सोमवार, 18 मई 2015

साहसिक यात्रा (Adventure Tour) - मेघाताबुरु

मेघाताबुरु

मेघाताबुरु ओडिशा और झारखंड की सीमा के नजदीक एक पहाड़ी, ४३०० फीट की ऊंचाई पर स्थित  है। कोलकाता से बरबिल जाने वाली जनशताब्दी बरबिल तक जाती है और वहाँ से नजदीक ही है मेघाताबुरु। इस बार होली पर वहीं जाने का कार्यक्रम बनाया और हम बड़ी उमंग के साथ पहुँच गए बरबिल।

बरबिल पहुँचने पर पता चला कि हम मेघाताबुरु में नहीं बल्कि बरबिल में ही रहेंगे और मेघाताबुरु तो चार दिनों में केवल आधे दिन के लिए ही जाएंगे तो जबर्दस्त झटका लगा। हमारे साथ धोखा हुआ, अब तो फंस गए। बरबिल एक छोटी सी जगह। निहायत बोर। चारों तरफ केवल लाल मिट्टी की धूल । गेस्ट हाउस, थोड़ा खुला खुला सा लेकिन अंदर कहीं टहलने लायक जगह नहीं। कमरे में लंबे समय तक रह ही नहीं सकते। न  टीवी,
कोई देखने लायक दृश्य।  नलों में गर्म पानी नहीं। गेस्ट हाउस के बाहर तो निकलने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो मालूम था की हम छुट्टी आराम से बिताने  के लिए नहीं आए हैं,   एक साहसिक यात्रा (एडवेंचर ट्रिप) पर आये हैं। लेकिन  साथ ही यह विश्वास भी था कि पहाड़ी होने से मौसम खुशनुमा होगा, हरियाली होगी, पेड़ पौधे होंगे, चहलकदमी लायक जगह होगी।  यह तो हमे पहले ही बता दिया गया था कि सरांडा वन्य का भाग होने के बावजूद लोहे के  खदानों की  खुदाई के कारण हाथी तो बहुत दूर की बात है एक भी जानवर  नहीं  दिखेगा।  वैसे हमें कुछ बंदर दिख गए थे -  सड़कों पर, हनुमान / राम मंदिर में नहीं।
 गेस्ट

बहरहाल, इस प्रथम साक्षात्कार के बाद धीरे धीरे जैसे जैसे आगे के चार दिन खुले सब गिले-शिकवे दूर हो गए। जटेश्वर मंदिर एवं झील का नज़ारा, जिकरा जल प्रपात के लिए पानी की धारा में चलना  और वहाँ झरने में नहाना, मेघाताबुरु का सूर्यास्त, पचरी का जल प्रपात, जंगल में भोजन, पुंडुल में गर्म चाय बना कर पीना और पालहाटी के चौड़े बहाव का आनंद। कारो नदी के ही विभिन्न रूप एवं रंग। इतने रूप की सबका नाम नहीं, रास्ते इतने दुरूह कि लोगों के पद चिन्ह नहीं। रास्तों की लुका-छिपी, कारो का इठलाना, जंगल की नीरवता और हर जगह की स्वच्छता ने  हमारा  मन मोह लिया। इन  सब जगहों पर जाने के रास्ते आसान नहीं  हैं। या यह भी कह सकता हूँ कि रास्ते हैं ही नहीं। अगर जाना है तो रास्ते  खोजने  पड़ेंगे। पतझड़ का मौसम होने के कारण पेड़ों पर हरे पत्तों के बदले सड़कों पर पीले पत्तों की भरमार थी। पूरा रास्ता पत्तों से पटा होने के कारण सही रास्ता खोजना और भी कठिन था। पूरे रास्ते वीरान थे। कहीं कोई नजर नहीं आता था। कहीं कहीं वहीं के आदिवासी नज़र आए जो जंगलों में सूखी लकड़ियाँ बिन रहे थे। नंगा तन, भूखा पेट, दिल के साफ, सरल हृदय, जंगल के रखवाले। जंगलों की उपज से ही अपना जीवन यापन करनेवाले। कोई बड़ी ख़्वाहिश नहीं, न कोई बड़े सपने। सरकार इन्हे विस्थापित करना चाहती है। इनके जंगलों को काटती है, और वादा करती है नौकरी देने का, मुआवजा देने का। शहरी दुनिया से जोड़ने का। सोचता हूँ उन्हे शहरी दुनिया  से जोड़ने की जरूरत है या शहर के लोगों को इनसे जोड़ने की।  खैर, मैं भटक गया। हम बात कर रहे थे जंगल की, पेड़ों की, पत्तों के  रास्तों की।  गाइड ने बताया की इन रास्तों  पर इन आदिवासियों के अलावा अन्य बहुत कम लोग आते हैं। सैलानी यात्री  भी इने गिने ही आते हैं। समय समय  पर वे ही रास्तों में उग रहे झाड़-झंझाड़  की  साफ करते रहते हैं ताकि जाने आने का रास्ता बना रहे और रास्तों को खोज सकें।  वर्षा के मौसम में तो आ ही नहीं सकते। पूरे रास्तों  में और पर्यटन बिन्दु (टुरिस्ट पॉइंट्स) पर भी हमे किसी भी प्रकार की कोई गंदगी नहीं मिली – यथा कागज की प्लेटें, चिप्स के ठोंगे, पानी की बोतलें, टेट्रापैक। यह इस बात का प्रमाण था कि  यह इलाका अभी भी  महफूज है। सिर्फ एक जगह पर हमें कूड़ा मिला, और इस लिए हमें वहाँ वक्त भी कुछ ज्यादा लगा। पूरा  कूड़ा  जमा किया, उन्हे जलाया और फिर आग को बुझाने के बाद ही  हम वहाँ से निकले। गाइड के साथ हमारे खाने पीने का सामान था और साथ था कूड़े को बटोरने के लिए थैला, जिसमें हम अपना पूरा कूड़ा समेट कर वापस ले आए।

जटेश्वर मंदिर एवं झील
जैसा की नाम से परलिक्षित होता है शिवजी का छोटा सा मंदिर है। काफी ऊंचाई से, पत्थरों के बीच से, एक एक बूंद पानी टपकता है, छोटे से  शिवलिंग पर। बड़े बड़े पत्थरों को आश्चर्यजनक रूप से  वृक्षों ने ऐसे जकड़ रखा है कि  दोनों ही  हिल नहीं सकते।  वहीं पर है जटेश्वर झील। नीरव एवं शांत। कहीं कोई हलचल नहीं। न कोई मनुष्य, न जानवर और न ही शाम होने के बावजूद कोई पक्षी। कहीं कोई गंदगी भी नहीं। झील के किनारे चलते चलते अचानक एहसास हुआ कि हम निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं। गाड़ी के आने का कोई रास्ता नहीं है, हमें उतना ही वापस भी जाना होगा। और तब, और थोड़ी देर, कि इच्छा को मन में दबा कर कुछ देर पत्थरों पर विश्राम कर वापस लौट पड़े।

जिकरा
साफ सुथरे निरंतर बहते पानी में रुकते-चलते, चढ़ते-उतरते ही पहुंचा जा सकता है जिकरा जल प्रपात पर। करीब  १०० फीट कि ऊंचाई से गिरती पतली जल धारा को कुछ देर निहारने के बाद आगे बढ़ कर उसके नीचे खड़े हों तभी आनंद है यहाँ आने का। कहते है मानसून में जल का बहाव बढ़ जाता है, धारा मोटी, चौड़ी और तेज  हो जाती है, लेकिन फिर भी उसमें से चलकर आया जा सकता है और स्नान का आनंद उठाया जा सकता है।

मेघाताबुरु
छोटी सी पहाड़ी पर, थोड़ी ठंड भी, आँखों के सामने पसरी  दूर दूर तक पहाड़ियों की चोटियाँ। हम  गिन नहीं सकते कि आँखों की गिरफ्त  में कितनी पहाड़ियाँ और चोटियाँ है। सेल का अतिथि गृह भी वहीं दर्शनीय स्थल (व्यू पॉइंट) पर। सबकी आँखें क्षितिज पर सूर्य के  छिपने की प्रतीक्षा में। और यह लीजिये सूर्य का रथ धीरे धीरे हमारी मनोकामना की पूर्ति करता ले चल सूर्य को क्षितिज के नीचे। मनमोहता दृश्य एवं रंग बदलता सूर्यास्त। सब कुछ मन के अनुकूल, लेकिन सबसे ज्यादा खला न चाय, न पकौड़ा, न मूड़ी, न चनाचोर। वहाँ से निकल कर बस्ती में चाय पी कर हम भी चले अपने घर को।

पचरी एवं पुंडुल जल प्रपात एवं जंगल
आज जंगल में मंगल का दिन था। कारो नदी के और दो अलग अलग रूप। पचरी झरने की दुरूह ऊंचाई तक चढ़ना सब के संभव नहीं। चड़ाई थोड़ी ही है लेकिन सीधी। इन झरनों के लिए जाते हुए रास्तों में प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा था कि हम बीहड़ जंगल में घूम रहे हैं। साल एवं टीक के वृक्षों से पटा, जहां तहां महुआ के पेड़ भी दिखे।  लेकिन, पूरा जंगल  एकदम वीरान। भयानक सन्नाटा। एकदम वैसी ही अनूभूति जैसे चलते फिरते गाँव से रातों रात ग्राम वासियों को हटा दिया गया हो। पूरा गाँव जागता सा दिखे लेकिन जीवन कहीं नहीं। वैसा  ही पूरे जंगल का रूप लेकिन जानवर जैसे  रातों रात छोड़ कर चले गए। कैसा दर्द हुआ होगा उन्हे, पीढ़ियों से रहते जंगल को छोड़ कर जाते हुवे? और कैसे रोये होंगे ये वृक्ष साथ न चल पाने की मजबूरी के कारण।  वहीं स्वपनेश्वर मंदिर के किनारे  सूखे  पत्तों और लकड़ियों को बटोर कर गरमा गरम चाय बनाने  का  मजा  लेना  न भूलें।

पालहाटी
कारो का एक और रूप। एकदम खुली जगह। चौड़ा पाट। कहीं धीरे कहीं तेज धारा। कहीं गहरा कहीं घुटने भर। इच्छानुसार जगह चुन कर बैठ जाइये। मन भर जाए तो  जगह बदल लीजिये। इस प्रकार से अठखेलियाँ करते बहुत समय निकल जाएगा पता ही नहीं चलेगा। जब पेट में दस्तक होगी तब घड़ी दिखेगी और तब होश आएगा कि नाश्ते का समय हो गया है। अत: इसका इंतजाम पहले से रखिए, कुछ साथ में कुछ गरमा गरम। तभी ले पाएंगे पालहाटी का आनंद।

यहाँ से निकलते निकलते पता चला कि, अरे ये क्या? ट्रेन का समय हो चला, वापस लौटने का!
एक दृश्य, गेस्ट हाउस से
जटेश्वर मंदिर, पेड़ों द्वारा जकड़े हुवे चट्टान एवं जंगल

जकिरा

 सूर्यास्त के अलग अलग रूप और रंग, मेघाताबुरु से

पुंडुल

पालहाटी

जंगल, उफनती कारो और शांत कारो को  गाड़ी से पार करते

1 टिप्पणी:

sourabhtyagioffice@gmail.com ने कहा…

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