शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

दशम न्याय - (मुझे छोड़कर और सब)

 आज हमारे देश में हर आदमी दशम-न्याय के मर्ज का शिकार है। हर एक को शोक है कि देश में भ्रष्टाचार है। रिश्वतख़ोरी का बाजार गरम है। धार्मिक असहिष्णुता है। शासन में शिथलता है। सेवकों में भोग-विलास-लोलुपता-पद और लालसा है। हम लोग जहां कहीं जाते हैं –  गाँव-कस्बों में, बाजार-हाटों में, रेल-बस-गाड़ियों में, सड़कों-गलियों में, सभाओं-सम्मेलनों में, परिषदों-संसदों में, अखबारों-पत्रों में, हर मुंह से, हर मंच से, हर व्यासपीठ से, हर लेखनी से यही आवाज। यही शिकायत सुनते हैं। हरेक कहता है हम अपने वेदों-शास्त्रों-पुराणों की सिखावन भूल गए। हम उनके बतलाए हुए आचरण के आदर्श से गिर गए हैं। हम भोग और सत्ता के मोह में फंस गए हैं। वह कहता तो हम है। लेकिन अपने दिल में कहता रहता है –मुझे छोड़कर और सब। इतना वाक्यांश वह कोष्ठक में लिख लेता है। लेकिन वह वाकई बड़े टाइप में होता है।

सरकारी प्रशासक, शासनाधिकारी और कर्मचारी, नेता-विधायक-सांसद-मंत्री भी जब अपनी अपनी फर्याद लेकर आते हैं, तो यही कहते हैं –क्या कहें, पक्षपात और अन्याय का बाजार गर्म है। न्याय की किसी को परवाह नहीं। सारा शासन चौपट हो रहा है। मालूम होता है, सारा देश रसातल को जा रहा है। मजा यह कि हर एक यही बात कहता है। हर एक न्याय का कायल है। पक्षपात  का विरोधी है। अन्याय का दुशमन है। सारे देश में जब हर एक इंसान इतना न्यायप्रिय और सदाचारी है तो फिर कुल मिलकर भष्टाचार और अन्याय आया कहाँ से?

मजा यह कि हर एक अन्याय और अनाचार का आरोप करता है, लेकिन उनके निवारण की जिम्मेदारी अपनी नहीं, दूसरे की समझता है। अन्याय और अनाचार के आरोप में से भी अपने-आपको कोष्ठक में रख लेता है। यही दशम न्याय है। आज इस देश की मुख्य बीमारी यही है। हर एक दूसरे के अपराधों के लिए शोक करता है। उसके लिए रुष्ट और संतप्त है, परंतु अपने-आपको अलग समझता है।  हम सब को गिनते हैं अपने को छोड़ कर। हमने अपने आप को गिनना बंद कर दिया है। हम सभी, बाकी नौ को ही गिनते हैं, अपने को छोड़ देते हैं।


गांधी ने कहा मैं पहले अपना हृदय परिवर्तन करूंगा, फिर औरों का करूंगा। पहले अपने को गिनूँगा फिर औरों का गिनूँगा। हम कहते हैं औरों का हृदय परिवर्तन हो जाए तब मैं अपना हृदय परिवर्तन करूंगा। मैं दूसरों को गिनूँगा अपने को  नहीं। 

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