शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

मेरी नहीं, तेरी इच्छा पूरी हो

  जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं जब प्रार्थना में पूर्ण आस्था रखने के बावजूद जब प्रार्थना न सुनी जाने के कारण ‘उस’ पर से हमारा विश्वास हिल जाता है। और ठीक इसके विपरीत यानी ऐसी भी अनेक घटनाएँ हैं जब प्रार्थना में विश्वास न करने वाला भी प्रार्थना करता नजर आता है और उसकी प्रार्थना सुन ली जाती है।



विचित्रा, मिशिगन के एक विशाल ग्रेनाइट चट्टान की चोटी पर चढ़ने में  लगी हुई थी। वह लगभग आधा रास्ता तय पर कर चुकी थी। ऐसी चट्टान पर पर्वतारोहण करने का यह उसका पहला अनुभव था। चट्टान के एक कगार पर खड़ी वह जरा आराम कर रही थी। जैसे ही उसने वहां से आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाया, अचानक उसका कॉन्टैक्ट लेंस आँख से निकल कर गिर गया। बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला। उसके मुंह से अनायास निकल पड़ा 'बहुत बढ़िया!’ और खयाल आया - यहां मैं एक चट्टान के मुहाने पर खड़ी हूं, नीचे से सैकड़ों फीट ऊपर और इसकी चोटी से सैकड़ों फीट नीचे, और अब मुझे सब कुछ धुंधला नजर आ रहा  है।' 

          उसकी नजरें लेंस को चारों तरफ खोजती रहीं और आशा करती रही कि शायद वह लेंस इस मोड़ पर मिल जाये। लेकिन वह कहीं नहीं था। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि उसके अंदर घबराहट बढ़ रही है। उसके ओंठ स्वतः प्रार्थना करने लगे। उसने धैर्य, शांति और शक्ति के लिए प्रार्थना की, और उसने प्रार्थना की कि उसे उसका कॉन्टैक्ट लेंस मिल जाए। यही प्रार्थना करती हुई वह धीरे-धीरे चट्टान की चोटी तक  पहुंच गई। वहाँ उसके साथियों ने उसके लेंस को उसकी आंख और कपड़ों पर ढूंढा। लेकिन लेंस को नहीं मिलना था, नहीं मिला। हालाँकि अब वह शांत थी क्योंकि वह चोटी तक पहुँच चुकी थी, लेकिन वह दुखी भी थी क्योंकि वह पहाड़ों की श्रृंखला के पार स्पष्ट रूप से कुछ नहीं देख पा रही थी।

          उसने फिर से भगवान से प्रार्थना की... “हे ईश्वर, आप इन सभी पहाड़ों को देख सकते हैं। आप हर पत्थर और पत्ते को जानते हैं, और आप ठीक-ठीक जानते हैं कि मेरा कॉन्टैक्ट लेंस कहाँ है। कृपया मेरी मदद करें।” थोड़ी देर बाद, पर्वतारोहियों का दूसरा दल शीर्ष पर पहुंच गया। उनमें से एक चिल्लाया, 'अरे! क्या तुमलोगों में से किसी का कॉन्टैक्ट लेंस खो गया है?’

          सब अचंभित रह गये! यह हुआ कैसे?  यह काफी चौंकाने वाला किस्सा था। हाँ, किस्सा क्योंकि यह किसी भी अवस्था में सत्य नहीं हो सकता था। हुआ क्या? पर्वतारोही ने इसे क्यों और कैसे देखा? एक चींटी चट्टान के नजदीक एक टहनी के ऊपर, इस कांटैक्ट लेंस को लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी! उसी अवस्था में उसकी उस चींटी पर नजर पड़ी और उसने उसे वहाँ से उठा लिया।

           कथा यहाँ समाप्त नहीं होती है। क्योंकि इसके बाद जो हुआ वह यकीनन कहानी नहीं घटना है। विचित्रा के पिता एक व्यंगकार हैं।  जब विचित्रा ने उसे चींटी, प्रार्थना और कॉन्टैक्ट लेंस की अविश्वसनीय कहानी सुनाई, तो उन्होंने उस कॉन्टैक्ट लेंस को पकड़े हुए एक चींटी का कार्टून बनाया और लिखा, 'हे भगवन, मुझे नहीं पता कि आप क्यों चाहते हैं कि मैं यह चीज़ ले जाऊं। मैं इसे नहीं खा सकती, और यह बहुत भारी भी है। लेकिन अगर आप मुझसे यही चाहते हैं तो मैं इसे आपके लिए लेकर आऊंगी।"

 

          मुझे लगता है कि यह हम सभी के लिए एक अति प्रभावशाली प्रार्थना होगी, "हे भगवन!, मुझे नहीं पता कि आप क्यों चाहते हैं कि मैं यह बोझ उठाऊं, यह कष्ट झेलूँ, दुख सहूँ, मुझे इसमें कोई अच्छाई नजर नहीं आती और यह बहुत कष्टप्रद भी है। लेकिन, अगर आप चाहते हैं कि मैं इसे उठाऊं, सहूँ, झेलूँ, तब, यह मैं करूँगा। मुझे कोई शिकायत नहीं"।

 

         भगवान योग्य लोगों को नहीं बुलाते, वह जिन्हें बुलाते हैं उन्हें योग्य बनाते हैं।

 

          सामान्य जीवन में प्रार्थना ईश्वर के साथ मानवीय संबंध के प्रमुख तत्वों में से एक है और अक्सर इसका उत्तर दिया जाता है लेकिन हमेशा नहीं; जब इसका उत्तर नहीं दिया जाता है तो धार्मिक व्यक्ति ईश्वर में अपना विश्वास बनाए रखता है और समझता है कि उत्तर देना ईश्वरीय इच्छा नहीं थी।

 

          निःसंदेह सभी प्रार्थनाएँ नहीं सुनी जातीं - यदि सभी की प्रार्थनाएँ सुनी गईं, चाहे वे कितनी ही सच्ची क्यों न हों, तब दुनिया वर्तमान से भी ज्यादा विनाशकारी होती। जैसे हर ईश्वरीय प्रार्थना हमेशा तुरंत नहीं सुनी जाती है, वैसे ही, आस्था भी हमेशा तुरंत उचित नहीं होती है। एक चीनी कहानी में, एक देवता को किसी भक्त पर क्रोध आ जाता है, तब वह उसे श्राप देता है "तुम्हारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया जाए"। यानी सभी मानवीय प्रार्थनाओं का सुना जाना वरदान नहीं अभिशाप है।

 

 श्रीअरविंद कहते हैं :

जहाँ तक प्रार्थना का प्रश्न है, कोई कठोर नियम नहीं बनाया जा सकता। कुछ प्रार्थनाओं का उत्तर दिया जाता है, सभी का नहीं। आप पूछ सकते हैं कि फिर सभी प्रार्थनाओं का उत्तर क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? लेकिन सही प्रश्न है उन्हें क्यों दिया जाना चाहिए? यह कोई मशीनरी नहीं है: स्लॉट में प्रार्थना डालें और अपना अनुरोध प्राप्त करें। इसके अलावा, उन सभी विरोधाभासी चीजों पर विचार करते हुए जिनके लिए मानव जाति एक ही क्षण में प्रार्थना कर रही है, यदि ईश्वर को उन सभी को प्रदान करना पड़ा तो वह एक अजीब स्थिति में होगा; यह चल नहीं सकता।  प्रार्थना में जो महत्वपूर्ण है, वह प्रतिक्रिया नहीं बल्कि संबंध है, निरंतर प्रार्थना हमें अपने भीतर के ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत और अंतरंग संबंध विकसित करने में मदद करती है। यदि प्रार्थनाओं का उत्तर दिया जाता है, तो ठीक है। यदि उनका उत्तर नहीं दिया जाता है तो हम कहते हैं "मेरी नहीं, तेरी इच्छा पूरी हो" इस विश्वास के साथ कि वह हमसे बेहतर जानता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है।  

 

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शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

जीविका और जीवन

 जीविका और जीवन

          अच्छी से अच्छी परिस्थिति में भी एक महा दुखी है और दूसरा बुरी से बुरी परिस्थिति में भी सुखी है। राम और दशरथ एक ही परिस्थिति में हैं – एक दुख में प्राण त्याग करता है और दूसरा मुदित मन से वन-गमन करता है। आज हम सुखी हैं क्योंकि कोई भी छोटी बात हमारे मन में रुकी नहीं। छोटी बात ही हमें दुखी करती है।



          जिस आचरण से हमारा मंगल हो उसे मंगला चरण कहते हैं। जैसे-जैसे हमारी बाहरी भूख कम होती जाती है हमारी अंदर की भूख बढ़ने लगती है। हम तैयार होते हैं – मृत्यु के लिए नहीं बल्कि यह जानने के लिए कि मृत्यु होती ही नहीं। हमें यम नहीं ब्रह्म दिखने लगता है।

          आज 50 का वेतन मिल रहा है। एक दिन अचानक बताया जाता है कि अगर यह कार्य दो महीने में पूरा कर लेते हैं तब 125 का वेतन मिलेगा। और हम आनन-फानन में मनुष्य से बैल बन जाते हैं और कोल्हू के बैल की तरह चक्कर लगाने लगते हैं। 125 का वेतन हो गया  – तब और कम समय में और ज्यादा काम, और ज्यादा वेतन। यानी बैल बने रहिए। 50 में सुखी जीवन जी रहे थे, अब अगर वापस उसी 50 पर आ भी जाएँ तो.... सुख नहीं दुख ही मिलेगा। यानी बैल बने रहिए, निजात नहीं है। यह वह चक्र है जो कभी समाप्त नहीं होता, जीवन समाप्त हो जाता है।  हम लगातार भविष्य का अहम खरीदते रहते हैं। नया-नया अहम, नये-नये ऊंचे मूल्यों पर।

          अध्यात्म की एक बड़ी विचित्रता है। मार खाना भी सत्संग हो सकता है। रामायण में प्रसंग है। हनुमान वायु मार्ग से लंका पहुँच गये। लंका में  प्रवेश करने की विधि खोज रहे हैं। द्वार पर लंकिनी रास्ता रोके खड़ी है। कोई रास्ता न पाकर लंकिनी को मुष्टिका प्रहार करते हैं। प्रहार से लंकिनी को मूर्छा आ गई, रक्त निकल आया। लेकिन मूर्छा से उठी तो न आह किया-न ओह, न क्रोध आया। हनुमान ने भी कुछ कहा नहीं। लेकिन उठते ही लंकिनी ने कहा ‘बड़ा सत्संग हुआ’। मुष्टिका प्रहार ने उसे जगा दिया, उसे झकझोर दिया। अगर आप सजग हैं तो विपरीत परिस्थिति में भी अच्छा सत्संग हो सकता है।  हनुमान के उस प्रहार ने उसके अहंकार का नाश किया और यह समझ आई कि लंका के अहंकार के नाश का समय आ गया है। अगर यह सत्संग नहीं तो फिर किसे सत्संग कहेंगे?

          कोई खिलाना चाहे और हम न खाएं तो उसके खिलाने की चाह कम होने लगती है। कोई सहायता करना चाहे और हम उसकी सहायता न लें तो उसकी सहायता करने कि चाह कम होने लगती है। संबंध तब बनता है जब दोनों तरफ प्यास लगती है। अतः यह आवश्यक है कि कभी-कभी भूख न रहने पर भी खाएं, जरूरत न होने पर भी सहायता लें। इससे सिर्फ आपसी संबंध ही नहीं बनते बल्कि समाने वाले की खिलाने और सहायता करने की प्रवृत्ति को भी सहारा मिलता है। क्या यह सत्संग नहीं है?

          बाजार से लाई हुई मूर्ति-फोटो को रोज-रोज नहलाने, शृंगार करने, खिलाने से हम उसमें प्राण फूँक देते हैं। हमें हठी होना पड़ेगा। शिव ने सती का त्याग किया, उसे बगल में नहीं सामने बैठने कहा। लेकिन पार्वती की प्यास ने उन्हें मजबूर कर दिया, उन्हें भी अपने संकल्प का त्याग कर पार्वती को बगल में स्थान देना पड़ा।  

          यह मेरी जिंदगी है, इस पर मेरा अधिकार है! क्या यह आपकी है। जिस जिंदगी को अपनी इच्छा से प्रारम्भ नहीं कर सकते, जिस जिंदगी को आप अपनी इच्छा से समाप्त नहीं कर सकते, वह कितनी आपकी है? हमारे इस जीवन में अपरिमित शक्ति है, उसे हम संभाल ही नहीं पाते। अतः अपनी उस अपरिमित शक्ति को ईश्वर से जोड़ दीजिये, अपने से नहीं। वह हमारी शक्ति को संभाल सकता है।  

          दो प्रकार की संस्थाएं विश्व भर में हैं, हर देश में, हर शहर में, हर कस्बे में। एक सिखाती है जीवन और दूसरी सिखाती है जीविका। विशेष बात यह है कि जीवन सीखने वाली संस्थाएं जीविकोपार्जन भी सिखाती है, लेकिन जीविका सिखाने वाली संस्थाएं जीवन जीना नहीं सीखतीं। कभी जीवन सिखाने वाली संस्थाएं ही थीं, उससे ही दोनों, जीवन और जीविका, चल जाती थीं। लेकिन जैसे-जैसे लालच बढ़ा जीवन सीखने वाली संस्थाएं चाहरदीवारी में घिरने लगीं और जीविका सीखने वाली संस्थाएं बाजार में आ गईं। जीवन सिखाने वाली संस्थाओं को धार्मिक संस्था, आश्रम, धर्मस्थल, वृद्धों का घर, आदि नाम दिये गए हैं। उन्हें मिटाने के लिए पूरा प्रयत्न करने के बाद भी वे फल-फूल रही हैं क्योंकि जीना तो है ही और जीना तो वही सिखाती है। जीविका सिखाने वाली संस्थाएं  तो मानव को बैल बना रही हैं। 6-7 अंको वाली नौकरी तो बीते समय की बात हो गई है अब तो बातें 8-9 अंकों वाली नौकरी की होती है। कितनों को यह वेतन मिलता है? कक्षा में प्रथम कितने विद्यार्थी आते हैं? क्या बाकी का जीवन व्यर्थ है?

          जीवन सिखाने वाली संस्थाओं को आपका जीवन (समय) चाहिए और जीविका सिखाने वाली संस्थाओं को आपकी जीविका (धन) चाहिए। और यह धन भी 7-8 अंकों की। कम अंकों की शिक्षा से तो कुछ मिलने वाला नहीं सिर्फ पसीना बहाते रहिए। बड़ी शिक्षा लेकर बड़ी जीविका चाहिए तो कर्ज लीजिये, कर्ज यानी गुलामी। यह एक नया चक्र-व्यूह है, जिसमें अंदर जाने का तो रास्ता है लेकिन निकलने का ........?  

 ‘गोलमाल’ के गाने के ये पंक्तियाँ याद आ रही है। - 

          गोल माल है भइ सब गोल माल है, हर सीधे रस्ते की एक टेढ़ी चाल है

                    भूख रोटी की हो तो पैसा कमाइये, पैसा कमाने के लिये भी पैसा चाहिये
                              गोल माल है भइ सब गोल माल है, हर सीधे रस्ते की एक टेढ़ी चाल है

          जीवन बनाना और जीविका बनाना दो अलग-अलग चीजें हैं। हम प्रायः जीविका बनाना ही जीवन बनाना मान लेते हैं और पूरी गड़बड़ी यहीं से हो जाती है। जीविका बाहर का अस्तित्व है और जीवन अपने भीतर का। सुदामा की, राम की जीविका अच्छी नहीं थी लेकिन जीवन अच्छा था। रावण की जीविका अच्छी थी लेकिन जीवन नहीं।  जीविका अच्छी हो तो आवश्यक नहीं की जीवन अच्छा होगा लेकिन अगर जीवन अच्छा होगा तो जीविका की परवाह नहीं होगी।  

          पहले अकाल आता है, पीछे सुकाल। पहले लू की जलती हुई हवाएं आती हैं, फिर बरखा की ठंडी फुहार। पहले भूख आती है, फिर रोटी। पहले रात आती है, पीछे दिन। प्रकृति का यही नियम है और कायदा भी। जीवन अच्छा बनाइये और धीरज रखिए। जीविका अच्छी बनाने के लिए धन चाहिए और जीवन अच्छा बनाने के लिए समय और अनुभव।

          पौष्टिक आहार का फैशन है और पौष्टिक विचार का अकाल। पौष्टिक विचारों का सावन लाइये और फिर जीवन को फलता-फूलता देखिये।  

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शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

सूतांजली अगस्त 2023


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शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

दिल की धड़कन

 

(आपके शरीर में एक दिल भी है जो धड़कता है। उसका धड़कना काफी नहीं है। यह जरूरी है कि जो भी आपसे मिले उसे लगे कि आपका दिल धड़कता है। एक धड़कना, जीवन की निशानी है और दूसरा, ईश्वरीय अंश की। पहला जब तक धड़कता है तब तक आप जीवित हैं उसके बाद केवल “बॉडी” (body), और दूसरा आपके इंसानियत की और आपके जाने के बाद दूसरों के दिल को धड़काता रहता है। समझते हैं इस कथन को एक घटना से।)  



          रात काफी हो चुकी थी और पहाड़ी इलाके में गंतव्य नगर पहुंचने के बाद हम रात्रि विश्राम के लिए किसी होटल की तलाश में थे। आश्चर्य हुआ कि इस इलाके के प्रायः सभी होटल और लॉज के दरवाजे बंद थे, और रास्ते भी प्रायः निर्जन। हम एक जगह से दूसरी जगह एक दिशा में आगे बढ़ते रहे। इस बीच एक बाईक पर सवार दो युवक ज़रूर दिखे जो हमारी गाड़ी का पीछा करते  प्रतीत हो रहे थे और हमें रुकने का इशारा भी कर रहे थे। हम थोड़े आशंकित हुए। लेकिन हमारी आशंका तब निर्मूल साबित हुई जब गाड़ी रोकने के बाद उनकी बातों से हमें ऐसा लगा कि उन लोगों ने दरअसल हमें कहीं दूर से ही होटल की तलाश करते परेशान हाल देख लिया था।

          वे लोग अपने घर में ही होटल का छोटा-मोटा कारोबार चलाते थे और चाहते थे कि हमलोग उनके साथ चलकर रहने का कमरा देख लें और पसंद आ जाए तो वहीं रुक जाएं। हम बुरी तरह थक चुके थे और हमें तुरंत आराम की ज़रूरत थी। पसंद और नापसंद की बात तो तब होती जब हमारे पास आसान सा दूसरा कोई विकल्प होता। इसलिए हम उनका प्रस्ताव स्वीकार कर उनके साथ हो लिये। वे दो लोग आगे-आगे और हमारी गाड़ी उनके पीछे-पीछे। दो-तीन किलोमीटर चलने के बाद हमलोग एक संकरे रिहायशी इलाके के भीतर थे। गाड़ी एक गली के मुहाने पर खड़ी कर हमें अंदर जाना पड़ा जहां उनका एक पुराना दो मंजिला घर था। ऊपरी मंजिल के छोटे-छोटे चार कमरे उन लोगों ने पर्यटकों के लिए छोड़ रखे थे और नीचे वे लोग खुद अपने परिवार के साथ रहते थे। हमारे पहुंचते ही नीचे परिवार के लोगों के बीच थोड़ी हलचल सी हुई और दो महिलाएं भी ऊपरी मंजिल पर हमें कमरे तक ले जाने के लिए उन दोनों के साथ हो लीं। शायद वे दोनों भाई थे और वे महिलाएं दोनों की पत्नियां। ऊपर के चारों कमरे खाली थे। कमरे में एक मामूली बेड, लकड़ी की एक मेज़ और कुर्सी के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। और चारों कमरों के लिए एक ही साझा टॉयलेट बाहर बरामदे के एक छोर पर था। एक मन हुआ कोई दूसरी जगह देख ली जाए। फिर लगा एक रात की ही तो बात है, थोड़ा कष्ट ही सही, हमारे रुकने से अगर उन लोगों की भी थोड़ी मदद हो जाती है तो हमारे लिए भी संतोष की बात होगी। वैसे यह सोचकर हम उनपर कोई अहसान नहीं करने जा रहे थे। हमारी अपनी भी लाचारी कोई कमतर नहीं थी। वैसे बातचीत में उन लोगों के आग्रह का स्वर भी कुछ ऐसा था कि हम अन्य विकल्पों के बारे में सोच नहीं पाते। यह आदान-प्रदान जैसा व्यापार भर नहीं था। और उनकी तंगहाली का एक कारण शायद यह भी रहा हो, किराया पूछने पर उन्होंने जो बात कही उससे भी हमारी इस आशंका की ही पुष्टि होती थी। उन्होंने कहा- 'वैसे तो किराया पांच सौ रुपए है लेकिन आप जो भी देना चाहेंगे हमें स्वीकार होगा।'

          मैने पूछा- 'आपलोग इतनी रात गये घर से दूर निर्जन सड़कों पर क्या कर रहे थे ?"

          एक ने जवाब दिया- 'घाटी जाने वाले बहुत सारे सैलानी अक्सर रातों को यहां तक पहुंच कर होटल की तलाश में भटकते मिल जाते हैं। और इस वक्त तक बड़े-बड़े होटलों के व्यवसायी प्रायः अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। इस तरह वे जो छोड़ देते हैं वही हमारी छोटी-मोटी कमाई है। हम इन्हीं होटलों के आसपास ग्राहकों की तलाश में रोज़ रात के इस वक्त भटकते हैं।'

          उसके भीगे स्वर के आरोह-अवरोह से मुझे महसूस हुआ कि यह युवक बहुत ही संवेदनशील है। अपनी बेबसी को लेकर बेहद सजग और संजीदा भी। और इस वक्त मेरे कुछ भी कहने पर शायद रो पड़े। इसलिए मैं पूरी संजीदगी से बस उसे सुनता रहा। ...लेकिन उसके चेहरे की चमक में हस्तक्षेप करते कृतज्ञता के भाव को देख मैं थोड़ा - निराश भी हुआ।

          रात के करीब डेढ़ बजे एक अजनबी शहर में अजनबी लोगों के साथ बिल्कुल अनौपचारिक घरेलू माहौल में इस तरह चाय पीते हुए अचानक मुझे एक अहसास-सा हुआ कि ज़रूरतमंदों की मदद करना बहुत नेकी का काम हो सकता है लेकिन इस बाबत अगर हमारे भीतर श्रेष्ठता-बोध, या जिसकी मदद की गयी है उसके भीतर हीनता-बोध जैसी कोई सुगबुगाहट होने लगी हो तो सहायता करने में अवश्य कोई कमी रह गयी है। निस्पृह और निर्विकार सहायता करना सब लोगों के वश की बात नहीं।  

          हम तो आज अपनी ही बनायी एक ऐसी हिंसक और आत्म- मुग्ध दुनिया में रहने के आदि हो गए हैं जहां एक तरफ पूरा-का-पूरा जंगल तो हम रात के अंधेरे में बिना किसी शोरगुल के काट लेते हैं, लेकिन दूसरी तरफ एक अदद पौधा भी रोपने जब कहीं निकलते हैं तो पूरा लाव-लश्कर हमारे साथ होता है और कई कोणों से उस दृश्य की तस्वीर भी उतरवा लेते हैं कि सुबह-सुबह चाय के साथ, अखबारों में छपा अपना चेहरा देख मुस्कुराते रहें। पूरे पर्यावरण में व्याप्त अश्लील आत्म-मुग्धता, आत्म-प्रचार, और मुफलिसी में जीते वंचित समाज के प्रति खाए-अघाए लोगों की आपराधिक हृदय हीनता जैसे भयावह प्रदूषण के बीच भी हमें निस्पृह और निर्विकार मदद करने वाले लोगों के दर्शन हो जाते हैं।

          ऐसे हृदय-विहीन दुनिया में भी हृदय-वान लोगों की कमी नहीं। जहां एक तरफ ऐसे लोग हैं जिनका दिल केवल इसलिए धड़कता रहता कि वे कहीं बॉडी न बन जाएँ तो ऐसे दिल भी हैं जिनमें ईश्वरीय अंश हैं। आत्म-मंथन कीजिये, आपके हृदय में कौन-सा दिल धड़क रहा है।

(योगेन्द्र यादव के संस्मरण पर आधारित)

(...उन्होंने कहा- 'वैसे तो किराया पांच सौ रुपए है लेकिन आप जो भी देना चाहेंगे हमें स्वीकार होगा।'… जब कोई  भुगतान की राशि आपके ऊपर छोड़ देता है, तो उसकी मजबूरी का फायदा न उठाएँ, उसे उसकी अपेक्षा से ज्यादा दें, उसके  होठों की मुस्कान को अपनी मुस्कान बनाएँ। वह आप में ईश्वर के दर्शन कर रहा है, उसे ईश्वर बन कर दिखाएँ।  एक पौधे को लगाने की नकली मुस्कान ओढ़ने के बजाय एक जंगल को बचाने की असली मुस्कुराहट चेहरे पर लटकाएँ। उसे यह अहसास कराएँ कि आपके अंदर एक ईश्वरीय हृदय धड़क रहा है।)

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

इंसानियत के सात दिन

                                                               देना ही पाना है  


 
टाइम्स ऑफ इंडिया, कोलकाता प्रकाशन, 16 मई 2023। एक विशेष और महत्वपूर्ण खबर छपी। न न न न...., आप गलत सोच रहे हैं, यह न मोदी के बारे में है न बीजेपी के बारे में, न गांधी परिवार के बारे में न विपक्ष के बारे में, न खिलाड़ी के बारे में न फिल्मी हस्ती के बारे में, न अरबपतियों के बारे में न विश्व की बड़ी हस्तियों के बारे में। बल्कि यह खबर है पूना की एक सॉफ्टवेर कंपनी “Icertis” के बारे में। कैसे इस कंपनी ने अपने कर्मचारियों को बताया कि वे सिर्फ न तो कर्मचारी है, न मालिक, न मानव बल्कि इंसान हैं। वे क्या, किसे, कैसे कुछ दे सकते हैं? कैसे इस कंपनी ने अपने कर्मचारियों को इसकी प्रेरणा दी, जानकारी दी। इंसानियत की दुनिया से रूबरू होने का मौका दिया।

          लेकिन इसके पहले जानिए एक छोटी सी घटना :

          एक धनाड्य महिला अपनी जिंदगी से ऊब गयी थी। उसे लगने लगा कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। सज-धज कर अपने मनोचिकित्सक के पास गई और बोली डॉ साहब मुझे लगता है कि मेरा पूरा जीवन  अर्थहीन है, मेरी खुशियाँ जैसे मर चुकी हैं, क्या आप मेरी खुशियाँ ढूंढने में मदद करेंगे? एक बारगी मनोचिकित्सक मौन हो गया, लेकिन फिर उसने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला मैं तो यह नहीं बता सकता कि आपकी जिंदगी में खुशियाँ कैसे आयेगी लेकिन यह औरत तुम्हें बतायेगी कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। आप उसे ध्यान से सुनें और विचार करें क्या आपकी खुशी भी लौट कर आ सकती है?

          वह वृद्ध औरत बताने लगी - मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके ३ महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी। मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था। मैं दिन रात स्वयं के जीवन को समाप्त करने की तरकीब सोचने लगी थी। तब एक दिन एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया। जब मैं काम से घर आ रही थी, बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।

          उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई। तब मैंने सोचा यदि इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करने से मुझे इतनी खुशी मिल सकती है तो हो सकता है कि दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी खुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी के लिए, जो कि बीमार था, कुछ खाने का बना कर ले गई। वह बहुत खुश हुआ और मुझे भी खुशी मिली। फिर मैं हर दिन कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिसमें दूसरों को खुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे खुशी मिलती थी।

          आज मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को खुशी देकर।  यह सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी। लेकिन उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।

          तब, अब बताता हूँ टाइम्स ऑफ इंडिया की उस खबर के बारे में जिसकी मैंने चर्चा की थी। इस कंपनी ने एक विशेष अभियान प्रारम्भ किया है अपने कर्मचारियों के लिए। अभियान का नाम है “इंसानियत के 7 दिन” (7 Days for Humanity)। इस अभियान के तहत कंपनी का कोई भी कर्मचारी एक वर्ष में 7 दिन की सवैतनिक छुट्टी (paid holiday) ले सकता है। इन सात दिनों में उसे अपने मन-मुताबिक किसी भी प्रकार की स्वयंसेवा (volunteering) करनी होगी। यही नहीं इस कार्य में वे जितना खर्च करेंगे कंपनी भी बराबर की धन राशि की सहायता करती है।  

          मित्रों हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं। तो आइये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।

          रोहन सोमन, कंपनी के सहयोगी निर्देशक यह मानते हैं कि समाज को वापस देने का हर अवसर - बड़ा हो या छोटा - "हमें मनुष्य के रूप में हमारे उद्देश्य की याद दिलाता है। मैं आइसर्टिस का हिस्सा बनकर खुश हूं, जो अक्सर हमें व्यवसाय से पहले स्वयं, परिवार और समुदाय की देखभाल करने की हमारी जिम्मेदारी के चार चक्रों की याद दिलाता है।” वे आगे कहते हैं कि “द सोसाइटी फॉर डोर स्टेप स्कूल” (DSS) के साथ काम करने के क्षण अविस्मरणीय हैं। अपने समुदाय को वापस देने का अनुभव और स्कूली बच्चों की आंखों में खुशी देखना बेश-कीमती है।"

          मित्रों यह बहुत महत्वपूर्ण है अतः मैं फिर से दोहरा रहा हूँ हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं। तो आइये आज शुभारम्भ करें इस संकल्प के साथ कि आज हम भी किसी न किसी की खुशी का कारण बनें।     

          मैं फिर कहता हूँ – देना ही पाना है।

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शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

सूतांजली जुलाई 2023

 



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शुक्रवार, 16 जून 2023

‘माँ’ जैसी मैं


 

(कुछ तो होती हैं कहानियाँ, कुछ घटनाएँ और कुछ आपबीती। अब कही गई बात इन तीनों में से क्या है यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या आपने वैसा क्षण जिया है या आपने ऐसा  देखा है या आपको इसका कोई अहसास ही नहीं है। तो फिर, अब यह ‘प्रीति’ की आपबीती है, या घटना है, या कहानी है? यह तो या तो प्रीति ही बता सकती है या शायद आप ही तय कर करें, मैं नहीं बता सकता। लेकिन हाँ मैं यह जरूर कह सकता हूँ कि मैंने इसे एक लंबे समय तक होते देखा है, और आज भी देख रहा हूँ, लेकिन क्या अब आगे देख सकूँगा.......?)   

          माँ अक्सर ही अपनी रोटियां जल्दी में बनाया करती थीं। सब को गरमागरम, मुलायम, घी लगी रोटियां परोसने के बाद कभी अध-सिकी, अध-पकी, कभी जली हुई, कभी दो तो कभी उतने ही आटे से बनी एक मोटी रोटी पास ही तश्तरी में रख ली जाती। उसके बाद चूल्हा साफ किया जाता, फिर प्लेटफॉर्म, उसके बाद आंचल से हाथ पोंछते हुए उसी तश्तरी में सब्जी, चटनी, सलाद सारी घिच्च-पिच्च करके और एक कटोरी में दाल ले, जैसे-तैसे खाना निबटाया जाता। पापड़ अपने लिए तो कभी सेका ही नहीं, किसी-न-किसी का बचा हुआ, ढीला, सीला खाकर ही संतुष्ट हो जातीं। बहुत चिढ़ हुआ करती थी मुझे कितनी बार गुस्सा भी किया, कई बार उठकर उनके लिए दूसरी रोटी बना लाती, पर वो हमेशा यही कहतीं, 'अरे... मेरा तो चलता है, स्वाद तो वही है न।' मैं पलटकर कहती... अगर स्वाद वही है, तो कल से हम सभी को भी वैसी ही रोटी बनाकर दो।' वो निरुत्तर हो जाती, गर्दन को एक झटका दे हंसने लगतीं। कभी-कभी मुस्कुराकर कह भी देती थीं, जब माँ बनोगी, तब समझोगी।' मैं झुंझला जाती और चिल्लाती।'

          पर चिल्लाने से क्या होता है... शादी हुई, ससुराल आई। आम भारतीय नारी की तरह जीवन चलने लगा। पूज्य ससुर जी के निधन के बाद हम सासू-माँ के साथ हमारे शहर में रहने लगे। एक दिन अचानक ही कुछ बात चली और उन्होंने मुझे कहा... 'तू मेरे लिए कुछ स्पेशल न बनाया कर, मैं तो सुबह का बचा भी खा लेती हूँ। उस दिन बहुत दिल दुखा मेरा, और मैंने उन्हें कहा... 'आप घर की सबसे बड़ी हैं और विशिष्ट भी आपके लिए कुछ करना मुझे अच्छा लगता है, करने दीजिए।' वो हैरान हो मेरा चेहरा देख रही थीं, पर उन्हें ये सुनकर कहीं प्रसन्नता भी हुई थी, उनकी आंखों की नम कोरें इसका प्रमाण थीं।

          उन्हीं दिनों मेरा भाभी जी (जेठानी जी) के यहाँ भी जाना हुआ। वहाँ भी मिलता-जुलता दृश्य... भाभी बच्चों की प्लेट में ही अपना खाना लगा लिया करतीं और उनके प्लेट में बचे-खुचे के साथ थोड़ा और परोसकर भोजन शुरू कर देतीं। कई बार ऐसा भी होता कि कुछ बचा होता... तो बच्चों को कहतीं... इधर दे जाओ, मैं खा लूंगी।' मुझसे रहा नहीं गया और मैंने तुरंत ही कहा... 'भाभी, आपका खाना तो हो गया था, फिर आपने क्यों लिया?' उनका जवाब था, 'अरे, फेंकना पड़ता, बेकार जाता, सो... खा लिया।' मैंने सवाल किया.... 'आप डस्टबिन हो, जो सब का बचा-खुचा आपको ही समेटना है, आपको स्वास्थ्य की परवाह नहीं?' वो सोच में पड़ गई थीं। पर एक वर्ष बाद जब हम मिले, तो उन्होंने कहा कि... 'मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था इस बात पर, मेरे बढ़ते हुए वजन का एक कारण ये भी था। उन्हें खुश देख मैं और भी खुश हो गई थी। समय बीतता गया।

          पर आज कुछ ऐसा हुआ कि ये सभी यादें एक साथ ताजा हो गई। मैं खाना लेकर बैठी ही थी, बेटी जिद पर थी कि आपके ही साथ खाऊंगी। मेरे आते ही उसने रोटियां बदल लीं। मैंने उसके हाथों से छीनने की बहुत कोशिश की, पर वो नहीं मानी। उसके चेहरे पर वही चिढ़ थी और आंखों में वैसा ही दुख! सच में बहुत ही बुरा लगा मुझे! आंखें नम हैं, वक्त के साथ पता ही नहीं चला कि कब मेरी बेटी बड़ी हो गई और मैं 'माँ' जैसी!

          यह केवल खुद रूखा-सूखा खा कर परिवार को अच्छा गरम खाना देना तक सीमित नहीं है बल्कि यह है खुद कष्ट उठा कर भी दूसरे के सुख का ध्यान रखना है।

(पिछली बार मैंने लिखा था ‘अपना कर्ज चुकाया’, यही है अपना असली कर्ज चुकाना और इसकी शिक्षा उपदेश से नहीं उदाहरण से ही दी जा सकती है। याद रखिये आपने दिया तभी आपने पाया।

(प्रीति एक गुजरात में रहने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता व ब्लॉगर हैं)

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