रविवार, 23 अप्रैल 2017

मेरी यात्राएं

राजस्थान की खुशबू – वृन्दावन के रंग

घुमक्कड़ी का शौक रहा है। वर्ष भर घूमता ही रहता हूँलेकिन नजर केवल वहीं पड़ती है जहां नहीं गया। दो जगहों पर काफी समय से जाने की इच्छा थी – होली पर वृन्दावन और राजस्थान में बिकानेर, श्यामबाबा, सालासर धाम और झुनझुनु। लेकिन, इच्छा रहने के बावजूद भी जाना नहीं हो रहा था। दरअसल, किसी का साथ ढूंढ रहा था और कोई मिल नहीं रहा था। ऐसा नहीं है कि वहाँ कोई नहीं जाता। बल्कि हर वर्ष इन जगहों पर लाखों लोग जाते हैं। बार बार जाते हैं। लेकिन प्राय: तूफानी दौरे पर रहते हैं। सुबह की फ्लाइट से दिल्ली या जयपुर गए। सब जगहों का चक्कर लगाते हुवे रात तक वापस। मुझे स्थिर हो कर आराम से, धीरे धीरे, उन जगहों की माटी की सोंधी सुगंध लेते हुवे, जीवन का अहसास लेते हुवे जाना था। ऐसी फुर्सत में जाने वाला कोई मिलता नहीं था। अत: जब अचानक ही होली पर वृन्दावन चलने का निमंत्रण मिला तो तुरंत बिकानेर, खाटू, सालासर और झुनझुनु को भी सफलता पूर्वक यात्रा में शामिल करवा लिया। और इस तरह 12 दिनों की यात्रा पर हम चार लोग निकल पड़े राजस्थान की तरफ, रंगों के त्योहार होली तक वृन्दावन पहुँचने के कार्यक्रम से।

चितपुर के कोलकाता रेलवे स्टेशन से सीधे बिकानेर के लिए प्रताप एक्सप्रेस पर सवार हो गए। ट्रेन के इतिहास को देखते हुवे हमलोगों ने यह मन बना लिया था कि गाड़ी कुछ देर से छूटेगी और काफी विलंब से गंतव्य यानि बिकानेर पहुंचेगी। विचारानुकूल गाड़ी निर्धारित समय से 2 घंटे बाद छूटी और 6 घंटे विलंब से पहुंची। रास्ते का नजारा देश के हर जगह के नजारे से भिन्न था। न कहीं कोई जलाशय, न नहर, न हरियाली, न खेत, न बस्तियाँ। हर जगह बंजर भूमि, बालुकामय प्रदेश, झाड़ झंगड़। दर असल ये ही, जिसे हम झाड़ झंगड़ समझ रहे थे, यहाँ की खेती, फसल, गायों का चारा है। जहां कहीं बस्तियाँ दिखीं, कहीं भी खपरैल के मकान या मट्टी की झोपड़ी नहीं दिखी -  न ट्रेन से, न बाद में गाड़ी में सफर करते समय। हर जगह छोटे छोटे पक्के मकान ही दिखे।  टैक्सी स्टेशन पर तैयार थी, हम सीधे होटल सागर निवास पहुंचे।

सही माने में बीकानेर जाने का कोई प्रयोजन नहीं था। लेकिन मेरी वहाँ जाने की इच्छा दो कारणों से थी। पहला-करनी माता का चूहों का मंदिर देखने की तमन्ना थी, दूसरा-राजस्थानी साहित्य और टेस्सिटोरी से रूबरू होने की इच्छा थी। इसकी खोज खबर लेने हम सीधे पहुँच गए राजकीय संग्रहालय पर। रविवार और मरम्मत के  कार्य के कारण संग्रहालय में किसी से मुलाक़ात नहीं हुई। टेस्सिटोरी के मकबरे का भी सही पता नहीं चल पाया। लेकिन संग्रहालय के प्रांगण में डॉ.टेस्सिटोरी की संगमरमर की लगी मूर्ति दीख पड़ी।
संग्रहालय के सामने टेस्सिटोरी की मूर्ति

 इसकी स्थापना 1995 में श्री हजारीमल बांठिया, कानपुर एवं श्री तनसुखराज डागा, बीकानेर ने करवाया था। इससे इस बात की आशा जगी कि अगले दिन संग्रहालय के निर्देशक से कुछ सामग्री या जानकारी  मिल जाएगी। लेकिन वैसा हो नहीं सका। मरम्मत के कार्य के कारण कार्यकाय बंद था और निर्देशक महोदय यात्रा पर बाहर गए हुवे थे। लेकिन सौभाग्य से, वहाँ के एक कर्मचारी से डॉ.टेस्सिटोरी के मकबरे का पता चला और वहाँ पहुँच ही गए। छोटे से कब्रिस्तान में डॉ.टेस्सिटोरी का मकबरा है। संगमरमर से क्रॉस का चिन्ह बना हुआ है। संगमरमर के ही पत्थर पर एक तरफ राजस्थानी में लिखा है,”डॉ.एल.पी.टेस्सिटोरी री समाधि रो निर्माण खादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट री प्रेरणा सूं फूलचंद बांठिया री स्मृति में बांरा पुत्र श्री हजारीमल बांठिया ता. 22-11-56 नै करायौ”।  
डॉ.टेस्सिटोरी का मकबरा

मकबरे पर छतरी का निर्माण भी शायद उन्होने ही कराया होगा। टैक्सी का ड्राईवर हमारी इस भाग दौड़ से जरा सा परेशान भी था और आश्चर्यचकित भी। इस नाम से वह तो समझ रहा था कि ये हमारे कोई रिस्तेदार तो नहीं हो सकते। लेकिन कौन हैं? आखिर उससे नहीं रहा गया तो उसने पूछ ही लिया। मैंने उसे डॉ.टेस्सिटोरी की राजस्थानी भाषा और साहित्य में योगदान की बात बताई तो श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। तुरंत गाड़ी से कपड़ा लाकर कब्र पर जमी धूल हटाई और प्रणाम किया। ड्राईवर का मौन श्रद्धा सुमन मेरी मेहनत की सफलता की पूरी कहानी कह गया।

बिकानेर से करीब 30 किलोमीटर पर है प्रसिद्ध करनी माताका मंदिर। यह मंदिर चूहों के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में चूहों की भरमार है। चूहे माता को लगाए गए भोग का निरंतर भोग लगाते रहते हैं और वही प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को भी दिया जाता है। किसी समय तो चूहों की ऐसी भरमार थी कि पैर उठा लेने पर रखने की जगह नहीं मिलती थी। अत: पैरों को घसीट कर चलना 
करनी माता का मंदिर

पड़ता था। चूहे यात्रियों के पैरों और बदन पर बेखौफ चढ़ जाया करते थे। आज यह मंदिर विदेशी सैलानियों के लिए, चूहों के कारण, एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर के विशाल गुंबद के निर्माण का कार्य जारी है। मंदिर देशनोक रेल्वे स्टेशन के नजदीक ही है। चाँदी के दरवाजे, सोने-चाँदी का सिंहासन एवं  गुंबज, नक्काशीदार संगमरमर के खंबे तथा दरवाजे मंदिर की खूबसूरती बयान करती हैं। कहा जाता है कि करनी माता की प्रेरणा से ही राव बीकाजी ने बीकानेर की स्थापना की थी।

राजस्थान केवल रेगिस्तान नहीं है। यहाँ केवल हवेलियां और किले ही नहीं हैं। यहाँ घूमते फिरते बहुतायत में गायें एवं गौशालाएँ दीख पड़ेंगी। यहां बूढ़ी, अंधी, लाचार गायों को संरक्षण मिलता है। इन गौशालाओं में हजारों की संख्या में गायें हैं जिनका भरण पोषण “दान” के ही सहारे होता है। इनका लक्ष्य गाय के दूध से कमाना नहीं बल्कि गाय की सेवा करना ही है। भारत में सबसे ज्यादा गायें राजस्थान में ही हैं। यह अपने आप में एक विलक्षण अनुभव था। श्री रामसुख दास जी का स्थान नकदीक ही है। उनके पास बड़ी संख्या में श्रद्धालु आया करते थे और उनकी प्रेरणा से गौशाला को समुचित अनुदान भी मिल जाता था। लेकिन उनके देहांत के बाद अनुदान कम हो गया है। आमदनी से खर्च ज्यादा है।

बीकानेर में देश का ऊंठों का सबसे बड़ा केंद्र है जहां अलग अलग जातियों और नस्लों के ऊंट देखे जा सकते हैं। ऊंठों की अनुसंधानशाला भी है। यहाँ अगल बगल में देखने और बताए जाने पर ऊंटों 

के रंग और बनावट में साफ फर्क नजर आया। केवल देखने में ही नहीं लेकिन गुणों में भी भेद है। कोई नस्ल दूध ज्यादा देती है, कोई ज्यादा माल ढो सकता है तो कोई रेगिस्तान में बिना पानी के ज्यादा दिन रह सकता है, आदि आदि। अपनी आवश्यकता के अनुसार ही चयन करके लोग यहाँ से ऊंट लेते हैं।

शाम बल्कि रात ही कहना चाहिए, 10 बजे के बाद, बीकानेर के प्रसिद्ध लक्ष्मी नाथ जी के मंदिर में शयन आरती के दर्शन करने गए। कम से कम एक बार सुनने और देखने का तो बनता ही है। शयन आरती की राग एकदम अलग है। प्रत्येक अक्षर को लंबा टानते हैं। कहा जाता है कि बीकानेर  की नींव इसी मंदिर से शुरू हुई थी।

बीकानेर अगर पर्यटन की दृष्टि से आए हैं तो जूनागढ़ तो देखना ही होगा। जूनागढ़ के नाम से एक 
जूनागड़ में दरवाजे पर चित्र
जूनागड़ का भीतरी हिस्सा

शहर है, गुजरात में। इस किले से उसका क्या संपर्क है? यह मेरे समझ में नहीं आ रहा था। पूछे बिना नहीं रह सका। पता चला “जुणा” एक राजस्थानी शब्द है जिसका अर्थ है पुराना या पहले वाला। जगह की कमी होने के बाद एक नया गढ़ बनाया गया, तभी से इसे “जुणा” कहा जाने लगा और यही इसका नामकरण हो गया। गढ़ विशाल है, अनेकोनेक कमरे, गलियारे, छोटे बड़े अनेक सभाकक्ष भी हैं, फिर यह छोटा कैसे पड़ गया? बड़ों की बड़ी बातें। अपने दिमाग न ही लगायें तो अच्छा।

शहर की सबसे विलक्षण बात लगी शहर के सीने को चीर कर जाती हुई रेल। वैसे तो रेल पुराने शहर के परकोटे के ठीक बाहर ही है। लेकिन यह तो दशकों पहले की  बात है। नया तो नया पुराना शहर भी इस परकोटे के बाहर कई गुना बढ़ चुका है। लेकिन  रेल की पटरी अब शहर के बीचों बीच हो गई है और वहीं की वहीं मौजूद है। रेलवे स्टेशन भी पास में ही है। शायद इसी कारण रेल पटरी को दूर करने में दिक्कत है। यह बीकानेर रेल मार्ग की प्रमुख पटरी है। बिकानेर आने जाने वाली सब गाडियाँ इसी पटरी से गुजरती हैं। एक ही पटरी होने के कारण चौड़ाई भी बहुत कम है। एकदम ऐसा लगता है जैसे रेल सड़क को चीरती हुई कोलकाता की बांसतल्ला या बड़तल्ला में या फिर दिल्ली की चाँदनी चौक की संकड़ी गलियों में घुस गई। जैसे रेल में बैठे बैठे या घर के चबूतरे से हाथ बढ़ाकर खाने   का टिफिन ले लें या दे दें।

वैसे तो यहाँ दो दिन रहा और गाड़ी में पुराने शहर की पुरानी गलियों के चक्कर भी लगाया। लेकिन शहर से साक्षात्कार हो नहीं पाया। ठहरना नए शहर में हुआ था और घूमना गाड़ी में। अत: शहर से अपरिचित सा ही रहा। सुना था कि होली के समय शाम को खुले में अच्छे एवं मधुर राजस्थानी फाग के गीत सुनने को मिल जाएंगे। लेकिन न कुछ दिखा न सुना। हाँ, दो बाते हुईं। पहली, बिकनेर के कपड़े, विशेष कर बंधेज की साड़ी और मसाले खरीदने के चक्कर में कुछ समय शहर घूमा, देखा और अनुभव किया। अपना सा लगा, देखा सुना परिचित सा।  और दूसरा, एक मित्र कि अनुकंपा से  लेखक श्री शुभू पटवा जी का आतिथ्य स्वीकार किया। उनके घर पर जैसे पूरी राजस्थानी संस्कृति के दर्शन हो गए। भोजन और खाने की व्यवस्था तो राजस्थानी संस्कृति के अनुरूप थी ही, मनुहार – परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा, साथ में क्या और कैसे खाना है इसके निर्देश एवं उस क्रिया में सहयोग। राजस्थानी होने के बावजूद, ऐसा मैंने इसके पहले कहीं नहीं देखा था और इस बात की आशा भी नहीं है कि कभी देखूंगा। उनके आतिथ्य में हम सबों का रोम रोम भीग गया।

बीकानेर से रेल द्वारा जयपुर पहुंचे और स्टेशन से ही गाड़ी से निकल पड़े सीधे खाटू श्याम बाबा के दर्शन के लिए। वार्षिक मेले का समय था। भीड़ मिलने की पूरी आशा थी। लेकिन जब भीड़ के दर्शन हुवे तो हिम्मत जवाब दे गई। कल्पना के बाहर लोगों का जमावड़ा, बेशुमार गाड़ी, बसें और ट्रैक्टर। इसके ऊपर गर्मी। मन बना लिया कि सुविधा पूर्वक जहां तक जा सकूँगा, जाऊंगा और वहीं से हाथ जोड़ कर वापस हो लूँगा, बाकी साथी जो करना चाहें करें। व्यवस्था सुचरू होने के कारण इन सबके बावजूद कहीं जाम नहीं, गंदगी नहीं, शोरगुल नहीं। टैक्सी चालक एक के बाद एक प्रवेश स्थल को पार करता हुआ गाड़ी आगे ही बढ़ाये जा रहा था। कोई जानकारी न होने के कारण न तो कुछ पूछने कि अवस्था में थे न बता सकने की। फिर अचानक लगा कि मेला तो पीछे छूटता जा रहा है। शायद हमारी खामोशी और चेहरों से हमारे प्रश्न को ड्राईवर ने पढ़ लिया। खुद बताया कि ऐसी जगह ले जा रहा हूँ जहां से मंदिर नजदीक पड़ेगा, जाने में सहूलियत रहेगी और निकल कर आगे के सफर पर बढ़ने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। हम खामोश बने बैठे रहे। गाड़ी लगाई। उसने निर्देश दिये लेकिन अंत में कहा, “उसके बाद आप जाने और जाने आपका श्याम बाबा”। ऊहापोह में हम उसके निर्देशानुसार आगे बढ़ने लगे।  लोगों का आना जाना तो लगा हुआ था लेकिन वह रेलम-पेल, भीड़ भाड़  कहीं नजर नहीं आई। लोगों के साथ साथ चलते हुवे एक दरवाजे पर पहुंचे। देखा, दरवाजे पर तैनात पुलिस, लोगों का परिचय पत्र देख कर ही जाने दे रहा है। किसका पत्र, कैसा पत्र? कोई जानकारी नहीं। हमारे पास न तो किसी का कोई पत्र, न कोई पहचान, न कोई परिचय। जैसे ही दरवाजे पर पहुंचे, पता नहीं कहाँ से एक अधिकारी आ पहुंचा हमें हाथ जोड़ा और आगे बढ़ने का इशारा किया। तैनात सब पुलिस कर्मी पीछे हट गए। दरवाजे को पार करते ही दर्शनार्थियों का अथाह सागर दिखाई पड़ा। लेकिन हम कुछ ही मिनटों में  ठाकुर के सामने थे, दर्शन किया और वापस। लौटने पर अहसास हुआ कि जिस कार्य के लिए आए थे वह तो आशा के विपरीत बड़ी सुगमता से और द्रुत गति से हो गया। कैसे हुआ? श्याम बाबा ही जाने।

महाभारत के युद्ध की नींव पड़ चुकी थी। कौरव और पांडव अपने अपने मित्रों से सहायता एकत्रित करने में लगे हुवे थे। कौरवों ने बड़ी चतुराई एवं छल से पांडवों के संबंधी शल्य को अपनी तरफ कर लिया था। शल्य अतुलनीय सारथी थी। रथ हाँकने में उसका कोई सानी नहीं। युद्ध में चतुर सारथी की बहुत बड़ी भूमिका होती है। अर्जुन यह समझते थे और इसलिए चिंतित भी। कर्ण का रथ शल्य चलाएँगे और अगर उसके पास कुशल सारथी नहीं हुआ तो कर्ण को परास्त करना दुर्भर हो सकता है। शल्य की बराबरी केवल कृष्ण कर सकते थे। शायद यही कारण था कि अर्जुन ने कृष्ण का चुनाव किया। एक अच्छे सारथी का महत्व हमलोगों के समझ में आ रहा था। उसने हमारी पूरी यात्रा को सफल, सुखी एवं आरामदायक बना दिया था। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमें खाटू श्याम बाबा के यहाँ मिला और उसके बाद भी हर जगह हमने उसके सूझ-बूझ और अनुभव को महसूस किया।

रात का पड़ाव सालासर धाम में था, लेकिन हमारे पास समय भी था और फुर्सत में भी थे। अत: ड्राईवर के सुझाव पर गाड़ी जीण माता की तरफ घुमा ली। यहाँ मेले का समय नहीं होने के कारण यात्री बहुत कम थे। लेकिन वहाँ लगी दुकानें, मंदिर तथा अन्य व्यवस्था देख कर प्रतीत  हुआ कि मेले के समय लाखों श्रद्धालु यहाँ जमा होते होंगे। धर्म के नाम पर लोगों में कैसा कैसा उन्माद छा जाता है। लोग धर्म के नाम पर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहते हैं। एक दमड़ी न खर्च करने वाले भी लाखों रुपए लुटा देते हैं। बिना किसी शारीरिक क्षमता के अनेक शारीरिक कार्य कर गुजरते हैं। कई बुद्धिजीवियों को इन सबों से शिकायत है, नफरत है, चिढ़ है। उनके विचार से धन और बल का इससे ज्यादा दुरुपयोग और नुकसान कुछ नहीं हो सकता। इतनी मेहनत और धन किसी सत्कार्य पर खर्च किया जाय तो मनुष्य की बहुत सी समस्याएँ हल हो जाएँ। मुझे भी यह सोच कर आश्चर्य होता है कि यह वर्ग  यह क्यों नहीं देख पाता कि वह सत्कार्य, जिसके वे चर्चा कर रहे हैं, इसी से निकल कर आती है। वे यह क्यों नहीं समझ पाते कि यह एक ऐसा उन्माद है जिससे अनेक रचनात्मक और सृजनात्मक कार्य हुवे थे और हो रहे हैं। इसको सही दिशा दे कर असंभव कार्य कराये जा सकते हैं, और कराने वाले कराते भी हैं। गरीबों एवं जरूरतमंदों के लिए अनेक पाठशालाएं, औषधालय, धर्मशालाएँ, भवन एवं सड़कों का निर्माण इसी उन्माद की देन है। अब पढ़े लिखे और धनवान लोगों में यह उन्माद न होने के कारण पाठशालाएं नहीं बनती हैं, शिक्षा का व्यापार होता है। रोगियों के लिए अस्पताल नहीं बनते, मल्टी स्पेसियलिटी हॉस्पिटल के नाम से कारखाने खुलते हैं, धर्मशालाएँ नहीं बनती होटल बनते हैं। पहल सही दिशा देने की होनी चाहिए, विराम चिन्ह लगाने की नहीं।

जब तक सालासर धाम पहुंचे अंधकार घिर आया था। ठहरने कि व्यवस्था करने के पहले बाबा के दर्शन करने का मन में आया। मंदिर में गए। बड़ी निराशा हुई। जरा भी श्रद्धा या भक्ति भाव नहीं जगा। लगा जैसे कोई दर्शनीय स्थल देखने आए हैं जिसके लिए केवल चंद लमहे दिये जाते हैं। लम्हे जहां मिनटों में बदले, कि आगे बढ़ने की हुंकार। और ये लम्हे भी सामने से गुजरने के नहीं, बल्कि किनारे से निकल जाने तक ही सीमित है। मेले का समय हो, भीड़ हो तब ऐसी व्यवास्था समझ में आती है। लेकिन आम दिन भी वही। यही हाल था ठाकुर के भोग का। मंदिर में तैयार मिलता है। खरीद लीजिये और छुट्टी। ठहरने की जगह भी रास नहीं आई। गंध ऐसी मिली कि आम जनता कम आती है, लक्ष्मी पुत्र ही ज्यादा आते हैं। मन खट्टा हो गया। हो सकता है मेरा आकलन गलत हो। लेकिन मैं यहाँ से निकला इसी उधेढ़-बुन में, बुझे मन से।

यहाँ से निकालकर सीधे पहुंचे फ़तेहपुर धोली सती दादी के। फ़तेहपुर में कई सती मंदिर के दर्शन 
किए। हर मंदिर में उत्तम व्यवस्था। इन मंदिरों एवं सतियों का भी एक अलग ही किस्सा है। सार्वजनिक होते हुवे भी ये सब मंदिर एक प्रकार के निजी मंदिर से हैं। अलग अलग वृहद परिवार की अपनी अपनी सती दादी। सब परिवार पैसे वाले। अच्छे रुपए खर्च करके एक से एक मंदिर स्थापित कर लिए, व्यवस्था कर दी। सब अपनी अपनी सती को पूजते हैं। हाँ, झुनझुनु की राणीसती दादी इनमें सबसे प्रमुख है जिसको सब मानते हैं। शायद उनका इतिहास सबों से अलग है।

मंडावा होते हुवे झुञ्झुणु पहुँचे। ड्राईवर ने बताया कि मंडावा की कोठियाँ देखने लायक हैं और शिवलिंग भी। लेकिन फ़तेहपुर से यहाँ का रास्ता भी अच्छा नहीं था और भूख भी लगने लगी थी। अत: गाड़ी में बैठे बैठे जितना दिखा वही देखा और आगे बढ़ गए। बाद में इसकी वृस्तित जानकारी मिली तो अफसोस हुआ। लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग  गई खेत।

मंडावा से झुञ्झुणु चले तो विचार राणीसती मंदिर में ही ठहरने का था। लेकिन फिर वहाँ मोदीजी की हवेली में व्यवस्था हो गई। कोठी शहर के बाज़ार में है। अच्छा हुआ। यहाँ ठहरने से शहर देखने, सुनने और समझने का मौका मिला। अपने वतन का यही फर्क है। राजस्थान में कहीं भी चले जाएँ लगता है अपनों के ही बीच हैं। कोठी काफी बड़ी है, व्यवस्थित है और बे-हिसाब खिड़कियाँ हैं – 
400 खिड़की की कोठी का एक भाग

400 खिड़की वाली कोठी के नाम से भी जानी जाती है। विशाल मंदिर और वैसी ही व्यवस्था। मेला तो नहीं था और न ही मेले जैसी भीड़, लेकिन मेला सा ही लगा हुआ था। मंदिर का अपना भोजनालय भी है और कैंटीन भी जो 12हों महीने चलता है। मेले के समय तो इतने कमरे काम में आ जाते हैं। बाकी वर्ष भर बंद ही पड़े रहते हैं। 

यहाँ से अब हमारी यात्रा वृन्दावन की तरफ बढ़ी। जयपुर से ट्रेन लेनी थी। रास्ते में शाकम्बरी देवी के पहुँच गये। मेरे नयनों में, कई दशकों पहले जब आया था उस समय की धुंधली सी याद थी कि यहाँ का प्रकृतिक सौंदर्य देखने लायक है। मार्ग ने निराश नहीं किया। अभी तक के बालुकामय रास्ते तथा झाड-झंखाड़ देखते-देखते आँखें दुखने लगी थी। यहाँ आँखों को राहत मिली। मनोहारी एवं मनोरम दृश्य देख कर आँख ठंडी हुई। लेकिन मंदिर पर पहुँच कर फिर वही कंक्रीट के टीले। कुछ पता नहीं चलता कि इसके बाहर प्रकृति ने कैसी छटा बिखेर रखी है। भोजन का समय हो चला था। मंदिर के बासे में भोजन तैयार था। कार्यकर्ताओं के मनुहार के सामने हमने अपने हथियार डाल दिये और सुस्वादु प्रसाद ग्रहण किया। न बासे ने, न मंदिर के कार्यालय ने  किसी प्रकार का अनुदान स्वीकार किया। अंत में दान पेटी में ही श्रद्धा सुमन चढ़ाये। यहाँ से जयपुर, जयपुर से ट्रेन से सीधे मथुरा पहुंचे।

वृन्दावन, मथुरा, बरसाना, नंदगांव, गोकुल, एक शब्द में कहूँ तो ब्रजभूमि। कृष्ण की जन्मभूमि, बाल गोपाल की लीलाओं की साक्षी भूमि, राधा के रज की भूमि, गोपियों के विरह गीत से गुंजित भूमि। पिताजी के रहते कभी यह खयाल नहीं आया कि वृन्दावन में क्या करेंगे, कहाँ ठहरेंगे। ठहरने के लिए बिरागी बाबा का आश्रम था और पूरी दिनचर्या उन्ही के इर्द गीर्द घूमती थी। लेकिन अब दोनों ही नहीं रहे। ठहरने कि विशेष समस्या थी। जगह अच्छी भी चाहिये थी सस्ती भी और बाँके बिहारी के मंदिर के नजदीक भी। खोज खाज कर मोर भवन में आरक्षण भी करवा लिया था। अत: निश्चिंत था। लेकिन गाज गिरि। रात 9 बज गए थे, वर्षा भी हो रही थी। भवन वाले ने भवन का सबसे गंदा कमरा खोल दिया। वहाँ ठहरना संभव नहीं था। खैर, ठाकुर की कृपा। रात तो जैसे तैसे कहीं और गुजारी और सुबह जयपुरिया भवन में आ गए। इस समय इसमें जगह मिलना अपने आप में एक आश्चर्यजनक घटना थी। महंगा तो पड़ा लेकिन 5 दिन आवास ठीक न हो तो गुजारना कठिन हो जाता। मंदिर - धार्मिक स्थलों में घूमना और बाँके बिहारी के दर्शन करना। यही दिनचर्या रही।
बाँके बिहारी मंदिर का समय
 वृन्दावन की होली की स्मृति नहीं थी। सब कुछ नया और पहली बार सा लगा। कुछ अच्छा - कुछ बुरा। लेकिन मन लगा, श्रद्धा हुई, भीड़ में पिसे लेकिन कई बार दर्शन किए। मेरी निगाह में यह पहला मंदिर है जो ब्रह्म-मुहूर्त में नहीं खुलता। दर्शन 8-9 बजे ही होते हैं। क्यों? अरे यहाँ के ठाकुर तो बाल गोपाल हैं। बच्चा तो देर से धीरे धीरे अंगड़ाई लेते हुवे ही न उठेगा। भोर में कैसे उठेगा? और एक बात, बाँके बिहारी के दर्शन लगातार नहीं कर सकते। बार बार बीच में पड़दा लाकर ध्यान भंग कर देते हैं। कहते हैं, एक भक्त ऐसा आया, बिहारी जी को एकटक देखता रहा। ठाकुर उसकी आँखों में देखते देखते खुद उस की आँखों में खो गए और उसके साथ चल दिये। भक्ति के भी कैसे कैसे और कितने रूप होते हैं।

द्वारकाधीश मथुरा मे भोग

राधा टिला जाकर दर्द हुआ। अगल बगल बहु मंज़िली इमारत बन जाने के कारण अब तोते बहुत कम आते हैं, मोर तो आने बंद ही हो गए। प्रेम-मंदिर नवीन मंदिर है। मंदिर कम पर्यटन स्थल ज्यादा।
प्रेम मंदिर

निधिवन, कृष्ण – राधा – गोपियों की महारासलीला स्थल। अनेक दन्त कथाएँ। इन कथाओं की सत्यता और प्रामाणिकता पर ध्यान गया, तब तो बस लखनऊ की भूल भुलय्या की तरह उलझ कर रह जाएंगे।  इनमें डूब कर भक्ति भाव से छक कर रसपान कीजिये, स्वाद का 
प्रेम मंदिर का समय

आनंद लीजिये। तभी इसे समझ पाएंगे, नहीं तो केवल धूल हाथ लगेगी।  इसकी छटा अभी  भी निराली है। पहले का अब स्मृति में नहीं। अत: कितना और क्या बदलाव आया इसका अंदाज नहीं लगा सका। रमन रेती भी अच्छी जगह है। देख कर ही अहसास होता है। यहाँ की रज में गुरगंडी भी खाया लेकिन न रज मिली, न सुगंध, न भाव। खोजता रहा लेकिन हाथ लगी नहीं। नया गोकुल - पुराना गोकुल - नन्द भवन - नन्द किला में हम उलझ गए। अंत तक निकल पाये कि नहीं भरोसा  नहीं। हर कोई अपने ही स्थान को असली जगह बताता है। गूगल से जो जगह मिली, वहाँ पहुंचे, लेकिन लगा नहीं कि वह सही जगह है। लेकिन निष्कर्ष यही निकला कि नन्द किला नए गोकुल में और नन्द भवन पुराने गोकुल में है। गोल गोल घूमते रहने के कारण पुराने गोकुल तक पहुँचते पहुँचते रात हो गई थी।  बाल गोपाल की लीला स्थली नहीं देख पाये। लेकिन गोकुल में दर्द बहुत हुआ। यहाँ हर जगह पंडे-पुजारी ज्यादती कर रखे हैं। हर जगह एक ही दर्शन, एक ही तरीका-नियम। दर्शनों में पड़दा लगा रखे हैं। आराम से बैठ जाइए। एक ही कहानी सुनिए। और फिर कितना क्या भेंट चढ़ाना है चढ़ाईये। तब पर्दा हटेगा, दर्शन होंगे। केवल धांधली और लूट।

वृन्दावन की एक विशेष बात है – वहाँ के बंदर। ये चश्मा और पर्स के शातिर चोर हैं या डाकू। शायद विश्व में ऐसा कहीं नहीं मिलेगा। चश्मे पर नजर गड़ाए रखते हैं और मौका मिलते ही आँखों पर से चश्मा उतार कर मकान के मुंडेर पर चढ़ जाएंगे।  लोगों की भीड़ में से हाथ में पकड़े हुवे चश्मे को लेकर भागते हुवे भी मैंने बंदरों को देखा। हाथ से पर्स लेकर छीन कर भाग जाएंगे, उसे खोल कर नोट दिखाएंगे। मांग पूरी नहीं हुई तो नोट हवा में और चश्मे की भद्रा। मांग पूरी कर दीजिये अपना समान वापस ले लीजिये। किसी समय मांग थी खाने के  समान की। लेकिन अब तो मांग हो गई है पीने की, और वह भी फ्रूटी की। चशमा पॉकेट में रखें और पर्स सँभाल कर, हाथ से छीन कर ले जाने का कलेजा रखते हैं ये हनुमान। निधिवन के नजदीक सुबह सुबह मेरे सर पर से गरम ऊनी टोपी लेकर भाई भाग खड़ा हुआ। कोई दुकान खुली नहीं थी, अत: फ्रूटी मिली नहीं। नई बिस्किट का पैकेट मेरे मुंह पर वापस दे मारा। पैकेट खोल कर रखा, तो मुंह उठा कर देखा तक नहीं। किसी से लेकर रोटी दी, उसे देखा, उठाया, चखा, तब मेरी टोपी वापस मिली। जय हनुमान।

खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, नहीं खट्टे अनुभव तो कहीं नहीं हुवे, यात्रा समाप्त हुई।

और चित्रों के लिए यहाँ क्लिक करें 

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

रिलीफ़

चिकित्सा व्यवसाय नहीं है
 (मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी की मासिक पत्रिका “रिलीफ़” के जनवरी २०१७ अंक से उद्धृत)

चिकित्सा कार्य व्यवसाय नहीं है, व्यवसाय सरीखा होते हुवे भी यह एक सेवा कार्य है, साधना है, तपस्या है और रुग्ण प्राणी के रूप में भगवान की पूजा है। व्यवसाय में लेन देन होता है, एक ग्राहक होता है जो व्यवसायी को आय प्रदान करता है, इसलिए ग्राहक व्यवसायी के लिए महत्वपूर्ण और सम्माननीय होता है। लेकिन चिकित्सक के पास जो आता है वह ग्राहक नहीं होता, लेन देन करने वाला नहीं होता बल्कि रोग और कष्ट से परेशान एक दुखी और लाचार व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें ग्राहक जैसी अकड़ नहीं होती बल्कि याचक जैसी निरीहता और विनम्रता होती है। वह ग्राहक की तरह मोल भाव करने की स्थिति में नहीं होता बल्कि एक समर्पित और हर बात मानने की स्थिति वाला लाचार व्यक्ति होता है। चिकित्सक और रोगी का संबंध व्यावसायिक नहीं होता। इसके बावजूद चिकित्सक को भी अपने और परिवार के निर्वाह के लिए चिकित्सा के बदले धन मिलना जरूरी है। धन के बिना किसी का काम नहीं चलता है मगर चिकित्सक को सिर्फ धन प्राप्त करने और अधिक से अधिक प्राप्त करने के उद्देश्य से चिकित्सा नहीं करनी चाहिए। यदि उसका उद्देश्य आधिक से आधिक धन कमाना ही हो तो उसे चिकित्सा छोड़ कर अन्य व्यवसाय ग्रहण करना चाहिए।

      ----------------------------------------------------------------

गांधी जी का सेव
(कुरजां से साभार)

वर्धा के गांधीआश्रम में बुनियाद शिक्षा का मसौदा बन रहा था। डॉ. जाकिर हुसैन, के.टी.शाह, जे.बी.कृपलानी, आशा देवी आदि कई लोग मौजूद थे। बापू ने पूछा, “के.टी.अपने बच्चों के लिए कैसी शिक्षा तैयार कर रहे हो?” सब चुप रहे। के.टी.ने पूछा, “बापू, आप ही बताइये कि कैसी शिक्षा हो?” बापू ने कहा, “ के.टी., अगर मैं किसी भी कक्षा में जाकर पूछूं कि मैंने एक सेब चार आने में खरीदा और उसे एक रुपए में बेचा दिया तब मुझे क्या मिलेगा? मेरे इस प्रश्न के जवाब में अगर पूरी कक्षा ये कहे कि आपको जेल मिलेगी, तब मानूँगा कि आजाद भारत के बच्चों के सोच के मुताबिक शिक्षा है।” बापू के इस सवाल पर सब दंग रह गये। वास्तव में किसी व्यापारी को यह हक नहीं कि वह चार आने के चीज पर बारह आने लाभ कमाये। इस प्रकार बापू ने एक प्रश्न के जरिये नैतिक शिक्षा का संदेश बिना बताये ही दे दिया।

(आज शिक्षा का संदेश ही नहीं, उसका उद्देश्य भी बदल गया है। चार आने के सेव पर चार रुपये किस तरह कमाये जा सकते हैं, यही पढ़ाया और सिखाया जाता है। कच्चे माल, अनाज, सब्जी और फल को उगाने वाला किसान और मजदूर भूख से मरता है, बिचौलिये, व्यापारी और मल्टीनेशनल उसकी उपज पर सौ गुना लाभ कमा रहे हैं। क्या यही हमारी शिक्षा का उद्देश्य है।?) 

       --------------------------------------------------------------------------------

धन्य जीवन


अपने जीवन भर कि सम्पूर्ण कमाई सामाजिक कार्यों हेतु लगाने वाले विश्व के पहले एवं एकमात्र व्यक्ति हैं तमिलनाडू (भारत) के श्री कल्याण सुंदरम। पिछले 45 वर्षों से समाज सेवा के कार्यों में संलग्न लाइब्रेरी साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट, इतिहास और साहित्य में एम.ए. तथा भारत सरकार द्वारा देश के सर्वश्रेष्ठ लाइब्रेरियन पुरस्कार से सम्मानित हैं।

तीस वर्षों तक लाइब्रेरियन के पद पर सेवा कार्य के दौरान प्रतिमाह प्राप्त सम्पूर्ण वेतन गरीबों की सहायतार्थ दान किया। स्वयं के व्यक्तिगत खर्च पूर्ति हेतु होटल में वेटर के रूप में कार्य करते रहे तथा पेंशन में प्राप्त दस लाख की राशि भी दुखी गरीबों के सहायतार्थ दान कर दी।

गांधीवादी आदर्श से प्रेरित, एकदम साधारण जीवन शैली तथा अब तक अविवाहित। दूसरों की सहायता हेतु उनके इस भावनात्मक अनुपम कार्य से प्रभावित होकर अमेरिकी सरकार ने उन्हे सदी का महानायक (man of millennium) पुरस्कार से सम्मानित किया तथा 30 करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि प्रदान की, परंतु उस सम्पूर्ण राशि को भी हमेशा की तरह उन्होने गरीब असह्य लोगों में वितरित कर दिया। उनके इस अद्भुत जज्बे से प्रभावित होकर दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकान्त ने उन्हे बतौर पिता गोद लिया है। दुखद है कि अमेरिका जैसे सुदूर देश में उन्हे पहचान मिली परंतु हम में से कितने व्यक्ति को उनके बारे में पता है?

_____________________________________   


महान लोगों की महान बातें
(मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी की मासिक पत्रिका “रिलीफ़” के दिसम्बर २०१६ अंक का अंश)

मार्टिन लूथर किंग ने कहा था,“अगर तुम उड़ नहीं सकते हो तो दौड़ो। अगर तुम दौड़ नहीं सकते हो तो चलो। अगर तुम चल भी नहीं सकते हो तो घिसट कर रेंगो, मगर आगे बढ़ते रहो। क्योंकि एक जगह पड़े और खड़े रह जाने वाले का स्वागत सफलता नहीं करती है।”

उन्होने यह भी कहा था कि अगर रास्ते पर पत्थर ही पत्थर हों तो सँभल कर और अच्छा जूता पहन कर उस पर चला जा सकता है। लेकिन एक अच्छे जूते के अंदर एक भी कंकड़ हो तो अच्छी सड़क होने के बावजूद उस पर चलना मुश्किल होता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य बाहर कि चुनौतियों से नहीं हारता है बल्कि अपनी अंदर कि कमजोरियों से हारता है।   

संत विनोबा भावे कहा करते थे कि अभिमान और अहंकार फरिश्ते को भी शैतान बना देते हैं, लेकिन धैर्य और विनम्रता में भी कम ताकत नहीं होती वह मामूली इंसान को भी फरिस्ता बना देती है।


उन्होने यह भी कहा था कि आवाज को ऊंचा करने से ही दूसरे उसको नहीं सुनते हैं। आदमी का व्यक्तित्व ऊंचा होना चाहिए ताकि लोग उसे सुनने के लिए उसका इंतजार करें। 

                            --------------------------------------


सेवा उचित अथवा सस्ते दर पर सबको सुलभ हो
(मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी की मासिक पत्रिका “रिलीफ़” के अंक अगस्त २०१६ का संपादकीय)

पिछले कुछ दशकों में मारवाड़ी और हरियाणवी समाज में ही नहीं बल्कि गुजराती, बंगाली और अन्य जातीय समाज में भी उल्लेखनीय आर्थिक तरक्की और सामाजिक चेतना आयी है। व्यावसायिक सफलता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद एक बात मन को कूरेदती है, वह है, सामाजिक  दायित्व और सेवा भावना की कमी। कोलकाता जैसे महानगर में सामाजिक संगठनों का प्रचुर विकास हुआ है। शिक्षा और संस्कृति के प्रति भी जागरूकता फैली है, मगर व्यावसायिकता के स्तर पर ही। पिछले पाँच दशकों में यहाँ एक भी नया सार्वजनिक अस्पताल, पुस्तकालय अथवा शिक्षालय नहीं खुला है। जो भी नए अस्पताल अथवा स्कूल-कालेज खुले है, वे सब कॉर्पोरेट स्तर पर, व्यवसाय के उद्देश्य से खोले गए हैं। वहाँ समाज के साधारण वर्ग के लिए चिकित्सा अथवा शिक्षा सुलभ नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ कर सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित ज़्यादातर पुराने स्कूलों और अस्पतालों में भी पहले वाली सेवा और सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिसके हेतु उनकी स्थापना हुई थी। इसका कारण क्या है? त्रुटियाँ और समस्याएँ सभी जगहों में है मगर इस पर गंभीरतापूर्वक सोचने और विचार करने में भी किसी की भी रुचि नहीं है। सेवाभाव के स्थान पर कहीं व्यक्तिगत प्रचार नजर आता है तो कहीं अपरोक्ष स्वार्थ। समाज के कर्णधारों के पास इतना समय नहीं है कि वे पुरानी संस्थाओं की समस्याओं को मिलकर समझें और सुलझाएँ। ऊपरी तौर से तो यही नजर आता है कि अर्थाभाव, उचित संचालन और सेवाभाव की कमी ही वह कारण है जिससे कतिपय सार्वजनिक अस्पताल और विद्यालय बंद पड़े हैं, और कुछ बंद होने के कगार पर हैं। इस स्थिति में यह कर्तव्य पूरे समाज का बनता है कि वह सामाजिक संस्थाओं को सँभाले और स्वस्थ्य करे। जो सामाजिक कार्यकर्ता, कठनाइयों के बावजूद विभिन्न अस्पतालों, शिक्षालयों और पुस्तकालयों से जुड़ें हैं और उनसे संबन्धित समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनका सहयोग करना और उनका उत्साह बढ़ाना भी पूरेमाह समाज का कर्तव्य है। समाज के पास धार्मिक आयोजन के लिए धन की कमी नहीं होती है, मगर जब किसी सेवासंस्था अथवा रियायती दर पर चिकित्सा करने वाले अस्पताल का सवाल आता है तब पता नहीं क्यों समाज में कृपणता नजर आने लगती है। यह किसी भी संस्था अथवा संगठन के प्रति शिकायत नहीं है, बल्कि एक आम निवेदन है, सुझाव है, जो इस आशा के साथ दिया जा रहा है कि समाज के अग्रणी महानुभाव इस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेंगे। किसी भी जातीय अथवा प्रांतीय समुदाय द्वारा स्थापित क्यों न हो, नगर की सभी संस्थाएं समान रूप से पूरे समाज की धरोहर हैं और उनके उद्देश्य जाति और धर्म से ऊपर उठकर मानवमात्र की सेवा करना है। यह सेवा उचित अथवा सस्ते दर पर सबको सुलभ हो, यही हमारा उद्देश्य है।

स्वतन्त्रता दिवस की शुभ बेला पर हम सभी देशवासियों का सादर अभिनंदन करते हैं और उन्हे हमारी शुभकामनायें देते है।



---------------------------------------------


विदेशी ब्रांड के पैक्ड खाद्य पदार्थ हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाते है
(मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी की मासिक पत्रिका “रिलीफ़” के जुलाई २०१६ अंक का संपादकीय)

एक कथा है। एक शेर, एक भेड़िया और एक लोमड़ी इकट्ठे मिलकर शिकार कर रहे थे। उन्होने तीन जानवरों का शिकार किया, एक गधा, एक हिरण और एक खरगोश। शेर ने भेड़िये से पूछा, “बताओ, हम शिकार का बंटवारा कैसे करें?” भेड़िया बोला, आप बड़े हैं, गधा आप ले लीजिये, लोमड़ी खरगोश ले लेगी और मैं हिरण से संतुष्ट हो जाऊंगा। शेर क्रोध से गरजा और सलाह के पुरस्कार स्वरूप पंजे के एक ही वार से भेड़िये का सिर कुचल दिया। फिर उसने लोमड़ी से पूछा, “तुम्हारा क्या सुझाव है?” लोमड़ी बोली, “सीधी सी बात है, आप सुबह का भोजन गधे से करें, शाम का हिरण से और दोपहर का हल्का नाश्ता खरगोश से। सारा का सारा शिकार अकेले अपने को मिलते देख खुश होकर बोला, “बहुत ठीक, पर ऐसी बुद्धिमानी और न्यायप्रियता की बात करना तुमको सिखाया किसने?’ लोमड़ी ने उत्तर दिया, “श्रीमान, भेड़िये ने।

लोमड़ी के इस उत्तर के पीछे उसके मन में क्या था? भय था, शेर के प्रति भक्ति थी अथवा शेर का बचाखुचा पाने का लोभ था। इस बात का निर्णय आप स्वयं करें। जो बात हम कहना चाहते हैं  वह यह है कि जीवन के हर क्षेत्र में “शेर” भरे पड़े हैं। राजनीति हो चाहे उदद्योग और व्यवसाय, मजहब और धर्म का मामला हो अथवा शिक्षा और समाज सेवा का, हर जगह सत्ताधारी सारा का सारा शिकार खुद हड़प जाना चाहते हैं। हम आम लोग, लोमड़ी हैं, स्वेच्छा से सबकुछ “शेर” को दे देना पसंद करते हैं। विदेशी मल्टीनेश्नल कंपनियां आज हमारे उदद्योग और व्यवसाय पर हावी हैं। देश का धन और जनता का परिश्रम सब उनके मुंह में चला जाता है। हमें इस वस्तुस्थिति को समझना होगा और इस व्यवस्था को बदलना होगा। इसके लिए भेड़िये की तरह जान गँवाने की जरुरत नहीं है। जरुरत है शेर का साथ छोड़ कर अपना शिकार खुद करने और खाने की, याने विलासता और आराम के सामानों का मोह त्याग कर अपनी जरूरतों को सीमित करने की। विदेशी कंपनियों का अस्तित्व उपभोगताओं पर टिका है, यदि उपभोगता उनके उत्पादों को खरीदना और इस्तेमाल करना बंद कर दें तो वे “शेर” भूखों मर जाएंगे। एक बात और, विदेशी ब्रांड के पैक्ड खाद्य पदार्थों में जो धीमा जहर मिलाकर हमें खिलाया जा रहा है वह न सिर्फ हमारी सेहत को नुकसान पंहुचता है बल्कि एक नशे की तरह हमारी आदत बन कर हमारी सोच को भी विकृत करता है और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाता है।

इस माह रथ-यात्रा का पावन-पुण्यमय त्यौहार है। बाल गंगाधर तिलक और चन्द्रशेखर आजाद कि जयंती भी है। एक और स्मरणीय दिवस भी है जो हाल में मनाया जाने लगा है, “डॉक्टर्स डे”। डॉक्टरों के प्रति श्रद्धा जताना हमारे संस्कारों में है। हम डॉक्टरों को भगवान मानते हैं। दुविधा उत्पन्न होती है जब इस सम्मानीय पेशे के कुछ लोग अपने को सचमुच भगवान समझकर रोगियों कि अवहेलना करते हैं और उन्हे पैसा कमाने का माध्यम मानते हैं। ऐसे बहुत थोड़े लोग हैं, मगर वे सम्मानीय चिकित्सक समाज को बुरा नाम देते हैं। आशा करते हैं कि वे सभी अपने पेशे के महत्व और उसकी गरिमा को समझते हुए, सचमुच सेवा जगत के भगवान बनने का प्रयत्न करेंगे।

 राजेंद्र केडीया
परिचय
श्री राजेंद्र केडीया कोलकाता के मारवाड़ी रिलीफ़ सोसाइटी के सौजन्य से प्रकाशित पत्रिका “रेलीफ” के स्वयं-सेवकीय संपादक हैं। ६५ वर्ष की आयु में जब अन्य अपनी लेखनी रखने पर आ जाते हैं, राजेन्द्रजी ने लेखनी उठाई। पुराना राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित कई मौलिक कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। यहाँ उसी पत्रिका के कतिपय लेख तथा संपादकीय उद्धृत हैं।


गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

मैक्स मुलर और स्वर्णिम भारत

क्यों हम जब अपने देश के इतिहास का स्मरण करते हैं तो हमारी स्मरण शक्ति एवं साधारण जानकारी हमें मुग़लकालीन भारत तक ही ले जाती है?
क्यों हमें यह ध्यान नहीं रहता कि मुग़ल भारत भी ब्रिटिश भारत की तरह दासता  व गुलामी के भारत का ही इतिहास है जो लगभग सिर्फ ५०० वर्ष पुराना है?
क्यों हम यह नहीं समझते कि अंग्रेजों ने, भारत का शोषण कर, अपने देश, ब्रिटेन को समृद्ध किया?
क्या हमें यह मालूम नहीं कि अंग्रेजों ने दोनों हाथों से जी भर कर हमारे देश को नोचा, लूटा और खसोटा?
क्या तथ्य इस बात के साक्षी नहीं कि ब्रिटिश शासन अत्याचार, आतंक और दमन का शासन था?
क्या हम यह भी नहीं जानते हैं कि  मुग़ल भी थे तो आक्रान्ता ही, लेकिन यहाँ की सुजला, सुफला भूमि, यहाँ की संपन्नता व वैभव, कला व साहित्य, नैतिक एवं चारित्रिक सबलता देख कर दंग रह गए और यहीं रहने-बसने का इरादा कर लिया? मुग़लों ने हर प्रकार की नीतियाँ अपना कर हमसे पारिवारिक संबंध स्थापित किये। इन सम्बन्धों का असर ऐसा हुआ कि आक्रांता मुगलों के पक्ष में भारतीय शासक और सैनिक ही दूसरे भारतीय शासक के विरुद्ध युद्ध में शरीक हुए। महारणा प्रताप और शिवाजी जैसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। इन देश प्रेमियों के विरुद्ध लड़ने वाले राजपूत और मराठे ही थे और उन्ही के कारण प्रताप और शिवा को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
कब तक विद्यालयों में भारत के इतिहास का प्रमुख पाठ मुग़ल भारत की चर्चा, उनका गुणगान और उनके विजय की गाथा से भरा रहेगा?
क्यों हमारे विद्यालयों में हमारे पराभव, पराजय, अपमान और गद्दारी का इतिहास पढ़ाया जाता है?
क्या कारण है कि हमारे इतिहास के जिन पन्नों को हमें समेट देना चाहिए था उसकी तो विस्तृत चर्चा करते हैं और जिनकी विस्तृत चर्चा करनी थी उनको आधे-एक पन्ने में समेट देते है?
क्या हम यह नहीं जानते कि यह पूरा पाठ्यक्रम ब्रिटिश शासकों का बनाया हुआ है और इसी पाठ्यक्रम को कमोबेश हम चला रहे हैं?
क्या हमारी इतनी समझ नहीं है कि इस पाठ्यक्रम से अंग्रेजों का उद्देश्य हमें हीन भावना से ग्रस्त करना था?
लेकिन अब स्वतन्त्रता प्राप्ति के ७० वर्ष बाद भी क्यों हमें साधारणतया अपने “स्वर्ण-युग” कि जानकारी नहीं है जो हमारी असली पहचान है। क्यों हमसे हमारा परिचय नहीं है?  

हम जिस गौरवशाली भारत, महान आर्यावर्त, “सोने की चिड़िया” की बात करते हैं क्या वे केवल कपोल कल्पनाएं हैं? क्या इनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है? क्या हम कहानियों के आधार पर ही अपनी महानता का झूठा दंभ दिखाते फिरते हैं? दर असल हम प्राय: जहां से भारत के इतिहास की चर्चा करते हैं वहाँ से इसका प्रारम्भ नहीं समापन है। उसके बाद तो केवल हमारी दासता की कहानी है जो समाप्त होती है १९४७ में, अंग्रेजों के जाने के बाद। यह हजार वर्षों का काल खंड भारत की नहीं गुलाम भारत की दास्तां है। उज्ज्वल भारत, स्वर्णिम भारत, हमारी पहचान तो उसके पहले का स्वतंत्र भारत है।

भारत को समझने के लिए हमें हजारों वर्ष पहले जाना होगा, गुलामी के पहले, स्वतंत्र भारत की तरफ। मौर्य वंश (३२२-१८५ बीसी) और गुप्त वंश (३२०-५५०) के  साम्राज्य का इतिहास भारत का परिचय है। यही वह समय था जब ग्रीक यात्री मेगास्थनीज (३२०-२९० बीसी),  चीनी यात्री फ़ाहियन (३३७-४२२) एवं हुवेनसांग (६०२-६४४) भारत आए थे और अपनी यात्रा तथा तत्कालीन भारत के बारे में लिखा। इस समय के इतिहास को ठीक से खँगालने, शोध एवं खोज करने की  आवश्यकता है, क्योंकि बहुत कुछ है जिसकी हमें जानकारी नहीं है। कहते हैं इतिहास को सुख और शांति का काल पसंद नहीं। उसे तो क्रांति और युद्ध का ही समय चाहिए। संभव है, गुप्त काल सुख और शांति का समय होने के कारण उसके बारे में इतिहास में विशेष कुछ लिखा न गया हो। खोज-बीन कर पुनर्वालोकन करने की आवश्यकता है।

यह हमें खुद सोचना और विचार करना चाहिए कि क्या कारण था कि अपने देश को छोड़ कर मुग़ल भारत में बस गए? क्यों अंग्रेज़ भी इतनी दूर आकर भारत में इतना निवेश किया? क्या कोई भी व्यापारी, समाज, मुल्क किसी भी गरीब – दीन – हीन से व्यापार करता है? क्या चोरों, लुटेरों, बेईमानों, डाकुओं से व्यापार संभव है? क्या ऐसे लोगों के मध्य बसता है? क्या कोई अनपढ़, गंवार, असभ्य के बीच रहना पसंद करता है? हम इन प्रश्नों के तह तक जाएँ तो हमें खुद अपना स्वरूप दिखाई पड़ जाएगा कि हम किसकी संतान हैं? हमारा हम से साक्षात्कार  होगा।

अंग्रेजों को इस बात का इल्म था कि अगर हमें अपनी महानता का परिचय हुआ तो बगावत हो सकती है जिसे अंग्रेज़ किसी भी अवस्था में सँभाल नहीं पाएंगे। अत: हमारे गौरवशाली और स्वर्ण युग को नजरंदाज करके दासता, पराभव, पराजय, हीनता, अपमान की ही चर्चा की। जिससे हम मानसिक रूप से यह मान बैठे कि हम निरीह, अज्ञानी और अपमानजनक व्यवहार के योज्ञ हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने “Discovery of India” में भारत का इतिहास लिखा है। यह लगभग ६०० पृष्ठों का ग्रंथ है। इसमें आदिकाल, वेद-पुराण-रामायण-महाभारत काल से अंग्रेजों के शासन तक का इतिहास लिपिबद्ध है। इस पुस्तक में भी उन्होने इस स्वर्ण युग का बहुत कम जिक्र किया है। इसके तीन ही कारण हो सकते हैं -
१। नेहरू जी को इसकी विस्तृत जानकारी नहीं थी,
२। नहरुजी ने इस काल खंड को नजर अंदाज किया, और
३। इस इतिहास की ज्यादा जानकारी उपलब्ध ही नहीं है।
पहले दो कारण सही नहीं हो सकते। और अगर तीसरा कारण सही है तो इसके लिए अथक परिश्रम की आवश्यकता है। स्वतंत्र भारत की सरकार ने जो भी जानकारी उपलब्ध है उसे विस्तृत रूप में विदद्यालयों तक पहुँचने में विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई, यह हमारा दुर्भाग्य है। 

जर्मन विद्वान मैक्स मुलर ने भारत का गहन अध्ययन किया और भारत की सही तस्वीर दुनिया के सामने रखी। उसने भारत और हिंदुओं के बारे में जो लिखा उस पर हमें खुद को सहसा विश्वास नहीं होता। लगता है कि कोई भ्रम है, अतिशयोक्ति है। हम अपनी ही नजरों में इतने गिर चुके हैं कि हम उस पर विश्वास करने से कतराते हैं। सही बात तो यह है कि उस समय भी अनेक  विदेशी विद्वान मैक्स मुलर से सहमत नहीं थे और इसका विरोध और आलोचना की थी। आलोचना थी लेखक कि इस घोषणा पर जिसमें उसने भारत और हिंदुओं को “सर्वश्रेष्ठ” कहा था। जिस देश को अंग्रेजों ने पूरे विश्व में दीन-हीन, गंवार-अशिक्षित, गरीब-भूखा-नंगा, चोर-डाकू-ठग, साँप-जंगल-जानवर के प्रदेश के रूप में चित्रित कर रखा था उस देश के लिए ऐसी घोषणा पर प्रश्न चिन्ह लगाना स्वाभाविक है।

भारत मेँ प्रशासन हेतु भेजे जाने वाले ICS अधिकारियों को भारत से परिचत करवाने के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने मैक्स मुलर के एक व्यख्यानमाला  का १८८२ में आयोजन किया था। यह पूरी व्याख्यानमाला एक पुस्तक (India:What Can it teach us) के रूप मेँ उपलब्ध है। उस पुस्तक के केवल एक अध्याय, जिस पर सबसे ज्यादा उंगली उठाई गई, के कुछ अंश को मैं पाठकों कि जानकरी के लिए उद्धृत कर रहा हूँ। विश्लेषण आप खुद करें।

1.  If we were to look over the whole world to find out the country most richly endowed with all the wealth, power and beauty that nature can bestow – in some parts a very paradise on earthI should point to India. 

2.     If I were asked under what sky the human mind has most fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions of some of them which will deserve the attention even of those who have studied Pluto and Kant – I should point to India.

3.     And if I were to ask myself from what literature we, here in Europe, we who have been nurtured almost exclusively on the thoughts of Greeks and Romans, and one Semitic race the Jewish, may draw that corrective which is most wanted in order to make our inner life more perfect, more comprehensive, more universal, in fact more truly human, a life, not for this life only, but for transfigured and eternal life – again I should point to India.

4.     A very common characteristic of these men (Hindu) and of the Hindus especially, was simplicity truly childish, and a total un-acquaintance with the business and manners of life. Where that features was lost? It was chiefly by those who had been long familiar with Europeans.

5.     Polished manners, clearness and comprehensions of understanding, liberty of feeling and independence of principle that would have stamped them (Hindu) gentlemen in any country in the world.

6.     Let me add that I have been repeatedly told by English merchants that commercial honour stands higher in India than in any other country and that a dishonoured bill is hardly known there (India).

इसके अलावा इसी अध्याय में मैक्स मुलर ने कई अधिकारियों, शासकों, विदेशी यात्रियों एवं इतिहासकारों की उक्तियाँ भी उद्धृत की हैं। ये भी पढ़ने एवं मनन करने योग्य हैं:-

1.  कर्नल स्लीमैन भारत में कई वर्षों तक “Commissioner for the suppression of thuggee” रहे और इस सिलसिले में उन्हे भारत में  भ्रमण करते रहे और उन्हे आम जनता के निरंतर संपर्क में रहना पड़ा। मैक्स मुलर ने लिखा कि वे लिखते हैं - “In their panchayats,  men adhere habitually, and religiously to the truth and I had before me hundreds of cases, in which a man’s property, liberty and life has depended upon his telling a lie, and he has refused to tell it.”
2.  हुवेंनसंग कि पंक्तियां भी उन्होने उद्धृत कि हैं,Though the Indians are of light temperament, they are distinguished by the straightforwardness and honesty of their character. With regard to riches, they never take anything unjustly: with regard to justice they even make excessive concessions ....... Straightforwardness is the distinguished features of their administration.
3.  ११वीं सदी के स्पेन के इतिहासकर मोहम्मद इद्रीसी की पुस्तक से मैक्स मुलर ने उद्धृत की है ये पंक्तियाँ “The Indians are naturally inclined to justice, and never depart from it in their actions. Their good faith, honesty and fidelity to their engagements are well known they are so famous for these qualities that people flock to their country from every side.
4.  अकबर के मंत्री आबु फजल की “आईने अकबरी” से ये पंक्तियाँ,The Hindus are religious, affable, cheerful, lovers of justice, given to retirement, able in business, admirers of truth, grateful and of unbounded fidelity: and their soldiers know not what it is to fly from the field of battle.”
5.  वारेन हेस्टिंगस से हम सब परिचित हैं। वे लिखते हैं, “They (Indian) are gentle and benevolent, more susceptible of gratitude for kindness shown them, and less prompted to vengeance for wrongs inflicted than any people on the face of the earth: faithful, affectionate, submissive to legal authority.”
6.  कलकत्ता के बिशप हेबर का उद्धरण, “The Hindus are brave, courteous, intelligent, most eager for knowledge and improvement: sober, industrious, dutiful to parents, affectionate to their children, uniformly gentle and patient, and more easily effected by kindness and attention to their wants and feelings than any other people I ever met.”
7.  मौन्स्तुयार्ट एल्फिन्स्तोन, जो ब्रिटिश भारत में मुंबई के राज्यपाल थे ने लिखा है, Including the Thugs and Dacoits, the mass of crime is less in India than in England”.
8.  सर थॉमस मुनरो, जो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के अधिकारी थे, ने तो यहाँ तक लिखा है कि, “if civilisation is to become an article of trade between England and India, I am convinced that England will gain by the import cargo.”

मैक्स मुलर ने इसी अध्याय में स्लीमन कि पुस्तक के आधार पर यह बताया है कि भारत में न्यायालयों में कुरान शरीफ एवं गंगा की शपथ दिलाई जाती है। अगर इसे बदल कर “ईश्वर” की शपथ दिलाई जाए तो उसका क्या असर होगा? सर्वे से पता चला कि निवासियों को प्रमुखत: तीन विभागों में विभाजित किया जा सकता है :
१। ऐसे लोग जो बिना शपथ के भी सत्य ही कहेंगे,
२। अगर शपथ नहीं दिलाई जाए तो स्वार्थवश सत्य से विमुख हो सकते हैं। लेकिन शपथ कुरान शरीफ या गंगा कि ही होनी चाहिए,
३।  शपथ से कोई फर्क नहीं पड़ता, स्वार्थ वश झूठ कहने में नहीं हिचकिचाएँगे।

जोड़-घटाव करने से यह चौंकाने वाला आंकड़ा  सामने आया कि संख्या के आधार पर २रे प्रकार के लोग सबसे ज्यादा हैं जो प्राय: गांवों में रहते हैं। १ले प्रकार के लोगों की संख्या उनसे कम है और वे भी गांवो में रहने वाले है। ३रे प्रकार के लोग सबसे कम हैं और प्राय: शहर के निवासी हैं। यह अवस्था सिर्फ २००-२५० वर्षों पुरानी है जिसकी नींव पड़ी थी १५००  वर्ष पूर्व। महात्मा गांधी के सचिव प्यारेलाल कि पुस्तक से भी सत्य के प्रति हमारी वचन बद्धता सिद्ध होती है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व बिहार में फैले दंगो को नियंत्रण में लेने के लिए नेहरुजी ने बिहार का दौरा किया था। प्यारेलाल ने “गांधी पूर्णाहुति” खंड २ पृ ३७८ में इस यात्रा का जिक्र करते हुए लिखा, “पीड़ित क्षेत्रों में हुई इन सभाओं में चारों ओर के गांवों से बहुत बड़ी संख्या में किसान उपस्थित हुए। प्रत्येक सभा के अंत में पंडित नेहरू ने हाथ उठवा कर श्रोताओं से प्रतिज्ञा कराई कि इस प्रकार का दुराचरण फिर कभी नहीं करेंगे। बाद के समाचारों से पता चला कि इस प्रकार प्रतिज्ञा लेने वाले इन किसानों ने अपने वचन का महत्व समझा और सचमुच दूसरों से उन्होने ने कहा कि जब हम वचन दे चुके हैं तो उसका पालन करना होगा।“

यह है हमारी वंश परंपरा और हमारा इतिहास। हम वंशज हैं ऐसी महान कौम के जो सत्य पर कायम रहते हैं भले ही सर्वस्व लुट जाए। इसे बार बार दोहरने और नई पीढ़ी को बताने कि आवश्यकता है। हम वो नहीं हैं जो अंग्रेजों ने सबको दिखाया और दुनिया तथा हमने माना। हमें अपने इस अतीत के गौरव को, अपने स्वर्णिम युग को जानना, समझना और बताना है। इससे हमारी हीन भावना समाप्त होगी और हम पूरे आत्मविश्वास के साथ सर उठा कर कह सकेंगे कि हम भारत के वासी हैं। आत्म विश्वास प्रगति और उत्थान के नए आयामों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है।  


शनिवार, 19 नवंबर 2016

       परम्परा

परम्परा को अंधी लाठी से मत पीटो।
उस में बहुत कुछ
                    जो जीवित है,
                  जीवन-दायक है।
जैसा भी हो,
ध्वंस से बचा रखने लायक है।

पानी का छिछला होकर
                      समतल में दौड़ना,
                  यह क्रांति का नाम है।
            लेकिन घाट बांधकर
            पानी को गहरा बनाना,
            यह परम्परा का काम है।

परम्परा और क्रांति में
                  संघर्ष चलने दो।
आग लगी है, तो
            सूखी टहनियों को जलने दो।
मगर जो टहनियाँ
                 आज भी कच्ची और हरी हैं,
                     उन पर तो तरस खाओ।
            मेरी एक बात तो तुम मान जाओ।

परम्परा जब लुप्त होती है,
लोगों के आस्था के आधार
                        टूट जाते हैं।
उखड़े हुए पेड़ों के समान
वे अपनी जड़ों से छूट जाते हैं।
परम्परा जब लुप्त होती है,
                  लोगों को नींद नहीं आती,
न नशा किये बिना
            चैन या कल पड़ती है।
परम्परा जब लुप्त होती है,
सभ्यता अकेलेपन के
                  दर्द से मरती है।

क़लमें लगाना जानते हो,
                  तो जरूर लगाओ,
मगर ऐसे कि फलों में
                  अपनी मिट्टी का स्वाद रहे।
और यह बात याद रहे
कि परम्परा चीनी नहीं           
                  मधु है।

परम्परा को अंधी लाठी से मत पीटो।
उस में बहुत कुछ
जो जीवित है,       जीवन-दायक है।
जैसा भी हो,
ध्वंस से बचा रखने लायक है।

शनिवार, 12 नवंबर 2016

आजादी या गुलामी : ब्रिटिश इंडिया या हमारा भारत

१५ अगस्त १९४७ की रात भारत आजाद हो गया। अंग्रेजों ने देश की बागडोर भारतीयों के हाथों में सौंप दी। पूरे भारत में यूनियन जैक का स्थान भारतीय तिरंगे ने ले लिया। लेकिन जनता गुलाम ही रही। तब फिर कौन आजाद हुआ? क्या भारतीय आजाद हुआ? किससे आजाद हुआ? जनता आजाद हुई? क्या आजादी की हमारी परिभाषा यही थी?

हाँ, यह ठीक है कि सबसे पहले आजादी। लेकिन गांधी ने इससे आगे सोचने के लिए कहा। गांधीजी पहले ऐसे विश्व  नेता थे जिनका यह मानना था कि आजादी के पूर्व इस पर विचार करने की जरूरत है कि किसकी आजादी, किससे आजादी और कैसी आजादी? अगर हमारे पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं तो हम केवल व्यक्तियों की अदला-बदली ही कर पाएंगे।  आजादी हासिल नहीं कर पाएंगे। बाघ बदल जाएंगे उनका स्वभाव तो वैसा ही रहेगा। १९७१ में मुजीब के नेतृत्व में बंगला देश ने पश्चिमी पाकिस्तान से आजादी हासिल कर ली। लेकिन परिणाम? खुद मुजीब की हत्या कर दी गई। बंगला देश में अराजकता फैल गई। स्टालिन के नेतृत्व में रूस “जार” से आजाद हुआ लेकिन स्टालिन  खुद “जार” बन बैठा। १९७७ के चुनाव में, आपतकाल के बाद, देश की सब राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर इन्दिरा गांधी को मात दे दी, लेकिन नई सरकार अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई और इन्दिरा वापस सत्ता में आ गई।

ऐसा क्यों हुआ? इन सबका लक्ष्य आजादी” ही थी और आजादी मिल भी गई। लेकिन वह आजादी अपनी आजादी के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई। क्योंकि इस आजादी को कार्य का “समापन” समझा गया। न आजादी की व्याख्या की गई, न उसपर विचार किया गया, न कोई रूप रेखा तैयार थी। अत: गुलामी ही वेश बदल कर वापस आ गई। सच्चाई यह है कि आजादी तो केवल अपनी सोच, समझ और विचार के अनुरूप कार्य करने का अधिकार मात्र था। जिस खंडित राष्ट्र को हासिल किया गया है उसका नव निर्माण करने का अधिकार मात्र था। उसकी पूरी योजना होनी चाहिए थी और उस पर पूरी ईमानदारी से कार्य होना चाहिए था। लेकिन, न तो उसकी कोई योजना बनाई गई और न ही उसपर विचार किया गया। गांधी ने आजादी के पश्चात के कार्यक्रमों पर विचार करने के लिए कहा और उनके पास स्वतंत्र भारत की छवि, रूप रेखा, स्वरूप स्पष्ट भी थी। लेकिन कांग्रेस ने भारत को स्वतंत्र करने के अंग्रेजों के निर्णय के बाद गांधी को हटा दिया। गांधी की निगाह राष्ट्र एवं जनता पर थी लेकिन काँग्रेस की नजर सत्ता पर थी। गांधी के भारत से वे सहमत नहीं थे और उनके पास अपनी कोई योजना नहीं थी, कोई स्वरूप नहीं था। विदेशों से लाये गए उधार के विचारों को तोड़-मरोड़ कर भारतीयता का जामा पहना कर अपना लिया। गांधी के सपनों के भारत को तो वे पहले ही खारिज कर चुके थे। भारत देसी रहा नहीं, विदेसी हो नहीं सकता था।   

गांधी को दर किनार करने का अर्थ नैतिकता, राष्ट्रियता, अहिंसा को किनारे करना था। इस एक कदम ने केवल गांधी को नहीं छोड़ा बल्कि गांधीवादी पूरी कौम को उपेक्षित कर दिया। इस पूरे घटक की साख समाप्त हो गई, ये उपेक्षित हो गए।  “मजबूरी का नाम गांधी” की घोषणा कर इनका मखौल उड़ाया गया। नैतिकता नष्ट हो गई, राष्ट्रियता समाप्त हो गई, हिंसा मान्य हो गई। गांधी जनता के उपासक थे लेकिन अन्य नेता सत्ता के पुजारी थे। इसी कारण आजादी का लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद गांधी की काँग्रेस को भंग  करने की सलाह कांग्रेसियों ने ठुकरा दी। उन नेताओं का उद्देश्य जनता की सेवा करना नहीं बल्कि उन पर शासन करना था। ब्रिटिश राज से देखा समझा हुआ आतंक का शासन ही उनके ख़यालों में था। । वे पीढ़ी दर पीढ़ी उसी अंग्रेजों के दिखाये-सिखाये रास्ते पर चलते जा रहे हैं। विधायक और प्रशासक खुल्लम खुल्ला  नियम, कायदे और कानून का मखौल उड़ाते हैं और उनकी अवहेलना करना अपना विशेषाधिकार मानते हैं। अपने आचरणों से यह साबित करते हैं कि कानून जनता के लिए है उनके लिए नहीं। यथा राजा तथा प्रजा। हर कोई अपने बल-बूते के अनुसार नियम, कायदे और कानून का उल्लंघन करता है, आतंकी बना हुआ है और उसे ही अपना बड़प्पन समझता है।

मैं वापस अपने उपरोक्त प्रश्न पर आता हूँ - क्या सचमुच आजाद हुआ? कौन आजाद हुआ? किससे आजाद हुआ? जनता आजाद हुई? क्या हमारी आजादी की परिभाषा यही थी? हमें मिला क्या? पहनने के लिए चिथड़े, रहने के लिए खुला आसमान, खाने के लिए .....? अंग्रेजों की ही तरह सत्ता का विरोध अपराध हो गया, विधायकों और प्रशसकों को अपरिमित विशेषधिकर प्राप्त हुवे, गली के गुंडो के बजाय थाने की पुलिस से ज्यादा भय लगने लगा। २५० वर्षों से दमित दासता और उसके पहले कि १००० वर्षों कि गुलामी के बाद हमारी मानसिकता ही गुलाम की हो गई। हमें शासक की ही खोज थी और वे हमें मिल गए। वेश बदल कर देशी गुलामी वापस आ गई। जनता तो जहां, जैसी थी वैसी ही रही केवल दमनकारियों कि चमड़ी का रंग बदल गया। 

स्वतन्त्रता संग्राम में बनाए गए बंदियों को जेलों से रिहाई मिली। संग्राम में भाग लेने वालों को स्वतन्त्रता सेनानी का खिताब मिला, पेंशन भी मिली। संग्राम में मारे जाने वाले वीरों को “शहीद” कह कर उनका सम्मान किया गया और उनके आश्रित परिवारों को भी तमगे और पेंशन मिले। इसके विपरीत वे भारतीय जिन्होंने अंग्रेजों की जी हजूरी की, भारतीयों पर जुल्म ढाये, रायबहादुर और सर की उपाधि शान से ली, को कोई पेंशन नहीं मिली, सेनानी भी नहीं कहा गया, शहीद वे हुए नहीं। उन्हे केवल उच्च प्रशासनिक और वैधानिक पद मिला। उन्हे जनता की सेवा करने का उत्तरदायित्व दिया गया। उन्हे जनता पर शासन करने का अनुभव जो था। आजादी के तुरंत बाद भारत के प्रधानमंत्री ने तो प्रथम सेनाध्यक्ष भी किसी अनुभवी अंग्रेज़ को ही बनाने का प्रस्ताव रखा था। उनके विचारों के अनुसार किसी भी भारतीय को इस कार्य का अनुभाव नहीं था। उन्हे यह ध्यान नहीं आया कि उन्हे भी किसी देश को चलाने का अनुभव नहीं था। भारतीय भाषा के बदले अँग्रेजी भाषा का पक्ष लेते हुवे भी प्रधान मंत्री ने कहा कि हमारी भाषा में न तो वैसी पुस्तके हैं, न वैसे लेखक और न ही शब्द। अंग्रेजों का तो लक्ष्य ही यही था। भारतीय भाषा  नष्ट कर उसके स्थान पर अँग्रेजी को बैठना। उस विदेशी भाषा को हटा कर भारतीय भाषा के विकास का उत्तरदायित्व किस का था? अंग्रेजों का? फिर आजादी किस लिए, कैसे और क्यों? अनपढ़, गंवार, शक्तिहीन जनता को लताड़ना, उन पुर जुल्म करना, उनसे जी हजूरी करवाने का इन नए लोगों को बहुत अच्छा अनुभव था और इस अनुभव के बल पर आम जनता को भयाक्रांत, भूखा और नंगा रखा। बेचारी जनता दो जून रोटी और एक जोड़ी कपड़े के आगे सोच ही नहीं सकी। जनता इस आशा में जुल्म सहती जा रही है कि आज नहीं तो कल आजादी कि रोशनी उन पर भी पड़ेगी। उन्हे सताने वाले बाहरी नहीं अपने ही घर वाले हैं। कभी तो रहम खाएँगे।

प्रशासकों, विधायकों, बड़े उदद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने जनता की आंखो पर तेज सर्च लाइट डाल कर उसे चौंधिया दिया है। बेदम जनता पर्दे पर चल रही कम्प्युटर, रोजगार, गगनचुंबी स्मार्ट शहर, महंगी गाडियाँ, तेज रेल, ५ सितारा अस्पताल, विकास, रोजगार  की निरंतर चल रही फिल्म को चौंधियाई हुई आंखो से देख रही है। लेकिन इनके पीछे अंधेरे में खड़े चंद किरदारों और निर्देशकों को बेचारी भोली भली जनता न देख पा रही है और न समझ पा रही है। जनता को एक के बाद दूसरे सम्मोहन में डालते हुवे ये चंद लोग मनमानी कर रहे हैं। अंग्रेज़ शासकों के सब गुण इन में मिल जाएंगे, जो समय के साथ फलते फूलते भी रहे हैं। यह तो बुरा हो इस संविधान का जिसके कारण ५ सालों में उन्हे इस भिखमंगी जनता के सामने हाथ पसारना पड़ता है। और हमारा दुर्भाग्य आज ७० वर्षों के बाद भी हम में  उन पसारे हुवे गंदे हाथों को काटने की कुव्वत नहीं आई। 

ऐसे में कौन स्थापित करेगा “हम भारत के लोग” को? यह तो तभी हो सकता है जब इस उद्देश्य को सम्मुख रखते हुवे छोटे छोटे कदम उठाने शुरू करें। माना कि मंजिल तक पहुँचने के लिए बहुत कदम उठाने होंगे, लेकिन एक बार में केवल एक कदम। पूरे रास्ते का ध्यान करने से कभी कभी यात्रा ही प्रारम्भ नहीं होती।

   नियमों का पालन करें                       अन्याय  सहन न करें
   पड़ोसियों से संवाद करें                      अपनी ही दुनिया में न रहें
   बुजुर्गों का सम्मान करें                      परिवार के दायरे को बढ़ाएँ
   अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाएं          विदेशी सीखें लेकिन अपनाएं नहीं


अगर हमारी नैतिकता और चरित्र मजबूत होती है तो हमारे अंदर साहस का संचार होता है। साहस हमें संगठित करेगा और यह संगठन इस कोढ़ को निकाल फेंकेगा।