शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

अति सर्वत्र वर्जयेत

 जब जनता भ्रमित हो, दो खेमों में बंटी हो, तर्क-कुतर्क के सहारे अपने को सही और दूसरे को गलत सिद्ध करने पर तुली हो, दोनों पक्ष असत्य-अर्धसत्य का सहारा ले रहे हों, दोनों पक्षों में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हों,  तब विद्वानों-मनीषियों का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वे किसी भी एक पक्ष के  हिमायती न बन कर अच्छे को अपनाने और बुरे को निकालने,  चाहे जिस पक्ष में हो, की पैरवी कर दोनों पक्षों में शांति पैदा करने की कोशिश करें, एक स्वस्थ्य वातावरण तैयार करें, एक अनुकरणीय आचरण करें, न कि पक्ष-विपक्ष में बंट कर अशांति को बढ़ायेँ।

पूरे विश्व में  बहुत कुछ घटित हो रहा है। हमें, हमारे देश की ज्यादा जानकारी है। अत: हमें यहाँ की घटनाओं का ज्यादा पता है और वे हमें ज्यादा उद्वेलित करती हैं। हम अपने देश के भूत, वर्तमान तथा भविष्य से जुड़े हैं, अत: अपने देश की घटनाएँ हमें ज्यादा विचलित करती हैं।  पूरा देश, ऐसा प्रतीत होता है अंध लोगों से भरा है और दो खेमों में बंटा है – एक है अंध भक्तों का और दूसरा है अंध विरोधियों का। ये दोनों ही खतरनाक हैं। एक को कोई बुराई नहीं दिखती और दूसरे को कोई भलाई नहीं नजर आती। एक को लगता है कि सब ठीक और सही है तो दूसरे खेमे को सब बुरा और गलत नजर आता है।  जहां एक खेमा जिन नियमों, क़ानूनों, संविधान और महापुरुषों की बातों और कार्यों से सही सिद्ध करता है तो दूसरा उन्हीं की दुहाई दे कर तर्कों से उन्हें गलत बताता है। यही नहीं दोनों एक दूसरे को सहन भी करते नजर नहीं आ रहे। हमने अंग्रेजों को भी सहन नहीं किया और उन्हें देश से चले जाने को कहा, लेकिन वे अंग्रेज़ थे, विदेशी थे। लेकिन इनका क्या करें? ये तो इसी देश के हैं। क्या वे भी देश छोड़ कर चले जाएँ? क्या यह उनका देश नहीं है? कहाँ जाएँ? जिस डॉ. अंबेडकर ने हमें संविधान दिया और उसके अंतर्गत हमें मौलिक अधिकार प्रदान किए उन्हीं डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “अब जब हमारा देश स्वतंत्र हो गया है, हमारे पास अपना संविधान है, कानून है, न्यायालय हैं, हमें सत्याग्रह और हड़ताल का परित्याग कर, अपने न्यायालयों या अन्य संवैधानिक तरीकों से, समस्या का हल शांतिप्रिय तरीकों का उपयोग कर निकालना चाहिए लेकिन नहीं, कोई न समझने को तैयार न सुनने को। दोनों की एक ही जिद पंचों की आज्ञा सर-माथे, लेकिन नाला यहीं खुदेगा।  दोनों खेमों में हर मुद्दे पर जोरदार बहस, धरना, विरोध  चलता ही रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह हमारी नहीं किसी विदेशी कि सरकार है। तर्क, वितर्क, कुतर्क सभी का ज़ोर रहता है। किंकर्तव्यविमूढ़ जनता एक खेमे की बात सुनकर खुश होती है, नारे लगाती है, जयजयकार करती है वही जनता दूसरे खेमे में भी वही करती है। पहलवानों की कुश्ती देखने से जनता को जैसे उत्तेजना मिलती है, ठीक वैसी ही उत्तेजना चारों तरफ फैली हुई है। वास्तविक तथ्य जानने की  न किसी को परवाह है न फुर्सत। न्याय शास्त्र में जितने प्रकार के छल, कपट, वितण्डावाद  आदि बताए गए हैं उन सबका दांव-पेंच की तरह दोनों खेमे के लोग कर रहे हैं।  दोनों खेमों में युधिष्टिर की तरह अर्ध-सत्य कहने वाले और असत्य कहने वालों की कमी नहीं। हाँ, सत्य कहने वाले भी हैं लेकिन उनकी बात न कोई करना चाहता  है और न सुनना। बात उत्तेजना से आगे बढ़ कर हिंसा, विद्वेष, तिरस्कार, नफरत तक चली जाती है।

बात यहीं तक होती तो फिर भी संतोष कर लिया जाता। दर्द और चिंता की बात तो यह है कि देश के बहुतायत मनीषी, विद्वान, संत  ने भी अपने को बाँट लिया है और जनता को बांटने में लगे हैं। गांधी ने देश के विभाजन का पुरजोर विरोध किया। अंत तक स्वीकार भी नहीं किया। लेकिन जब देश के विभाजन का निर्णय हो गया तब विभाजन के निर्णय के विरुद्ध सत्याग्रह न कर उन्होंने अपनी पूरी ताकत दोनों खेमों के बीच सौहार्द-प्रेम-प्यार-भाईचारा स्थापित करने में लगा दिया। और इसी कारण दोनों खेमों के अनेक लोग उन्हें संदिग्ध नजरों से देखने लगे। दोनों तरफ के लोग उन्हें दूसरे खेमे का समर्थक मानते रहे और अंत में, अहिंसा का पुजारी अपने ही लोगों की हिंसा का शिकार हो गया।  

दु:ख होता है जब देखता हूँ कि उनके ही अनुयायी, उनके ही नाम पर एक को दूसरे के विरुद्ध उकसा रहे हैं। दोनों ही खेमों में अपनी अपनी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हैं। ऐसा नहीं है कि एक दूध का धोया है और दूसरा काजल की कोठरी है।  बुद्धिजीवियों को खेमों में बंटने के बजाय दोनों को सही मार्ग दिखाना है, उनमें सामंजस्य पैदा करना है, भाईचारे की प्रवृत्ति पैदा करनी है। गांधी की ही बात मानें तो बुरे को नहीं बुराई को त्यागना है। आखिरकार दोनों तरफ के लोग इसी देश के नागरिक हैं, हमें साथ-साथ ही रहना है। तब फिर एक से प्यार और दूसरे से नफरत क्यों?

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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

मधुर गालियाँ

गालियाँ और मधुर? नहीं मैं शादी-विवाह में दी जाने वाली सीठनों (गालियों) की बात नहीं कर रहा जहां वधु पक्ष की औरतें वर पक्ष को मधुर गीतों में खरी-खोटी सुनाती हैं। मैं बात कर रहा हूँ वास्तविक गालियों की, श्राप की। देखिये कुछ मधुर गालियों की बानगी:

१। उसके घर में न तो बड़े रहें, जो अक़्लमंद नसीहत दे सकें और न छोटे रहें, जो उन नसीहतों को सुन सकें।

२। भगवान करे कि

·        तुम्हारी जबान सूख जाए,

·        तुम अपनी प्रेमिका का नाम भूल जाओ,

·        जिस आदमी के पास तुम्हें काम से भेजा जाये, वह तुम्हारी बात को सही ढंग से न समझ सके,

·        जब तुम दूर-दराज़ का सफर करके लौटो, तो गाँव वालों को अभिनंदन के शब्द कहने भूल जाओ,

·        तुम्हारे  बच्चों को उससे महरूम कर सकें जो उन्हें उनकी जुबान सीखा सकता हो,

·        तुम्हारे बच्चों को  उससे मरहूम करे, जिसे वे अपनी जबान सीखा सकते हों।

ये हैं कुछेक ऐसी गालियाँ जिन्हें समझने के लिए इन्हें फिर से पढ़ना पड़ सकता है। ये हैं साहित्यकारों की साहित्यिक गालियाँ, शरीफ़ों की शरीफ गलियाँ। दरअसल ये हैं एक रूसी लेखक रसूल हमज़ातोव की 



मेरा दागिस्तान से लिया गया अंश। दागिस्तान रूस के उस गाँव का नाम है जहां रसूल का जन्म हुआ था। उन्हें अपनी मातृभूमि और मातृभाषा से बेहद लगाव था। उपन्यास में उनके इस लगाव की स्पष्ट झलक मिलती है, और साथ ही पता चलता है अपनी भाषा के महत्व का।

संचय के नुकसान

अब दूसरी बानगी देखिये टोल्स्टोय की शैतान यह सब सुनते ही चुस्त-दुरुस्त सरकारी हकीमों की भाषा में बदतमीज, नालायक, बेहूदा, कमीना, चुगद ....... आदि की बौछार करते हुए सख्ती से पेश आया और कहा – अगर तूने तीन बरस में मेरा काम नहीं किया तो तुझे गंगा-स्नान की सख्त सजा देनी पड़ेगी, और रामनाम जपने, तुलसीदल खाने, गंगाजल पीने की यंत्रणा भी दी जाएगी। 

यह उनकी एक बड़े मजेदार कहानी का अंग है। कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक गाँव में एक बड़ा मेहनती और ईमानदार किसान रहता था साथ ही बुराई से डरता था। शैतान से यह बरदास्त नहीं हुआ। उसने अपने अनुचर को उसे पदभ्रष्ट करने भेजा। बेचारे कई चालें चला लेकिन अपने कार्य में सफल नहीं हो पाया। हार कर वह शैतान के पास लौट आया और बताया कि वह उनका काम नहीं कर सका। यह जान कर ही शैतान ने उसे ऊपरी बातों से सुशोभित किया। बेचारा वापस चला आया और विचार करने लगा कि क्या किया जाये? आखिर उसे एक अच्छा उपाय सूझा। उसने एक गरीब किसान का रूप बनाया और उसके यहाँ नौकरी करने लगा। अब उसने किसान को सलाह देनी शुरू की। उसकी सलाह से किसान को प्रचुर फायदा और गाँव वालों का नुकसान होने लगा। गाँव के लोग गरीब होते चले गये और वह बड़ा सेठ बन गया, और प्रचुर मात्रा में धन जमा होने लगा। किसान उस पर फिदा हो गया और उसकी हर सलाह मानने लगा। और जब उसके पास बेशुमार दौलत जमा हो गई। तब उसने किसान को चावल सड़ा कर शराब बनाने की विधि सिखाई और फिर पीना भी सीखा दिया। बस फिर क्या था दावतें होने लगीं, महफिलें जमने लगीं। मेहनत, ईमानदारी हवा हो गई और बुराई तथा बेईमानी ने अपने पाँव पसार लिए। ऐसी ही एक महफिल में जिसमें यार दोस्तों के साथ उनकी पत्नियाँ भी थीं अनुचर ने शैतान को अपनी सफलता दिखाने बुला लिया। उसने देखा उनके बीच नि:संकोच बेशरमी से सब चल रहा था। पहले लोमड़ी की तरह गली-गलौच, बेईमानी और धूर्तता की बातें, फिर भेड़िये की तरह गुर्राना और हाथा-पाई और अंत में वहीं गंदी नाली में गिर कर वहीं सूअरों की तरह सो गये। शैतान बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा यह केवल शराब का कमाल नहीं है बल्कि जरूरत से ज्यादा संचय करने का कमाल है। ऐसी कोशिश करो की दुनिया के लोग दूसरों से छीन कर संचय करने लगें। तब वे छीना-झपटी और संचय की होड़ में फंस जाएंगे और तब दुनिया से उस दुष्ट ईश्वर का राज्य उठ जाएगा और सब मेरी प्रजा बन जाएगी।

गांधी ने तीन बातें कही थीं – संयम करो, अपरिग्रह करो तथा आलस्य त्याग कर परिश्रम करो। गांधी के अनुयायी नेहरू ने केवल एक बात अपनाई – आराम है हराम। पहले औद्योगिक क्रांति हुई। फिर हरित क्रांति हुई। और फिर श्वेत क्रांति भी हुई। लेकिन 100 में से 90 की थाली में कुछ नहीं आया, एक बूँद दूध का नहीं पहुंचा। जब हम अधूरी बात मानते हैं तब हमारी मंशा भी अधूरी ही फलित होती है। अर्जन के साथ वर्जन, ग्रहण के साथ अपरिग्रह को जोड़ना जरूरी है अन्यथा संयम संभव नहीं। मद धन में नहीं संचय में है। जब तक हमारा मन अ-प्रमाद के साथ-साथ दम और त्याग को मंजूर नहीं करता, सारी क्रांतियाँ निरर्थक हैं।

(पत्र मणिपुतुल के नाम पर आधारित)

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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

सूतांजली, फरवरी २०२१

 सूतांजली के फरवरी अंक का संपर्क सूत्र नीचे है:-

इस अंक में तीन विषयों पर चर्चा है:

१। यक्ष प्रश्न 

यक्ष ने अगला प्रश्न किया, “संसार में दु:ख क्यों है?”

“लालच, स्वार्थ, भय संसार के दु:ख के कारण हैं”, युधिष्ठिर ने बताया।

“तब फिर ईश्वर ने दु:ख की रचना क्यों की?”

“ईश्वर ने संसार की रचना की। और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दु:ख और सुख की रचना की”।   ..........................

२। अंधेरा

·          अंधेरा, अंधकार, अँधियारा, तमस, रात, तम, तिमिर

·          अज्ञानता, मतिभ्रम, निराशा, अवसाद, रहस्य, अप्रसिद्धि, अपमान, मृत्यु

·          दिन में सूर्य प्रकाशित होता है तो रात्रि में चाँद, तारे, दीपक, मोमबत्ती, मशाल, बिजली अंधेरे का नाश करते हैं

·          जरा ठहरो, यानि प्रकाश के लिये किसी का होना आवश्यक है! चाहे वह सूर्य हो या चाँद-तारे, या दीपक, बिजली या कुछ और! ...................

३। कारावास की कहानी

पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल बंद में थे। जेल के इस जीवन का, श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से, रोचक वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे हम जनवरी माह से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इस कड़ी में यहाँ इसका दूसरा अंश है।

 

संपर्क सूत्र (लिंक): -> https://sootanjali.blogspot.com/2021/02/blog-post.html

 

ब्लॉग में इस अंक का औडियो भी उपलब्ध है।