शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

सूतांजली दिसम्बर 2023

 


अहंकार से प्राप्त ज्ञान अहंकार पैदा करता है,

विनय और नम्रता से प्राप्त ज्ञान नम्रता प्रदान करती है।

स्वामी तेजोमयानंदजी (गीता)

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छुटकारा – पाप से या दुःख से?                                             मैंने पढ़ा

मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है!

अपराध खुद करता है, लेकिन चाहता है दंड किसी और को मिले!

जीत का सेहरा खुद के सिर पर, लेकिन हार का ठीकरा किसी और के सिर पर।

पुण्य का फल खुद के लिए लेकिन पाप का दंड किसी और के लिए?

है न विचित्रिता!

          हम कोई तरकीब चाहते हैं कि पाप तो कर लिये, लेकिन पाप के फल से बच जाऊँ। कोई मंत्र, कोई चमत्कार, कोई पूजा-पाठ, कोई दर्शन, कोई स्नान, कोई दान हमें छुटकारा दिला दे। कौन छुटकारा दिलायेगा? और ऐसा भी नहीं है कि समझदार पुरुषों ने हमें बार-बार, हजारों बार न कहा हो कि ठहरो, रुक जाओ। यही नहीं, ऐसा भी नहीं है कि आज भी वे हम से कह रहे हैं तो, मैं रुक जाऊंगा, हम करते ही रहेंगे। पिछले जन्मों में करते रहे हैं, अभी भी कर रहे हैं और आगे के जन्मों में भी करते रहेंगे। और फिर यह विचार करेंगे कि क्या अनंत जन्मों तक किये हुए पाप का फल क्या अनंत जन्मों तक भोगने पड़ेंगे? हम निरंतर करते चले  जाते हैं और फिर असंभव की आकांक्षा करते हैं। पाप तो हम करें और फल हमें न मिले, फल किसको मिलेगा फिर? अगर दुःख मैंने बोया है तो उसकी फसल कौन काटेगा? और यह तो सरासर अन्याय होगा कि फसल किसी और को काटनी पड़े। फसल तो मुझे ही काटनी पड़ेगी!

          इस बात की चिंता छोड़ो कि कितना समय बीत चुका। जब जागो तभी सवेरा। ऐसा नहीं है कि जितने समय दुःख बोया है उतने ही समय दुःख भोगना पड़ेगा। लेकिन दुःख भोगने के लिए तैयार तो होना पड़ेगा। इस सोच से तो निकलना पड़ेगा कि दुःख भोगना ही न पड़े। इस तैयारी में ही छुटकारा है। कहना तो यही चाहिए कि ‘चाहे कितना ही समय लगे, जो मैंने किया है उसे भोगने के लिए मैं राजी हूँ, चाहे अनंत काल लगे’। अपनी तरफ से तैयारी तो दिखानी ही होगी और यही हमारा सौमनस्य होगा, सद्भाव होगा, ईमानदारी होगी, प्रमाणिकता होगी। हमें यह कहना ही चाहिए कि जब मैंने फसल बोई है, तो मैं कटूँगा, और जितनी बोई है उतनी काटूंगा। इसमें किसी और पर मैं जिम्मेवारी नहीं देता। और न कोई ऐसा सूक्ष्म रास्ता खोजना चाहता हूँ कि किसी तरह बचाव हो जाए। किसी रिश्वत से नहीं, किसी दबाव से नहीं, किसी की प्रार्थना से नहीं, मेरे किये का फल मुझे मिलना ही चाहिए।

हम तैयारी तो दिखाएँ। अगर हमारी तैयारी सच्ची है, निर्मल हृदय से है, तो एक बात समझ लेनी चाहिए, दुःख का संबंध विस्तार से नहीं, गहराई से है। दुःख के दो आयाम हैं - लंबाई और गहराई। बात सरल और सीधी सी है, अगर एक कटोरी जल को एक छोटी-सी शीशी में डाल दें तो जल की गहराई बढ़ जाती है लेकिन अगर उसे फर्श पर फैला दें तो उसकी गहराई समाप्त हो जाती है। लेकिन वह पूरे फर्श पर फैल जाती है और उसकी लंबाई बढ़ जाती है। हमने जो पाप लंबे समय तक किए हैं, कई जन्मों तक किये हैं। लेकिन अगर हम तैयार हैं झेलने को, तब उसका दर्द हम लंबे समय तक न भोग कर गहरा भोग कर,  झेल कर समाप्त कर सकते हैं। साल भर का सिरदर्द एक क्षण में भी झेला जा सकता है। पीड़ा सघन हो सकती है, प्राणांतक हो सकती है।

          यह एक बड़े आश्चर्य की बात देखने-सुनने में आती है कि रामकृष्ण कैंसर से मरे, रमण भी कैंसर से मरे, महावीर बड़ी गहन उदर की बीमारी से मरे, बुद्ध शरीर के विषाक्त होने से मरे, ऐसे महापुरुष, ऐसे पूर्णज्ञान को उपलब्ध लोग ऐसी संघातक बीमारियों से मरे? जँचता नहीं। और यहां करोड़ों है, महापापी, जो बिना कैंसर के मरेंगे। तो उनके भाग्य में ऐसा क्या लिखा है? अक्सर ऐसा हुआ है कि जिस व्यक्ति का आखिरी क्षण आ गया, इसके बाद जिसका जन्म नहीं होगा, यह उनका शरीर से आखिरी संबंध है। तब उनकी पीड़ा सघन हो जाती है, ताकि एकत्रित सारे पाप का दुःख गहरा हो जाये और फिर जनम न लेना पड़े, अन्यथा सिर्फ उन दुःखों को भोगने के लिए फिर से जनम लेना पड़ेगा। हम वर्षों-वर्षों और जन्मों-जन्मों तक भोगते हैं, वे क्षण में भोग लेते हैं। क्योंकि तीव्र पीड़ा को झेल लेना मुक्त हो जाना है। यह जरूरी नहीं कि हमें उतने ही जन्म लेने पड़ेंगे जितने जन्म तक हमने पाप किए हैं। और अगर हम तटस्थ भाव से इसे भोग सकें तो एक क्षण में जन्मों-जन्मों की कथा समाप्त हो जाती है।

          प्रार्थना मत कीजिये। अगर करनी ही है तो दुःख हरने या कम करने के लिए नहीं बल्कि ‘पाप’ न करने की कीजिये। दुःख परिणाम है और पाप कारण। अगर कारण मिट गया तो परिणाम स्वतः मिट जायेगा। प्रार्थना में क्षमा मत मांगिये, दंड मांगिए। अगर पाप करते समय उसे नहीं बुलाया तो अब भोगते वक्त किस मुंह से उसे बुलाओगे? पाप करने से रोकने नहीं बुलाया तो अब दंड भोगते समय उसे क्यों बुला रहे हो। उचित यही है कि उसे अब दंड देने बुलाओ।

         

 

 

 

 

 

एक बात और कहूँगा, दंड का विरोध मत करो, उसके आगे समर्पण करो। विरोध में  शक्ति लगेगी; अवसाद, क्रोध, अशांति घेर लेंगी। समर्पण में सहजता आ जाएगी; निश्चिंतता, क्षमा, शांति का निवास होगा। हम सोचते हैं कि एक तो पुनर्जन्म अपने आप में एक कारा-गृह का दंड है और फिर ये दुःख? ये क्या सजा के साथ-साथ जुर्माना है? लेकिन सत्य तो यही है कि किसी ने हमें कारा-गृह में नहीं डाला है। हम खुद बेहोश हैं। मोक्ष कहीं आकाश में, क्षीर सागर में, सात-समुंदर पार नहीं है, हमारे भीतर ही है। बस बेहोश मत होइये, जागृत रहिये। अपने कर्मों को भोगने के लिए तैयार रहिए।  ‘मोक्ष’ पाने की नहीं, ‘मोक्ष’ धरा पर अवतरित करने की आकांक्षा रखिये।

(ओशो पर आधारित)

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रचना-कार

आड़े-तिरछे, टेढ़े-मेढ़े, गोल-लंबे आकृतियों को जब एक विशेष क्रम में सजाते हैं तो उससे उत्पन्न होता है ‘अक्षर’।

अलग-अलग अक्षरों को किसी विशेष क्रम में सजाते हैं तब जो आकृति उभर कर आती है वह कहलाती है ‘शब्द’।

इन शब्दों को एक अनुशासन में बांधने से बनता है ‘वाक्य’।

और जब इन वाक्यों को पिरोते हैं खूबसूरती से तब निर्माण होता है एक ‘रचना’ का।

लेकिन बात यहाँ समाप्त नहीं होती, आगे चलती है।

जब यह रचना लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं तब रचना का वितरण होता है,

और सही ढंग से वितरित होने से यह रचना पहुँचती है सही पाठकों के हाथों में।

तब वह रचना सार्थक होती है।

मैंने अपने एक फ्रांसीसी परिचित को एक हिन्दी रचना भिजवाई। मिलने पर उसने भी मुझे एक फ्रांसीसी रचना  भिजवाई साथ में बताया कि ‘आड़ी-तिरछी महीन रेखाओं से बनाई हुई कलाकृतियों की पुस्तक उसे मिली और पसंद आई लेकिन उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसमें कला कृतियों की  बार-बार आवृति की गई है यह समझ नहीं पाया कि ऐसा क्यों है?’

यह पूरा कार्य जब उत्तम एवं सही तरीके से, मेहनत और पूरी लगन के साथ की जाती है तब वह बनती है कालजयी रचना। इनमें से एक में भी गड़बड़ हुई, आलस हुआ, छूट गया, समुचित ढंग से नहीं हुआ तो वह सार्थकता उपलब्ध नहीं होती जो उस रचना के उपयुक्त है।

          यह कोई पुस्तक हो, संगीत हो, कला हो, वार्ता हो, खेल हो, फल हो, पुष्प हो, वस्तु हो, निर्माण हो, प्रकृति कृत हो या मानव कृत सब पर कमोबेश लागू होती है। अंदाज़ लगायें किसी की भी सफलता के लिए कितना कुछ करना पड़ता है, यही नहीं यह सब आदि से अंत तक हमारे हाथ में नहीं है, यह एक संयोग से होता है। यह संयोग क्या होता है, कैसे होता है, क्यों होता है? इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों इसके उत्तर खोज रहे हैं, अपने-अपने ढंग से, कोई विश्लेषण से कोई संश्लेषण से, कोई जोड़ कर कोई तोड़ कर। अनेक उत्तर हैं, सब के अपने-अपने। किस को सही मानें किसको गलत यह आपकी प्रवृत्ति है। 

          कोई जोड़ किसी तोड़ की तैयारी थी या कोई तोड़ किसी जोड़ की, इसका तो पता चलता है पूर्णाहुति पर ही है। आज अपनी पत्रिका को अंतिम रूप देकर समाप्त करना था। प्रायः इसे सम्पन्न करने में रात 8-9 बज जाते हैं। लेकिन आज कार्य समय के पूर्व ही सम्पन्न हो गया, 6 बजे। इत्तिफ़ाक से! पत्रिका में एक पुस्तक, ‘द ग्रेट अडवेंचर’  से एक पन्ना दिया करता हूँ, आज भी दिया लेकिन बंद करते-करते उस पुस्तक के अंतिम पन्ने पर, जिसे नहीं भेजना था, अचानक ध्यान चला गया जिसमें एक छोटा सा एक पन्ने का उद्धरण पढ़ने लगा और मुझे वह बहुत अच्छा लगा। इसके बावजूद भी समय काफी था, अतः सोचा की चलूँ शाम की सैर कर लूँ, थोड़ी लंबी सैर करके वापस आऊँगा। निकलने के पहले एक आवश्यक फोन करना था, सोचा उनसे बात करके ही निकलूँ। लेकिन शायद वे उस समय व्यस्त थे अतः उन्होंने कहा कि वे दस मिनट बाद फोन करेंगे। इत्तिफ़ाक से! मैं 10 मिनट कमरे में नहीं रहना चाहता था अतः छोटा हलका वाला (बेसिक) फोन के बदले बड़ा भारी वाला (स्मार्ट) फोन लेकर निकल पड़ा क्योंकि फोन इसी से किया था तो फोन इसी पर आता। सैर के दौरान बात हो गई। सैर समाप्त होने के बाद साधारणतया मैं कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर, पानी वगैरह पीकर आता हूँ। लेकिन आज वैसा कुछ महसूस नहीं हुआ और ध्यान-केंद्र में  जाने की इच्छा हुई तो सीधे उसी तरफ आगे बढ़ गया। मैं रोज वहाँ नहीं जाता और फोन भी लेकर नहीं आता लेकिन आज सीधे आया था अतः फोन जेब में ही था। इत्तिफ़ाक से! सोचा कि प्रवेश करने के पहले फोन बंद कर दूँगा। कक्ष में प्रवेश करने के पहले फोन बंद करने ही वाला था कि फोन कि घंटी बज उठी। कुछ क्षणों का हेर-फेर होने पर फोन बंद होकर जेब में आ चुका होता। आज की भजन गायिका का फोन था, बता रही थी कि वह ट्राफिक में फंसी है अतः आने में देर होगी। आज यह फोन साथ में था और बंद भी नहीं था।  साधारणतया मैं यह भरी फोन साथ में नहीं रखता लेकिन आज संयोग ही कुछ ऐसा बैठा कि यही फोन साथ था। अगर वैसा संयोग नहीं होता तो फोन मेरे पास नहीं होता, बात नहीं हो पाती। खैर कक्ष में प्रवेश करते-करते विचार किया कि आज भजन और वार्ता का क्रम उल्टा कर दूँगा। आज की वार्ताकार से अनुरोध करूंगा कि गायिका को आने में कुछ विलंब होगा अतः वार्ता प्रारम्भ करें तब तक गायिका आ जाएगी।

          लेकिन कक्ष में प्रवेश किया तो पाया कि आज की वार्ताकार अनुपस्थित है। मतलब कि आज का पूरा मोर्चा मुझे ही संभालना पड़ेगा। सोचने लगा कि क्या बोलूँ?  तभी याद आया कि आज ही शाम को जो एक पन्ना पढ़ा हूँ उस पर बोला जा सकता है। और मैंने माईक संभाल लिया। मेरी वार्ता समाप्ति के नजदीक ही थी कि मैंने देखा कि आज की गायिका कक्ष में प्रवेश कर रही है। आज के इस दिन भर की परिचर्या में कई जोड़-तोड़ हुए लेकिन मुझे छोड़ और किसी को पता नहीं चला और सब कार्यक्रम सुचरू रूप से सम्पन्न हो गया।

          कितने तोड़ हुए और कितने जोड़? हर तोड़ पर उद्विग्न हुआ और हर जोड़ पर संतोष। सब जोड़-तोड़ ऐसे हुए कि किसी भी न तोड़ का भान हुआ न जोड़ की प्रतीति। कार्यक्रम बिना व्यवधान के सम्पन्न हो गया।

          कौन जोड़ता है – कौन तोड़ता है हम समझ नहीं पाते। ‘जोड़’ पर प्रसन्न और ‘तोड़’ पर हताश मत होइये। हम नहीं जानते कि रचनाकार क्या कर रहा है। जो भी है उसे स्वीकार कीजिये और उस रचयिता के अहसानमन्द बने रहिए, वह तोड़ को ठीक से जोड़ सकता है, कुछ जोड़ने के लिए ही तोड़ रहा है। 

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शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

जीवन के दर्द

 (जीवन में अनेक दुख हैं, दर्द है, कष्ट हैं।  हम उनसे बच नहीं सकते। हाँ, अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार इसे हम कम या ज्यादा महसूस कर सकते हैं। लेकिन इसके पहले, ये दर्द क्या हैं? क्या ये हमारे दुष्कर्मों का फल है? क्या यह नर्क की यातना है? क्या यह ईश्वर का दंड विधान है? या उन सब से परे ईश्ववरीय अनुकम्पा है, प्रसाद है, वरदान है?)



एक बुजुर्ग दम्पति दुर्लभ वस्तुओं की दुकानों की खोज में रहता और जहां कहीं ऐसी दुकान का पता चलता वहाँ पहुँच जाता। इसी खोज में एक बार वे इंग्लैंड पहुँच गए। उन दोनों को प्राचीन वस्तुएँ, मिट्टी के बर्तन और विशेष रूप से चाय के अनोखे कप बेहद पसंद थे। देश-विदेश से अनेक अनमोल, विशिष्ट, अद्भुत चाय के कपों का एक विशाल संग्रह उन्होंने तैयार किया था।

 

एक दिन इस ख्याति प्राप्त दुकान में उन्हें एक खूबसूरती से तराशा हुआ कप दिखाई दिया। वे उसे देखते रह गए। उनके मुंह से निकल पड़ा, "अद्भुत, अति-सुंदर! हमने कभी इतना सुंदर कप नहीं देखा। क्या हम इसे हाथ में उठा कर देख सकते हैं?"

जैसे ही दुकान की महिला ने वह कप उन्हें थमाया,  कप अचानक बोल उठा, "आप नहीं समझते, मैं हमेशा से चाय का प्याला नहीं रहा हूं। एक समय था जब मेरा रंग लाल था और मैं मिट्टी का एक लोंदा भर था। मेरे मालिक ने एक दिन मुझे उठा लिया और पूरी ताकत से मसला, मुझ में पानी डाला, मुझे बार-बार थपथपाया। मुझे अच्छा नहीं लगा, पीड़ा हुई और मैंने अनुरोध किया, मुझे छोड़ दो, जैसा हूँ वैसा ही रहने दो, मुझे अकेला रहने दो। लेकिन वह नहीं माना, केवल मुस्कुराया और बोला 'ठहरो, जरा ठहरो, अभी नहीं।”

          कप ने आगे कहा, "फिर उसने मुझे एक गोल घुमावदार चक्की पर बैठा दिया और अचानक मुझे गोल-गोल तेजी से घुमाने लगा। धीरे-धीरे उसकी गति तेज हो गई, मुझे असहनीय हो गई, मुझे लगा मेरे अंग-प्रत्यंग उखड़ जायेंगे, मैं टूट कर बिखर जाऊंगा।  मैं चीख पड़ा, चीखने चिल्लाने लगा – “मुझे चक्कर आ रहा है, इसे रोको, मुझे निकालो।” लेकिन मालिक ने केवल सिर हिलाया, मुस्कुराया और कहा, “ठहरो, अभी नहीं'।"

          फिर कुछ देर बाद उसने उसे रोका, मेरी सांस-में-सांस आई। लेकिन यह क्षणिक ही था क्योंकि इसके तुरंत बाद उसने मुझे उठा कर गरमा-गरम भट्टी में डाल दिया। मेरा तन-बदन जल गया, मुझे लगा आज तो मैं जल कर राख़ ही हो जाऊँगा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वह मुझे क्यों जलाना चाहता था।  मेरी त्वचा का रंग-ढंग ही बदल गया था, मेरी मुलायम त्वचा एकदम कठोर हो गई थी। मैं पूरे ज़ोर चिल्लाया, हाथ-पैर दीवारों पर मारे। मैं उसे देख सकता था उसने अपना सिर हिलाया और फिर वही बात दोहरा दी – ‘ठहरो, अभी नहीं।’

          मुझे ऐसा लगा की बस अब कुछ नहीं हो सकता, मेरे अंतिम दिन आ गए तभी आखिरकार उसने मुझे उस भट्टी में से निकाला और मेज पर रख दिया। मैं ठंडा होने लगा। अब कुछ ठीक है, मैंने सोचा। उसने फिर मुझे झाड़-पोंछ कर साफ किया और मुझ पर रंग करने लगा। अरे ये क्या है! वीभत्स। मुझे लगा की उसकी गंध और गैस से मैं बेहोश हो जाऊँगा। ठहरो-ठहरो – मैं चिल्लाया, लेकिन उसने फिर वही रटी-रटाई बात दोहरा दी – अभी नहीं। 

          "फिर अचानक उसने मुझे वापस एक दूसरी भट्टी में डाल दिया। यह भट्टी पहली भट्टी से दुगनी गर्म थी, मेरा दम घुटा जा रहा था। लगभग एक घंटे बाद उसने मुझे उसमें से निकाला और ठंडा होने रख दिया। कोई घंटे भर बाद उसने मुझे एक दर्पण के सामने रखा और मुझे देखने कहा। मैंने अपने आप को देखा। मैं चीख पड़ा, “नहीं मैं यह नहीं हो सकता। क्या मैं सचमुच इतना सुंदर हूँ, मेरी कल्पना से बाहर।”

          मालिक ने कहा, "मैं चाहता हूं कि तुम याद रखो। मुझे पता है कि मसलने, थपथपाने, जलाने से दर्द होता है, लेकिन अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया होता, तो तुम सूख गई होती। मैं जानता हूं कि तुम्हें पहिये पर घूमने में चक्कर आया होगा, लेकिन अगर मैं रुक जाता, तो तुम टुकड़े-टुकड़े हो गए होते। मैं जानता था कि यह दुखदायी है और भट्टी की गर्मी असहनीय है, लेकिन अगर मैंने तुम्हें वहां नहीं रखा होता, तो तुम टूट गए होते। मैं जानता हूं कि जब मैंने तुम्हें झाड़ा-पोंछा और तुम्हारे पूरे शरीर पर रंग डाला तो गैस बहुत बुरा था, लेकिन अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता, तो तुम कभी भी कठोर नहीं होते; तुम्हारे जीवन में कोई रंग न होता। और अगर मैंने तुम्हें उस दूसरे ओवन में वापस नहीं डाला होता, तो तुम बहुत लंबे समय तक बचे नहीं रहते, क्योंकि तब तुममें आवश्यक कठोरता नहीं रहती। अब तुम पूरी तरह तैयार हो और वैसी ही हो जिसकी मैंने कल्पना की थी, जब मैंने तुम्हें गढ़ना शुरु किया था।" इतनी कहानी सुना कर कप चुप हो गया।

          दंपति जैसे नींद से जागी और कप की बातों पर विचार करने लगी!  यह कप की जीवनी है या हमारी, आप की, सबों की जिंदगी का निचोड़ है!  

          वह माटी का लोंदा हम ही तो हैं। ईश्वर हमें पटकता है, मसलता है, पीटता है, जलाता है, रंगता है, झाड़ता है तब जाकर हम वैसे बनते हैं जैसे दिख रहे हैं। हमें उसका शुक्र-गुजार होना चाहिए उन सब कष्टों के लिए जिसके ताप में जल कर हम निखर उठे।

          दर्द-पीड़ा हम सब भोगते हैं, भोगते ही रहते हैं, इससे छुटकारा नहीं है। प्रकृति, जीवन, देवता हमें क्या दर्द देने के लिए दर्द देते हैं, पीड़ित करने के लिए पीड़ा देते हैं? या फिर हमें तैयार करते हैं हमारी पीड़ा और दर्द को कम करने के लिए या  किसी अन्य महान कार्य के लिए?

दर्द प्रकृति का वह हाथ है जो मनुष्य को

महानता के लिए गढ़ता है,

              एक प्रेरित श्रम क्रूरता के साथ छेनी के प्रहार से 

              कठोर पत्थर को एक अनिच्छुक सुंदर साँचे में ढालता है।

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शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

पारिवारिक त्यौहार



 वार्षिक त्यौहार दीवाली ने हमारे घर पर दस्तक दे दी है। दीवाली के आगमन की तैयारी अब अपने अंतिम चरण में है। दीवाली, जो पहले भारत का त्यौहार था अब धीरे-धीरे इसे वैश्विक दर्जा भी मिलने लगा है। अनेक देशों ने इस दिन सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी है, तो कई देशों ने इस दिन आंशिक-धार्मिक-सामुदायिक छुट्टी की घोषणा की है। कई विदेशी शहरों में भी सरकारी भवनों और पर्यटक इमारतों को रोशनी से सजाया जाता है, जिनमें मुस्लिम मुल्क भी शामिल हैं। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी गाहे-बगाहे पटाखों की आवाज सुनने लगी है, पटाखों की रोशनी दिख रही है।  आकाश दीप के गुब्बारे और छतों पर जली आकाश दीप भी दिख रही हैं। लेकिन सबसे खास बात यह है कि दीवाली हमारा पारिवारिक त्यौहार है। इसे हम अपने घर-परिवार में एक साथ मानते हैं। पूरा परिवार एक घर में जमा होता है और वहीं इसे सानंद मनाया जाता है। कोई पार्टी नहीं, कोई दोस्तों की जमघट नहीं, कोई केक नहीं। आधुनिकता और कॉर्पोरेट ने इसमें काफी दखल-अंदाजी की है लेकिन इसके बावजूद भी आज भी यह प्रमुखतः पारिवारिक त्यौहार ही है।

          कई परिवारों ने ‘बचत’ के नाम पर एक साथ जमा होना छोड़ दिया है। बच्चे, भाई-भाई, माँ-बाप अलग-अलग, अपने-अपने शहरों में मनाते हैं। ‘एक दिन के लिए आ कर क्या करेंगे, बहुत खर्च हो जाएगा!’ नहीं मिलने का रामबाण बहाना है। क्या इतना भी नहीं कमा रहे हो कि एक दिन के लिए नहीं आ सको? पूरा परिवार एक साथ हो सके! नहीं ऐसा नहीं है, बस मानसिकता हो गई है, और इसमें बच्चों का कम माँ-बाप का ही हाथ ज्यादा है। आर्थिक तंगी-दबाव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन बचपन से ही हमने उन्हें ऐसी समझ डाल दी है – परिवार बाद में अन्य सब कुछ उसके पहले। जब बच्चे छोटे थे आप को उनकी जरूरत नहीं थी, तब आकर क्या करेंगे। अब वे बड़े हो गए तब जाकर क्या करेंगे?

          लेकिन इन सब विषमताओं के विपरीत  ऐसे परिवार हैं जिनके लिए परिवार ही सबसे पहले है, अन्य सब उसके पीछे। देश के एक छोटे से शहर में पला-बड़ा और बढ़ा यह छोटा सा परिवार समय के साथ-साथ बड़ा होता गया। बच्चों को पढ़ने के लिए देश की राजधानी दिल्ली एवं अन्य बड़े शहरों की तरफ मुंह मोड़ना पड़ा। धीरे-धीरे माँ-बाप को छोड़ एक-एक कर सब बच्चे अपने शहर से निकल गए।  लेकिन प्रारम्भ से ही माँ-बाप ने एक कड़े अनुशासन का पालन किया – साल भर कहीं भी रहें दीवाली के दिन पूरे परिवार को अपने शहर में  आना होगा। सबों को बुलाया जाता था और समय के साथ अब सब आते ही नहीं थे बल्कि इस दिन की प्रतीक्षा भी करते रहते थे। सब दीवाली पर जमा होते हैं, पूरा परिवार आपस में मिलता और मिलकर उत्सव मनाता है। समय बीतता गया बच्चे अब शहर ही नहीं देश तक भी सीमित नहीं रहे। लेकिन आज भी सब बच्चे दीवाली पर अपने उसी पैतृक घर में ही होते हैं, दीवाली एक साथ मनाते हैं। यही एक दिन होता है जब पूरा परिवार – पाँच लड़के, पाँच बहुएँ और बड़े-बड़े पोते-पोतियाँ सब – एक साथ होते हैं। बिना किसी शिकन के ही नहीं बल्कि बड़े चाव से।  यही कारण है कि इतना बड़ा परिवार, सब अलग-अलग शहरों और देशों में रहने के बाद भी एक साथ है, सबों में पांडवों जैसा संबंध है, एक दूसरे के लिए खड़े हैं, साल भर एक दूसरे के पास आते-जाते रहते हैं। वह बीज जो पिता ने बोया था आज घना वट वृक्ष हो गया है। और सब मिलकर इस वृक्ष को खाद-पानी देते हैं इसकी रक्षा करते  हैं, फलस्वरूप फल-फूल रहा है।

          और एक दूसरा परिवार है, मुझे हर समय यही लगता रहा कि परिवार आधुनकिता में लिपा-पुता है। लेकिन फिर एक घटना ने मेरे विचार बदल दिये। एक पारिवारिक आयोजन था। परिवार के सदस्यगण – बेटे, बहुएँ, पोते, पोतियाँ – अलग-अलग शहरों में रह रहे थे। परिवार के सब सदस्यों के पहुंचने की बात थी। उनके अलावा अन्य पारिवारिक सदस्य, मित्र, रिश्ते-नातेदार भी पहुँच रहे थे। पोते-पोतियाँ स्कूल में थे, मैंने सोचा सब लोग तो पहुँच ही नहीं सकते। सिर्फ पता लगाने मैंने एक को फोन किया और पूछा कि कौन-कौन जा रहे हैं?

‘हमलोग सब कोई जा रहे हैं?’

‘तो बच्चे किसके साथ रहेंगे?’ मेरा अगला प्रश्न था।

‘नहीं हम सब जा रहे हैं, बच्चे भी जा रहे हैं,’ फिर से वही जवाब मिला।

मैंने फिर कहा, ‘लेकिन छुट्टी तो है नहीं, स्कूल मिस करवाओगे?’

‘और उपाय भी क्या है भैया,’ जवाब मिला।

‘स्कूल से अनुमति मिल गई है?’

‘नहीं, मैंने मांगी ही नहीं। छुट्टी तो तब मांगनी जब विकल्प हो, जाना तो है ही, तब अनुमति क्या मांगना। परिवार पहले है या स्कूल,’ उसने बिना रुके कहा, ‘छुट्टी तो सिर्फ बहाना होता है नहीं आने का, बच्चा हमारा है, परिवार हमारा है, वे कौन होते हैं हमारे परिवार के बीच में आने वाले?’

          जब ऐसे विचार हों तब परिवार चलते हैं। विघटनकारियों के विरुद्ध ऐसे ही आक्रामक होना पड़ता है, तब अस्मिता बचती है। समर्पण करने से हम अपनी सभ्यता, संस्कृति का नाश करते हैं। प्रायः यह देखने में आता है कि दुष्टों के प्रति हम डर कर दया का भाव रखते हैं और सज्जनों के प्रति आक्रामक हो जाते हैं। श्रीअरविंद तो यहाँ तक कहते हैं कि भेड़िये के द्वारा आक्रांत मेमने की तरह अपनी हत्या होने देने से कोई विकास नहीं होता, कोई प्रगति नहीं होती। भेड़िये पर आक्रमण कर अपनी और मेमने की रक्षा करनी होती है। दूसरों की नकल में विघटित मत होइये, संगठित होइये; दुर्जनों के प्रति समर्पित नहीं आक्रामक होना है। सुविधा भोगी नहीं, संरक्षक बनिये। अपने परिवार से प्रारम्भ कीजिये। अपने तीज त्यौहार अपनी संस्कृति के अनुसार मनाइये। समय के अनुसार बदलाव अवश्यंभावी है, जरूर कीजिये लेकिन उन्नति के लिए अवनति के लिए नहीं। हमारे तीज-त्यौहार जुड़ना सिखाते हैं, टूटना नहीं। आज की नहीं कल की सोचिये। दुनिया को बदलने के लिये अपने को बदलने की जरूरत है। पहले खुद बदलिये, फिर दुनिया को बदलिये। कल हमारा होगा।

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शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

सूतांजली नवंबर 2023


 

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शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

एक अवगुण छोड़िये

“जी हाँ, मैं बस एक ही अवगुण छोड़ने कह रहा हूँ। अगर एक से ज्यादा छोड़ने कहूँगा तब तो आप मेरी बात सुनेंगे ही नहीं, अतः बस एक के लिए ही कह रहा हूँ। आप केवल एक ही छोड़िये और फिर देखिये कैसे धीरे-धीरे आपका जीवन सुधरता जाएगा, जीवन शुद्ध-शांत और निर्मल हो जाएगा।” आज के सत्संग का यही सार था – एक अवगुण छोड़िये।  स्वामी जी ने यह भी नहीं बताया की कौन सा अवगुण छोड़ें, वह भी हम पर ही छोड़ दिया। 



सत्संग से उठ कर बाहर निकलते ही सुनने को मिला - “गुण हों या अवगुण, बड़ी लंबी फेहरिस्त है। वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, रामायण, धर्माचार्य, महामंडलेश्वर, गुरु, ऋषि, कथा वाचक हर समय केवल बस यही तो कहते रहते हैं – या तो कोई कथा-कहानी सुनाते हैं या फिर ये करो-ये न करो। उनकी बातें मानने लगें तो जीने लायक ही नहीं रहें। वे जो कहते हैं उसे बस वहीं छोड़ कर चले आने में ही भलाई है। क्यों ठीक कह रहा हूँ न? शायद यही कारण है कि वे अपनी कहते रहते हैं और दुनिया अपनी चाल से चलती रहती है। और तो और महर्षि पतंजलि को लें तो उन्होंने भी पाँच यम और पाँच नियम गिना दिये। एक-दो गिनाते तो  शायद उस पर फिर भी विचार कर लेते”।

“भाई साहब जरा ठहरिए! अगर एक-एक होते तो क्या आप उन पर विचार करते?”

अपनी झोंक में लेकिन थोड़ा संभलते हुए कहा, “तब-का-तब सोचते!”

“अच्छा बताइये ये पाँच-पाँच क्या हैं?”, मैंने पूछ ही लिया।

“पाँच यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और पाचवाँ .......”

“अपरिग्रह।”

“हाँ...हाँ  वही, अब आप ही बताइये इन्हें अपना लें तो कैसे जीवन चले। अपने तो बस एक ही सिद्धान्त अपना रखें हैं – व्यावहारिकता। मनुष्य को व्यावहारिक होना चाहिए, बस इससे अपना कम चल जाता है”। उन्होंने घोषणा कर दी।

“जी, ठीक कहा अपने, अहिंसा – गुस्सा तो नाक पर चढ़ा रहता है, बच्चों को डांट न लगाएँ, मजदूर को चार गाली न दें तो वे काम ही न करें। और ये सत्य, अगर सत्य बोलें तो जेल में रहें या फिर सड़क किनारे खाली कटोरा ले कर बैठे रहें, झूठ बोले बिना तो भीख भी नहीं मिलती।”

“हाँ, और नहीं तो क्या!”, मैंने जोड़ा।

“अस्तेय- चोरी न करना, अरे हम कोई चोर हैं क्या, चोरी तो न हम करते हैं और न करेंगे। चोरी तो छोड़ी हुई ही है!”

“अरे वाह! तब हम यह मान लेते हैं कि हमने एक अपना लिया है, अब हमें मुक्त करो। क्यों क्या कहते हैं आप? इसके साथ यह भी जोड़ देते हैं कि वैसे तो हम चोरी करेंगे ही नहीं लेकिन अगर कहीं गलती से, लालच से कर भी लिया तो हम प्रायश्चित भी कर लेंगे या तो उसे बता देंगे या वह सामान वापस वहीं रख देंगे। क्या दिक्कत है, ऐसा काम करें कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।” मौका देख कर मैंने कहा।

“हाँ, हाँ। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हम किसी तीर्थ पर जाते हैं तो कुछ छोड़ने कहा जाता है और हम वही छोड़ते हैं जो पहले से ही छोड़ा हुआ है। आम-के-आम गुठली के दाम।”

          चलिये अब यह समझ लें कि चोरी किसे कहते हैं। शब्दकोश का सहारा लें तब इसकी परिभाषा कुछ इस प्रकार बनती है – जब कोई किसी व्यक्ति की सम्मति या जानकारी के बिना उसका समान या संपत्ति ले लेता है या हटा देता है तो इसे चोरी कहा जाता है। यानी बिना सम्मति या जानकारी के ले लेना ही नहीं बल्कि हटा देना भी चोरी ही है।

          इस चोरी को और जरा गहराई से देखने और उस पर विचार करते-करते मुझे अपने जीवन की एक छोटी सी आपबीती याद आ गई। मैं अपने सहपाठी, सुरेश के कार्यालय में बैठा था। उसका लड़का राहुल भी वहीं था। गर्मी का मौसम था, टिफिन में आम भी था। मैंने लेने से इंकार किया और कहा कि मैंने आम छोड़ रखा है और बताया कि आम मेरे प्रिय फलों में से एक है, लेकिन उस वर्ष पूरी गया था वहाँ जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर के वट वृक्ष पर एक वर्ष तक आम न खाने  का वचन देकर आया हूँ।  राहुल ने बताया कि उसने भी इसी वर्ष वहीं आम छोड़ा है। लेकिन तभी टिफिन में रखे आचार को मैंने उठा लिया। राहुल ने बताया, “अंकल यह आम का आचार है।” मुझे बात समझ नहीं आई तो उसने  जोड़ा ‘अंकल अभी तो आपने बताया कि आपने आम छोड़ रखा है’। ‘हाँ, लेकिन यह तो आम का ......’, यहाँ तक कहने के बाद मेरी जबान तलवे से चिपक गई। मुझे सचमुच बड़ा अच्छा लगा जिसे मैं बच्चा मान रहा था उसने आम को छोड़ने के वचन को बड़ी गहराई से समझा था।

          जब आम पर उसने इतनी गहराई से सोचा तब फिर चोरी पर भी सोचने की जरूरत है। श्रीअरविंद ने चोरी का अर्थ ही बदल  दिया है।  लगभग 1905 में वे अपनी पत्नी को एक पत्र लिखते हैं जिसमें वे अपने तीन पागलपन की चर्चा करते हुए पहले पागलपन के बारे में लिखते हैं कि अगर वे अपने पास जितनी उनको  आवश्यकता है उससे ज्यादा रखते हैं तब वे अपने आप को चोर समझेंगे। उस समय उन्हें 500 रुपए माहवार मिला करते थे। उस समय के हिसाब से यह एक शाही राशि थी। यह राशि पूर्ण रुपेण श्रीअरविंद की उनकी अपनी  थी लेकिन फिर भी वे उसका अपने लिए उपयोग करना चोरी मानते थे। यह चोरी का एक अन्य आयाम है। अपना होने के बावजूद अपनी आवश्यकता  से ज्यादा रखना, जिसके पास उसका अभाव है उसकी आवश्यकताओं की चोरी करना है।

          इशोपनिषद का पहला श्लोक है:

ईशा वास्यम् इदं सर्वम् यत्किञ्च जगत्यां जगत्  ।

ते न त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ।।१।।

श्लोक के अंतिम छंद का अर्थ है ‘किसी दूसरे के धन की इच्छा मत करो’, यानि किसी दूसरे के धन की इच्छा करना भी चोरी या चोरी की तैयारी है अतः उसे भी त्यागो। चोरी को त्यागने का अर्थ है मन से, कर्म से और वाणी से उसका त्याग करना।

          सामान्यतः एक और वस्तु की चोरी करने की हमारी बुरी आदत है, वह है दूसरों के समय की चोरी। निर्धारित समय से न आ कर किसी को इंतजार करवाना उस के समय की चोरी है। अगर वहीं किसी आयोजन में जहां हम वक्ता हैं या प्रमुख अतिथि हैं और वहाँ देर से पहुँचना वहाँ उपस्थित सबों के समय की चोरी है। समय से ज्यादा बोलना अन्य वक्ता के समय की, न सुनने की इच्छा होने के बाद भी बोलते जाना, श्रोता या अन्य वक्ता के समय की चोरी ही है।

          अनिच्छा से दी जाने वाली वस्तु को लेना, बिना इच्छा के किसी के प्रेम की अपेक्षा रखना, ज्यादा लेकर कम देना यहाँ तक की कम देने की भावना रखना भी अलग-अलग प्रकार की चोरियाँ ही हैं।

          एक अन्य प्रकार की प्रचलित चोरी है – जमाखोरी। मुनासिब से ज्यादा कमाने की इच्छा से कम उपलब्ध सामग्री को जमा करना, भविष्य के लिए इतना जमा कर लेना कि दूसरे के वर्तमान के लिए भी न रहे। कोरोना के समय ऐसी वारदातें देखने को मिलीं, किसी कॉलोनी या मुहल्ले में पानी की कम आपूर्ति की खबर आने पर जरूरत से ज्यादा पानी जमा करना इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। यहाँ हम दूसरे के हिस्से का संसाधन चुरा कर खुद के लिए या खुद के मुनाफे के लिए जमा कर रहे हैं।

          अन्य के कार्य को अपना बताना या अपने होने का आभास देना तो प्रत्यक्ष रूप से चोरी है ही किसी के कार्य की उचित प्रशंसा न करना भी सूक्ष्म चोरी है। किसी के लिखे हुआ को अपना बताना, उसकी सहमति के बिना उसका प्रयोग करना तो आज कॉपी-राइट के नियमों के अंतर्गत जुर्म ही है, चोरी तो है ही।

          किसी की अनुपस्थिति में उसकी निंदा करना क्या उसकी प्रतिष्ठा, मान, मर्यादा की चोरी नहीं है? भविष्य और आने वाली पीढ़ी का ध्यान न रखते हुए प्रकृति का अनावश्यक दोहन भी चोरी का ही स्वरूप है।

            और तो और श्रीकृष्ण ने गीता के तीसरे अध्याय में कहा है :

इष्टान् भोगान्, हि, वः, देवाः, दास्यन्ते, यज्ञभाविताः,
तैः दत्तान्, अप्रदाय, एभ्यः, यः, भुङ्क्ते, स्तेनः, एव, सः  ।।3:12।।

इस श्लोक का भावार्थ यही निकलता है कि यह पूरी सृष्टि इसलिए चल रही है क्योंकि देना और लेना निरंतर चलता रहता है। देने से ही मिलता है और जो मिला उसमें से फिर देना। और जो इस कड़ी को तोड़ता है यानि सिर्फ अपने लिए लेता है देता नहीं वह चोर है। 

          आप जितना गहरे उतरते जाएंगे, चोरी के नए-नए आयाम खुलते जाएंगे। जैसे-जैसे आप उन्हें जिंदगी में उतारते जाएंगे, आपका जीवन निखरता जाएगा।

कबीर को याद कीजिये-

                 जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

                          मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ। 

किनारे बैठ कर ही अगर संतोष हो जाता है तब आपकी मर्जी लेकिन अगर मोती चाहिए तो पानी में गहरा उतरना होगा।

(डॉ.रमेश बिजलानी की वार्ता पर आधारित)

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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

दैवीय मार्ग-दर्शन

 पांडेचरी, श्री अरविंद आश्रम से हम सब परिचित हैं। भले ही वहाँ गए न हों, उस स्थान का नाम सुना है। इस आश्रम में एक साधिका रहती थीं, लंबे समय से। बल्कि यह कहना उचित होगा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही इस आश्रम को समर्पित कर दिया था। एक बार उनके परिवार की कई महिलाएं आश्रम देखने और उनसे मिलने वहाँ आईं। लौटते समय उनका चेन्नई (तब मद्रास) 2-3 दिन रुक कर, घूम-फिर कर लौटने का कार्यक्रम था। उन्होंने उस साधिका को भी साथ चलने के लिए कहा और सुझाव दिया कि वे तो चेन्नई से फिर आगे चली जाएंगी और साधिका आश्रम वापस लौट आयें। साधिका का भी मन बना और उन्हें श्रीमाँ से अनुमति भी मिल गई।



          जिस दिन यात्रा पर निकलना था उसके पहले रात्री को तेज बरसात हुई। रात लगभग 10 बजे किसी ने साधिका के कमरे का दरवाजा खटखटाया। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, भला इतनी रात कौन आया होगा? दरवाजा खोला, एक अन्य वरिष्ठ साधक दरवाजे पर खड़े थे। उन्हें देख सकपकाना स्वाभाविक था। उन्होंने उन्हें एक लिफाफा पकड़ाया और बताया कि श्रीमाँ ने उनके लिए यह एक आवश्यक पत्र भेजा है। दरवाजा बंद कर वे कुर्सी पर बैठ गईं और आशंकित मन से धीरे-धीर लिफाफा खोला। लिखा था, “तुम कहीं नहीं जाओगी”। साधिका सन्न रह गयी। उसके मंसूबों पर पानी फिर गया। उन्हें बड़ा झटका लगा, दुख हुआ, क्रोध आया, निराशा हुई। रात भर नींद नहीं आई लेकिन  श्रीमाँ की आज्ञा का पालन करते हुए उसने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया। लेकिन दुख और क्रोध में दूसरे दिन कमरे से बाहर नहीं निकलीं, खाने के लिए भी नहीं। शाम को अचानक उन्हें एक खबर मिली। जिस गाड़ी में उनके परिवार की महिलाएं गई थीं रास्ते में, गाड़ी समेत सड़क धंस गई, उनमें से कोई नहीं बचा।

          साधिका के रोंगटे खड़े हो गए। एक बार तो किंकर्तव्यविमूढ़ सी बैठी रहीं फिर बदहवास हो उत्तेजित होकर माँ के कमरे की तरफ दौड़ पड़ीं। उन्हें कमरे के दरवाजे पर रोका गया, ‘श्रीमाँ अभी व्यस्त हैं, मुलाक़ात नहीं हो सकती’। ‘नहीं, मुझे तो अभी ही मिलना है’, और वे एक प्रकार से जबर्दस्ती कमरे में घुस गईं। अब तक उनकी उत्तेजना, दुख, झटका, निराशा     क्रोध, श्रद्धा, भावुकता, समर्पण अविश्वास में तब्दील चुकी  थी। वह अपने आप को श्रीमाँ की अपराधी समझ रही थी। रो रही थीं और अपने आप को माफ नहीं कर पा रही थी। श्रीमाँ उन्हें देखते ही समझ गईं। उन्होंने उंगली से साधिका को चुप रहने और बैठने के लिए कहा। कुछ देर में जब साधिका व्यवस्थित हुई, उसकी उत्तेजना शांत हुई तब माँ ने उनकी तरफ देखा।

          “जब आप को पता था यह होने वाला है, तब आपने मुझे तो रोका लेकिन उन्हें क्यों नहीं रोका”?, साधिका का क्रोध फिर मुखर हो उठा।

श्रीमाँ ने धीरे से कहा, “क्या मेरे रोकने से वे रुक जातीं”?

          साधिका सन्नाटे में आ गई, उन्हें पता था वे नहीं रुकतीं। उनके मन में,  श्रीमाँ के प्रति न वह श्रद्धा थी न विश्वास। साधिका श्री माँ के चरणों में गिर पड़ी और धीरे-धीरे उठ कर वापस आ गई।

          श्रीमाँ, जन्मदिन पर बधाई-पत्र दिया करती थीं। जब इस साधिका को जन्मदिन पर बधाई पत्र मिला तो उसने देखा उसमें जो तारीख लिखी थी, वह उसका जन्मदिन नहीं था। उसने माँ की तरफ देखा। माँ मुस्कुरा रही थी। उसे याद आया, यह वही तारीख थी जिस दिन उपरोक्त दुर्घटना घटी थी।

          दैवीय शक्तियाँ हमेशा हमारा मार्ग-दर्शन करने के लिए कटिबद्ध रहती हैं, हमें सावधान करती रहती हैं, हमारा मार्ग दर्शन करती हैं, बशर्ते हम इस योग्य बनें कि उनकी बात सुनें और माने। ये मार्ग-दर्शन हमें उन शक्तियों से सीधे भी प्राप्त होते हैं, छठी इंद्रियों के माध्यम से या फिर किसी योग्य व्यक्ति के माध्यम से भी जिनमें हमारा अटूट विश्वास होता है, उनके प्रति हमारी श्रद्धा होती है। लेकिन क्या हमारी तैयारी है?

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शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

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