शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

क्या पसंद है और क्या है अच्छा?



यह व्यंग चित्र (कार्टून) देख कर आपको बीते हुए दिन याद आ रहे होंगे,ना ही चाहिये। बल्कि अगर याद नहीं आ रही है तब यह प्रश्न उठता है कि क्या डेनिस के कार्टून अपने नहीं देखे? Dennis the Menance’ के नाम से अखबारों में, पत्रिकाओं में इसके नये व्यंग चित्र का बेसब्री से इंतजार रहता था। इसके जनक थे हांक केचाम (Hank Ketcham) जिसने अवतार लिया था 12 मार्च 1951 को। यह कई व्यक्तियों के हाथों से गुजरता हुआ अब, 2010 से, उनके लड़के स्कॉट द्वारा लिखा और बनाया जाता है।

          अब हम आते हैं इस कार्टून पर। क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि इस कार्टून में क्या चल रहा है? यह तो साफ नजर आ रहा है कि डेनिस अपने अनोखे लेकिन चिर-परिचित अंदाज  में खड़ा है और शायद कुछ बोल रहा है। उसके सामने एक महिला कुछ पका रही है जो संभवतः उसकी माँ है। अगर दिमाग पर थोड़ा और ज़ोर लगाएँ तो लगता है कि उनके बीच जो खाना पकाया जा रहा है उसके बारे में ही बातचीत हो रही है। लेकिन उनके बीच क्या बात हो रही है? यही है महत्वपूर्ण। ठहरें, आगे बढ़ने के पहले जरा आए सोचें, अटकलें लगाएँ-

क्या डेनिस पूछा रहा है कि आज क्या पक रहा है? या

खेलने जाने की अनुमति मांग रहा है? या

वह अपनी माँ की सहायता करना चाहता है?

, नहीं इनमें से कुछ भी नहीं। लेकिन फिर क्या?

डेनिस अपनी माँ से पूछ रहा है, “क्या मुझे कुछ ऐसा मिल रहा है जो मुझे पसंद है या कुछ ऐसा जो मेरे लिये अच्छा है?”  

कुछ देर इस प्रश्न का आनंद लीजिये, फिर हम प्रयत्न करेंगे इसकी गहराई में उतरने का।  - “हमें क्या मिल रहा है – हमें पसंद है या हमारे लिए अच्छा है?”

          इस वार्तालाप से यह जाहीर है कि डेनिस जानता है कि उसे क्या पसंद है और उसे यह भी मालूम है कि उसके लिए क्या अच्छा है। उसे अच्छा-बुरा, सही-गलत सीखाने या बताने की अवश्यकता नहीं है, यह उसे ज्ञात है। इतना ही नहीं उसे इस बात का संदेह भी है कि जो पक रहा है वह उसे पसंद नहीं है बल्कि उसके लिए अच्छा है। इसके बाद भी वह इस आशा से पूछ रहा है कि शायद उसे उसके मनोनुकूल उत्तर मिल जाये या फिर उसके मनोनुकूल पका दिया जाये। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा नहीं होगा। वही पकेगा जो पक रहा है और जो पक रहा है वह उसके लिये अच्छा है। 

          इसके विपरीत हम यह मानते हैं कि बच्चे को पसंद और अच्छे का ज्ञान नहीं है। लेकिन सही यही है कि वह दोनों का फर्क जानता है। पसंद और अच्छे का ही नहीं बल्कि सही और गलत’, अच्छे और बुरे का फर्क भी वह जानता है। फिर बच्चा बुरे की तरफ ही क्यों प्रवृत्त होता है? बुरे में आकर्षण है और हाथों हाथ लाभ नजर आता है। अच्छे का फल मिलने में थोड़ा समय लगता है, तब तक उसका आकर्षण समाप्त हो चुका होता है और बहुधा पता ही नहीं चलता कि जो अच्छा हुआ वह सही निर्णय के कारण हुआ। तब एक अभिभावक या शिक्षक के रूप में हमारा उत्तरदायित्व सिर्फ इतना ही है कि हम उसे अच्छे और सही की तरफ प्रेरित करें, उत्साहित करें।

          हमने ही अपने कृत्यों से उसे अच्छे के बजाय बुरे की तरफ प्रेरित किया है, अच्छे के बजाय पसंद की तरफ धकेला है, सही के बदले गलत को आकर्षक बनाया है। और इसे ठीक करने का केवल एक ही उपाय है – हम अपने कृत्यों को बदलें, हम खुद सही और अच्छे करें।  

           

भारत के एक महान योगी के शिक्षा सिद्धान्त सिर्फ बच्चे पर ही नहीं हम पर भी लागू होते हैं -

"सच्चे शिक्षण का पहला सिद्धान्त है कि कुछ भी सिखाया नहीं जा सकता। शिक्षक तो एक सहायक एवं पथ प्रदर्शक है। उसका काम है सुझाव देना, थोपना नहीं। वह सचमुच हमारे मानस को प्रशिक्षित नहीं करता, वह तो उसे केवल यह दिखाता है कि अपने ज्ञान के उपकरणों को कैसे पूर्ण बनाया जाये और इस प्रक्रिया में वह उसे सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करता है। वह उसे ज्ञान नहीं देता, वह उसे यह दिखाता है कि अपने लिये ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाए। वह अंदर स्थित ज्ञान को बाहर प्रकट नहीं करता; वह केवल यह दिखलाता है कि ज्ञान कहाँ स्थित है और उसे ऊपरी तल पर आने के लिये कैसे अभ्यस्त किया जा सकता है।”

अब एक बार इस चित्र में थोड़ा सा परिवर्तन करते है। उस बच्चे की जगह अपने को देखें और माँ कि जगह ईश्वर को। अब बताएं ईश्वर से हमें क्या मांगना चाहिए – वह जो हमें पसंद है या वह जिसमें हमारा अच्छा है, भला है?

हमारी प्रकृति हमें अपना स्वधर्म निभाने के लिये प्रेरित करती है, लेकिन हम उसकी सुनते नहीं हैं?

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

क्या है महान लक्ष्य?


          किसे कहेंगे महान लक्ष्य? क्या अकूत संपत्ति का मालिक होना महानता है? देश-विदेश में कारोबार का होना महानता है। ऐश्वर्य-वैभव का होना महानता है? कैलिफोर्निया की बे-एरिया में कंपनी का मुख्यालय होना महानता है। हजारों इंजीनियर-टेकनिशियनों को रोजगार देना महानता है। महानता क्या है? कोई ऊंचा पद हासिल करना, कोई बड़ा पुरस्कार प्राप्त करना, आज की तकनीकी दुनिया में करोड़ों लाइक बटोरना-फ़ौलोअर्स का होना? – क्या है महानता लेना या देना!  मैं या हम। सब-कुछ अपनी मुट्ठी में होते हुए भी मुट्ठी को खुली रखना ही महानता है। सब कुछ स्वयं करते हुए भी करनहार को ही करने वाला मानना महानता है। मैं नहीं तू ही महानता है।  

          किसी की कुल सम्पति अगर 18 हजार करोड़ रूपये की हो तो 300 करोड़ रूपये के प्राइवेट जेट विमान खरीदने पर ऑडिटर भी एतराज नहीं करेगा, और जब अथाह पैसा हो तो फिर मुश्किल ही क्या है? यूँ भी, लक्ष्मी जब छप्पर फाड़कर धन बरसाती है तो ऐसे फैसले किसी को ख़र्चीले नहीं लगते। शायद इसलिए एक खरबपति के लिए जेट विमान खरीदना ऐसा ही है जैसे किसी मैनेजर के लिए मारुति कार खरीदना। लेकिन जोहो कारपोरेशन (Zoho Corporation) के चेयरमैन श्रीधर पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती भी मेहरबान थीं। इसलिए उनके इरादे औरों से बिलकुल अलग थे। उनका अगला लक्ष्य प्राइवेट जेट खरीदना होना चाहिए था। लेकिन प्राइवेट जेट खरीदना तो दूर उन्होंने अपनी कम्पनी के बोर्ड के निर्देशकों से कहा कि वे अब कैलिफोर्निया (अमेरिका) से जोहो कारपोरेशन का मुख्यालय कहीं और ले जाना चाहते हैं। कहाँ?

          श्रीधर के इस विचार से कम्पनी के अधिकारी हतप्रभ थे क्यूंकि सॉफ्टवेरी के लिये कैलिफोर्निया की बे-एरिया से मुफीद जगह दुनिया में और कोई है ही नहीं। गूगल, एप्पल, फेसबुक, ट्विटर या सिस्को सब-के-सब इस इलाके में बसे, फले-फूलेपर श्रीधर तो कोई बड़ा अप्रत्याशित फैसला लेने जा रहे थे। वे कैलिफोर्निया से शिफ्ट होकर सीएटल या हूस्टन नहीं जा रहे थे। वे अमेरिका से लगभग 13000 किलोमीटर दूर चेन्नई वापस आना चाहते थे।

          उन्होंने बोर्ड मीटिंग में कहा कि अगर डेल, सिस्को, एप्पल या माइक्रोसॉट अपने दफ्तर और रिसर्च सेंटर भारत में स्थापित कर सकते हैं तो जोहो कारपोरेशन को स्वदेश लौटने पर परहेज क्यों है?

श्रीधर के तर्क और प्रश्नों के आगे बोर्ड में मौन छा गयाफैसला हो चुका था। आई आई टी मद्रास के इंजीनियर श्रीर वापस मद्रास जाने का संकल्प ले चुके थे। उन्होंने कम्पनी के नए मुख्यालय को तमिलनाडु के एक गाँव  में स्थापित करने का फैसला ले लिया था और एलान के मुताबिक, अक्टूबर 2019 में श्रीधर ने टेंकसी जिले के मथलामपराई गाँव में जोहो कारपोरेशन का हेडक्वार्टर शुरू कर दिया।

 

स्वदेश क्यों लौटना चाहते थे श्रीधर?

श्रीधर अमेरिका की किसी एजेंसी या बैंक या स्टॉक एक्सचेन्ज के दबाव के कारण स्वदेश नहीं लौटे। उनपर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी नहीं था। वे कोई नया व्यवसाय भी नहीं शुरू कर रहे थे। वे किसी नकारात्मक कारण नहीं एक सकारात्मक विचार लेकर वतन लौटे। उन्होंने कई वर्ष पहले संकल्प लिया था कि अगर जोहो ने बिजनेस में कामयाबी पायी तो वे मुनाफे का बड़ा हिस्सा गाँव के बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने पर खर्च करेंगे। इसी इरादे से उन्होंने सबसे पहले मथलामपराई गाँव में बच्चों के लिए निःशुल्क आधुनिक स्कूल खोले। फोर्ब्स मैगजीन में दिए एक इंटरव्यू में श्रीधर बताते हैं कि टेक्नोलॉजी को अगर ग्रामीण इलाकों से जोड़ा जाए तो गाँव से पलायन रोका जा सकता है। गाँव में प्रतिभा है, काम करने की इच्छा हैइसीलिए मैं भी बच्चों की क्लास में जाता हूँ, उन्हें पढ़ाता भी हूँ। हम न सिर्फ दूरियां मिटा रहे हैं, न सिर्फ पिछड़ापन दूर कर रहे हैं, बल्कि शहर से बेहतर डेलीवरी गाँव से देने जा रहे है... प्रोडक्ट चाहे सॉफ्टवेयर ही क्यों न हो।

          श्रीधर बेहद सहज और सादगी पसंद इंसान हैं। वे लुंगी और बुशर्ट में ही अक्सर आपको दिखेंगे। गाँव और तहसील में आने जाने के लिए वे साईकिल पर ही चल निकलते हैं। उनकी बातचीत से, हाव-भाव से, ये आभास नहीं होता कि श्रीधर एक खरबपति सॉफ्टवेटर उद्योगपति हैं जिन्होंने 9 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है जिसमें अधिकाँश इंजीनियर है। उनकी कम्पनी के ऑपरेशन अमेरिका से लेकर जापान और सिंगापुर तक फैले हैं जहाँ 9,300 टेक-कर्मियों को रोजगार मिला है। श्रीधर का कहना है कि आने वाले वर्षों में वे करीब 8 हजार टेक रोजगार भारत के गाँवों में उपलब्ध कराएंगे और ग्लोबल सर्विस को देश के ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित करेंगे। शिक्षा के साथ गाँवों में वे आधुनिक अस्पताल, सीवर सिस्टम, पीने का पानी, सिंचाई, बाजार और स्किल सेंटर स्थापित कर रहे हैं। सरकार ने 2021 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा है।

          महान लक्ष्य का कोई एक निश्चित सूत्र नहीं है। जो बात पन्नों में लिखी जाती है विद्वान जन उसे कुछ पंक्तियों में बयाँ कर देते हैं। कोलकाता विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के आचार्य स्व. विष्णुकान्त जी शास्त्री की ये पंक्तियाँ देखें :

          बड़ा काम करना है मुझको,

                       मैंने पूछा मन से।

                                    बड़ा लक्ष्य हो बड़ी तपस्या

                                           बड़ा हृदय मृदुवाणी।

                                                                      किन्तु अहम छोटा हो जिससे

                                                                                सहज मिले सहयोगी।

                                                                                                    दोष हमारा श्रेय राम का

                                                                                                        यह प्रवृत्ति कल्याणी।

और यही है महानता, सब कुछ करने की क्षमता होने पर भी यह स्वीकार करना कि सब दोष हमारे हैं सब उपलब्धि राम की है। 

(इन पंक्तियों को मुझ तक प्रेषित करने का श्रेय जाता है हमारे एक सुधि पाठक /  सब्सक्राइबर श्री श्री गोपालजी  डागा को जिन्हें यह हठात मिली अपनी पत्नी, सुधा भाभी के संग्रह में। उनका अतिशय आभार।)

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शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

सूतांजली जनवरी 2024


 

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