शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

ऐसा भी होता है ....... ?

कतराव (kataraw)? का नाम आपने सुना है? अच्छा सहोदरा (sahodara) का नाम? या फिर बगहा (bagaha) का? नहीं सुना है न? मैंने भी नहीं सुना था। चंपारण? इसका नाम तो गांधी ने इतिहास में दर्ज करा दिया है, जरूर सुना होगा। इसी चंपारण से गांधी ने भारत में अपना पहला सत्याग्रह आंदोलन प्रारंभ किया था, नील की खेती करने वाले किसानों के लिए। उत्तर बिहार में नेपाल की सीमा के नजदीक, बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले का एक छोटा सा गाँव है कतराव; यह  सहोदरा थाने के अंतर्गत आता है। बगहा शहर से 70 किलोमीटर है और पटना से 245 किमी दूर।

सहोदरा पुलिस स्टेशन की भौगोलिक स्थिति दर्शना गूगल मैप 

आप सोच रहे हैं कि मैं इसकी चर्चा क्यों कर रहा हूँ। कतराव एक आदर्श गाँव है जिसकी मिसाल नहीं मिलेगी। यहाँ के थाने में आजादी के 73 सालों में आज तक एक भी, किसी भी अपराध के लिए एफ़आईआर (FIR) दर्ज नहीं हुई है और न ही अदालत में कोई फ़ौजदारी मुकदमा दर्ज हुआहै। यह गाँव उसी बिहार में है जो अपने अपराधों के कारण देश के शीर्षतम राज्यों में एक माना जाता है। गाँव में लगभग 5000 लोग रहते हैं जिनमें अनुसूचित जाति के लोग भी शामिल हैं। यहाँ के आपसी झगड़े वहीं की पंचायत निबटा देती है और सबों को उसका फैसला मान्य होता है। महिलाओं से संबन्धित मामलों का महिला पंचायत में फैसला होता है जिनमें पुरुषों की दखल अंदाजी नहीं होती है। लोगों ने बताया कि यह संभव हुआ है उनकी महात्मा गांधी के आदर्शों में पूर्ण विश्वास और आस्था के कारण। महात्मा गांधी का भितिहरवा गांधी स्मारक आश्रम  यहाँ से सिर्फ 15 किमी पर है। राज्य के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को भी विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब वे भी वहाँ का दौरा कर आए तब उन्हे भी मानना पड़ा कि आज भी महात्मा में अविश्वसनीय शक्ति है। आज भी महात्मा गांधी वह करने में  सक्षम हैं जिसे थाना, पुलिस, कानून नहीं कर सकती

गांधी आश्रम
भीतिरहवा गांधी आश्रम का प्रवेश द्वार (यहाँ से प्रवेश करें)


ऐसा क्या था बापू के आदर्शों में, जिसे लोग आज भी निष्ठापूर्वक निभा रहे हैं और सब साथ साथ एक परिवार की तरह रहते हैं? पढे-लिखे लोग, बुद्धिजीवी वर्ग, शिक्षित समुदाय शायद इस पर बड़े बड़े शोध पत्र लिख डालें, डिग्रियाँ हासिल कर लें और शायद इसको लेकर लड़ भी लें। दुर्भाग्य तो यह है कि देश में गांधी के नाम से चलाने वाली संस्थाओं के पदाधिकारी भी गांधी के नाम पर कमोबेश परस्पर द्वेष और वैमनस्य बढ़ाने की ही भाषा बोल रहे हैं। इसके विपरीत कतराव ग्राम के वासी इसकी चर्चा नहीं करते, बल्कि गांधी मार्ग अपना कर उसका अतिउत्तम उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। सही कहें तो इसका कोई एक कारण नहीं है। अनेक कारण हो सकते हैं। लेकिन एक बहुत ही सीधा और सरल सा कारण है हम। हम मतलब कौन? साधारण से शब्दों में इस हम को बड़े अच्छे ढंग से परिभाषित किया गया है इस कविता में : 

बचपन में जब भी पूछता था कोई,

कितने भाई बहन हैं तुम्हारे,

जोड़ने लगते थे हम सभी ......

जल्दी-जल्दी,

अपनी नन्ही-नन्ही उँगलियों पर,

उँगलियाँ खत्म हो जातीं, जोड़ नहीं

क्योंकि, कज़िन क्या होता है, पता ही नहीं था।

माँ ने कहा, ये तेरे बड़े भाई हैं, यह छोटी बहन।

बस,

हो गए हम ढेर सारे.....

जब भूख लगे,

जिस घर के बाहर खेलते उसी में घुस जाते;

वे अपने नहीं थे, पता ही नहीं था!!

चाची, ताई, मासी, बुआ,

न जाने कितने अपने लोग, कितने प्यारे रिश्ते,

एक ही टोकरी में सजे, अलग-अलग फूलों की भांति, 

उतना ही अपनापन, उतनी ही डांट,

परायापन क्या होता है, पता ही न था। .........

(यह खबर मैंने पढ़ी अँग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, कोलकाता, में और कविता का यह अंश लिया है मधुसंचय से)

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर 


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http://youtube.com/watch?v=pY7R-iXnbm8

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