शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

मुजिका और शास्त्रीजी की सरलता और सादगी

 (उरुग्वे के राष्ट्रपति मुजिका को पूरा विश्व जानता है लेकिन अपने प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से, जो केंद्रीय मंत्री और फिर प्रधान मंत्री रहे, कितने लोग परिचित हैं? उन्होंने एक सादगी पूर्ण सरल जीवन ही व्यतीत  किया। अब दशकों बाद उनके अनेक किस्से एक-एक कर सामने आ रहे हैं। यह विचारणीय है कि देश, क्यों उनकी सादगी और सरलता की चर्चा नहीं करता?  क्यों हम अपने देश में ही उन्हें प्रतिष्ठित नहीं कर पाये? क्यों हमारे राजनेता, विधायक, प्रशासक उनके आदर्श को, उनकी सरलता को, सादगी को पसंद नहीं करते अतः नहीं अपनाते हैं और इस कारण उनकी चर्चा नहीं करते हैं? अगर हम ही इनकी चर्चा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा? सं.)

इंसान को मुश्किल बनाती स्थितियां हैं, तो वह हौसला भी है जो इंसान को सरल-सहज बने रहने के लिए प्रेरित करता है। भले ही असल जीवन में यह क़िस्से आटे में नमक के बराबर हों, लेकिन समाज को सरलता का स्वाद तो चखा ही देती हैं। ऐसा ही एक नाम एलबर्टो मुजिका का है। मुजिका उरुग्वे के राष्ट्रपति थे। दुनिया उन्हें सबसे ग़रीब राष्ट्रपति के नाम से जानती है।



          मुजिका अपने वेतन यानी 12 हज़ार डॉलर का 90 प्रतिशत हिस्सा ग़रीबों की मदद के लिए ख़र्च कर दिया करते थे। लोग उन्हें भले ही दुनिया का सबसे ग़रीब राष्ट्रपति कहती हो, लेकिन दरअसल वे दुनिया के सबसे अमीर राष्ट्रपति थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें यूं तो राष्ट्रपति भवन में रहना था, लेकिन उन्होंने अपना पुराना घर चुना। वे वहाँ अपनी पत्नी और कुत्ते के साथ रहा करते थे। उनके पास अपनी वॉक्सवेगन बीटल गाड़ी थी, जो उन्होंने 1987 में खरीदी थी, लेकिन 2010 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा। वे  मिसाल थे कि हमें अपनी जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति मुजिका कहते थे, गरीब वह है जो जीना नहीं जानता। जिसे जीने के लिए अपने अगल-बगल कबाड़ इकट्ठा करने की जरूरत पड़ती है। मुजिका ने बता दिया कि राजनीति इतनी भी मुश्किल नहीं होती है, सरल आदमी दूसरों की जिंदगी को आसान बनाता है। उसके लिए उसे साधु बनने की जरूरत नहीं है।

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बात उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय मन्त्री थे। सादगी और ईमानदारी  में शास्त्रीजी बेजोड़ थे। एक बार की बात है, प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू  ने उन्हें एक जरूरी काम से कश्मीर जाने के लिये कहा। शास्त्रीजी ने निवेदन किया कि किसी और को उनकी जगह भेज दिया जाये। नेहरूजी ने जब इसका कारण पूछा तो शास्त्री जी बोले – कश्मीर में इस समय बेहद ठण्ड पड़ रही है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है।' यह सुनकर बहुत इनकार करने के बावजूद नेहरूजी ने अपना एक कोट शास्त्रीजी को दे दिया। शास्त्रीजी ने पण्डितजी का कोट पहनकर देखा। वह बहुत लम्बा था और बहुत नीचे तक लटक रहा था। शास्त्री जी अपने एक मित्र को साथ लेकर एक नया कोट खरीदने बाजार पहुँचे। बाजार में काफी कोट देखे गये, पर मन पसन्द कोट नहीं मिला। वह या तो इतना महँगा होता कि शास्त्रीजी दाम चुकाने में असमर्थ होते या फिर उसका साइज ऐसा होता कि उनको ठीक नहीं आता। एक दुकानदार ने उन्हें एक ऐसे दर्जी का पता दिया, जो सस्ता और अच्छा कोट सिलकर दे सकता था। शास्त्रीजी अपने मित्र के साथ उस दर्जी के पास पहुँचे और एक सस्ता कोट सिलने को दे दिया। शास्त्रीजी के मित्र बोले- 'आप केन्द्रीय मन्त्री हैं। आप चाहें तो सैकड़ों कीमती कोट आपके पास हो सकते हैं, लेकिन आप एक मामूली कोट के लिये बाजार में मारे-मारे घूम रहे हैं।' शास्त्रीजी ने मुसकुराकर जवाब दिया—'भाई! मुझे इतनी तनख्वाह नहीं मिलती कि मैं कीमती कपड़े खरीद सकूँ और फिर मेरे लिये तो देश-सेवा ही सबसे बढ़कर है, जो मैं मामूली कपड़ों में भी कर सकता हूँ।'

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यह घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री भारत के गृहमन्त्री थे। शास्त्रीजी की सादगी सर्वविदित है। वे स्वयं पर अथवा अपने परिवार पर तनिक भी अनावश्यक खर्च नहीं करते थे। उनका रहन-सहन आम लोगों जैसा ही था। राष्ट्र के अति महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होने के बावजूद भी उन्होंने कभी अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया। एक बार इलाहाबाद स्थित निवास के मकान मालिक ने उनसे मकान खाली करने का अनुरोध किया, जिसे शास्त्रीजी ने तत्काल मान लिया। वास्तव में मकान मालिक को उस निवास स्थान की अति आवश्यकता थी और शास्त्रीजी स्वयं से अधिक दूसरों की जरूरतों का ख्याल रखते थे। अतः उन्होंने मकान खाली कर दिया और किराये  पर दूसरा मकान लेने के लिये आवेदन-पत्र भरा। काफी समय बाद भी शास्त्रीजी को मकान नहीं मिल सका, तो उनके किसी मित्र  ने अधिकारियों से पूछताछ की। अधिकारियों ने बताया कि शास्त्रीजी का कड़ा आदेश है कि जिस क्रम में उनका आवेदन-पत्र दर्ज है, उसी क्रम  के अनुसार मकान दिया जाये। कोई पक्षपात न किया जाये। और सच तो यह था कि १७६ आवेदकों के नाम शास्त्रीजी के पहले दर्ज थे, इसलिए देश का गृह मंत्री मकान के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षारत रहा।  इस घटना  का सार यह है कि नियम-कानून का पालन यदि साधारण लोगों के साथ विशिष्टजन भी पूरी ईमानदारी से करें तो समाज से भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो जाये।

तुम मन की जेल में क्यों रहते हो...

जबकि दरवाज़ा तो पूरी तरह से खुला है।

                                                            रूमी

(आप एक बड़ी साँस लेकर सोच रहे हैं क्या स्थिति है, लेकिन मैं कर ही क्या सकता हूँ! क्या आप मुझे बताएँगे अगर आप नहीं कर सकते तो कौन कर सकता है? दर असल यह केवल और केवल आप यानी हम ही कर सकते हैं – आम जन। इस आम-जन में ताकत तो बहुत बड़ी है लेकिन हनुमान की तरह अपनी ताकत को भुला कर बैठा है। उत्तिष्ठ भारत उठो भारतीय जागो, अपनी ताकत को पहचानो।  

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https://youtu.be/oUpsHrqmwBM


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