना समस्त ध्यान अपने प्रभाव क्षेत्र तक ही सीमित रखें – हम उन बातों पर, खबर पर, क्षेत्रों पर अत्यधिक ध्यान देते हैं जो हो सकता है हमें प्रभावित करती हों लेकिन वे हमारे अधिकार क्षेत्र या सामर्थ्य के बाहर हो। बहुत कुछ हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए और बहुत कुछ नहीं हो रहा है लेकिन होना चाहिए। दुनिया में कोई कुछ भी कर रहा हो या न कर रहा हो उसकी चिंता मत कीजिये। न तो इसकी चिंता कीजिये और न ही इसकी परवाह कीजिये कि मेरे अकेला के करने से क्या होगा। यह अपनी सोच के अनुसार करना और न करना आपको अवसाद से बाहर निकाल कर सुखद, संतोष और आत्मानन्द के संसार में ले जाएगा। आप दूसरे को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपने आप को कर सकते हैं। सेवेन हैबिट्स ऑफ हाईली इफेक्टिव पीपल के लेखक स्टीफन कोव भी अपनी पुस्तक में यही सुझाव देते हैं कि हम उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करें जिन्हें हम नियंत्रित ...... प्रभावित कर सकते हैं। इसके साथ-साथ मैं गांधी जी की सलाह को भी जोड़ना चाहूँगा हम दुनिया में जो बदलाव देखना चाहते हैं, हम खुद वैसे बनेंयह केवल आप को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को बदलने की ऊर्जा रखती है। मैं यूक्रेन, अफगानिस्तान, अमेरिका, रूस, मंहगाई के बारे में बहुत चिंतित नहीं हूं. मैं इनके बारे में नहीं बल्कि इस बारे में बहुत कुछ सोचता हूं कि मेरे पास साप्ताहिक ब्लॉग या मासिक सूतांजली के लिए आवश्यक सामग्री है या नहीं। मेरा लेख लिपिबद्ध तैयार है या नहीं। मैं यह नहीं सोचता कि कोई मेरे पोसटिंग्स देख रहा है या नहीं, कितनों ने इसे लाइक किया या सबस्क्राइब किया। मुझे लगता है मुझे करना चाहिए और मैं कर रहा हूँ। मैं उन लोगों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कर सकता जो नफरत फैला रहे हैं लेकिन मैं प्यार फैलाना और अपने आस-पास के विभाजन को ठीक करने का प्रयत्न कर सकता हूं और कर रहा हूँ। मैंने इसके  प्रभाव को भी महसूस किया है। मैं अपने बारे में बेहतर महसूस करता हूं। मुझे छोटी-छोटी हरकतों से ऊर्जा मिलती है और धीरे-धीरे मेरे प्रभाव का दायरा भी बढ़ रहा है।

3.   सही साथियों को चुनिये – जिनके साथ आप अधिक समय बिताते हैं। आपके आस-पास के लोगों का आपके विचारों, भावनाओं, व्यवहारों आदि पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। अतः इस बात का ध्यान रखें कि जिनके साथ आप उठते-बैठते हैं वे सकारात्मक सोच के लोग हों, सहृदय हों, विचारवान हों, प्रेम से भरे हों। इनके विपरीत जिनमें नकारात्मकता हो और विचारों में कडुआहट हो, विष हो उनकी संगत छोड़ दीजिये। उनके सोशल पोसटिंग्स मत देखिये, ऐसे व्हाट्सएप्प ग्रुप या तो छोड़ दीजिये या ऐसी पोसटिंग्स करने वालों को ब्लॉक कर दीजिये।

4.    नियमित ध्यान करें -  हाँ, यह अत्यावश्यक है। जहाँ असाधारण समय में, हमारे चारों ओर सब स्थायित्व पिघलता जा रहा है, जहां घटनाएं आवाज की गति से घट रही हैं, क्या सही है और क्या गलत यह समझने का अवसर ही नहीं मिलता है, ऐसे समय में सचेत रहने और परिवर्तनों से निपटने की कुंजी हमारे अन्तर्मन में ही है। दार्शनिकों का मानना है कि हमारी खुशी में सबसे बड़ी बाधा यही है कि हम में से अधिकांश के लिए अपने विचारों, मन की निरंतर ऊहापोह, बाहरी शोरगुल के बीच हमारी अपनी पहचान का गुल हो जाना। जब हम ध्यान में  बैठते हैं तब हम अपने आप को, अपने विचारों को एक अलग आसमान में उड़ते बादल की तरह अलग से देख और परख पाते हैं। हमारी अपने से, जो कहीं खो गया था, मुलाक़ात हो जाती हैहम जैसे दिखते हैं उसकी तुलना में  हम बेहतर हैं, ध्यान में हम इस हम से मिलते हैं।  हमारा आत्म साक्षात्कार होता है। अपने से अपनी यह मुलाक़ात हमें सुकून देती है।

5.     आध्यात्मिक जीवन का विकास करें – हमें यह सिद्दत से महसूस करना चाहिए कि हम  आध्यात्मिक अनुभव रखने वाले मानव नहीं, हम आध्यात्मिक जीव हैं जो मानवता का अनुभव रखते हैं। समय-समय पर हमें किसी बड़ी चीज की झलक मिलती है, जो हमें यह अहसास कराती है कि हम एक बड़े खेल का एक बहुत छोटा सा हिस्सा हैं। उस क्षण में, हमारी सारी चुनौतियाँ, जो कुछ भी चल रहा है, वह सब महत्वहीन हो जाती है। उस पल में हम जानते हैं कि यह सब क्षणिक है, यह ज्यादा समय नहीं रहेगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा। आप किसी भी धर्म को मनाने वाले हों या किसी भी धर्म को नहीं मानते हों, आप किसी भी ईश्वर या प्रकृति या अदृश्य शक्ति या तकदीर या कर्म को मनाने वाले हों, युक्ति यह है कि आप जो भी आध्यात्मिक अभ्यास उपयोगी पाते हैं, उनके माध्यम से इन क्षणों को बार-बार अधिक बार अनुभव करने में अपने को सक्षम बनाएँ।

यह आवश्यक नहीं है कि इन पांचों बातें को एक साथ अपनाएं। आपको इनमें जो भी सबसे ज्यादा सरल अनुभव होता है वहीं से शुरू करें।  निरंतर अपनी अशांति का कारण ढूंढिये और उसका उपचार करते चलिये। फिर अगर लगता है कि आपके जीवन में शांति कुछ बढ़ी है, संतुलित हुई है तब एक-के-बाद एक अपनाते जाएँ और बदलते जीवन को अनुभव करें।

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 यूट्यूब  का संपर्क सूत्र à

https://youtu.be/HvE66X_Dqog


शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

सूतांजली सितंबर 2022


 

सूतांजली के सितंबर अंक का संपर्क सूत्र नीचे है:-

इस अंक में हैं फोर्ड गाड़ी के निर्माता श्रीमान फोर्ड से मुलाक़ात का एक दिलचस्प किस्सा और साथ में एक लघु संदेश।

१। चलें, मिलें फोर्ड के जनरल मैनेजर से...           मैंने पढ़ा  

एक किस्सा बताती है जीने का तरीका।

२। ईश्वर          लघु बातें   - जो सिखाती हैं जीना

क्या भय है ईश्वर को?

 

यू ट्यूब पर सुनें : à

https://youtu.be/aJsYHCwku7Y

ब्लॉग  पर पढ़ें : à 

https://sootanjali.blogspot.com/2022/09/2022.html

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

नयी या पुरानी

  अभी पिछले माह, जुलाई 2022 में मैं चिन्मय तपोवन आश्रम, सिद्धबारी, धर्मशाला में  दस दिवसीय श्रीमदभागवत पुराण, स्कन्ध एक की व्याख्या के शिविर में था। शिविर में वक्ता थे पूज्य स्वामी श्री अभेदानंदजी। स्वामीजी चिन्मय मिशन दक्षिण अफ्रीका से इस शिविर के आयोजन के लिए विशेष रूप से आए थे। जिस प्रकार राम चरित मानस और रामायण श्री राम कथा है उसी प्रकार श्रीमदभागवत महापुराण श्रीकृष्ण कथा है।

          स्वामीजी के सामने भागवत पुराण रहती थी और वे उसके पन्ने पलटते रहते थे। एक दिन बोलते-बोलते स्वामीजी अचानक रुक गए। कुछ समय पश्चात उन्होंने फिर से बोलना प्रारम्भ किया – आप देख रहे हैं। इस ग्रंथ के पन्ने निकल गए हैं। बहुत पुरानी हो गई है। काफी मैली सी भी दिखती है। पूरा ग्रंथ ढीला हो गया है। इसे बहुत यत्न से रखना पड़ता है, पन्नों को बड़ी सावधानी  से पलटना होता है। आप लोगों में से कइयों ने और दूसरों ने भी अनेक बार इसके बदले नया लेने को कहा, बल्कि लाकर रख भी दिया। लेकिन मैं बार-बार इसी पर लौट आता हूँ। मैं जब भी नयी पुस्तक खोलता हूँ मुझे उसमें कागज और स्याही के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखता। मुझे वह बेजान और  नीरस प्रतीत होती है। मैं, न तो उसे पढ़ पता हूँ और न ही कोई नया विचार, अर्थ मेरे मन में आता है।

          लेकिन जब इस पुरानी पुस्तक को खोलता हूँ तो ऐसे लगता है जैसे मैं भागवत पढ़ नहीं रहा हूँ, बल्कि भागवत खुद-ब-खुद मेरे कानों में बोल रही है। न जाने कितने वर्षों से मेरी अंगुलियों ने इसे छुआ है, इस पर चली हैं, मेरी आँखों ने इसे देखा है, इन पर छपी पंक्तियों की बीच के खज़ानों ने मेरे कानों में कुछ गुनगुनाया है। शायद इसने गुरुदेव की अंगुलियों के स्पंदन और दृष्टिपात का भी अनुभव किया होगा। उनके अलावा और भी कई गुरु-भाइयों, संतों, स्वामियों ने इसमें प्राण फूंके होंगे। इसमें  चेतना है, प्राण है, स्पंदन है। जगह-जगह मेरे निशान हैं, टिप्पणियाँ हैं। ये मुझ से बात करती हुई प्रतीत होती है।

          हमारे सदियों पुराने मंदिर, चार धाम, बारह ज्योतिर्लिंग, इक्यावन शक्ति पीठ, प्राचीन मंदिर और आस्थास्थल अपनी गंदगी, भीड़-भाड़, सँकड़ा प्रवेश, प्राचीन बनावट, छोटे प्रांगण और अन्य बुराइयों के बावजूद हमारे पूजनीय स्थल हैं, हमारी आस्था के प्रतीक हैं। लाखों नहीं करोड़ों लोग वहाँ जाते हैं, बार-बार जाते हैं, उनकी मनौती मानते हैं। इन आम जनता और राजा-महाराजाओं की श्रद्धा ने, संतों और महात्माओं के स्पर्श ने, विद्वानों और पंडितों के ज्ञान ने, कलाकारों और साहित्यकारों की कृतियों ने, श्रद्धालुओं और दीन-दुखियों की नजरों ने इनमें प्राण फूँक दिये हैं। इनकी रक्षा के लिए न जाने कितने लोगों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया है। इनके दर पर न जाने कितने लोगों ने अपने सिर पटके हैं। ये जाग्रत देव हैं, इनमें शक्ति का निवास है। इनकी याद आने पर, यहाँ पहुंचने पर हम स्वयंमेव श्रद्धानवत हो जाते हैं हमारी सात्विकता प्रखर हो जाती है। 

          अगर आपके घर में भी कोई ग्रंथ है, भले ही किसी भी अवस्था में हो, उसे न हटाएँ। उसमें आपके पूर्वजों के संस्कार, उनकी आत्मा, उनके स्पंदन, उनकी यादें समाई हैं। उस ग्रंथ को वही आदर दीजिये जो आप अपने पूर्वज को देते हैं। आदर पूर्वक आहिस्ते से खोलिये, उसे प्रणाम कीजिये, उसका सम्मान कीजिये, उसकी पूजा कीजिये। अगली पीढ़ी को संस्कारित करने का यह भी एक सरल सा उपाय है।

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