शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

साध्य से ज्यादा साधन का महत्व

 गुरु के द्वारा निर्दिष्ट साधन ही परिपक्व और फलप्रद हो सकता है। पाँच-छ: मनुष्य हैं। उन सब को एक ही रोग है, उसके लिये जुलाब लेना आवश्यक है। वे पंसारी की दुकान पर जाकर पूछते हैं कि 'भाई! जुलाब के लिये क्या लेना चाहिये?' वह कहता है कि नमकीन आँवला बहुत अच्छा रहेगा। दूसरी दुकान पर जाकर पूछते हैं तो वह कहता है कि हर्रे  अच्छी रहेगी। तीसरा दुकानदार कहता है कि नौसादर अच्छा रहेगा। चौथा कहता है कि विलायती नमक अच्छा रहेगा । झण्डू की दुकान पर पूछने से वह कहता है कि अश्वगन्धा ले लो, वायु कुपित हो गया है।

          ऐसी अवस्था में वे निश्चय नहीं कर पाते कि कौन-सा जुलाब लें और उनको निराशा हो जाती है। इतने में एक चतुर मनुष्य कहता है, 'भाई! उदास क्यों होते हो? चतुरलाल वैद्य के यहाँ चलो और वे जैसा कहें, वैसा करो।' वैद्यराज प्रत्येक की प्रकृति की जाँच करके किसी को हर्रे, किसी को नौसादर तथा किसी को नमकीन आँवला, किसी को विलायती नमक का नुस्खा बताते हैं और उससे प्रत्येक को लाभ होता है।


          

इसी प्रकार हम सब लोग एक ही रोग से पीड़ित हैं। व्याधि महाभयंकर है, उसका नाम है भव-रोग। निदान तो ठीक है, परंतु चिकित्सा में भूल होने से मृत्यु निश्चित है। यहाँ मृत्यु का अर्थ एक बार मरना नहीं है, बल्कि अनन्त मृत्यु के चक्कर में भटकना है। 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति।' अतएव सद्गुरुरूपी सद्वैद्य के पास जाना चाहिये और उनकी बतलायी हुई औषधि का सेवन तब तक करना चाहिये, जबतक व्याधि निर्मूल न हो जाये। इसमें असावधानी करने से रोग दूर नहीं हो सकता।

          भारत और पाकिस्तान एक साथ आजाद हुए। लेकिन आज इतने वर्षों बाद भारतीय गूगल्स माइक्रोसॉफ़्ट, पेप्सिको, जैगुआर, लैंड रोवर आदि अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के प्रमुख हैं जबकि पाकिस्तान तालिबन, अल-केदा, जम्मात उ दावा, हिजबल मुजाहिदीन आदि का जन्मदाता और पनाहगार है। भारत चाँद और मंगल तक पहुँच रहा है जबकि पाकिस्तान भारत में प्रवेश करने की कोशिश में लगा है। दोनों के उद्देश्य एक ही हैं, लेकिन दोनों ने अलग-अलग साधन अपनाए, स्वतन्त्रता प्राप्ति के भी और उन्नति के भी, और दोनों का परिणाम भी अलग-अलग है।

          विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, "उच्च आय वाले देश में गहन देखभाल इकाइयों में लगभग 30% रोगी कम से कम एक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े संक्रमण से प्रभावित होते हैं"। ये संक्रमण अक्सर एंटीबायोटिक दवाओं के अनुचित या अधिक उपयोग के कारण होते हैं। 20वीं सदी में शोधकर्ताओं ने एंटीबायोटिक्स की खोज की थी।

          हमें कभी-कभी यह सोचने की आवश्यकता होती है कि क्या हमें एक विशेष किस्म की अनुसंधान पद्धति को विकसित करना चाहिए।  (द वीक , 30 जून 2019)

            क्या कारण है कि नए-नए अनुसन्धानों, खोजों, दावों के बावजूद प्रायः हर रोग अविरल गति से बढ़ रहे हैं? यही नहीं बल्कि नए-नए रोग भी ईजाद हो रहे हैं? कहीं हमारे साधन में बड़ी त्रुटि तो नहीं? हमें अपने तरीकों को बदलने की आवश्यकता तो नहीं?

          केवल लक्ष्य का महान या पवित्र होना यथेष्ट नहीं होता, लक्ष्य को पाने का साधन भी सटीक होना आवश्यक है। सटीक साधन के अभाव में लक्ष्य प्राप्त होने पर भी उसका फल तिरोहित हो जाता है। अतः जितना महत्व लक्ष्य का है उतना ही उसे पाने के साधन का, मार्ग का भी है। अल्पज्ञानी का ध्यान केवल लक्ष्य पर ही केन्द्रित रहता है लेकिन विद्वजन लक्ष्य के साथ साधन की सटीकता का भी पूरा ध्यान रखते हैं।  

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https://youtu.be/etTjpu0fiMA

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

मुजिका और शास्त्रीजी की सरलता और सादगी

 (उरुग्वे के राष्ट्रपति मुजिका को पूरा विश्व जानता है लेकिन अपने प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से, जो केंद्रीय मंत्री और फिर प्रधान मंत्री रहे, कितने लोग परिचित हैं? उन्होंने एक सादगी पूर्ण सरल जीवन ही व्यतीत  किया। अब दशकों बाद उनके अनेक किस्से एक-एक कर सामने आ रहे हैं। यह विचारणीय है कि देश, क्यों उनकी सादगी और सरलता की चर्चा नहीं करता?  क्यों हम अपने देश में ही उन्हें प्रतिष्ठित नहीं कर पाये? क्यों हमारे राजनेता, विधायक, प्रशासक उनके आदर्श को, उनकी सरलता को, सादगी को पसंद नहीं करते अतः नहीं अपनाते हैं और इस कारण उनकी चर्चा नहीं करते हैं? अगर हम ही इनकी चर्चा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा? सं.)

इंसान को मुश्किल बनाती स्थितियां हैं, तो वह हौसला भी है जो इंसान को सरल-सहज बने रहने के लिए प्रेरित करता है। भले ही असल जीवन में यह क़िस्से आटे में नमक के बराबर हों, लेकिन समाज को सरलता का स्वाद तो चखा ही देती हैं। ऐसा ही एक नाम एलबर्टो मुजिका का है। मुजिका उरुग्वे के राष्ट्रपति थे। दुनिया उन्हें सबसे ग़रीब राष्ट्रपति के नाम से जानती है।



          मुजिका अपने वेतन यानी 12 हज़ार डॉलर का 90 प्रतिशत हिस्सा ग़रीबों की मदद के लिए ख़र्च कर दिया करते थे। लोग उन्हें भले ही दुनिया का सबसे ग़रीब राष्ट्रपति कहती हो, लेकिन दरअसल वे दुनिया के सबसे अमीर राष्ट्रपति थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें यूं तो राष्ट्रपति भवन में रहना था, लेकिन उन्होंने अपना पुराना घर चुना। वे वहाँ अपनी पत्नी और कुत्ते के साथ रहा करते थे। उनके पास अपनी वॉक्सवेगन बीटल गाड़ी थी, जो उन्होंने 1987 में खरीदी थी, लेकिन 2010 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा। वे  मिसाल थे कि हमें अपनी जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति मुजिका कहते थे, गरीब वह है जो जीना नहीं जानता। जिसे जीने के लिए अपने अगल-बगल कबाड़ इकट्ठा करने की जरूरत पड़ती है। मुजिका ने बता दिया कि राजनीति इतनी भी मुश्किल नहीं होती है, सरल आदमी दूसरों की जिंदगी को आसान बनाता है। उसके लिए उसे साधु बनने की जरूरत नहीं है।

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बात उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय मन्त्री थे। सादगी और ईमानदारी  में शास्त्रीजी बेजोड़ थे। एक बार की बात है, प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू  ने उन्हें एक जरूरी काम से कश्मीर जाने के लिये कहा। शास्त्रीजी ने निवेदन किया कि किसी और को उनकी जगह भेज दिया जाये। नेहरूजी ने जब इसका कारण पूछा तो शास्त्री जी बोले – कश्मीर में इस समय बेहद ठण्ड पड़ रही है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है।' यह सुनकर बहुत इनकार करने के बावजूद नेहरूजी ने अपना एक कोट शास्त्रीजी को दे दिया। शास्त्रीजी ने पण्डितजी का कोट पहनकर देखा। वह बहुत लम्बा था और बहुत नीचे तक लटक रहा था। शास्त्री जी अपने एक मित्र को साथ लेकर एक नया कोट खरीदने बाजार पहुँचे। बाजार में काफी कोट देखे गये, पर मन पसन्द कोट नहीं मिला। वह या तो इतना महँगा होता कि शास्त्रीजी दाम चुकाने में असमर्थ होते या फिर उसका साइज ऐसा होता कि उनको ठीक नहीं आता। एक दुकानदार ने उन्हें एक ऐसे दर्जी का पता दिया, जो सस्ता और अच्छा कोट सिलकर दे सकता था। शास्त्रीजी अपने मित्र के साथ उस दर्जी के पास पहुँचे और एक सस्ता कोट सिलने को दे दिया। शास्त्रीजी के मित्र बोले- 'आप केन्द्रीय मन्त्री हैं। आप चाहें तो सैकड़ों कीमती कोट आपके पास हो सकते हैं, लेकिन आप एक मामूली कोट के लिये बाजार में मारे-मारे घूम रहे हैं।' शास्त्रीजी ने मुसकुराकर जवाब दिया—'भाई! मुझे इतनी तनख्वाह नहीं मिलती कि मैं कीमती कपड़े खरीद सकूँ और फिर मेरे लिये तो देश-सेवा ही सबसे बढ़कर है, जो मैं मामूली कपड़ों में भी कर सकता हूँ।'

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यह घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री भारत के गृहमन्त्री थे। शास्त्रीजी की सादगी सर्वविदित है। वे स्वयं पर अथवा अपने परिवार पर तनिक भी अनावश्यक खर्च नहीं करते थे। उनका रहन-सहन आम लोगों जैसा ही था। राष्ट्र के अति महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होने के बावजूद भी उन्होंने कभी अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया। एक बार इलाहाबाद स्थित निवास के मकान मालिक ने उनसे मकान खाली करने का अनुरोध किया, जिसे शास्त्रीजी ने तत्काल मान लिया। वास्तव में मकान मालिक को उस निवास स्थान की अति आवश्यकता थी और शास्त्रीजी स्वयं से अधिक दूसरों की जरूरतों का ख्याल रखते थे। अतः उन्होंने मकान खाली कर दिया और किराये  पर दूसरा मकान लेने के लिये आवेदन-पत्र भरा। काफी समय बाद भी शास्त्रीजी को मकान नहीं मिल सका, तो उनके किसी मित्र  ने अधिकारियों से पूछताछ की। अधिकारियों ने बताया कि शास्त्रीजी का कड़ा आदेश है कि जिस क्रम में उनका आवेदन-पत्र दर्ज है, उसी क्रम  के अनुसार मकान दिया जाये। कोई पक्षपात न किया जाये। और सच तो यह था कि १७६ आवेदकों के नाम शास्त्रीजी के पहले दर्ज थे, इसलिए देश का गृह मंत्री मकान के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षारत रहा।  इस घटना  का सार यह है कि नियम-कानून का पालन यदि साधारण लोगों के साथ विशिष्टजन भी पूरी ईमानदारी से करें तो समाज से भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जाये।

तुम मन की जेल में क्यों रहते हो...

जबकि दरवाज़ा तो पूरी तरह से खुला है।

                                                            रूमी

(आप एक बड़ी साँस लेकर सोच रहे हैं क्या स्थिति है, लेकिन मैं कर ही क्या सकता हूँ! क्या आप मुझे बताएँगे अगर आप नहीं कर सकते तो कौन कर सकता है? दर असल यह केवल और केवल आप यानी हम ही कर सकते हैं – आम जन। इस आम-जन में ताकत तो बहुत बड़ी है लेकिन हनुमान की तरह अपनी ताकत को भुला कर बैठा है। उत्तिष्ठ भारत उठो भारतीय जागो, अपनी ताकत को पहचानो।  

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https://youtu.be/oUpsHrqmwBM


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो,

चार- किताबें पढ़ कर वे भी हम जैसे हो जाएंगे

                                                                                                        निदा फाजली



वक्त बचपन को बहा ले जाता है। बचपन का जाना, जीवन से सरलता का चले जाना होता है। हम बड़े हो जाते हैं। सरल बनने की कोशिशें करते हैं, तमाम स्वांग करते हैं, आवरण ओढ़ते हैं, हजारों रुपए देकर जिंदगी जीने की कला सीखने भी जाते हैं, लेकिन नहीं बदलते। साल 2011 में लिटिल चैंप्स रियलिटी शो में एक बच्चा आया था। रूहानी आवाज के मालिक नन्हे से अजमत से जब पूछा गया कि अगर वह जीत जाएगा तो पैसों का क्या करेगा तो उसने शो में ही अपने एक और प्रतिभागी साथी का नाम लेकर कहा था, उसका मकान कच्चा है। उसके मकान को बनवाऊँगा इतनी सरलता से कोई बच्चा ही कह सकता है।

          यहाँ ईरानी डायरेक्टर अब्बास किआरोस्तामी की फिल्म 'वेयर इज दि फ्रेंड्स होम' याद आती है। फिल्म विद्यालय की कक्षा के दृश्य के साथ आगे बढ़ती है, जहाँ शिक्षक होमवर्क पूरा न करके लाने वाले छात्र को छड़ी से मारता है। अहमद को याद आता है कि उसके दोस्त की नोटबुक उसके पास रह गई है, वह उस दिन क्लास में नहीं आया, लेकिन अगले दिन आएगा होमवर्क नहीं किया होगा, तो क्या होगा। अहमद के इस दोस्त का गाँव उसके घर से दूर है, वह नोटबुक लेकर निकल पड़ता है उसे लौटाने के लिए। वह लड़के के गाँव पहुँचता है, तो पता चलता है वह कहीं और है। वह पता लेकर उसे ढूँढ़ने निकल पड़ता है, रात हो जाती है, लेकिन वह उसे ढूँढ लेता है। हम बड़े हो जाते हैं और दोस्तों के घर का पता होते हुए भी, हाथ में गूगल मैप होते हुआ भी, गाड़ी या मोटर साइकिल होते हुआ भी, नहीं पहुँच पाते। हम इतने बड़े क्यों हो जाते हैं?

         माजिद माजीदी की फिल्म 'चिल्ड्रन ऑफ हेवन।' अपनी बहन का जूता खो देने वाला अली विद्यालय की ओर से आयोजित दौड़ प्रतियोगिता  में हिस्सा लेने का फैसला करता है, क्योंकि उसे बस इतना पता है कि इनाम में उसे जूते मिलेंगे। जूते के लिए दरअसल उसे सेकेंड आना था, लेकिन वह दौड़ते हुए यह भूल जाता है और पहले नंबर पर आ जाता है। वह पहले नंबर पर आकर भी खूब रोता है, क्योंकि उसका लक्ष्य सिर्फ जूते हैं। आदमी ठीक इससे उलट करता है, वह लक्ष्य बना लेता है, पूरा करता है, वह उस लक्ष्य को पूरा करने का आनंद लेना भूल जाता है। उसका आनंद लेने की बजाय उसे फिर कुछ और चाहिए। ये कुछ और क्या है, उसे खुद को पता नहीं। वह ता-उम्र उस तक नहीं पहुँच पाता। सरलता सीखनी है तो बच्चों से सीखें, लेकिन बतौर समाज हम बच्चों से सबसे पहले जो छीनते हैं वह है उनकी सरलता।

गुलजार साहब की एक कविता याद आ रही है

 

"जिन्दगी की दौड़ में,

तजुर्बा कच्चा ही रह गया...।"

         " हम सीख न पाये 'फरेब'

         और दिल बच्चा ही रह गया...।"

                    "बचपन में जहाँ चाहा हँस लेते थे,

                    जहाँ चाहा रो लेते थे...।"

                              "पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए,

                              और आँसुओं को तन्हाई..।"

                                        "हम भी मुसकुराते थे कभी बेपरवाह, अन्दाज़ से..."

                                        देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में ..।

                                           "चलो मुस्कुराने की वजह ढूँढते हैं...

                                                   तुम हमें ढूँढो...हम तुम्हें ढूँढते हैं .....!!"

 

सरल होना, अपनी तरफ़ से अच्छे से अच्छा, और जहाँ तक हो सके श्रेष्ठ रूप से करना कितना अच्छा है; केवल प्रगति प्रकाश, सद्भावनापूर्ण , शान्ति के लिए अभीप्सा करना। तब कोई चिन्ता नहीं रहती और पूर्ण रूप से सुखी होते हैं!

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आपने भी कहीं कुछ पढ़ा है और आप उसे दूसरों से बाँटना चाहते / चाहती हैं तो हमें भेजें। स्कैन या फोटो भी भेज सकते / सकती हैं। हम उसे यहाँ प्रकाशित करेंगे।

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यू ट्यूब लिंक --->

https://youtu.be/1lpe2cYQH3U




शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

सूतांजली दिसंबर 2021

 सूतांजली के दिसम्बर अंक के ब्लॉग और यू ट्यूब का  संपर्क सूत्र नीचे है:-

इस अंक में तीन विषय, एक लघु कहानी और धारावाहिक कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी की बारहवीं किश्त है।

१। यह या वह - मेरे विचार

कौन-सा मार्ग चुनें, तपस्या का या समर्पण का? बहुधा यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इस शंका का समाधान बहुत ही सरल भाषा में एक उदाहरण के माध्यम से समझाया है।  श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, तुम बन्दर के बच्चे और बिल्ली के बच्चे, इन दोनों में से किसी एक के मार्ग का अनुसरण कर सकते हो। ……..

२। ऐ सुख तू कहाँ मिलता है ? - मेरे विचार

सुख तो हम सब चाहते हैं, लेकिन वह है कहाँ? कहाँ ढूँढे उसे? है तो हमारे अगल-बगल ही, लेकिन हमें दिखता क्यों नहीं, हमें मिलता क्यों नहीं? कैसे दिखेगा-किसे मिलेगा?

३। वाह हिंदुस्तान!  - मैंने पढ़ा

हम उन लोगों में जिन्हें अपना मुल्क, अपना धर्म, अपने संस्कार, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपना साहित्य सब घटिया लगता है। विदेशी जब इसकी आलोचना करते हैं तब हम उनसे सहमत होते हैं लेकिन जब प्रशंसा करते हैं तब संदेह ही दृष्टि देखते हैं। जब तक हम खुद अपने को इज्जत नहीं देंगे, हमें इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि दूसरे इसे इज्जत देंगे। मार्क ट्वेन की भारत की यात्रा-विवरण से कुछ अंश। 

४। हौसला                                          लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

हमारे मुँह से निकले हर शब्द का अर्थ होता है, सुनने वाले को प्रभावित करता है। उसे प्रोत्साहित या हतोत्साहित करता है। जब भी मुँह खोलें, समझ कर खोलें।

५। कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी – धारावाहिक

धारावाहिक की बारहवीं किश्त

 ब्लॉग  का संपर्क सूत्र (लिंक): à  

https://sootanjali.blogspot.com/2021/12/2021.html

 यू ट्यूब का संपर्क सूत्र (लिंक) : à

https://youtu.be/GtMdjaqo4Ng