रविवार, 12 अप्रैल 2015

बूंद-बूंद विचार - प्रथम


समाचार पत्रों की कहें या  टेलीविज़न की, कोई दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन किसी बलात्कार का समाचार पढ़ने या सुनने को नहीं मिलता।
  •         साधारणतया एक ही समाचार होता है।
  •         तो क्या वर्ष में ३६५ घटनाएँ ही होती हैं।
  •         नहीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सूचित अपराधों की संख्या इससे कई गुना    ज्यादा है और असूचित की तो और भी ज्यादा।
  •       अच्छा! तो मीडिया ने शायद कोटा निर्धारित कर रखा है। एक दिन में एक।
  •     लेकिन फिर इस प्रकार के वारदातों पर हमारी अदालतों से भी तो रोज कम से  कम एक फैसला आता ही होगा?
  • शायद इन फैसलों का समाचार बिकाऊ नहीं होगा!
  •         यह भी हो सकता है कि ज़्यादातर फैसले अपराधी के पक्ष मे हों !
  •         या फिर अपराधी “इज्जतदार” या “पहुँच” वाला हो?
  •         ऐसा कुछ नहीं है, ऐसे मामलों में फैसले आते ही नहीं।
  •         क्यों नहीं आते?
  •         या तो “तारीख” पर “तारीख” पड़ती रहती है या पीड़ित पक्ष से बलात समझौता  करवा लिया जाता है।
  •         मतलब?
  •  अभिभावक या पीड़िता को डरा-धमका  कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है या “नगद” भुगतान कर दिया जाता है।
  •         लेकिन यह दोनों ही तो गैर कानूनी है और इससे तो अपराधी और अपराध को दोनों बढ़ावा ही मिलेगा।
  •         तब भी दो दिन में एक फैसला तो आना ही चाहिए।
  •         अगर फैसले नहीं आते तो दोष प्रशासन का है या न्याय व्यवस्था का।
  •         अगर फैसले आते हैं तो दोषी मीडिया है।
  •         मीडिया दोषी क्यों?
  •         अगर आप वारदात की खबर देते हैं लेकिन अंतिम अंजाम की नहीं तो आप वारदात को बढ़ावा देते हैं।
  •         वारदात के साथ-साथ एक फैसले का समाचार भी क्या मीडिया नहीं बता सकती?

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